विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ]
* चतुर्थ अंश *
२३५
[संस्कृत मूल पाठ]
सुवृद्धेः केवलः ॥ ३८ ॥ केवलान्त्सुधृतिर-
भूत् ॥ ३९ ॥ ततश्च नरः ॥ ४० ॥ तस्मा-
च्चन्द्रः ॥ ४१ ॥ ततः केवलोऽभूत् ॥ ४२ ॥
केवलाद्वन्धुमान् ॥ ४३ ॥ बन्धुमतो वेगवान् ॥ ४४ ॥
वेगवतो बुधः ॥ ४५ ॥ ततश्च तृणबिन्दुः ॥ ४६ ॥
तस्याप्येका कन्या इलविला नाम ॥ ४७ ॥
ततश्चालम्बुषा नाम वराप्सरास्तृणबिन्दुं
भेजे ॥ ४८ ॥ तस्यामप्यस्य विशालो जज्ञे
यः पुरीं विशालां निर्ममे ॥ ४९ ॥
हेमचन्द्रश्च विशालस्य पुत्रोऽभवत् ॥ ५० ॥
ततश्चन्द्रः ॥ ५१ ॥ तत्तनयो धूम्राक्षः ॥ ५२ ॥ तस्यापि
सृञ्जयोऽभूत् ॥ ५३ ॥ सृञ्जयात्सहदेवः ॥ ५४ ॥
ततश्च कृशाश्वो नाम पुत्रोऽभवत् ॥ ५५ ॥
सोमदत्तः कृशाश्वाज्जज्ञे योऽश्वमेधानां
शतमाजहार ॥ ५६ ॥ तत्पुत्रो जनमेजयः ॥ ५७ ॥
जनमेजयात्सुमतिः ॥ ५८ ॥ एते वैशालिका
भूभृतः ॥ ५९ ॥ श्लोकोऽप्यत्र गीयते ॥ ६० ॥
तृणबिन्दोः प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपाः ।
दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तोऽतिधार्मिकाः ॥ ६१
शर्यातेः कन्या सुकन्या नामाभवत्,
यामुपयेमे च्यवनः ॥ ६२ ॥ आनर्त्तनामा परम-
धार्मिकश्शर्यातिपुत्रोऽभवत् ॥ ६३ ॥ आनर्त्तस्यापि
रेवतनामा पुत्रो यज्ञे योऽसावानर्त्तविषयं बुभुजे
पुरीं च कुशस्थलीमध्युवास ॥ ६४ ॥
रेवतस्यापि रैवतः पुत्रः ककुद्मिनामा धर्मात्मा
भ्रातृशतस्य ज्येष्ठोऽभवत् ॥ ६५ ॥ तस्य रेवती
नाम कन्याभवत् ॥ ६६ ॥ स तामादाय कस्येय-
मर्हतीति भगवन्तमब्जयोनिं प्रष्टुं ब्रह्मलोकं
जगाम ॥ ६७ ॥ तावच्च ब्रह्मणोऽन्तिके
हाहाहूहूसंज्ञाभ्यां गन्धर्वाभ्यामतितानं नाम
दिव्यं गान्धर्वमगीयत ॥ ६८ ॥ तच्च
त्रिमार्गपरिवृत्तैरनेकयुगपरिवृत्तिं तिष्ठन्नपि
रैवतश्शृण्वन्मुहूर्त्तमिव मेने ॥ ६९ ॥
गीतावसाने च भगवन्तमब्जयोनिं प्रणम्य रैवतः
[हिन्दी अनुवाद]
सुवृद्धिसे केवल और केवलसे सुधृतिका जन्म हुआ ॥ ३७—३९ ॥ सुधृतिसे नर, नरसे चन्द्र और चन्द्रसे केवल हुआ ॥ ४०—४२ ॥ केवलसे बन्धुमान्, बन्धुमान्से वेगवान्, वेगवान्से बुध, बुधसे तृणबिन्दु तथा तृणबिन्दुसे पहले तो इलविला नामकी एक कन्या हुई थी, किन्तु पीछे अलम्बुषा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा उसपर अनुरक्त हो गयी। उससे तृणबिन्दुके विशाल नामक पुत्र हुआ, जिसने विशाला नामकी पुरी बसायी ॥ ४३—४९ ॥
विशालका पुत्र हेमचन्द्र हुआ, हेमचन्द्रका चन्द्र, चन्द्रका धूम्राक्ष, धूम्राक्षका सृंजय, सृंजयका सहदेव और सहदेवका पुत्र कृशाश्व हुआ ॥ ५०—५५ ॥ कृशाश्वके सोमदत्त नामक पुत्र हुआ, जिसने सौ अश्वमेध-यज्ञ किये थे। उससे जनमेजय हुआ और जनमेजयसे सुमतिका जन्म हुआ। ये सब विशालवंशीय राजा हुए। इनके विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥ ५६—६० ॥
'तृणबिन्दुके प्रसादसे विशालवंशीय समस्त राजालोग दीर्घायु, महात्मा, वीर्यवान् और अति धर्मपरायण हुए ॥ ६१ ॥
मनुपुत्र शर्यातिके सुकन्या नामवाली एक कन्या हुई, जिसका विवाह च्यवन ऋषिके साथ हुआ ॥ ६२ ॥ शर्यातिके आनर्त्त नामक एक परम धार्मिक पुत्र हुआ। आनर्त्तके रेवत नामका पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामकी पुरीमें रहकर आनर्त्तदेशका राज्यभोग किया ॥ ६३-६४ ॥
रेवतका भी रैवत ककुद्मी नामक एक अति धर्मात्मा पुत्र था, जो अपने सौ भाइयोंमें सबसे बड़ा था ॥ ६५ ॥ उसके रेवती नामकी एक कन्या हुई ॥ ६६ ॥ महाराज रैवत उसे अपने साथ लेकर ब्रह्माजीसे यह पूछनेके लिये कि 'यह कन्या किस वरके योग्य है' ब्रह्मलोकको गये ॥ ६७ ॥ उस समय ब्रह्माजीके समीप हाहा और हूहू नामक दो गन्धर्व अतितान नामक दिव्य गान गा रहे थे ॥ ६८ ॥ वहाँ [गान-सम्बन्धी चित्रा, दक्षिणा और धात्री नामक] त्रिमार्गके परिवर्तनके साथ उनका विलक्षण गान सुनते हुए अनेकों युगोंके परिवर्तन-कालतक ठहरनेपर भी रैवतजीको केवल एक मुहूर्त ही बीता-सा मालूम हुआ ॥ ६९ ॥
गान समाप्त हो जानेपर रैवतने भगवान् कमलयोनिको