विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
मया मयेति क्षितिपात्मजानां
तदर्थमत्यर्थकलिर्बभूव ॥ ९३
यदा मुनिस्ताभिरतीवहार्दाद्-
वृतस्स कन्याभिरनिन्द्यकीर्तिः।
तदा स कन्याधिकृतो नृपाय
यथावदाचष्ट विनम्रमूर्तिः ॥ ९४
श्रीपराशर उवाच
तदवगमात्किङ्किमेतत्कथमेतत्किं किं करोमि किं मयाभिहितमित्याकुलमतिरनिच्छन्नपि कथमपि राजानुमेने ॥ ९५ ॥ कृतानुरूप-विवाहश्च महर्षिस्सकला एव ताः कन्यास्स्व-माश्रममनयत् ॥ ९६ ॥
तत्र चाशेषशिल्पकल्पप्रणेतारं धातारमिवान्यं विश्वकर्माणमाहूय सकलकन्यानामेकैकस्याः प्रोत्फुल्लपङ्कजाः कूजत्कलहंसकारण्डवादि-विहङ्गमाभिरामजलाशयास्सोपधानाः सावकाशा-स्साधुशय्यापरिच्छदाः प्रासादाः क्रियन्ता-मित्यादिदेश ॥ ९७ ॥
तच्च तथैवानुष्ठितमशेषशिल्पविशेषाचार्य-स्त्वष्टा दर्शितवान् ॥ ९८ ॥ ततः परमर्षिणा सौभरिणाज्ञप्तस्तेषु गृहेष्वनिवार्यानन्दनामा महानिधिरासाञ्चक्रे ॥ ९९ ॥ ततोऽनवरतेन भक्ष्यभोज्यलेह्याद्युपभोगैरागताननुगतभृत्यादीन-हर्निशमशेषगृहेषु ताः क्षितीशदुहितरो भोजयामासुः ॥ १०० ॥
एकदा तु दुहितृस्नेहाकृष्टहृदयस्स महीपतिरतिदुःखितास्ता उत सुखिता वा इति विचिन्त्य तस्य महर्षेराश्रमसमीपमुपेत्य स्फुरदंशुमालालालामां स्फटिकमयप्रासाद-मालामतिरम्योपवनजलाशयां ददर्श ॥ १०१ ॥
प्रविश्य चैकं प्रासादमात्मजां परिष्वज्य कृतासनपरिग्रहः प्रवृद्धस्नेहनयनाम्बुगर्भनयनो-ऽब्रवीत् ॥ १०२ ॥ अप्यत्र वत्से भवत्याः सुखमुत किञ्चिदसुखमपि ते महर्षिस्स्नेहवानुत न,
वरण किया है—पहले मैंने वरण किया है' ऐसा कह-कहकर उन राजकन्याओंमें उनके लिये बड़ा कलह मच गया ॥ ९३ ॥
जब उन समस्त कन्याओंने अतिशय अनुरागवश उन अनिन्द्यकीर्ति मुनिवरको वरण कर लिया तो कन्या-रक्षकने नम्रतापूर्वक राजासे सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया ॥ ९४ ॥
श्रीपराशरजी बोले—यह जानकर राजाने 'यह क्या कहता है?' 'यह कैसे हुआ?' 'मैं क्या करूँ?' 'मैंने क्यों उन्हें [अन्दर जानेके लिये] कहा था?' इस प्रकार सोचते हुए अत्यन्त व्याकुल चित्तसे इच्छा न होते हुए भी जैसे-तैसे अपने वचनका पालन किया और अपने अनुरूप विवाह-संस्कारके समाप्त होनेपर महर्षि सौभरि उन समस्त कन्याओंको अपने आश्रमपर ले गये ॥ ९५-९६ ॥
वहाँ आकर उन्होंने दूसरे विधाताके समान अशेष-शिल्प-कल्प-प्रणेता विश्वकर्माको बुलाकर कहा कि इन समस्त कन्याओंमेंसे प्रत्येकके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाओ, जिनमें खिले हुए कमल और कूजते हुए सुन्दर हंस तथा कारण्डव आदि जल-पक्षियोंसे सुशोभित जलाशय हों, सुन्दर उपधान (मसनद), शय्या और परिच्छद (ओढ़नेके वस्त्र) हों तथा पर्याप्त खुला हुआ स्थान हो ॥ ९७ ॥
तब सम्पूर्ण शिल्प-विद्याके विशेष आचार्य विश्वकर्माने भी उनकी आज्ञानुसार सब कुछ तैयार करके उन्हें दिखलाया ॥ ९८ ॥ तदनन्तर महर्षि सौभरिकी आज्ञासे उन महलोंमें अनिवार्य्यानन्द नामकी महानिधि निवास करने लगी ॥ ९९ ॥ तब तो उन सम्पूर्ण महलोंमें नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य और लेह्य आदि सामग्रियोंसे वे राजकन्याएँ आये हुए अतिथियों और अपने अनुगत भृत्यवर्गोंको तृप्त करने लगीं ॥ १०० ॥
एक दिन पुत्रियोंके स्नेहसे आकर्षित होकर राजा मान्धाता यह देखनेके लिये कि वे अत्यन्त दुःखी हैं या सुखी? महर्षि सौभरिके आश्रमके निकट आये, तो उन्होंने वहाँ अति रमणीय उपवन और जलाशयोंसे युक्त स्फटिक-शिलाके महलोंकी पंक्ति देखी जो फैलती हुई मयूख-मालाओंसे अत्यन्त मनोहर मालूम पड़ती थी ॥ १०१ ॥
तदनन्तर वे एक महलमें जाकर अपनी कन्याका स्नेहपूर्वक आलिंगन कर आसनपर बैठे और फिर बढ़ते हुए प्रेमके कारण नयनोंमें जल भरकर बोले— ॥ १०२ ॥ "बेटी! तुमलोग यहाँ सुखपूर्वक हो न? तुम्हें किसी प्रकारका कष्ट तो नहीं है? महर्षि सौभरि