विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
इत्याकर्ण्य समस्तदेवैरिन्द्रेण च बाढमित्येवं समन्वीप्सितम्॥ ३०॥ ततश्च शतक्रतोर्वृषरूपधारिणः ककुदि स्थितोऽतिरोषसमन्वितो भगवतश्चराचरगुरोरच्युतस्य तेजसाप्यायितो देवासुरसङ्ग्रामे समस्तानेवासुरान्निजघान॥ ३१॥ यतश्च वृषककुदि स्थितेन राज्ञा दैतेयबलं निष्षूदितमतश्चासौ ककुत्स्थसंज्ञामवाप॥ ३२॥ ककुत्स्थस्याप्यनेनाः पुत्रोऽभवत् ॥ ३३॥ पृथुरनेनसः॥ ३४॥ पृथोर्विष्टराश्वः॥ ३५॥ तस्यापि चान्द्रो युवनाश्वः॥ ३६॥ चान्द्रस्य तस्य युवनाश्वस्य शावस्तः यः पुरीं शावस्तीं निवेशयामास॥ ३७॥ शावस्तस्य बृहदश्वः॥ ३८॥ तस्यापि कुवलयाश्वः॥ ३९॥ योऽसावुदकस्य महर्षेरपकारिणं धुन्धुनामानमसुरं वैष्णवेन तेजसाप्यायितः पुत्रसहस्रैरेकविंशद्भिः परिवृतो जघान धुन्धुमारसंज्ञामवाप॥ ४०॥ तस्य च तनयास्समस्ता एव धुन्धुमुखनिःश्वासाग्निना विप्लुष्टा विनेशुः॥ ४१॥ दृढाश्वचन्द्राश्वकपिलाश्वाश्च त्रयः केवलं शेषिताः॥ ४२॥
दृढाश्वाद्धर्यश्वः॥ ४३॥ तस्माच्च निकुम्भः ॥ ४४॥ निकुम्भस्यामिताश्वः॥ ४५॥ ततश्च कृशाश्वः॥ ४६॥ तस्माच्च प्रसेनजित्॥ ४७॥ प्रसेनजितो युवनाश्वोऽभवत्॥ ४८॥ तस्य चापुत्रस्यातिनिर्वेदान्मुनीनामाश्रममण्डले निवसतॊ दयालुभिर्मुनिभिरपत्योत्पादनायेष्टिः कृता॥ ४९॥ तस्यां च मध्यरात्रौ निवृत्तायां मन्त्रपूतजलपूर्णं कलशं वेदिमध्ये निवेश्य ते मुनयः सुषुपुः॥ ५०॥ सुप्तेषु तेषु अतीव तृट्परीतस्स भूपालस्तमाश्रमं विवेश॥ ५१॥ सुप्तांश्च तानृषीनैवोत्थापयामास॥ ५२॥ तच्च कलशमपरिमेयमाहात्म्यमन्त्रपूतं पपौ॥ ५३॥ प्रबुद्धाश्च ऋषयः पप्रच्छुः केनैतन्मन्त्रपूतं वारि पीतम्॥ ५४॥ अत्र हि राज्ञो युवनाश्वस्य पत्नी महाबलपराक्रमं पुत्रं जनयिष्यति। इत्याकर्ण्य स राजा अजानता मया पीतमित्याह॥ ५५॥
यह सुनकर समस्त देवगण और इन्द्रने 'बहुत अच्छा'—ऐसा कहकर उनका कथन स्वीकार कर लिया॥ ३०॥ फिर वृषभ-रूपधारी इन्द्रकी पीठपर चढ़कर चराचरगुरु भगवान् अच्युतके तेजसे परिपूर्ण होकर राजा पुरंजयने रोषपूर्वक सभी दैत्योंको मार डाला॥ ३१॥ उस राजाने बैलके ककुद् (कन्धे)-पर बैठकर दैत्यसेनाका वध किया था, अतः उसका नाम ककुत्स्थ पड़ा॥ ३२॥ ककुत्स्थके अनेना नामक पुत्र हुआ॥ ३३॥ अनेनाके पृथु, पृथुके विष्टराश्व, उनके चान्द्र युवनाश्व तथा उस चान्द्र युवनाश्वके शावस्त नामक पुत्र हुआ जिसने शावस्ती पुरी बसायॊ थी॥ ३४-३७॥ शावस्तके बृहदश्व तथा बृहदश्वके कुवलयाश्वका जन्म हुआ, जिसने वैष्णवतेजसे पूर्णता लाभ कर अपने इक्कीस सहस्र पुत्रोंके साथ मिलकर महर्षि उदकके अपकारी धुन्धु नामक दैत्यको मारा था; अतः उनका नाम धुन्धुमार हुआ॥ ३८-४०॥ उनके सभी पुत्र धुन्धुके मुखसे निकले हुए निःश्वासाग्निसे जलकर मर गये॥ ४१॥ उनमेंसे केवल दृढाश्व, चन्द्राश्व और कपिलाश्व—ये तीन ही बचे थे॥ ४२॥
दृढाश्वसे हर्यश्व, हर्यश्वसे निकुम्भ, निकुम्भसे अमिताश्व, अमिताश्वसे कृशाश्व, कृशाश्वसे प्रसेनजित् और प्रसेनजित्से युवनाश्वका जन्म हुआ॥ ४३-४८॥ युवनाश्व निःसन्तान होनेके कारण खिन्न चित्तसे मुनीश्वरोंके आश्रमोंमें रहा करता था; उसके दुःखसे द्रवीभूत होकर दयालु मुनिजनोंने उसके पुत्र उत्पन्न होनेके लिये यज्ञानुष्ठान किया॥ ४९॥ आधी रातके समय उस यज्ञके समाप्त होनेपर मुनिजन मन्त्रपूत जलका कलश वेदीमें रखकर सो गये॥ ५०॥ उनके सो जानेपर अत्यन्त पिपासाकुल होकर राजाने उस स्थानमें प्रवेश किया। और सोये होनेके कारण उन ऋषियोंको उन्होंने नहीं जगाया॥ ५१-५२॥ तथा उस अपरिमित माहात्म्यशाली कलशके मन्त्रपूत जलको पी लिया॥ ५३॥ जागनेपर ऋषियोंने पूछा—'इस मन्त्रपूत जलको किसने पिया है?॥ ५४॥ इसका पान करनेपर ही युवनाश्वकी पत्नी महाबलविक्रमशील पुत्र उत्पन्न करेगी।' यह सुनकर राजाने कहा—"मैंने ही बिना जाने यह जल पी लिया है"॥ ५५॥
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