विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] * चतुर्थ अंश * २३७
मद्रूपमास्थाय सृजत्यजो यः स्थितौ च योऽसौ पुरुषस्वरूपी। रुद्रस्वरूपेण च योऽत्ति विश्वं धत्ते तथानन्तवपुस्समस्तम्॥ ८६
पाकाय योऽग्नित्वमुपैति लोका- न्बिभर्त्ति पृथ्वीवपुरव्ययात्मा। शक्रादिरूपी परिपाति विश्व- मर्केन्दुरूपश्च तमो हिनस्ति॥ ८७
करोति चेष्टाश्श्वसनस्वरूपी लोकस्य तृप्तिं च जलान्नरूपी। ददाति विश्वस्थितिसंस्थितस्तु सर्वावकाशं च नभस्स्वरूपी॥ ८८
यस्सृज्यते सर्गकृदात्मनैव यः पाल्यते पालयिता च देवः। विश्वात्मकस्संह्रियतेऽन्तकारी पृथक् त्रयस्यास्य च योऽव्ययात्मा॥ ८९
यस्मिञ्जगद्यो जगदेतदाद्यो यश्चाश्रितोऽस्मिञ्जगति स्वयम्भूः। ससर्वभूतप्रभवो धरित्र्यां स्वांशेन विष्णुर्नृपतेऽवतीर्णः॥ ९०
कुशस्थली या तव भूप रम्या पुरी पुराभूदमरावतीव। सा द्वारका सम्प्रति तत्र चास्ते स केशवांशो बलदेवनामा॥ ९१
तस्मै त्वमेनां तनयां नरेन्द्र प्रयच्छ मायामनुजाय जायाम्। श्लाघ्यो वरोऽसौ तनया तवेयं स्त्रीरत्नभूता सदृशो हि योगः॥ ९२
श्रीपराशर उवाच
इतीरितोऽसौ कमलोद्भवेन भुवं समासाद्य पतिः प्रजानाम्। ददर्श ह्रस्वान् पुरुषान् विरूपा- नल्पौजसस्स्वल्पविवेकवीर्यान् ॥ ९३
जो अजन्मा मेरा रूप धारणकर संसारकी रचना करता है, स्थितिके समय जो पुरुषरूप है तथा जो रुद्ररूपसे सम्पूर्ण विश्वका ग्रास कर जाता है एवं अनन्तरूपसे सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है॥८६॥ जो अव्यात्मा पाकके लिये अग्निरूप हो जाता है, पृथ्वीरूपसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करता है, इन्द्रादिरूपसे विश्वका पालन करता है और सूर्य तथा चन्द्ररूप होकर सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है॥८७॥ जो श्वास-प्रश्वासस्वरूपसे जीवोंमें चेष्टा करता है, जल और अन्नरूपसे लोककी तृप्ति करता है तथा विश्वकी स्थितिमें संलग्न रहकर जो आकाशरूपसे सबको अवकाश देता है॥८८॥ जो सृष्टिकर्ता होकर भी विश्वरूपसे आप ही अपनी रचना करता है, जगत्का पालन करनेवाला होकर भी आप ही पालित होता है तथा संहारकारी होकर भी स्वयं ही संहृत होता है औरजो इन तीनोंसे पृथक् इनका अविनाशी आत्मा है॥८९॥ जिसमें यह जगत् स्थित है, जो आदिपुरुष जगत्-स्वरूप है और इस जगत्के ही आश्रित तथा स्वयम्भू है, हे नृपते! सम्पूर्ण भूतोंका उद्भवस्थान वह विष्णु धरातलमें अपने अंशसे अवतीर्ण हुआ है॥९०॥
हे राजन्! पूर्वकालमें तुम्हारी जो अमरावतीके समान कुशस्थली नामकी पुरी थी वह अब द्वारकापुरी हो गयी है। वहीं वे बलदेव नामक भगवान् विष्णुके अंश विराजमान हैं॥९१॥ हे नरेन्द्र! तुम यह कन्या उन मायामानव श्रीबलदेवजीको पत्नीरूपसे दो। ये बलदेवजी संसारमें अति प्रशंसनीय हैं और तुम्हारी कन्या भी स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा है, अतः इनका योग सर्वथा उपयुक्त है॥९२॥
श्रीपराशरजी बोले—भगवान् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर प्रजापति रैवत पृथिवीतलपर आये तो देखा कि सभी मनुष्य छोटे-छोटे, कुरूप, अल्पतेजोमय, अल्पवीर्य तथा विवेकहीन हो गये हैं॥९३॥