भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२४६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


| अप्येतत्पुत्रान्पुत्रसमन्वितान्यश्यामीत्यादिमनोरथा- | बोलीसे बोलेंगे? अपने पाँवोंसे चलेंगे? क्या | | ननुदिनं कालसम्पत्तिप्रवृद्धानु- | ये युवावस्थाको प्राप्त होंगे? उस समय क्या मैं | | पेक्ष्यैतच्चिन्तयामास॥११४॥ अहो मे | इन्हें सपत्नीक देख सकूँगा? फिर क्या इनके पुत्र | | मोहस्यातिविस्तारः॥११५॥ | होंगे और मैं इन्हें अपने पुत्र-पौत्रोंसे युक्त देखूँगा?' | | मनोरथानां न समाप्तिरस्ति | इस प्रकार कालक्रमसे दिनानुदिन बढ़ते हुए | | वर्षायुतेनापि तथाब्दलक्षैः। | इन मनोरथोंकी उपेक्षा कर वे सोचने लगे- ॥११४॥ | | पूर्णेषु पूर्णेषु मनोरथाना- | 'अहो! मेरे मोहका कैसा विस्तार है॥११५॥ | | मुत्पत्तयस्सन्ति पुनर्नवानाम्॥११६ | इन मनोरथोंकी तो हजारों-लाखों वर्षोंमें | | पद्भ्यां गता यौवनिनश्च जाता | भी समाप्ति नहीं हो सकती। उनमेंसे यदि कुछ | | दारैश्च संयोगमिताः प्रसूताः। | पूर्ण भी हो जाते हैं तो उनके स्थानपर अन्य | | दृष्टाः सुतास्तत्तनयप्रसूतिं | नये मनोरथोंकी उत्पत्ति हो जाती है॥११६॥ मेरे | | द्रष्टुं पुनर्वाञ्छति मेऽन्तरात्मा॥११७ | पुत्र पैरोंसे चलने लगे, फिर वे युवा हुए, उनका | | द्रक्ष्यामि तेषामिति चेत्प्रसूतिं | विवाह हुआ तथा उनके सन्तानें हुईं—यह सब | | मनोरथो मे भविता ततोऽन्यः। | तो मैं देख चुका; किन्तु अब मेरा चित्त उन | | पूर्णेऽपि तत्राप्यपरस्य जन्म | पौत्रोंके पुत्र-जन्मको भी देखना चाहता है!॥११७॥ | | निवार्यते केन मनोरथस्य॥११८ | यदि उनका जन्म भी मैंने देख लिया तो | | आमृत्युतो नैव मनोरथाना- | फिर मेरे चित्तमें दूसरा मनोरथ उठेगा और यदि | | मन्तोऽस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य। | वह भी पूरा हो गया तो अन्य मनोरथकी | | मनोरथासक्तिपरस्य चित्तं | उत्पत्तिको ही कौन रोक सकता है?॥११८॥ | | न जायते वै परमार्थसङ्गि॥११९ | मैंने अब भली प्रकार समझ लिया है | | स मे समाधिर्जलवासमित्र- | कि मृत्युपर्यन्त मनोरथोंका अन्त तो होना | | मत्स्यस्य सङ्गात्सहसैव नष्टः। | नहीं है और जिस चित्तमें मनोरथोंकी आसक्ति | | परिग्रहस्सङ्गकृतो मयायं | होती है वह कभी परमार्थमें लग नहीं | | परिग्रहोत्था च ममातिलिप्सा॥१२० | सकता॥११९॥ अहो! मेरी वह समाधि जलवासके | | दुःखं यदैवकशरीरजन्म | साथी मत्स्यके संगसे अकस्मात् नष्ट हो गयी | | शताद्धसंख्याकमिदं प्रसूतम्। | और उस संगके कारण ही मैंने स्त्री और धन | | परिग्रहेण क्षितिपात्मजानां | आदिका परिग्रह किया तथा परिग्रहके कारण | | सुतैरनेकैर्र्बहुलीकृतं तत्॥१२१ | ही अब मेरी तृष्णा बढ़ गयी है॥१२०॥ | | सुतात्मजैस्तत्तनयैश्च भूयो | एक शरीरका ग्रहण करना ही महान् दुःख | | भूयश्च तेषां च परिग्रहेण। | है और मैंने तो इन राजकन्याओंका परिग्रह | | विस्तारमेष्यत्यतिदुःखहेतुः | करके उसे पचास गुना कर दिया है। तथा | | परिग्रहो वै ममताभिधानः॥१२२ | अनेक पुत्रोंके कारण अब वह बहुत ही बढ़ | | | गया है॥१२१॥ अब आगे भी पुत्रोंके पुत्र | | | तथा उनके पुत्रोंसे और उनका पुनः-पुनः विवाह- | | | सम्बन्ध करनेसे वह और भी बढ़ेगा। यह | | | ममतारूप विवाहसम्बन्ध अवश्य बड़े ही | | | दुःखका कारण है॥१२२॥ |


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