भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२३६ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० १


कन्यायोग्यं वरमपृच्छत्॥७०॥ ततश्चासौ भगवानकथयत कथय योऽभिमतस्ते वर इति ॥७१॥ पुनश्च प्रणम्य भगवते तस्मै यथाभिमतानात्मनस्स वरान् कथयामास। क एषां भगवतोऽभिमत इति यस्मै कन्यामिमां प्रयच्छामीति ॥ ७२ ॥

ततः किञ्चिदवनतशिरास्सस्मितं भगवानब्जयोनिरह॥ ७३ ॥ य एते भवतोऽभिमता नैतेषां साम्प्रतं पुत्रपौत्रापत्यापत्यसन्ततिरस्त्यवनीतले ॥ ७४॥ बहूनि तवात्रैव गान्धर्वं शृण्वतश्चतुर्युगान्यतीतानि॥ ७५ ॥ साम्प्रतं महीतलेऽष्टाविंशतितममनोश्चतुर्युगमतीतप्रायं वर्तते ॥ ७६ ॥ आसन्नो हि कलिः ॥ ७७ ॥ अन्यस्मै कन्यारत्नमिदं भवतैकाकिनाभिमताय देयम्॥ ७८ ॥ भवतोऽपि पुत्रमित्रकलत्रमन्त्रिभृत्यबन्धुबलकोशादयस्समस्ताः कालेनैतेनात्यन्तमतीताः ॥ ७९ ॥

ततः पुनरप्युत्पन्नसाध्वसो राजा भगवन्तं प्रणम्य पप्रच्छ ॥ ८० ॥ भगवन्नेवमवस्थिते मयेयं कस्मै देयेति ॥ ८१ ॥ ततस्स भगवान् किञ्चिदवनम्रकन्धरः कृताञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोकगुरुरम्भोजयोनिरह ॥ ८२ ॥

श्रीब्रह्मोवाच

न ह्यादिमध्यान्तमजस्य यस्य
विद्मो वयं सर्वमयस्य धातुः।
न च स्वरूपं न परं स्वभावं
न चैव सारं परमेश्वरस्य ॥ ८३

कलामुहूर्त्तादिमयश्च कालो
न यद्विभूतेः परिणामहेतुः।
अजन्मनाशस्य सदैकमूर्त्ते-
रनामरूपस्य सनातनस्य ॥ ८४

यस्य प्रसादादहमच्युतस्य
भूतः प्रजासृष्टिकरोऽन्तकारी।
क्रोधाच्च रुद्रः स्थितिहेतुभूतो
यस्माच्च मध्ये पुरुषः परस्मात् ॥ ८५


प्रणाम कर उनसे अपनी कन्याके योग्य वर पूछा॥७०॥ भगवान् ब्रह्माने कहा—"तुम्हें जो वर अभिमत हों उन्हें बताओ"॥७१॥ तब उन्होंने भगवान् ब्रह्माजीको पुनः प्रणाम कर अपने समस्त अभिमत वरोंका वर्णन किया और पूछा कि 'इनमेंसे आपको कौन वर पसन्द है जिसे मैं यह कन्या दूँ?'॥७२॥

इसपर भगवान् कमलयोनि कुछ सिर झुकाकर मुसकाते हुए बोले—॥७३॥ "तुमको जो-जो वर अभिमत हैं उनमेंसे तो अब पृथिवीपर किसीके पुत्र-पौत्रादिकी सन्तान भी नहीं है॥७४॥ क्योंकि यहाँ गन्धर्वोंका गान सुनते हुए तुम्हें कई चतुर्युग बीत चुके हैं॥७५॥ इस समय पृथिवीतलपर अट्ठाईसवें मनुका चतुर्युग प्रायः समाप्त हो चुका है॥७६॥ तथा कलियुगका प्रारम्भ होनेवाला है॥७७॥ अब तुम [अपने समान] अकेले ही रह गये हो, अतः यह कन्या-रत्न किसी और योग्य वरको दो। इतने समयमें तुम्हारे पुत्र, मित्र, कलत्र, मन्त्रिवर्ग, भृत्यगण, बन्धुगण, सेना और कोशादिका भी सर्वथा अभाव हो चुका है"॥७८-७९॥

तब तो राजा रैवतने अत्यन्त भयभीत हो भगवान् ब्रह्माजीको पुनः प्रणाम कर पूछा—॥८०॥ 'भगवन्! ऐसी बात है, तो अब मैं इसे किसको दूँ?'॥८१॥ तब सर्वलोकगुरु भगवान् कमलयोनि कुछ सिर झुकाये हाथ जोड़कर बोले॥८२॥

श्रीब्रह्माजीने कहा—जिस अजन्मा, सर्वमय, विधाता परमेश्वरका आदि, मध्य, अन्त, स्वरूप, स्वभाव और सार हम नहीं जान पाते॥८३॥ कलामुहूर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभूतिके परिणामका कारण नहीं हो सकता, जिसका जन्म और मरण नहीं होता, जो सनातन और सर्वदा एकरूप है तथा जो नाम और रूपसे रहित है॥८४॥ जिस अच्युतकी कृपासे मैं प्रजाका उत्पत्तिकर्त्ता हूँ, जिसके क्रोधसे उत्पन्न हुआ रुद्र सृष्टिका अन्तकर्त्ता है तथा जिस परमात्मासे मध्यमें जगत्स्थितिकारी विष्णुरूप पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ है॥८५॥