भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


वयमप्येवं पुत्रादिभिस्सह ललितं रंस्यामहे इत्येवमभिकाङ्क्षन् स तस्मादन्तर्जलाान्निष्क्रम्य सन्तानाय निवेष्टुकामः कन्यार्थं मान्धातारं राजानमगच्छत् ॥ ७५ ॥

'हम भी इसी प्रकार अपने पुत्रादिके साथ अति ललित क्रीड़ाएँ करेंगे।' ऐसी अभिलाषा करते हुए वे उस जलके भीतरसे निकल आये और सन्तानार्थ गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी कामनासे कन्या ग्रहण करनेके लिये राजा मान्धाताके पास आये॥ ७५॥


आगमनश्रवणसमनन्तरं चोत्थाय तेन राज्ञा सम्यगर्ध्यादिना सम्पूजितः कृतासनपरिग्रहः सौभरिरुवाच राजानम् ॥ ७६ ॥

मुनिवरका आगमन सुन राजाने उठकर अर्घ्यदानादिसे उनका भली प्रकार पूजन किया। तदनन्तर सौभरि मुनिने आसन ग्रहण करके राजासे कहा ॥ ७६ ॥


सौभरिरुवाच

निवेष्टुकामोऽस्मि नरेन्द्र कन्यां
$\quad$प्रयच्छ मे मा प्रणयं विभाङ्क्षीः।
न ह्यर्थिनः कार्यवशादुपैताः
$\quad$ककुत्स्थवंशे विमुखाः प्रयान्ति ॥ ७७

सौभरिजी बोले—हे राजन्! मैं कन्या-परिग्रहका अभिलाषी हूँ, अतः तुम मुझे एक कन्या दो; मेरा प्रणय भंग मत करो। ककुत्स्थवंशमें कार्यवश आया हुआ कोई भी प्रार्थी पुरुष कभी खाली हाथ नहीं लौटता॥ ७७॥


अन्येऽपि सन्त्येव नृपाः पृथिव्यां
$\quad$मान्धातरेषां तनयाः प्रसूताः।
किं त्वर्थिनामर्थितदानदीक्षा-
$\quad$कृतव्रतं श्लाघ्यमिदं कुलं ते ॥ ७८

हे मान्धाता! पृथिवीतलमें और भी अनेक राजालोग हैं और उनके भी कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं; किंतु याचकोंको माँगी हुई वस्तु दान देनेके नियममें दृढ़प्रतिज्ञ तो यह तुम्हारा प्रशंसनीय कुल ही है॥ ७८॥


शतार्थसंख्यास्तव सन्ति कन्या-
$\quad$स्तासां ममैकां नृपते प्रयच्छ।
यत्प्रार्थनाभङ्गभयाद्विभेमि
$\quad$तस्मादहं राजवरातिदुःखात् ॥ ७९

हे राजन्! तुम्हारे पचास कन्याएँ हैं, उनमेंसे तुम मुझे केवल एक ही दे दो। हे नृपश्रेष्ठ! मैं इस समय प्रार्थनाभंगकी आशंकासे उत्पन्न अतिशय दुःखसे भयभीत हो रहा हूँ॥ ७९॥


श्रीपराशर उवाच

इति ऋषिवचनमाकर्ण्य स राजा जराजर्जरित देहऋषिमालोक्य प्रत्याख्यानकातरस्तस्माच्च शापभीतो बिभ्यत्किञ्चिदधोमुखश्चिरं दध्यौ च ॥ ८० ॥

श्रीपराशरजी बोले—ऋषिके ऐसे वचन सुनकर राजा उनके जराजीर्ण देहको देखकर शापके भयसे अस्वीकार करनेमें कातर हो उनसे डरते हुए कुछ नीचेको मुख करके मन-ही-मन चिन्ता करने लगे॥ ८०॥


सौभरिरुवाच

नरेन्द्र कस्मात्समुपैषि चिन्ता-
$\quad$मसह्यमुक्तं न मयात्र किञ्चित्।
यावश्यदेया तनया तयैव
$\quad$कृतार्थता नो यदि किं न लब्धा ॥ ८१

सौभरिजी बोले—हे नरेन्द्र! तुम चिन्तित क्यों होते हो? मैंने इसमें कोई असह्य बात तो कही नहीं है; जो कन्या एक दिन तुम्हें अवश्य देनी ही है उससे ही यदि हम कृतार्थ हो सकें तो तुम क्या नहीं प्राप्त कर सकते हो?॥ ८१॥


श्रीपराशर उवाच

अथ तस्य भगवतश्शापभीतस्सप्रश्रयस्तमुवाचासौ राजा ॥ ८२ ॥

श्रीपराशरजी बोले—तब भगवान् सौभरिके शापसे भयभीत हो राजा मान्धाताने नम्रतापूर्वक उनसे कहा॥ ८२॥