भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

अ० २ ] * चतुर्थ अंश * २३९

चत्वारिंशदष्टौ च दक्षिणापथभूपालाः ॥ १४ ॥ स चेक्ष्वाकुरष्टकाश्राद्धमुत्पाद्य श्राद्धाहं मांसमानयेति विकुक्षिमाज्ञापयामास ॥ १५ ॥ स तथेति गृहीताज्ञो विधृतशरासनो वनमभ्ये- त्यानेकशो मृगान् हत्वा श्रान्तोऽतिक्षुत्परीतो विकुक्षिरेकं शशमभक्षयत्। शेषं च मांसमानीय पित्रे निवेदयामास ॥ १६ ॥ इक्ष्वाकुकुलाचार्यो वसिष्ठस्तत्प्रोक्षणाय चोदितः प्राह। अलमनेनामेध्येनामिषेण दुरात्मना तव पुत्रेणैतन्मांसमुपहतं यतोऽनेन शशो भक्षितः ॥ १७ ॥ ततश्चासौ विकुक्षिर्गुरुणैवमुक्त- श्शशादसंज्ञामवाप पित्रा च परित्यक्तः ॥ १८ ॥ पितर्युपरते चासावखिलामेतां पृथ्वीं धर्मत- श्शशास ॥ १९ ॥ शशादस्य तस्य पुरञ्जयो नाम पुत्रोऽभवत् ॥ २० ॥ तस्येदं चान्यत् ॥ २१ ॥ पुरा हि त्रेतायां देवासुरयुद्धमतिभीषणमभवत् ॥ २२ ॥ तत्र चातिबलिभिरसुरैरमराः पराजितास्ते भगवन्तं विष्णुमाराधयाञ्चक्रुः ॥ २३ ॥ प्रसन्नश्च देवानामनादिनिधनोऽखिलजगत्परायणो नारायणः प्राह ॥ २४ ॥ ज्ञातमेतन्मया युष्माभिर्यदभिलषितं तदर्थमिदं श्रूयताम् ॥ २५ ॥ पुरञ्जयो नाम राजर्षेश्शशादस्य तनयः क्षत्रियवरो यस्तस्य शरीरेऽहमंशेन स्वयमेवावतीर्य तानशेषा- नसुरान्निहनिष्यामि तद्भवद्भिः पुरञ्जयोऽसुरवधार्थ- मुद्योगं कार्यतामिति ॥ २६ ॥ एतच्च श्रुत्वा प्रणम्य भगवन्तं विष्णुममराः पुरञ्जयसकाशमाजग्मुरूचुश्चैनम् ॥ २७ ॥ भो भो क्षत्रियवर्य्यास्माभिरभ्यर्थितेन भवतास्माक- मरातिवधोद्यतानां कर्तव्यं साहाय्यमिच्छाम- स्तद्भवतास्माकमभ्यागतानां प्रणयभङ्गो न कार्य इत्युक्तः पुरञ्जयः प्राह ॥ २८ ॥ त्रैलोक्यनाथो योऽयं युष्माकमिन्द्रः शतक्रतुरस्य यद्यहं स्कन्धाधिरूढो युष्माकमरातिभिस्सह योत्स्ये तदहं भवतां सहायः स्याम ॥ २९ ॥


अड़तालीस दक्षिणापथके शासक हुए ॥ १२–१४ ॥ इक्ष्वाकुने अष्टकाश्राद्धका आरम्भ कर अपने पुत्र विकुक्षिको आज्ञा दी कि श्राद्धके योग्य मांस लाओ ॥ १५ ॥ उसने 'बहुत अच्छा' कह उनकी आज्ञाको शिरोधार्य किया और धनुष-बाण लेकर वनमें आ अनेकों मृगोंका वध किया, किन्तु अति थका-माँदा और अत्यन्त भूखा होनेके कारण विकुक्षिने उनमेंसे एक शशक (खरगोश) खा लिया और बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको निवेदन किया ॥ १६ ॥ उस मांसका प्रोक्षण करनेके लिये प्रार्थना किये जानेपर इक्ष्वाकुके कुल-पुरोहित वसिष्ठजीने कहा—''इस अपवित्र मांसकी क्या आवश्यकता है? तुम्हारे दुरात्मा पुत्रने इसे भ्रष्ट कर दिया है, क्योंकि उसने इसमेंसे एक शशक खा लिया है'' ॥ १७ ॥ गुरुके ऐसा कहनेपर, तभीसे विकुक्षिका नाम शशाद पड़ा और पिताने उसको त्याग दिया ॥ १८ ॥ पिताके मरनेके अनन्तर उसने इस पृथिवीका धर्मानुसार शासन किया ॥ १९ ॥ उस शशादके पुरंजय नामक पुत्र हुआ ॥ २० ॥ पुरंजयका भी यह एक दूसरा नाम पड़ा— ॥ २१ ॥ पूर्वकालमें त्रेतायुगमें एक बार अति भीषण देवासुरसंग्राम हुआ ॥ २२ ॥ उसमें महाबलवान् दैत्यगणसे पराजित हुए देवताओेंने भगवान् विष्णुकी आराधना की ॥ २३ ॥ तब आदि-अन्त-शून्य, अशेष जगत्प्रतिपालक, श्रीनारायणने देवताओंसे प्रसन्न होकर कहा— ॥ २४ ॥ ‘‘आपलोगोंका जो कुछ अभीष्ट है वह मैंने जान लिया है। उसके विषयमें यह बात सुनिये— ॥ २५ ॥ राजर्षि शशादका जो पुरंजय नामक पुत्र है उस क्षत्रियश्रेष्ठके शरीरमें मैं अंशमात्रसे स्वयं अवतीर्ण होकर उन सम्पूर्ण दैत्योंका नाश करूँगा। अतः तुमलोग पुरंजयको दैत्योंके वधके लिये तैयार करो'' ॥ २६ ॥ यह सुनकर देवताओंने विष्णुभगवान्को प्रणाम किया और पुरंजयके पास आकर उससे कहा— ॥ २७ ॥ ‘‘हे क्षत्रियश्रेष्ठ ! हमलोग चाहते हैं कि अपने शत्रुओंके वधमें प्रवृत्त हमलोगोंकी आप सहायता करें। हम अभ्यागत जनोंका आप मानभंग न करें।’' यह सुनकर पुरंजयने कहा— ॥ २८ ॥ ‘‘ये जो त्रैलोक्यनाथ शतक्रतु आपलोगोंके इन्द्र हैं यदि मैं इनके कन्धेपर चढ़कर आपके शत्रुओंसे युद्ध कर सकूँ तो आपलोगोंका सहायक हो सकता हूँ'' ॥ २९ ॥