विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 258
| अ० २ ] | * चतुर्थ अंश * | २४७ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| चीर्णं तपो यत्तु जलाश्रयेण<br> तस्यर्द्धिरेषा तपसोऽन्तरायः।<br>मत्स्यस्य सङ्गाद्भवच्च यो मे<br> सुतादिरागो मुषितोऽस्मि तेन ॥ १२३ | जलाशयमें रहकर मैंने जो तपस्या की थी उसकी फलस्वरूप यह सम्पत्ति तपस्याकी बाधक है। मत्स्यके संगसे मेरे चित्तमें जो पुत्र आदिका राग उत्पन्न हुआ था उसीने मुझे ठग लिया ॥ १२३ ॥ |
| निस्सङ्गता मुक्तिपदं यतीनां<br> सङ्गादशेषाः प्रभवन्ति दोषाः।<br>आरूढयोगो विनिपात्यतेऽध-<br> स्सङ्गेन योगी किमुताल्पबुद्धिः ॥ १२४ | निःसंगता ही यतियोंको मुक्ति देनेवाली है, सम्पूर्ण दोष संगसे ही उत्पन्न होते हैं। संगके कारण तो योगारूढ़ यति भी पतित हो जाते हैं, फिर मन्दमति मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ १२४ ॥ |
| अहं चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे<br> परिग्रहग्राहगृहीतबुद्धिः ।<br>यदा हि भूयः परिहीनदोषो<br> जनस्य दुःखैर् भविता न दुःखी ॥ १२५ | परिग्रहरूपी ग्राहने मेरी बुद्धिको पकड़ा हुआ है। इस समय मैं ऐसा उपाय करूँगा जिससे दोषोंसे मुक्त होकर फिर अपने कुटुम्बियोंके दुःखसे दुःखी न होऊँ ॥ १२५ ॥ |
| सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-<br> मणोरणीयांसमतिप्रमाणम् ।<br>सितासितं चेश्वरमीश्वराणा-<br> माराधयिष्ये तपसैव विष्णुम् ॥ १२६ | अब मैं सबके विधाता, अचिन्त्यरूप, अणुसे भी अणु और सबसे महान् सत्त्व एवं तमःस्वरूप तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् विष्णुकी तपस्या करके आराधना करूँगा ॥ १२६ ॥ |
| तस्मिन्नशेषौजसि सर्वरूपि-<br> ण्यव्यक्तविस्पष्टतनावन्नन्ते ।<br>ममाचलं चित्तमपेतदोषं<br> सदास्तु विष्णावभवाय भूयः ॥ १२७ | उन सम्पूर्ण तेजोमय, सर्वरूप, अव्यक्त, विस्पष्टशरीर, अनन्त श्रीविष्णुभगवान्में मेरा दोषरहित चित्त सदा निश्चल रहे जिससे मुझे फिर जन्म न लेना पड़े ॥ १२७ ॥ |
| समस्तभूतादमलादनन्ता-<br> त्सर्वेश्वरादन्यदनादिमध्यात् ।<br>यस्मान्न किञ्चित्तमहं गुरूणां<br> परं गुरुं संश्रयमेमि विष्णुम् ॥ १२८ | जिस सर्वरूप, अमल, अनन्त, सर्वेश्वर और आदि-मध्य-शून्यसे पृथक् और कुछ भी नहीं है उस गुरुजनोंके भी परम गुरु भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १२८ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्यात्मानमात्मनैवाभिधायासौ सौभरिरपहाय पुत्रगृहासनपरिच्छदादिकमशेषमर्थजातं सकलभार्यासन्वितो वनं प्रविवेश ॥ १२९ ॥ | श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार मन-ही-मन सोचकर सौभरि मुनि पुत्र, गृह, आसन, परिच्छद आदि सम्पूर्ण पदार्थोंको छोड़कर अपनी समस्त स्त्रियोंके सहित वनमें चले गये ॥ १२९ ॥ |
| तत्राप्यनुदिनं वैखानसनिष्पाद्यमशेषक्रियाकलापं निष्पाद्य क्षपितसकलपापः परिपक्वमनोवृत्तिरात्मन्यग्नीन्समारोप्य भिक्षुरभवत् ॥ १३० ॥ | वहाँ वानप्रस्थोंके योग्य समस्त क्रियाकलापका अनुष्ठान करते हुए सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेपर तथा मनोवृत्तिके राग-द्वेषहीन हो जानेपर, आहवनीयादि अग्नियोंको अपनेमें स्थापित कर संन्यासी हो गये ॥ १३० ॥ |
| भगवत्यासज्याखिलं कर्मकलापं हित्वाऽनन्तमजमनादिनिधनमविकारमरणादिधर्ममवाप परमनन्तं परवतामच्युतं पदम् ॥ १३१ ॥ | फिर भगवान्में आसक्त हो सम्पूर्ण कर्मकलापका त्याग कर परमात्मपरायण पुरुषोंके अच्युतपद (मोक्ष)-को प्राप्त किया, जो अजन्मा, अनादि, अविनाशी, विकार और मरणादि धर्मोंसे रहित, इन्द्रियादिसे अतीत तथा अनन्त है ॥ १३१ ॥ |
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