विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] * चतुर्थ अंश * २४१
गर्भश्च युवनाश्वस्योदरे अभवत् क्रमेण च ववृधे ॥५६॥ प्राप्तसमयश्च दक्षिणं कुक्षिमवनिपतेर्निर्भिद्य निश्चक्राम ॥५७॥ न चासौ राजा ममार ॥५८॥
जातो नामैष कं धास्यतीति ते मुनयः प्रोचुः ॥५९॥ अथागत्य देवराजोऽब्रवीत् मामयं धास्यतीति ॥६०॥ ततो मान्धातृनामा सोऽभवत्। वक्त्रे चास्य प्रदेशिनी देवेन्द्रेण न्यस्ता तां पपौ ॥६१॥ तां चामृतस्राविणीमास्वाद्याह्नैव स व्यवर्द्धत ॥६२॥ ततस्तु मान्धाता चक्रवर्ती सप्तद्वीपां महीं बुभुजे ॥६३॥ तत्रायं श्लोकः ॥६४॥
यावत्सूर्य उदेत्यस्तं यावच्च प्रतितिष्ठति ।
सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥६५
मान्धाता शतबिन्दोर्दुहितरं बिन्दुमतीमुपयेमे ॥६६॥ पुरुकुत्समम्बरीषं मुचुकुन्दं च तस्यां पुत्रत्रयमुत्पादयामास ॥६७॥ पञ्चाशद्दुहितरस्तस्यामेव तस्य नृपतेर्बभूवुः ॥६८॥
तस्मिन्नन्तरे बह्वृचश्च सौभरिर्नाम महर्षिरन्तर्जले द्वादशाब्दं कालमुवास ॥६९॥ तत्र चान्तर्जले संमदो नामातिबहुप्रजोऽतिमात्रप्रमाणो मीनाधिपतिरासीत् ॥७०॥ तस्य च पुत्रपौत्रदौहित्राः पृष्ठतोऽग्रतः पार्श्वयोः पक्षपुच्छशिरसां चोपरि भ्रमन्तस्तेनैव सदाहर्निशमतिनिर्वृता रेमिरे ॥७१॥ स चापत्यस्पर्शोपचीयमानप्रहर्षप्रकर्षो बहुप्रकारं तस्य ऋषेः पश्यतस्तैरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिः सहानुदिनं सुतरां रेमे ॥७२॥ अथान्तर्जलावस्थितस्सौभरिरेकाग्रतस्समाधिमपहायानुदिनं तस्य मत्स्यस्यात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सहतिरमणीयतामवेक्ष्याचिन्तयत् ॥७३॥ अहो धन्योऽयमीदृशमनभिमतं योन्यन्तरमवाप्यैभिरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सह रममाणोऽतीवास्माकं स्पृहामुत्पादयति ॥७४॥
अतः युवनाश्वके उदरमें गर्भ स्थापित हो गया और क्रमशः बढ़ने लगा॥५६॥ यथासमय बालक राजाकी दायीं कोख फाड़कर निकल आया॥५७॥ किन्तु इससे राजाकी मृत्यु नहीं हुई॥५८॥
उसके जन्म लेनेपर मुनियोंने कहा—"यह बालक क्या पान करके जीवित रहेगा?"॥५९॥ उसी समय देवराज इन्द्रने आकर कहा—"यह मेरे आश्रय-जीवित रहेगा'॥६०॥ अतः उसका नाम मान्धाता हुआ। देवेन्द्रने उसके मुखमें अपनी तर्जनी (अँगुठेके पासकी) अँगुली दे दी और वह उसे पीने लगा। उस अमृतमयी अँगुलीका आस्वादन करनेसे वह एक ही दिनमें बढ़ गया॥६१-६२॥ तभीसे चक्रवर्ती मान्धाता सप्तद्वीपा पृथिवीका राज्य भोगने लगा॥६३॥ इसके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है॥६४॥
'जहाँसे सूर्य उदय होता है और जहाँ अस्त होता है वह सभी क्षेत्र युवनाश्वके पुत्र मान्धाताका है'॥६५॥
मान्धाताने शतबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमतीसे विवाह किया और उससे पुरुकुत्स, अम्बरीष और मुचुकुन्द नामक तीन पुत्र उत्पन्न किये तथा उसी (बिन्दुमती)से उनके पचास कन्याएँ हुईं॥६६—६८॥
उसी समय बह्वृच सौभरि नामक महर्षिने बारह वर्षतक जलमें निवास किया॥६९॥ उस जलमें सम्मद नामक एक बहुत-सी सन्तानोंवाला और अति दीर्घकाय मत्स्यराज था॥७०॥ उसके पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदि उसके आगे-पीछे तथा इधर-उधर पक्ष, पुच्छ और सिरके ऊपर घूमते हुए अति आनन्दित होकर रात-दिन उसीके साथ क्रीडा करते रहते थे॥७१॥ तथा वह भी अपनी सन्तानके सुकोमल स्पर्शसे अत्यन्त हर्षयुक्त होकर उन मुनिश्वरके देखते-देखते अपने पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके साथ अहर्निश क्रीडा करता रहता था॥७२॥
इस प्रकार जलमें स्थित सौभरि ऋषिने एकाग्रतारूप समाधिको छोड़कर रात-दिन उस मत्स्यराजकी अपने पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके साथ अति रमणीय क्रीडाओंको देखकर विचार किया—॥७३॥ 'अहो! यह धन्य है, जो ऐसी अनिष्ट योनिमें उत्पन्न होकर भी अपने इन पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके साथ निरन्तर रमण करता हुआ हमारे हृदयमें डाह उत्पन्न करता है॥७४॥