भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० २ ] * चतुर्थ अंश * २४३


राजोवाचराजा बोले— भगवन्! हमारे कुलकी यह रीति
भगवन् अस्मत्कुलस्थितिरियं य एव कन्याभि-है कि जिस सत्कुलोत्पन्न वरको कन्या पसन्द करती
रुचितोऽभिजनवान्वरस्तस्मै कन्यां प्रदीयतेहै वह उसीको दी जाती है। आपकी प्रार्थना तो हमारे
भगवद्याच्ञा चास्मन्मनोरथानामप्यतिगोचर-मनोरथोंसे भी परे है। न जाने, किस प्रकार यह
वर्तिनी कथमप्येषा सञ्जाता तदेवमुपस्थिते न विद्मःउत्पन्न हुई है? ऐसी अवस्थामें मैं नहीं जानता कि
किं कुर्म इत्येतन्मया चिन्त्यत इत्यभिहिते चक्या करूँ? बस, मुझे यही चिन्ता है। महाराज मान्धाताके
तेन भूभुजा मुनिरचिन्तयत्॥८३॥ अयमन्योऽ-ऐसा कहनेपर मुनिवर सौभरिने विचार किया— ॥८३॥
स्मत्प्रत्याख्यानोपायो वृद्धोऽयमनभिमतः स्त्रीणां'मुझको टाल देनेका यह एक और ही उपाय है।
किमुत कन्यकानामित्यमुना सञ्चिन्त्यैतदभिहित-'यह बूढ़ा है, प्रौढ़ा स्त्रियाँ भी इसे पसन्द नहीं कर
मेवमस्तु तथा करिष्यामीति सञ्चिन्त्य मान्धातार-सकतीं, फिर कन्याओंकी तो बात ही क्या है?' ऐसा
मुवाच॥८४॥ यद्येवं तदादिश्यतामस्माकंसोचकर ही राजाने यह बात कही है। अच्छा, ऐसा ही
प्रवेशाय कन्यान्तःपुरवर्षवरो यदि कन्यैवसही, मैं भी ऐसा ही उपाय करूँगा।' यह सब
काचिन्मामभिलषति तदाहं दारसङ्ग्रहं करिष्यामिसोचकर उन्होंने मान्धातासे कहा— ॥८४॥ "यदि ऐसी बात
अन्यथा चेत्तदलम्स्माकमेतेनातीतक़ालारम्भणे-है तो कन्याओंके अन्तःपुर-रक्षक नपुंसकको वहाँ मेरा
नेत्युक्त्वा विरराम॥८५॥प्रवेश करानेके लिये आज्ञा दो। यदि कोई कन्या ही
ततश्च मान्धात्रा मुनिशापशङ्कितेनमेरी इच्छा करेगी तो ही मैं स्त्री-ग्रहण करूँगा नहीं तो
कन्यान्तःपुरवर्षवरस्समाज्ञप्तः॥८६॥ तेनइस ढलती अवस्थामें मुझे इस व्यर्थ उद्योगका कोई
सह कन्यान्तःपुरं प्रविशन्नेव भगवानखिलसिद्ध-प्रयोजन नहीं है।" ऐसा कहकर वे मौन हो गये॥८५॥
गन्धर्वेभ्योऽतिशयेन कमनीयं रूपमकरोत्॥८७॥तब मुनिके शापकी आशंकासे मान्धाताने कन्याओंके
प्रवेश्य च तमृषिमन्तःपुरे वर्षवरस्ताः कन्याःअन्तःपुर-रक्षकको आज्ञा दे दी॥८६॥ उसके साथ
प्राह॥८८॥ भवतीनां जनयिता महाराज-अन्तःपुरमें प्रवेश करते हुए भगवान् सौभरिने अपना रूप
स्समाज्ञापयति ॥८९॥ अयमस्मान् ब्रह्मर्षिःसकल सिद्ध और गन्धर्वगणसे भी अतिशय मनोहर बना
कन्यार्थं समभ्यागतः॥९०॥ मया चास्यलिया॥८७॥ उन ऋषिवरको अन्तःपुरमें ले जाकर अन्तःपुर-
प्रतिज्ञातं यद्यस्मत्कन्या या काचिद्भगवन्तंरक्षकने उन कन्याओंसे कहा— ॥८८॥ "तुम्हारे पिता
वरयति तत्कन्यायाश्छन्दे नाहं परिपन्थानंमहाराज मान्धाताकी आज्ञा है कि ये ब्रह्मर्षि हमारे पास
करिष्यमीत्याकर्ण्य सर्वा एव ताः कन्याःएक कन्याके लिये पधारे हैं और मैंने इनसे प्रतिज्ञा की
सानुरागाः सप्रमदाः करेणव इवेभयूथपतिंहै कि मेरी जो कोई कन्या श्रीमान्‌को वरण करेगी उसकी
तमृषिमहमहमिकया वरयाम्बभूवुरूचुश्च॥९१॥स्वच्छन्दतामें मैं किसी प्रकारकी बाधा नहीं डालूँगा।"
अलं भगिन्योऽहमिमं वृणोमियह सुनकर उन सभी कन्याओंने यूथपति गजराजका वरण
वृणोम्यहं नैष तवानुरूपः।करनेवाली हथिनियोंके समान अनुराग और आनन्दपूर्वक
ममैष भर्त्ता विधिनेव सृष्ट-'अकेली मैं ही—अकेली मैं ही वरण करती हूँ' ऐसा
स्सृष्टाहमस्योपशमं प्रयाहि॥९२कहते हुए उन्हें वरण कर लिया। वे परस्पर कहने
वृतो मयायं प्रथमं मयायंलगीं— ॥८९–९१॥ 'अरी बहिनो! व्यर्थ चेष्टा क्यों करती
गृहं विशन्नेव विहन्यसे किम्।हो? मैं इनका वरण करती हूँ, ये तुम्हारे अनुरूप हैं
भी नहीं। विधाताने ही इन्हें मेरा भर्त्ता और मुझे
इनकी भार्या बनाया है। अतः तुम शान्त हो जाओ॥९२॥
अन्तःपुरमें आते ही सबसे पहले मैंने ही इन्हें वरण
किया था, तुम क्यों मरी जाती हो?' इस प्रकार 'मैंने