विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० २ ] | * चतुर्थ अंश * | २४७ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| चीर्णं तपो यत्तु जलाश्रयेण<br> तस्यर्द्धिरेषा तपसोऽन्तरायः।<br>मत्स्यस्य सङ्गाद्भवच्च यो मे<br> सुतादिरागो मुषितोऽस्मि तेन ॥ १२३ | जलाशयमें रहकर मैंने जो तपस्या की थी उसकी फलस्वरूप यह सम्पत्ति तपस्याकी बाधक है। मत्स्यके संगसे मेरे चित्तमें जो पुत्र आदिका राग उत्पन्न हुआ था उसीने मुझे ठग लिया ॥ १२३ ॥ |
| निस्सङ्गता मुक्तिपदं यतीनां<br> सङ्गादशेषाः प्रभवन्ति दोषाः।<br>आरूढयोगो विनिपात्यतेऽध-<br> स्सङ्गेन योगी किमुताल्पबुद्धिः ॥ १२४ | निःसंगता ही यतियोंको मुक्ति देनेवाली है, सम्पूर्ण दोष संगसे ही उत्पन्न होते हैं। संगके कारण तो योगारूढ़ यति भी पतित हो जाते हैं, फिर मन्दमति मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ १२४ ॥ |
| अहं चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे<br> परिग्रहग्राहगृहीतबुद्धिः ।<br>यदा हि भूयः परिहीनदोषो<br> जनस्य दुःखैर् भविता न दुःखी ॥ १२५ | परिग्रहरूपी ग्राहने मेरी बुद्धिको पकड़ा हुआ है। इस समय मैं ऐसा उपाय करूँगा जिससे दोषोंसे मुक्त होकर फिर अपने कुटुम्बियोंके दुःखसे दुःखी न होऊँ ॥ १२५ ॥ |
| सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-<br> मणोरणीयांसमतिप्रमाणम् ।<br>सितासितं चेश्वरमीश्वराणा-<br> माराधयिष्ये तपसैव विष्णुम् ॥ १२६ | अब मैं सबके विधाता, अचिन्त्यरूप, अणुसे भी अणु और सबसे महान् सत्त्व एवं तमःस्वरूप तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् विष्णुकी तपस्या करके आराधना करूँगा ॥ १२६ ॥ |
| तस्मिन्नशेषौजसि सर्वरूपि-<br> ण्यव्यक्तविस्पष्टतनावन्नन्ते ।<br>ममाचलं चित्तमपेतदोषं<br> सदास्तु विष्णावभवाय भूयः ॥ १२७ | उन सम्पूर्ण तेजोमय, सर्वरूप, अव्यक्त, विस्पष्टशरीर, अनन्त श्रीविष्णुभगवान्में मेरा दोषरहित चित्त सदा निश्चल रहे जिससे मुझे फिर जन्म न लेना पड़े ॥ १२७ ॥ |
| समस्तभूतादमलादनन्ता-<br> त्सर्वेश्वरादन्यदनादिमध्यात् ।<br>यस्मान्न किञ्चित्तमहं गुरूणां<br> परं गुरुं संश्रयमेमि विष्णुम् ॥ १२८ | जिस सर्वरूप, अमल, अनन्त, सर्वेश्वर और आदि-मध्य-शून्यसे पृथक् और कुछ भी नहीं है उस गुरुजनोंके भी परम गुरु भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १२८ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्यात्मानमात्मनैवाभिधायासौ सौभरिरपहाय पुत्रगृहासनपरिच्छदादिकमशेषमर्थजातं सकलभार्यासन्वितो वनं प्रविवेश ॥ १२९ ॥ | श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार मन-ही-मन सोचकर सौभरि मुनि पुत्र, गृह, आसन, परिच्छद आदि सम्पूर्ण पदार्थोंको छोड़कर अपनी समस्त स्त्रियोंके सहित वनमें चले गये ॥ १२९ ॥ |
| तत्राप्यनुदिनं वैखानसनिष्पाद्यमशेषक्रियाकलापं निष्पाद्य क्षपितसकलपापः परिपक्वमनोवृत्तिरात्मन्यग्नीन्समारोप्य भिक्षुरभवत् ॥ १३० ॥ | वहाँ वानप्रस्थोंके योग्य समस्त क्रियाकलापका अनुष्ठान करते हुए सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेपर तथा मनोवृत्तिके राग-द्वेषहीन हो जानेपर, आहवनीयादि अग्नियोंको अपनेमें स्थापित कर संन्यासी हो गये ॥ १३० ॥ |
| भगवत्यासज्याखिलं कर्मकलापं हित्वाऽनन्तमजमनादिनिधनमविकारमरणादिधर्ममवाप परमनन्तं परवतामच्युतं पदम् ॥ १३१ ॥ | फिर भगवान्में आसक्त हो सम्पूर्ण कर्मकलापका त्याग कर परमात्मपरायण पुरुषोंके अच्युतपद (मोक्ष)-को प्राप्त किया, जो अजन्मा, अनादि, अविनाशी, विकार और मरणादि धर्मोंसे रहित, इन्द्रियादिसे अतीत तथा अनन्त है ॥ १३१ ॥ |
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२४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३
इत्येतन्मान्धातृदुहितृसम्बन्धादाख्यातम् ॥ १३२॥ यश्चैतत्सौभरिचरितमनुस्मरति पठति पाठयति शृणोति श्रावयति धरत्यवधारयति लिखति लेखयति शिक्षयत्यध्यापयत्युपदिशति वा तस्य षड् जन्मानि दुस्सन्ततिरसर्द्धर्मो वाङ्मनसयोरसन्मार्गाचरणमशेषहेतुषु वा ममत्वं न भवति॥ १३३॥
इस प्रकार मान्धाताकी कन्याओंके सम्बन्धमें मैंने इस चरित्रका वर्णन किया है। जो कोई इस सौभरि-चरित्रका स्मरण करता है, अथवा पढ़ता- पढ़ाता, सुनता-सुनाता, धारण करता-कराता, लिखता- लिखवाता तथा सीखता-सिखाता अथवा उपदेश करता है उसके छः जन्मोंतक दुःसन्तति, असद्धर्म और वाणी अथवा मनकी कुमार्गमें प्रवृत्ति तथा किसी भी पदार्थमें ममता नहीं होती॥ १३२-१३३॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
तीसरा अध्याय
मान्धाताकी सन्तति, त्रिशंकुका स्वर्गारोहण तथा सगरकी उत्पत्ति और विजय
अतश्च मान्धातुः पुत्रसन्ततिरभिधीयते॥ १॥ अम्बरीषस्य मान्धातृतनयस्य युवनाश्वः पुत्रोऽभूत् ॥ २॥ तस्माद्धारीतः, यतोऽङ्गिरसो हारीताः ॥ ३॥ रसातले मौनेया नाम गन्धर्वा बभूवुष्षट्कोटिसंख्यातास्तैरशेषाणिनागकुलान्य- पहृतप्रधानरत्नाधिपत्यान्यक्रियन्त॥ ४॥ तैश्च गन्धर्ववीर्यावधूतैरुरगेश्वरैः स्तूयमानो भगवानशेषदेवेशः स्तवच्छ्रवणोन्मीलितोन्निद्र- पुण्डरीकनयनो जलशयनों निद्रावसानात् प्रबुद्धः प्रणिपत्याभिहितः। भगवन्नस्माकमेतेभ्यो गन्धर्वेभ्यो भयमुत्पन्नं कथमुपशममेष्यतीति॥ ५॥ आह च भगवाननादिनिधनपुरुषोत्तमो योऽसौ यौवनाश्वस्य मान्धातुः पुरुकुत्सनामा पुत्रस्त- महमनुप्रविश्य तानशेषान् दुष्टगन्धर्वानुपशमं नयिष्यामीति॥ ६॥ तदाकर्ण्य भगवते जलशायिने कृतप्रणामाः पुनर्नार्गलोकमागताः पन्नगाधिपतयो नर्मदां च पुरुकुत्सानयनाय चोदयामासुः॥ ७॥ सा चैनं रसातलं नीतवती॥ ८॥ रसातलगताश्चासौ भगवत्तेजसाप्यायितात्म-
अब हम मान्धाताके पुत्रोंकी सन्तानका वर्णन करते हैं॥ १॥ मान्धाताके पुत्र अम्बरीषके युवनाश्व नामक पुत्र हुआ॥ २॥ उससे हारीत हुआ जिससे अंगिरा-गोत्रीय हारीतगण हुए॥ ३॥ पूर्वकालमें रसातलमें मौनेय नामक छः करोड़ गन्धर्व रहते थे। उन्होंने समस्त नागकुलोंके प्रधान-प्रधान रत्न और अधिकार छीन लिये थे॥ ४॥ गन्धर्वोंके पराक्रमसे अपमानित उन नागेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जानेपर उसके श्रवण करनेसे जिनकी विकसित कमलसदृश आँखें खुल गयी हैं निद्राके अन्तमें जगे हुए उन जलशायी भगवान् सर्वदेवेश्वरको प्रणाम कर उनसे नागगणने कहा—‘‘भगवन्! इन गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुआ हमारा भय किस प्रकार शान्त होगा?’’॥ ५॥ तब आदि-अन्तरहित भगवान् पुरुषोत्तमने कहा—‘युवनाश्वके पुत्र मान्धाताका जो यह पुरुकुत्स नामक पुत्र है उसमें प्रविष्ट होकर मैं उन सम्पूर्ण दुष्ट गन्धर्वोंका नाश कर दूँगा’॥ ६॥ यह सुनकर भगवान् जलशायीको प्रणाम कर समस्त नागाधिपतिगण नागलोकमें लौट आये और पुरुकुत्सको लानेके लिये [अपनी बहिन एवं पुरुकुत्सकी भार्या] नर्मदाको प्रेरित किया॥ ७॥ तदनन्तर नर्मदा पुरुकुत्सको रसातलमें ले आयी॥ ८॥ रसातलमें पहुँचनेपर पुरुकुत्सने भगवान्के तेजसे
अ० ३ ] * चतुर्थ अंश * २४९
| वीर्यस्सकलगन्धर्वान्निजघान ॥ ९ ॥ पुनश्च स्वपुरमाजगाम ॥ १० ॥ सकलपन्नगाधि-पतयश्च नर्मदाये वरं ददुः। यस्तेऽनुस्मरणसमवेतं नामग्रहणं करिष्यति न तस्य सर्पविषभयं भविष्य-तीति ॥ ११ ॥ अत्र च श्लोकः ॥ १२ ॥ | अपने शरीरका बल बढ़ जानेसे सम्पूर्ण गन्धर्वोंको मार डाला और फिर अपने नगरमें लौट आया ॥ ९-१० ॥ उस समय समस्त नागराजोंने नर्मदाको यह वर दिया कि जो कोई तेरा स्मरण करते हुए तेरा नाम लेगा उसको सर्प-विषसे कोई भय न होगा ॥ ११ ॥ इस विषयमें यह श्लोक भी है— ॥ १२ ॥ |
| नर्मदायै नमः प्रातर्नर्मदायै नमो निशि।<br>नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः ॥ १३ | ‘नर्मदाको प्रातःकाल नमस्कार है और रात्रिकालमें भी नर्मदाको नमस्कार है। हे नर्मदे! तुमको बारम्बार नमस्कार है, तुम मेरी विष और सर्पसे रक्षा करो’ ॥ १३ ॥ |
| इत्युच्चार्याहर्निशमन्धकारप्रवेशे वा सर्पेर्न दश्यते न चापि कृतानुस्मरणभुजो विषमपि भुक्तमुपघाताय भवति ॥ १४ ॥ पुरुकुत्साय सन्ततिविच्छेदो न भविष्यतीत्युरगपतयो वरं ददुः ॥ १५ ॥ | इसका उच्चारण करते हुए दिन अथवा रात्रिमें किसी समय भी अन्धकारमें जानेसे सर्प नहीं काटता तथा इसका स्मरण करके भोजन करनेवालेका खाया हुआ विष भी घातक नहीं होता ॥ १४ ॥ पुरुकुत्सको नागपतियोंने यह वर दिया कि तुम्हारी सन्तानका कभी अन्त न होगा ॥ १५ ॥ |
| पुरुकुत्सो नर्मदायां त्रसदस्युमजीजनत् ॥ १६ ॥ त्रसदस्युतस्सम्भूतोऽनरण्यः, यं रावणो दिग्विजय जघान ॥ १७ ॥ अनरण्यस्य पृषदश्वः पृषदश्वस्य हर्यश्वः पुत्रोऽभवत् ॥ १८ ॥ तस्य च हस्तः पुत्रोऽभवत् ॥ १९ ॥ ततश्च सुमनास्तस्यापि त्रिधन्वा त्रिधन्वनस्त्रय्यारुणिः ॥ २० ॥ त्रय्यारुणे-स्सत्यव्रतः, योऽसौ त्रिशङ्कुसंज्ञामवाप ॥ २१ ॥ | पुरुकुत्सने नर्मदासे त्रसदस्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ १६ ॥ त्रसदस्युसे अनरण्य हुआ, जिसे दिग्विजयके समय रावणने मारा था ॥ १७ ॥ अनरण्यके पृषदश्व, पृषदश्वके हर्यश्व, हर्यश्वके हस्त, हस्तके सुमना, सुमनाके त्रिधन्वा, त्रिधन्वाके त्रय्यारुणि और त्रय्यारुणिके सत्यव्रत नामक पुत्र हुआ, जो पीछे त्रिशंकु कहलाया ॥ १८—२१ ॥ |
| स चाण्डालतामुपगतश्च ॥ २२ ॥ द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां विश्वामित्र-कलत्रापत्यपोषणार्थं चाण्डालप्रतिग्रहपरिहरणाय च जाह्नवतीरन्यग्रोधे मृगमांसमनुदिनं बबन्ध ॥ २३ ॥ स तु परितुष्टेन विश्वामित्रेण सशरीरस्स्वर्गमारोपितः ॥ २४ ॥ | वह त्रिशंकु चाण्डाल हो गया था ॥ २२ ॥ एक बार बारह वर्षतक अनावृष्टि रही। उस समय विश्वामित्र मुनिके स्त्री और बाल-बच्चोंके पोषणार्थ तथा अपनी चाण्डालताको छुड़ानेके लिये वह गंगाजीके तटपर एक वटके वृक्षपर प्रतिदिन मृगका मांस बाँध आता था ॥ २३ ॥ इससे प्रसन्न होकर विश्वामित्रजीने उसे सदेह स्वर्ग भेज दिया ॥ २४ ॥ |
| त्रिशङ्कोर्हरिश्चन्द्रस्तस्माच्च रोहिताश्वस्ततश्च हरितो हरितस्य चञ्चुश्चञ्चोर्विजयवसुदेवौ रुरुको विजयाद्रुरुकस्य वृकः ॥ २५ ॥ ततो वृकस्य बाहुर्योऽसौ हैहयतालजङ्घादिभिः पराजितोऽन्तर्वत्न्या महिष्या सह वनं प्रविवेश ॥ २६ ॥ तस्याश्च सपत्न्या गर्भस्तम्भनाय गरो दत्तः ॥ २७ ॥ तेनास्या गर्भस्सप्तवर्षाणि जठर एव तस्थौ ॥ २८ ॥ स च बाहुर्वृद्धभावादौर्वाश्रम-समीपे ममार ॥ २९ ॥ सा तस्य भार्या चितां कृत्वा | त्रिशंकुसे हरिश्चन्द्र, हरिश्चन्द्रसे रोहिताश्व, रोहिताश्वसे हरित, हरितसे चंचु, चंचुसे विजय और वसुदेव, विजयसे रुरुक और रुरुकसे वृकका जन्म हुआ ॥ २५ ॥ वृकके बाहु नामक पुत्र हुआ जो हैहय और तालजंघ आदि क्षत्रियोंसे पराजित होकर अपनी गर्भवती पटरानीके सहित वनमें चला गया था ॥ २६ ॥ पटरानीकी सौतने उसका गर्भ रोकनेकी इच्छासे उसे विष खिला दिया ॥ २७ ॥ उसके प्रभावसे उसका गर्भ सात वर्षतक गर्भाशयहीमें रहा ॥ २८ ॥ अन्तमें, बाहु वृद्धावस्थाके कारण और्व मुनिके आश्रमके समीप मर गया ॥ २९ ॥ तब उसकी पटरानीने चिता बनाकर |
२५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३
तमारोप्यानुमरणकृतनिश्चयाऽभूत् ॥ ३० ॥ अथैतामतीतानागतवर्त्तमानकालत्रयवेदी भगवानौर्वस्स्वाश्रमान्निर्गत्याब्रवीत् ॥ ३१ ॥ अलमलमनेनासद्ग्राहेणाखिलभूमण्डलपतिरतिवीर्यपराक्रमो नैकयज्ञकृदरातिपक्षक्षयकर्त्ता तवोदरे चक्रवर्ती तिष्ठति ॥ ३२ ॥ नैवमतिसाहसाध्यवसायिनी भवती भवत्वित्युक्ता सा तस्मादनुमरणनिर्वन्धाद्विरराम ॥ ३३ ॥ तेनैव च भगवता स्वाश्रममानीता ॥ ३४ ॥
अनुवाद: उसपर पतिका शव स्थापित कर उसके साथ सती होनेका निश्चय किया ॥ ३० ॥ उसी समय भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालके जाननेवाले भगवान् और्वने अपने आश्रमसे निकलकर उससे कहा— ॥ ३१ ॥ 'अयि साध्वि ! इस व्यर्थ दुराग्रहको छोड़। तेरे उदरमें सम्पूर्ण भूमण्डलका स्वामी, अत्यन्त बल-पराक्रमशील, अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला और शत्रुओंका नाश करनेवाला चक्रवर्ती राजा है ॥ ३२ ॥ तू ऐसे दुस्साहसका उद्योग न कर।' ऐसा कहे जानेपर वह अनुमरण (सती होने)-के आग्रहसे विरत हो गयी ॥ ३३ ॥ और भगवान् और्व उसे अपने आश्रमपर ले आये ॥ ३४ ॥
तत्र कतिपयदिनाभ्यन्तरे च सहैव तेन गरेणाति तेजस्वी बालको जज्ञे ॥ ३५ ॥ तस्यौर्वो जातकर्मादिक्रिया निष्पाद्य सगर इति नाम चकार ॥ ३६ ॥ कृतोपनयनं चैनमौर्वो वेदशास्त्राण्यस्त्रं चाग्नेयं भार्गवाख्यमध्यापयामास ॥ ३७ ॥
अनुवाद: वहाँ कुछ ही दिनोंमें, उसके उस गर (विष)-के साथ ही एक अति तेजस्वी बालकने जन्म लिया ॥ ३५ ॥ भगवान् और्वने उसके जातकर्म आदि संस्कार कर उसका नाम 'सगर' रखा तथा उसका उपनयनसंस्कार होनेपर और्वने ही उसे वेद, शास्त्र एवं भार्गव नामक आग्नेय शस्त्रोंकी शिक्षा दी ॥ ३६-३७ ॥
उत्पन्नबुद्धिश्च मातरमब्रवीत् ॥ ३८ ॥ अम्ब कथमत्र वयं क्व वा तातोऽस्माकमित्येवमादिपृच्छन्तं माता सर्वमेवावोचत् ॥ ३९ ॥ ततश्च पितृराज्यापहरणादमर्षितो हैहयतालजङ्घादिवधाय प्रतिज्ञामकरोत् ॥ ४० ॥ प्रायशश्च हैहयतालजङ्घाञ्जघान ॥ ४१ ॥ शकयवनकाम्बोजपारदपह्लवाः हन्यमानास्तत्कुलगुरुं वसिष्ठं शरणं जग्मुः ॥ ४२ ॥ अथैनावसिष्ठो जीवन्मृतकान् कृत्वा सगरमाह ॥ ४३ ॥ वत्सालमेभिर्जीवन्मृतकैरनुसृतैः ॥ ४४ ॥ एते च मयैव त्वत्प्रतिज्ञापरिपालनाय निजधर्मद्विजसंगपरित्यागं कारिताः ॥ ४५ ॥ तथेति तद्गुरुवचनमभिनन्द्य तेषां वेषान्यत्वमकारयत् ॥ ४६ ॥ यवनान्मुण्डितशिरसोऽर्द्धमुण्डिताञ्छकान् प्रलम्बकेशान् पारदान् पह्लवाञ्श्मश्रुधरान् निस्स्वाध्यायवषट्कारानेतानन्यांश्च क्षत्रियांश्चकार ॥ ४७ ॥ एते चात्मधर्मपरित्यागाद्ब्राह्मणैः परित्यक्ता म्लेच्छतां ययुः ॥ ४८ ॥ सगरोऽपि स्वमधिष्ठानमागम्यास्खलितचक्रस्सप्तद्वीपवतीमिमामुर्वी प्रशासास ॥ ४९ ॥
अनुवाद: बुद्धिका विकास होनेपर उस बालकने अपनी मातासे कहा— ॥ ३८ ॥ 'माँ ! यह तो बता, इस तपोवनमें हम क्यों रहते हैं और हमारे पिता कहाँ हैं ?' इसी प्रकारके और भी प्रश्न पूछनेपर माताने उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त कह दिया ॥ ३९ ॥ तब तो पिताके राज्यापहरणको सहन न कर सकनेके कारण उसने हैहय और तालजंघ आदि क्षत्रियोंको मार डालनेकी प्रतिज्ञा की और प्रायः सभी हैहय एवं तालजंघवंशीय राजाओंको नष्ट कर दिया ॥ ४०-४१ ॥ उनके पश्चात् शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लवगण भी हताहत होकर सगरके कुलगुरु वसिष्ठजीकी शरणमें गये ॥ ४२ ॥ वसिष्ठजीने उन्हें जीवन्मृत (जीते हुए ही मरेके समान) करके सगरसे कहा— "बेटा ! इन जीते-जी मरे हुओंका पीछा करनेसे क्या लाभ है ? ॥ ४४ ॥ देख, तेरी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये मैंने ही इन्हें स्वधर्म और द्विजातियोंके संसर्गसे वंचित कर दिया है" ॥ ४५ ॥ राजाने 'जो आज्ञा' कहकर गुरुजीके कथनका अनुमोदन किया और उनके वेष बदलवा दिये ॥ ४६ ॥ उसने यवनोंके सिर मुड़वा दिये, शकोंको अर्द्धमुण्डित कर दिया, पारदोंके लम्बे-लम्बे केश रखवा दिये, पह्लवोंके मूँछ-दाढ़ी रखवा दीं तथा इनको और इनके समान अन्यान्य क्षत्रियोंको भी स्वाध्याय और वषट्कारादिसे बहिष्कृत कर दिया ॥ ४७ ॥ अपने धर्मको छोड़ देनेके कारण ब्राह्मणोंने भी इनका परित्याग कर दिया; अतः ये म्लेच्छ हो गये ॥ ४८ ॥ तदनन्तर महाराज सगर अपनी राजधानीमें आकर अप्रतिहत सैन्यसे युक्त हो इस सम्पूर्ण सप्तद्वीपवती पृथिवीका शासन करने लगे ॥ ४९ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अ० ४] * चतुर्थ अंश * २५१
चौथा अध्याय सगर, सौदास, खट्वांग और भगवान् रामके चरित्रका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
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| काश्यपदुहिता सुमतिर्विदर्भराजतनया केशिनी च द्वे भार्ये सगरस्यास्ताम् ॥ १ ॥ ताभ्यां चापत्यार्थमौर्वः परमेण समाधिनाराधितो वरमदात् ॥ २ ॥ एका वंशकरमेकं पुत्रमपरा षष्टिं पुत्रसहस्त्राणां जनयिष्यतीति यस्या यदभिमतं तदिच्छया गृह्यतामित्युक्ते केन्येकं वरयामास ॥ ३ ॥ सुमतिः पुत्रसहस्राणि षष्टिं वव्रे ॥ ४ ॥ | काश्यपसुता सुमति और विदर्भराज-कन्या केशिनी ये राजा सगरकी दो स्त्रियाँ थीं ॥ १ ॥ उनसे सन्तानोत्पत्ति के लिये परम समाधिद्वारा आराधना किये जानेपर भगवान् और्वने यह वर दिया ॥ २ ॥ 'एकसे वंशकी वृद्धि करनेवाला एक पुत्र तथा दूसरीसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे, इनमेंसे जिसको जो अभीष्ट हो वह इच्छापूर्वक उसीको ग्रहण कर सकती है।' उनके ऐसा कहनेपर केशिनीने एक तथा सुमतिने साठ हजार पुत्रोंका वर माँगा ॥ ३-४ ॥ |
| तथेत्युक्ते अल्पैरहोभिः केशिनी पुत्रमेक-मसमञ्जसनामान वंशकरमसूत ॥ ५ ॥ काश्यप-तनयायास्तु सुमत्याः षष्टिः पुत्रसहस्त्राण्यभवन् ॥ ६ ॥ तस्मादसमञ्जसा दंशुमान्नाम कुमारो जज्ञे ॥ ७ ॥ स त्वसमञ्जसो बालो बाल्यादेवा-सद्वृत्तोऽभूत् ॥ ८ ॥ पिता चास्याचिन्तयदद्य-मतीतबाल्यः सुबुद्धिमान् भविष्यतीति ॥ ९ ॥ अथ तत्रापि च वयस्यतीते असच्चरितमेनं पिता तत्याज ॥ १० ॥ तान्यपि षष्टिः पुत्रसहस्त्रा-ण्यसमञ्जसचरितमेवानुचक्रुः ॥ ११ ॥ | महर्षिके 'तथास्तु' कहनेपर कुछ ही दिनोंमें केशिनीने वंशको बढ़ानेवाले असमंजस नामक एक पुत्रको जन्म दिया और काश्यपकुमारी सुमतिसे साठ सहस्र पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५-६ ॥ राजकुमार असमंजसके अंशुमान् नामक पुत्र हुआ ॥ ७ ॥ यह असमंजस बाल्यावस्थासे ही बड़ा दुराचारी था ॥ ८ ॥ पिताने सोचा कि बाल्यावस्थाके बीत जानेपर यह बहुत समझदार होगा ॥ ९ ॥ किन्तु यौवनके बीत जानेपर भी जब उसका आचरण न सुधरा तो पिताने उसे त्याग दिया ॥ १० ॥ उनके साठ हजार पुत्रोंने भी असमंजसके चरित्रका ही अनुकरण किया ॥ ११ ॥ |
| ततश्चासमञ्जसचरितानुसारिभिस्सागरैरप-ध्वस्तयज्ञादिसन्मार्गे जगति देवास्सकलविद्या-मयमसंस्पृष्टमशेषदोषैर्भगवतः पुरुषोत्तमस्यांश-भूतं कपिलं प्रणम्य तदर्थमूचुः ॥ १२ ॥ भगवन्नेऽभिस्सगरतनयैरसमञ्जसचरितमनु-गम्यते ॥ १३ ॥ कथमेभिरसद्वृत्तमनुसरद्भि-र्जगद्भविष्यतीति ॥ १४ ॥ अत्यार्त्तजगत्यरित्राणाय च भगवतोऽत्र शरीरग्रहणमित्याकर्ण्य भगवाना-हाल्पैरेव दिनैर्विनंङ्क्ष्यन्तीति ॥ १५ ॥ | तब असमंजसके चरित्रका अनुकरण करनेवाले उन सगरपुत्रोंद्वारा संसारमें यज्ञादि सन्मार्गका उच्छेद हो जानेपर सकल-विद्यानिधान, अशेषदोषहीन, भगवान् पुरुषोत्तमके अंशभूत श्रीकृष्णदेवसे देवताओंने प्रणाम करनेके अनन्तर उनके विषयमें कहा— ॥ १२ ॥ "भगवन्! राजा सगरके ये सभी पुत्र असमंजसके चरित्रका ही अनुसरण कर रहे हैं ॥ १३ ॥ इन सबके असन्मार्गमें प्रवृत्त रहनेसे संसारकी क्या दशा होगी? ॥ १४ ॥ प्रभो! संसारमें दीनजनोंकी रक्षाके लिये ही आपने यह शरीर ग्रहण किया है [अतः इस घोर आपत्तिसे संसारकी रक्षा कीजिये] ।" यह सुनकर भगवान् कपिलने कहा—"ये सब थोड़े ही दिनोंमें नष्ट हो जायँगे" ॥ १५ ॥ |
२५२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४
| अत्रान्तरे च सगरो हयमेधमारभत ॥ १६ ॥ तस्य च पुत्रैरधिष्ठितमस्याश्वं कोऽप्यपहृत्य भुवो बिलं प्रविवेश ॥ १७ ॥ ततस्तत्तनयाश्चाश्वखुरगति-निबन्धैनावनीमेकैको योजनं चक्रुः ॥ १८ ॥ पाताले चाश्वं परिभ्रमन्तं तमवनीपतितनयास्ते ददृशुः ॥ १९ ॥ नातिदूरेऽवस्थितं च भगवन्तमपघने शरत्कालेऽर्कमिव तेजोभिरनवरतमूर्ध्वमधश्चाशेष दिशश्चोद्भासयमानं हयहर्तारं कपिलर्षिमपश्यन् ॥ २० ॥ | इसी समय सगरने अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ किया॥ १६ ॥ उसमें उसके पुत्रोंद्वारा सुरक्षित घोड़ेको कोई व्यक्ति चुराकर पृथिवीमें घुस गया ॥ १७ ॥ तब उस घोड़ेके खुरोंके चिह्नोंका अनुसरण करते हुए उनके पुत्रोंमेंसे प्रत्येकने एक-एक योजन पृथिवी खोद डाली ॥ १८ ॥ तथा पातालमें पहुँचकर उन राजकुमारोंने अपने घोड़ेको फिरता हुआ देखा ॥ १९ ॥ पासहीमें मेघावरणहीन शरत्कालके सूर्यके समान अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए घोड़ेको चुरानेवाले परमर्षि कपिलको सिर झुकाये बैठे देखा ॥ २० ॥ |
| ततश्चोद्यतायुधा दुरात्मानोऽयमस्मदपकारी यज्ञविघ्नकारी हन्यतां हयहर्त्ता हन्यतामित्यवोच-न्नभ्यधावंश्च ॥ २१ ॥ ततस्तेनापि भगवता किञ्चिदीषत्परिवर्तितलोचनेनावलोकितास्स्व-शरीरसमुत्थेनाऽग्निना दह्यमाना विनेशुः ॥ २२ ॥ | तब तो वे दुरात्मा अपने अस्त्र-शस्त्रोंको उठाकर 'यही हमारा अपकारी और यज्ञमें विघ्न डालनेवाला है, इस घोड़ेको चुरानेवालेको मारो, मारो' ऐसा चिल्लाते हुए उनकी ओर दौड़े ॥ २१ ॥ तब भगवान् कपिलदेवके कुछ आँख बदलकर देखते ही वे सब अपने ही शरीरसे उत्पन्न हुए अग्निमें जलकर नष्ट हो गये ॥ २२ ॥ |
| सगरोऽप्यवगम्याश्वानुसारि तत्पुत्रबलमशेषं परमर्षिणा कपिलेन तेजसा दग्धं ततोऽंशुमन्त-मसमञ्जसपुत्रमश्वानयनाय युयोज ॥ २३ ॥ स तु सगरतनयखातमार्गेण कपिलमुपगम्य भक्तिनम्रस्तदा तुष्टाव ॥ २४ ॥ अथैनं भगवानाह ॥ २५ ॥ गच्छैनं पितामहायाश्वं प्रापय वरं वृणीष्व च पुत्रक पौत्रश्च ते स्वर्गाद्गङ्गां भुवमानेष्यत इति ॥ २६ ॥ अथांशुमानपि स्वर्यातानां ब्रह्मदण्डहतानामस्मत्पितॄणामस्वर्ग-योग्यानां स्वर्गप्राप्तिकरं वरमस्माकं प्रयच्छेति प्रत्याह ॥ २७ ॥ तदाकर्ण्य तं च भगवानाह उक्तमेवैतन्मयाद्य पौत्रस्ते त्रिदिवाद्गङ्गां भुवमानेष्यतीति ॥ २८ ॥ तदम्भसा च संस्पृष्टेष्व-स्थिभस्मसु एते च स्वर्गमारोक्ष्यन्ति ॥ २९ ॥ भगवद्विष्णुपादांगुष्ठनिर्गतस्य हि जलस्यैतन्माहात्म्यम् ॥ ३० ॥ यन्न केवलमभि-सन्धिपूर्वकं स्नानाद्युपभोगेषूपकारकमनभि-संहितमप्यपेतप्राणस्यास्थिचर्मस्नायुकेशाद्युपस्पृष्टं शरीरजमपि पतितं सद्यश्शरीरिणं स्वर्गं नयतीत्युक्तः प्रणम्य भगवतेऽश्वमादाय पितामह- | महाराज सगरको जब मालूम हुआ कि घोड़ेका अनुसरण करनेवाले उसके समस्त पुत्र महर्षि कपिलके तेजसे दग्ध हो गये हैं तो उन्होंने असमंजसके पुत्र अंशुमान्को घोड़ा ले आनेके लिये नियुक्त किया ॥ २३ ॥ वह सगर-पुत्रोंद्वारा खोदे हुए मार्गसे कपिलजीके पास पहुँचा और भक्तिविनम्र होकर उनकी स्तुति की ॥ २४ ॥ तब भगवान् कपिलने उससे कहा—"बेटा! जा, इस घोड़ेको ले जाकर अपने दादाको दे और तेरी जो इच्छा हो वही वर माँग ले। तेरा पौत्र गंगाजीको स्वर्गसे पृथिवीपर लायेगा" ॥ २५-२६ ॥ इसपर अंशुमान्ने यही कहा कि मुझे ऐसा वर दीजिये जो ब्रह्मदण्डसे आहत होकर मरे हुए मेरे अस्वर्ग्य पितृगणको स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला हो ॥ २७ ॥ यह सुनकर भगवान्ने कहा—"मैं तुझसे पहले ही कह चुका हूँ कि तेरा पौत्र गंगाजीको स्वर्गसे पृथिवीपर लायेगा ॥ २८ ॥ उनके जलसे इनकी अस्थियोंकी भस्मका स्पर्श होते ही ये सब स्वर्गको चले जायेंगे ॥ २९ ॥ भगवान् विष्णुके चरणनखसे निकले हुए उस जलका ऐसा माहात्म्य है कि वह कामनापूर्वक केवल स्नानादि कार्योंमें ही उपयोगी हो—सो नहीं, अपितु, बिना कामनाके मृतक पुरुषके अस्थि, चर्म, स्नायु अथवा केश आदिका स्पर्श हो जानेसे या उसके शरीरका कोई अंग गिरनेसे भी वह देहधारीको तुरंत स्वर्गमें ले जाता है।" भगवान् कपिलके ऐसा कहनेपर वह उन्हें प्रणाम कर घोड़ेको लेकर |
अ० ४] * चतुर्थ अंश * २५३
| यज्ञमाजगाम ॥ ३१ ॥ सगरोऽप्यश्वमासाद्य तं यज्ञं समापयामास ॥ ३२ ॥ सागरं चात्मजप्रीत्या पुत्रत्वे कल्पितवान् ॥ ३३ ॥ तस्यांशुमतो दिलीपः पुत्रोऽभवत् ॥ ३४ ॥ दिलीपस्य भगीरथः योऽसौ गङ्गां स्वर्गादिहानीय भागीरथीसंज्ञां चकार ॥ ३५ ॥ | अपने पितामहकी यज्ञशालामें आया ॥ ३०-३१ ॥ राजा सगरने भी घोड़ेके मिल जानेपर अपना यज्ञ समाप्त किया और [अपने पुत्रोंके खोदे हुए] सागरको ही अपत्य-स्नेहसे अपना पुत्र माना ॥ ३२-३३ ॥ उस अंशुमान्के दिलीप नामक पुत्र हुआ और दिलीपके भगीरथ हुआ जिसने गंगाजीको स्वर्गसे पृथिवीपर लाकर उनका नाम भागीरथी कर दिया ॥ ३४-३५ ॥ |
| भगीरथात्सुहोत्रस्सुहोत्राच्छ्रुतः, तस्यापि नाभागः ततोऽम्बरीषः, तत्पुत्रस्सिन्धुद्वीपः सिन्धुद्वीपादयतायुः ॥ ३६ ॥ तत्पुत्रश्च ऋतुपर्णः, योऽसौ नलसहायोऽक्षहृदयज्ञोऽभूत् ॥ ३७ ॥ | भगीरथसे सुहोत्र, सुहोत्रसे श्रुति, श्रुतिसे नाभाग, नाभागसे अम्बरीष, अम्बरीषसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे अयुतायु और अयुतायुसे ऋतुपर्ण नामक पुत्र हुआ जो राजा नलका सहायक और द्यूतक्रीड़ाका पारदर्शी था ॥ ३६-३७ ॥ |
| ऋतुपर्णपुत्रस्सर्वकामः ॥ ३८ ॥ तत्तनयस्सुदासः ॥ ३९ ॥ सुदासात्सौदासो मित्रसहनामा ॥ ४० ॥ स चाटव्यां मृगयार्थी पर्यटन् व्याघ्रद्वयमपश्यत् ॥ ४१ ॥ ताभ्यां तद्वनमपमृगं कृतं मत्वैकं तयोर्बाणेन जघान ॥ ४२ ॥ म्रियमाणश्चासावतिभीषणाकृतिरतिकरालवदनो राक्षसोऽभूत् ॥ ४३ ॥ द्वितीयोऽपि प्रतिक्रियां ते करिष्यामीत्युक्त्वान्तर्धानं जगाम ॥ ४४ ॥ | ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम था, उसका सुदास और सुदासका पुत्र सौदासमित्रसह हुआ ॥ ३८-४० ॥ एक दिन मृगयाके लिये वनमें घूमते-घूमते उसने दो व्याघ्र देखे ॥ ४१ ॥ इन्होंने सम्पूर्ण वनको मृगहीन कर दिया है—ऐसा समझकर उसने उनमेंसे एकको बाणसे मार डाला ॥ ४२ ॥ मरते समय वह अति भयंकररूप क्रूर-वदन राक्षस हो गया ॥ ४३ ॥ तथा दूसरा भी 'मैं इसका बदला लूँगा' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गया ॥ ४४ ॥ |
| कालेन गच्छता सौदासो यज्ञमयजत् ॥ ४५ ॥ परिनिष्ठितयज्ञे आचार्ये वसिष्ठे निष्क्रान्ते तद्रक्षो वसिष्ठरूपमास्थाय यज्ञावसाने मम नरमांसभोजनं देयमिति तत्संस्क्रियतां क्षणादागमिष्यामीत्युक्त्वा निष्क्रान्तः ॥ ४६ ॥ भूयश्च सूदवेषं कृत्वा राजाज्ञया मानुषं मांसं संस्कृत्य राज्ञे न्यवेदयत् ॥ ४७ ॥ असावपि हिरण्यपात्रे मांसमादाय वसिष्ठागमनप्रतीक्षकोऽभवत् ॥ ४८ ॥ आगताय वसिष्ठाय निवेदितवान् ॥ ४९ ॥ | कालान्तरमें सौदासने एक यज्ञ किया ॥ ४५ ॥ यज्ञ समाप्त हो जानेपर जब आचार्य वसिष्ठ बाहर चले गये तब वह राक्षस वसिष्ठजीका रूप बनाकर बोला—'यज्ञके पूर्ण होनेपर मुझे नर-मांसयुक्त भोजन कराना चाहिये; अतः तुम ऐसा अन्न तैयार कराओ, मैं अभी आता हूँ' ऐसा कहकर वह बाहर चला गया ॥ ४६ ॥ फिर रसोइयेका वेष बनाकर राजाकी आज्ञासे उसने मनुष्यका मांस पकाकर उसे निवेदन किया ॥ ४७ ॥ राजा भी उसे सुवर्णपात्रमें रखकर वसिष्ठजीके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा और उनके आते ही वह मांस निवेदन कर दिया ॥ ४८-४९ ॥ |
| स चाप्यचिन्तयदहो अस्य राज्ञो दौश्शी्ल्यं येनैतन्मांसमस्माकं प्रयच्छति किमेतद्द्रव्यजातमिति ध्यानपरोऽभवत् ॥ ५० ॥ अपश्यच्च तन्मांसं मानुषम् ॥ ५१ ॥ अतः क्रोधकलुषीकृतचेता राजनि शापमुत्ससर्ज ॥ ५२ ॥ यस्मादभोज्यमेतदस्मद्विधानां तपस्विनामवगच्छन्नपि भवान्मह्यं ददाति तस्मात्तवैवात्र लोलुपता भविष्यतीति ॥ ५३ ॥ | वसिष्ठजीने सोचा—'अहो ! इस राजाकी कुटिलता तो देखो जो यह जान-बूझकर भी मुझे खानेके लिये यह मांस देता है।' फिर यह जाननेके लिये कि यह किसका है वे ध्यानस्थ हो गये ॥ ५० ॥ ध्यानावस्थामें उन्होंने देखा कि वह तो नरमांस है ॥ ५१ ॥ तब तो क्रोधके कारण क्षुब्धचित्त होकर उन्होंने राजाको यह शाप दिया ॥ ५२ ॥ 'क्योंकि तूने जान-बूझकर भी हमारे-जैसे तपस्वियोंके लिये अत्यन्त अभक्ष्य यह नरमांस मुझे खानेको दिया है इसलिये तेरी इसीमें लोलुपता होगी [अर्थात् तू राक्षस हो जायगा] ॥ ५३ ॥ |
२५४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४
अनन्तरं च तेनापि भगवतैवाभिहितोऽस्मीत्युक्ते किं किं मयाभिहितमिति मुनिः पुनरपि समाधौ तस्थौ ॥ ५४॥ समाधिविज्ञानावगतार्थश्चानुग्रहं तस्मै चकार नात्यन्तिकमेतद्द्वादशाब्दं तव भोजनं भविष्यतीति ॥ ५५ ॥ असावपि प्रतिगृहोदकाञ्जलिं मुनिशापप्रदानायोद्यतो भगवन्नयमस्मद्गुरुर्नाहंस्येनं कुलदेवताभूतमाचार्यं शप्तुमिति मदयन्त्या स्वपत्न्या प्रसादितस्सस्याम्बुदरक्षणार्थं तच्छापाम्बु नोर्व्यां न चाकाशे चिक्षेप किं तु तेनैव स्वपादौ सिषेच ॥ ५६ ॥ तेन च क्रोधाश्रितेनाम्बुना दग्धच्छायौ तत्पादौ कल्माषतामुपगतौ ततस्स कल्माषपादसंज्ञामवाप ॥ ५७॥ वसिष्ठशापाच्च षष्ठे षष्ठे काले राक्षसस्वभावमेत्याटव्यां पर्यटन्ननेकशो मानुषानभक्षयत् ॥ ५८ ॥
एकदा तु कञ्चिन्मुनिमृतुकाले भार्यासंगतं ददर्श ॥ ५९ ॥ तयोश्च तमतिभीषणं राक्षसस्वरूपमवलोक्य त्रासाद्दम्पत्योः प्रधावितयोर्ब्राह्मणं जग्राह ॥ ६० ॥ ततस्सा ब्राह्मणी बहुशस्तमभियाचितवती ॥ ६१ ॥ प्रसीदेक्ष्वाकुकुलतिलकभूतस्त्वं महाराजो मित्रसहो न राक्षसः ॥ ६२ ॥ नार्हसि स्त्रीधर्मसुखाभिज्ञो मय्यकृतार्थायामस्मद्भर्तारं हन्तुमित्येवं बहुप्रकारं तस्यां विलपन्त्यां व्याघ्रः पशुमिवारण्येऽभिमतं तं ब्राह्मणमभक्षयत् ॥ ६३ ॥
ततश्चातिकोपसमन्विता ब्राह्मणी तं राजानं शशाप ॥ ६४ ॥ यस्मादेवं मय्यतृप्तायां त्वयायं मत्पतिर्भक्षितः तस्मात्त्वमपि कामोपभोगप्रवृत्तोऽन्तं प्राप्स्यसीति ॥ ६५ ॥ शप्त्वा चैवं साग्निं प्रविवेश ॥ ६६ ॥
ततस्तस्य द्वादशाब्दपर्यये विमुक्तशापस्य स्त्रीविषयाभिलाषिणो मदयन्ती तं स्मारयामास ॥ ६७ ॥
तदनन्तर राजाके यह कहनेपर कि 'भगवन्! आपनेही ऐसी आज्ञा की थी,' वसिष्ठजी यह कहते हुए कि 'क्या मैंने ही ऐसा कहा था?' फिर समाधिस्थ हो गये ॥ ५४ ॥ समाधिद्वारा यथार्थ बात जानकर उन्होंने राजापर अनुग्रह करते हुए कहा—"तू अधिक दिन नरमांस भोजन न करेगा, केवल बारह वर्ष ही तुझे ऐसा करना होगा" ॥ ५५ ॥ वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर राजा सौदास भी अपनी अंजलिमें जल लेकर मुनीश्वरको शाप देनेके लिये उद्यत हुआ। किन्तु अपनी पत्नी मदयन्तीद्वारा 'भगवन्! ये हमारे कुलगुरु हैं, इन कुलदेवरूप आचार्यको शाप देना उचित नहीं है'—ऐसा कहे जानेसे शान्त हो गया तथा अन्न और मेघकी रक्षाके कारण उस शाप-जलको पृथिवी या आकाशमें नहीं फेंका, बल्कि उससे अपने पैरोंको ही भिगो लिया ॥ ५६ ॥ उस क्रोधयुक्त जलसे उसके पैर झुलसकर कल्माषवर्ण (चितकबरे) हो गये। तभीसे उनका नाम कल्माषपाद हुआ ॥ ५७ ॥ तथा वसिष्ठजीके शापके प्रभावसे छठे कालमें अर्थात् तीसरे दिनके अन्तिम भागमें वह राक्षस-स्वभाव धारणकर वनमें घूमते हुए अनेकों मनुष्योंको खाने लगा ॥ ५८ ॥
एक दिन उसने एक मुनीश्वरको ऋतुकालके समय अपनी भार्यासे संगम करते देखा ॥ ५९ ॥ उस अति भीषण राक्षस-रूपको देखकर भयसे भागते हुए उन दम्पतियोंमेंसे उसने ब्राह्मणको पकड़ लिया ॥ ६० ॥ तब ब्राह्मणीने उससे नाना प्रकारसे प्रार्थना की और कहा—"हे राजन्! प्रसन्न होइये। आप राक्षस नहीं हैं बल्कि इक्ष्वाकुकुलतिलक महाराज मित्रसह हैं ॥ ६१-६२ ॥ आप स्त्री-संयोगके सुखको जाननेवाले हैं; मैं अतृप्त हूँ, मेरे पतिको मारना आपको उचित नहीं है।' इस प्रकार उसके नाना प्रकारसे विलाप करनेपर भी उसने उस ब्राह्मणको इस प्रकार भक्षण कर लिया जैसे बाघ अपने अभिमत पशुको वनमें पकड़कर खा जाता है ॥ ६३ ॥
तब ब्राह्मणीने अत्यन्त क्रोधित होकर राजाको शाप दिया— ॥ ६४ ॥ 'अरे! तूने मेरे अतृप्त रहते हुए भी इस प्रकार मेरे पतिको खा लिया, इसलिये कामोपभोगमें प्रवृत्त होते ही तेरा अन्त हो जायगा' ॥ ६५ ॥ इस प्रकार शाप देकर वह अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ६६ ॥
तदनन्तर बारह वर्षके अन्तमें शापमुक्त हो जानेपर एक दिन विषय-कामनामें प्रवृत्त होनेपर रानी मदयन्तीने उसे ब्राह्मणीके शापका स्मरण करा दिया ॥ ६७ ॥
अ० ४ ] $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ * चतुर्थ अंश * $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ २५५
[ संस्कृत मूल ]
ततः परमसौ स्त्रीभोगं तत्याज॥ ६८॥ वसिष्ठश्चापुत्रेण राज्ञा पुत्रार्थमभ्यर्थितो मदयन्त्यां गर्भाधानं चकार॥ ६९॥ यदा च सप्तवर्षाण्यसौ गर्भो न जज्ञे ततस्तं गर्भमश्मना सा देवी जघान॥ ७० ॥ पुत्रश्चाजायत॥ ७१ ॥ तस्य चाश्मक इत्येव नामाभवत्॥ ७२ ॥ अश्मकस्य मूलको नाम पुत्रोऽभवत्॥ ७३ ॥ योऽसौ निःक्षत्रे क्ष्मातलेऽस्मिन् क्रियमाणे स्त्रीभिर्विवस्त्राभिः परिवार्य रक्षितस्ततस्तं नारीकवचमुदाहरन्ति॥ ७४॥
मूलकाद्दशरथस्तस्मादिलिविलस्ततश्चविश्वसहः॥ ७५ ॥ तस्माच्च खट्वाङ्गो योऽसौ देवासुरसङ्ग्रामे देवैरभ्यर्थितोऽसुराज्जघान॥ ७६॥ स्वर्गे च कृतप्रियैर्देवैर्वरग्रहणाय चोदितः प्राह॥ ७७ ॥ यद्यवश्यं वरो ग्राह्यस्तन्ममायुः कथ्यतामिति॥ ७८॥ अनन्तरं च तैरुक्तं एकमुहूर्त्तप्रमाणं तवायुरित्युक्तोऽथास्खलितगतिना विमानेन लघिमगुणो मर्त्यलोकमागम्येदमाह॥ ७९ ॥ यथा न ब्राह्मणेभ्यस्सकाशादात्मापि मे प्रियतरो न च स्वधर्मोल्लङ्घनं मया कदाचिदप्यनुष्ठितं न च सकलदेवमानुषपशुपक्षिवृक्षादिकेष्वच्युतव्यतिरेकवती दृष्टिमैमाभूत् तथा तमेवं मुनिजनानुस्मृतं भगवन्तमस्खलितगतिः प्रापयेयमित्यशेषदेवगुरौ भगवत्यनिर्देश्यवपुषि सत्तामात्रामन्त्यात्मानं परमात्मनि वासुदेवाख्ये युयोज तत्रैव च लयमवाप॥ ८० ॥
अत्रापि श्रूयते श्लोको गीतस्सप्तर्षिभिः पुरा।
खट्वांगेन समो नान्यः कश्चिदुर्व्यां भविष्यति॥ ८१
येन स्वर्गादिहागम्य मुहूर्तं प्राप्य जीवितम्।
त्रयोऽभिसंहिता लोका बुद्ध्या सत्येन चैव हि॥ ८२
खट्वाङ्गाद्दीर्घबाहुः पुत्रोऽभवत्॥ ८३॥ ततो रघुरभवत्॥ ८४॥ तस्मादप्यजः॥ ८५॥ अजाद्दशरथः॥ ८६॥ तस्यापि भगवानब्जनाभो जगतः स्थित्यर्थमात्मांशेन रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नरूपेण चतुर्द्धा पुत्रत्वमायासीत्॥ ८७॥
[ हिन्दी अनुवाद ]
तभीसे राजाने स्त्री-सम्भोग त्याग दिया॥ ६८॥ पीछे पुत्रहीन राजाके प्रार्थना करनेपर वसिष्ठजीने मदयन्तीके गर्भाधान किया॥ ६९॥ जब उस गर्भने सात वर्ष व्यतीत होनेपर भी जन्म न लिया तो देवी मदयन्तीने उसपर पत्थरसे प्रहार किया॥ ७० ॥ इससे उसी समय पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका नाम अश्मक हुआ॥ ७१-७२॥ अश्मकके मूलक नामक पुत्र हुआ॥ ७३॥ जब परशुरामजीद्वारा यह पृथिवीतल क्षत्रियहीन किया जा रहा था उस समय उस (मूलक)-की रक्षा वस्त्रहीना स्त्रियोंने घेरकर की थी, इससे उसे नारीकवच भी कहते हैं॥ ७४॥
मूलकके दशरथ, दशरथके इलिविल, इलिविलके विश्वसह और विश्वसहके खट्वांग नामक पुत्र हुआ, जिसने देवासुरसंग्राममें देवताओंके प्रार्थना करनेपर दैत्योंका वध किया था॥ ७५-७६॥ इस प्रकार स्वर्गमें देवताओंका प्रिय करनेसे उनके द्वारा वर माँगनेके लिये प्रेरित किये जानेपर उसने कहा—॥ ७७॥ “यदि मुझे वर ग्रहण करना ही पड़ेगा तो आपलोग मेरी आयु बतलाइये”॥ ७८॥ तब देवताओंके यह कहनेपर कि तुम्हारी आयु केवल एक मुहूर्त और रही है वह [देवताओंके दिये हुए] एक अनवरुद्धगति विमानपर बैठकर बड़ी शीघ्रतासे मर्त्यलोकमें आया और कहने लगा—॥ ७९॥ 'यदि मुझे ब्राह्मणोंकी अपेक्षा कभी अपना आत्मा भी प्रियतर नहीं हुआ, यदि मैंने कभी स्वधर्मका उल्लंघन नहीं किया और सम्पूर्ण देव, मनुष्य, पशु, पक्षी और वृक्षादिमें श्रीअच्युतके अतिरिक्त मेरी अन्य दृष्टि नहीं हुई तो मैं निर्विघ्नतापूर्वक उन मुनिजनवन्दित प्रभुको प्राप्त होऊँ।' ऐसा कहते हुए राजा खट्वांगने सम्पूर्ण देवताओंके गुरु, अकथनीयस्वरूप, सत्तामात्र-शरीर, परमात्मा भगवान् वासुदेवमें अपना चित्त लगा दिया और उन्हींमें लीन हो गये॥ ८०॥
इस विषयमें भी पूर्वकालमें सप्तर्षियोंद्वारा कहा हुआ श्लोक सुना जाता है। [उसमें कहा है—] 'खट्वांगके समान पृथिवीतलमें अन्य कोई भी राजा नहीं होगा, जिसने एक मुहूर्तमात्र जीवनके रहते ही स्वर्गलोकसे भूमण्डलमें आकर अपनी बुद्धिद्वारा तीनों लोकोंको सत्यस्वरूप भगवान् वासुदेवमय देखा'॥ ८१-८२॥
खट्वांगसे दीर्घबाहु नामक पुत्र हुआ। दीर्घबाहुसे रघु, रघुसे अज और अजसे दशरथने जन्म लिया॥ ८३–८६॥ दशरथजीके भगवान् कमलनाभ जगत्की स्थितिके लिये अपने अंशोंसे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न-इन चार रूपोंसे पुत्र-भावको प्राप्त हुए॥ ८७॥
२५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४
[संस्कृत मूल पाठ]
रामोऽपि बाल एव विश्वामित्रयागरक्षणाय गच्छंस्ताटकां जघान ॥ ८८ ॥
यज्ञे च मारीचमिषुवाताहतं समुद्रे चिक्षेप ॥ ८९ ॥
सुबाहुप्रमुखांश्च क्षयमनयत् ॥ ९० ॥
दर्शनमात्रेणाहल्यामपापां चकार ॥ ९१ ॥
जनकगृहे च माहेश्वरं चापमनायासेन बभञ्ज ॥ ९२ ॥
सीतामयौनिजां जनकराजतनयां वीर्यशुल्कां लेभे ॥ ९३ ॥
सकलक्षत्रियक्षयकारिणमशेषहैहयकुलधूमकेतुभूतं च परशुराममपास्तवीर्यबलावलेपं चकार ॥ ९४ ॥
पितृवचनाच्चावगणितराज्याभिलाषो भ्रातृभार्यासमेतो वनं प्रविवेश ॥ ९५ ॥
विराधखरदूषणादीन् कबन्धवालिनौ च निजघान ॥ ९६ ॥
बद्ध्वा चाम्भोनिधिमशेषराक्षसकुलक्षयं कृत्वा दशाननापहृतां भार्यां तद्वधादपहतऽकलंकामप्यनलप्रवेशशुद्धामशेषदेवसङ्घैः स्तूयमानशीलां जनकराजकन्यामयोध्यामानीन्ये ॥ ९७ ॥
ततश्चाभिषेकमङ्गलं मैत्रेय वर्षशतेनापि वक्तुं न शक्यते सङ्क्षेपेण श्रूयताम् ॥ ९८ ॥
लक्ष्मणभरतशत्रुघ्नविभीषणसुग्रीवाङ्गदजाम्बवद्धनुमत्प्रभृतिभिस्समुत्फुल्लवदनैश्छत्रचामरादियुतैः सेव्यमानो दाशरथिर्ब्रह्मेन्द्राग्नियमनिर्रृतिवरुणवायुकुबेरेशानप्रभृतिभिस्सर्वामरैर्वसिष्ठवामदेववाल्मीकिमार्कण्डेयविश्वामित्रभरद्वाजागस्त्यप्रभृतिभिर्मुनिवरैः ऋग्यजुस्सामाथर्वभिस्संस्तूयमानो नृत्यगीतवाद्याद्यखिललोकमङ्गलवाद्यैर्वीणावेणुमृदङ्गभेरीपटहशङ्खकाहलगोमुखप्रभृतिभिस्सुनादैस्समस्तभूभृतां मध्ये सकललोकरक्षार्थं यथोचितमभिषिक्तो दाशरथिः कोसलेन्द्रो रघुकुलतिलको जानकीप्रियो भ्रातृत्रयप्रियस्सिंहासनगत एकादशाब्दसहस्त्रं राज्यमकरोत् ॥ ९९ ॥
[हिन्दी अनुवाद]
रामजीने बाल्यावस्थामें ही विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षाके लिये जाते हुए मार्गमें ही ताटका राक्षसीको मारा, फिर यज्ञशालामें पहुँचकर मारीचको बाणरूपी वायुसे आहत कर समुद्रमें फेंक दिया और सुबाहु आदि राक्षसोंको नष्ट कर डाला ॥ ८८–९० ॥
उन्होंने अपने दर्शनमात्रसे अहल्याको निष्पाप किया, जनकजीके राजभवनमें बिना श्रम ही महादेवजीका धनुष तोड़ा और पुरुषार्थसे ही प्राप्त होनेवाली अयौनिजा जनकराजनन्दिनी श्रीसीताजीको पत्नीरूपसे प्राप्त किया ॥ ९१–९३ ॥
और तदनन्तर सम्पूर्ण क्षत्रियोंको नष्ट करनेवाले, समस्त हैहयकुलके लिये अग्निस্বরূপ परशुरामजीके बल-वीर्यका गर्व नष्ट किया ॥ ९४ ॥
फिर पिताके वचनसे राज्यलक्ष्मीको कुछ भी न गिनकर भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताके सहित वनमें चले गये ॥ ९५ ॥
वहाँ विराध, खर, दूषण आदि राक्षस तथा कबन्ध और वालीका वध किया और समुद्रपर पुल बाँधकर सम्पूर्ण राक्षसकुलका विध्वंस किया तथा रावणद्वारा हरी हुई और उसके वधसे कलंकहीना होनेपर भी अग्निप्रवेशसे शुद्ध हुई समस्त देवगणोंसे प्रशंसित स्वभाववाली अपनी भार्या जनकराजकन्या सीताको अयोध्यामें ले आये ॥ ९६–९७ ॥
हे मैत्रेय ! उस समय उनके राज्याभिषेकजैसा मंगल हुआ उसका तो सौ वर्षमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता; तथापि संक्षेपसे सुनो ॥ ९८ ॥
दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्नवदन लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, विभीषण, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान् आदिसे छत्र-चामरादिद्वारा सेवित हो, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान आदि सम्पूर्ण देवगण, वसिष्ठ, वामदेव, वाल्मीकि, मार्कण्डेय, विश्वामित्र, भरद्वाज और अगस्त्य आदि मुनिजन तथा ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेदोंसे स्तुति किये जाते हुए तथा नृत्य, गीत, वाद्य आदि सम्पूर्ण मंगलसामग्रियोंसहित वीणा, वेणु, मृदंग, भेरी, पटह, शंख, काहल और गोमुख आदि बाजोंके घोषके साथ समस्त राजाओंके मध्यमें सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये विधिपूर्वक अभिषिक्त हुए। इस प्रकार दशरथकुमार कोसलाधिपति, रघुकुलतिलक, जानकीवल्लभ, तीनों भ्राताओंके प्रिय श्रीरामचन्द्रजीने सिंहासनारूढ़ होकर ग्यारह हजार वर्ष राज्य-शासन किया ॥ ९९ ॥
अ० ४ ] * चतुर्थ अंश * २५७
भरतोऽपि गन्धर्वविषयसाधनाय गच्छन् संग्रामे गन्धर्वकोटिस्तिस्रो जघान ॥ १००॥ शत्रुघ्नेनाप्यमितबलपराक्रमो मधुपुत्रो लवणो नाम राक्षसो निहतो मथुरा च निवेशिता ॥ १०१ ॥ इत्येवमाद्यतिबलपराक्रमविक्रमणैरतिदुष्टसंहारिणोऽशेषस्य जगतो निष्पादितस्थितयो राम-लक्ष्मणभरतशत्रुघ्नाः पुनरपि दिवमारूढाः ॥ १०२ ॥ येऽपि तेषु भगवदंशेष्वनुरागिणः कोसलनगरजानपदास्तेऽपि तन्मनसस्तत्सालोक्यतामवापुः ॥ १०३ ॥
अतिदुष्टसंहारिणो रामस्य कुशलवौ द्वौ पुत्रौ लक्ष्मणस्याङ्गदचन्द्रकेतू तक्षपुष्कलौ भरतस्य सुबाहुशूरसेनौ शत्रुघ्नस्य ॥ १०४॥ कुशस्यातिथिर्तिथिरेरपि निषधः पुत्रोऽभूत् ॥ १०५॥ निषधस्याप्यनलस्तस्मादपि नभाः नभसः पुण्डरीकस्तत्तनयः क्षेमधन्वा तस्य च देवानीकस्तस्याप्यहीनकोऽहीनकस्यापि रुरुस्तस्य च पारियात्रकः पारियात्रकाद्देवलो देवलाद्वञ्चलः, तस्याप्युत्कः, उत्काच्च वज्रनाभस्तस्माच्छङ्खणस्तस्माद्युषिताश्वस्ततश्च विश्वसहो जज्ञे ॥ १०६ ॥ तस्माद्धिरण्यनाभो यो महायोगीश्वरज्जैमिनेश्शिष्याद्याज्ञवल्क्याद्योगमवाप ॥ १०७ ॥ हिरण्यनाभस्य पुत्रः पुष्यस्तस्माद्ध्रुवसन्धिस्ततस्सुदर्शनस्तस्मादग्निवर्णस्ततश्शीघ्रगस्तस्मादपि मरुः पुत्रोऽभवत् ॥ १०८ ॥ योऽसौ योगमास्थायाद्यापि कलापग्राममाश्रित्य तिष्ठति ॥ १०९ ॥ आगामियुगे सूर्यवंशक्षत्रप्रवर्त्तयिता भविष्यति ॥ ११०॥ तस्यात्मजः प्रसुश्रुतस्तस्यापि सुसन्धिस्ततश्चामर्ष-मर्षस्तस्य च सहस्वांस्ततश्च विश्वभवः ॥ १११ ॥ तस्य बृहद्दलः योऽर्जुनतनयेनाभिमन्युना भारतयुद्धे क्षयमनीयत ॥ ११२ ॥
एते इक्ष्वाकुभूपालाः प्राधान्येन मयेरिताः।
एतेषां चरितं शृण्वन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ११३ ॥
भरतजीने भी गन्धर्वलोकको जीतनेके लिये जाकर युद्धमें तीन करोड़ गन्धर्वोंका वध किया और शत्रुघ्नजीने भी अतुलित बलशाली महापराक्रमी मधुपुत्र लवण राक्षसका संहार किया और मथुरा नामक नगरकी स्थापना की॥ १००-१०१॥ इस प्रकार अपने अतिशय बल-पराक्रमसे महान् दुष्टोंको नष्ट करनेवाले भगवान् राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सम्पूर्ण जगत्की यथोचित व्यवस्था करनेके अनन्तर फिर स्वर्गलोकको पधारे॥ १०२॥ उनके साथ ही जो अयोध्यानिवासी उन भगवदंशस्वरूपोंके अतिशय अनुरागी थे उन्होंने भी तन्मय होनेके कारण सालोक्य-मुक्ति प्राप्त की॥ १०३॥
दुष्ट-दलन भगवान् रामके कुश और लव नामक दो पुत्र हुए। इसी प्रकार लक्ष्मणजीके अंगद और चन्द्रकेतु, भरतजीके तक्ष और पुष्कल तथा शत्रुघ्नजीके सुबाहु और शूरसेन नामक पुत्र हुए॥ १०४॥ कुशके अतिथि, अतिथिके निषध, निषधके अनल, अनलके नभ, नभके पुण्डरीक, पुण्डरीकके क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वाके देवानीक, देवानीकके अहीनक, अहीनकके रुरु, रुरुके पारियात्रक, पारियात्रकके देवल, देवलके वञ्चल, वञ्चलके उत्क, उत्कके वज्रनाभ, वज्रनाभके शंखण, शंखणके युषिताश्व और युषिताश्वके विश्वसह नामक पुत्र हुआ॥ १०५-१०६॥ विश्वसहके हिरण्यनाभ नामक पुत्र हुआ जिसने जैमिनिके शिष्य महायोगीश्वर याज्ञवल्क्यजीसे योगविद्या प्राप्त की थी॥ १०७॥ हिरण्यनाभका पुत्र पुष्य था, उसका ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धिका सुदर्शन, सुदर्शनका अग्निवर्ण, अग्निवर्णका शीघ्रग तथा शीघ्रगका पुत्र मरु हुआ जो इस समय भी योगाभ्यासमें तत्पर हुआ कलापग्राममें स्थित है॥ १०८-१०९॥ आगामी युगमें यह सूर्यवंशीय क्षत्रियोंका प्रवर्त्तक होगा॥ ११०॥ मरुका पुत्र प्रसुश्रुत, प्रसुश्रुतका सुसन्धि, सुसन्धिका अमर्ष, अमर्षका सहस्वान्, सहस्वान्का विश्वभव तथा विश्वभवका पुत्र बृहद्दल हुआ जिसको भारत युद्धमें अर्जुनके पुत्र अभिमन्युने मारा था॥ १११-११२॥
इस प्रकार मैंने यह इक्ष्वाकुकुलके प्रधान-प्रधान राजाओंका वर्णन किया। इनका चरित्र सुननेसे मनुष्य सकल पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ११३॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
२५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
पाँचवाँ अध्याय
निमि-चरित्र और निमिवंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| इक्ष्वाकुतनयो योऽसौ निमिर्नाम सहस्रं वत्सरं सत्रमारेभे ॥ १ ॥ वसिष्ठं च होतारं वरयामास ॥ २ ॥ तमाह वसिष्ठोऽहमिन्द्रेण पञ्चवर्षशतयागार्थं प्रथमं वृतः ॥ ३ ॥ तदनन्तरं प्रतिपाल्यतामागतस्तवापि ऋत्विग्भविष्यामीत्युक्ते स पृथिवीपतिर्न किञ्चिदुक्तवान् ॥ ४ ॥<br><br>वसिष्ठोऽप्यनेन समन्वीप्सितमित्यमरपतेर्यागमकरोत् ॥ ५ ॥ सोऽपि तत्काल एवान्यैर्गौतमादिभिर्यागमकरोत् ॥ ६ ॥<br><br>समाप्ते चामरपतेर्यागे त्वरया वसिष्ठो निमियज्ञं करिष्यामीत्याजगाम ॥ ७ ॥ तत्कर्मकर्तृत्वं च गौतमस्य दृष्ट्वा स्वपते तस्मै राज्ञे मां प्रत्याख्यायैतदनेन गौतमाय कर्मान्तरं समर्पितं यस्मात्तस्मादयं विदेहो भविष्यतीति शापं ददौ ॥ ८ ॥ प्रबुद्धश्चासाववनिपतिरपि प्राह ॥ ९ ॥ यस्मान्मामसम्भाष्याज्ञानत एव शयानस्य शापोत्सर्गमसौ दुष्टगुरुश्चकार तस्मात्तस्यापि देहः पतिष्यतीति शापं दत्त्वा देहमत्यजत् ॥ १० ॥<br><br>तच्छापाच्च मित्रावरुणयोस्तेजसि वसिष्ठस्य चेतः प्रविष्टम् ॥ ११ ॥ उर्वशीदर्शनादुद्भूतबीजप्रपातयोस्तयोस्सकाशाद्वसिष्ठो देहमपरं लेभे ॥ १२ ॥ निमेरपि तच्छरीरमतिमनोहरगन्धतैलादिभिरुपसंस्क्रियमाणं नैव क्लेदादिकं दोषमवाप सद्यो मृत इव तस्थौ ॥ १३ ॥<br><br>यज्ञसमाप्तौ भागग्रहणाय देवानागतानृत्विज ऊचुर्यजमानाय वरो दीयतामिति ॥ १४ ॥ देवैश्च छन्दितोऽसौ निमिराह ॥ १५ ॥ भगवन्तोऽखिलसंसारदुःखहन्तारः ॥ १६ ॥ न ह्येतादृगन्यद्दुःखमस्ति यच्छरीरात्मनोर्वियोगे भवति ॥ १७ ॥ तदहमिच्छामि सकललोकलोचनेषु वस्तुं न पुनश्शरीरग्रहणं कर्तुमित्येवमुक्तैर्देवैरसावशेष- | इक्ष्वाकुका जो निमि नामक पुत्र था उसने एक सहस्रवर्षमें समाप्त होनेवाले यज्ञका आरम्भ किया ॥ १ ॥ उस यज्ञमें उसने वसिष्ठजीको होता वरण किया ॥ २ ॥ वसिष्ठजीने उससे कहा कि पाँच सौ वर्षके यज्ञके लिये इन्द्रने मुझे पहले ही वरण कर लिया है ॥ ३ ॥ अतः इतने समय तुम ठहर जाओ, वहाँसे आनेपर मैं तुम्हारा भी ऋत्विक् हो जाऊँगा। उनके ऐसा कहनेपर राजाने उन्हें कुछ भी उत्तर नहीं दिया ॥ ४ ॥<br><br>वसिष्ठजीने यह समझकर कि राजाने उनका कथन स्वीकार कर लिया है इन्द्रका यज्ञ आरम्भ कर दिया ॥ ५ ॥ किन्तु राजा निमि भी उसी समय गौतमादि अन्य होताओंद्वारा अपना यज्ञ करने लगे ॥ ६ ॥<br><br>देवराज इन्द्रका यज्ञ समाप्त होते ही 'मुझे निमिका यज्ञ कराना है' इस विचारसे वसिष्ठजी भी तुरंत ही आ गये ॥ ७ ॥ उस यज्ञमें अपना [होताका] कर्म गौतमको करते देख उन्होंने सोते हुए राजा निमिको यह शाप दिया कि 'इसने मेरी अवज्ञा करके सम्पूर्ण कर्मका भार गौतमको सौंपा है इसलिये यह देहहीन हो जायगा' ॥ ८ ॥ सोकर उठनेपर राजा निमिने भी कहा— ॥ ९ ॥ “इस दुष्ट गुरुने मुझसे बिना बातचीत किये अज्ञानतापूर्वक मुझ सोये हुएको शाप दिया है, इसलिये इसका देह भी नष्ट हो जायगा।” इस प्रकार शाप देकर राजाने अपना शरीर छोड़ दिया ॥ १० ॥<br><br>राजा निमिके शापसे वसिष्ठजीका लिंगदेह मित्रावरुणके वीर्यमें प्रविष्ट हुआ ॥ ११ ॥ और उर्वशीके देखनेसे उसका वीर्य स्खलित होनेपर उसीसे उन्होंने दूसरा देह धारण किया ॥ १२ ॥ निमिका शरीर भी अति मनोहर गन्ध और तैल आदिसे सुरक्षित रहनेके कारण गला-सड़ा नहीं, बल्कि तत्काल मरे हुए देहके समान ही रहा ॥ १३ ॥<br><br>यज्ञ समाप्त होनेपर जब देवगण अपना भाग ग्रहण करनेके लिये आये तो उनसे ऋत्विक्गण बोले कि— “यजमानको वर दीजिये” ॥ १४ ॥ देवताओंद्वारा प्रेरणा किये जानेपर राजा निमिने उनसे कहा— ॥ १५ ॥ “भगवन्! आपलोग सम्पूर्ण संसार-दुःखको दूर करनेवाले हैं ॥ १६ ॥ मेरे विचारमें शरीर और आत्माके वियोग होनेमें जैसा दुःख होता है वैसा और कोई दुःख नहीं है ॥ १७ ॥ इसलिये मैं अब फिर शरीर ग्रहण करना नहीं चाहता, समस्त लोगोंके नेत्रोंमें ही वास करना चाहता हूँ।” |
अ० ५ ] * चतुर्थ अंश * २५९
| भूतानां नेत्रेष्ववतारितः ॥ १८ ॥ ततो भूतान्युन्मेषनिमेषं चक्रुः ॥ १९ ॥<br>अपुत्रस्य च भूपुजः शरीरमराजकभीरवो मुनयोऽरण्या ममन्थुः ॥ २० ॥ तत्र च कुमारो जज्ञे ॥ २१ ॥ जननाज्जनकसंज्ञां चावाप ॥ २२ ॥ अभूद्विदेहोऽस्य पितेति वैदेहः, मथनान्मिथिरिति ॥ २३ ॥ तस्योदावसुः पुत्रोऽभवत् ॥ २४ ॥ उदावसोर्नन्दिवर्द्धनस्ततस्सुकेतुः तस्माद्देवरात-स्ततश्च बृहदुक्थः तस्य च महावीर्यस्तस्यापि सुधृतिः ॥ २५ ॥ ततश्च धृष्टकेतुरजायत ॥ २६ ॥ धृष्टकेतोर्हर्यश्वस्तस्य च मनुर्मनोः प्रतीकः, तस्मात्कृतरथस्तस्य देवमीढः, तस्य च विबुधो विबुधस्य महाद्युतिस्ततश्च कृतरातः, ततो महारोमा तस्य सुवर्णरोमा तत्पुत्रो ह्रस्वरोमा ह्रस्वरोम्णस्सीरध्वजोऽभवत् ॥ २७ ॥ तस्य पुत्रार्थं यजनभुवं कृषतः सीरे सीता दुहिता समुत्पन्ना ॥ २८ ॥<br>सीरध्वजस्य भ्राता सांकाश्य़ाधिपतिः कुशध्वजनामासीत् ॥ २९ ॥ सीरध्वजस्यापत्यं भानुमान् भानुमतश्शतद्युम्नः तस्य तु शुचिः तस्माच्चोर्जनामा पुत्रो जज्ञे ॥ ३० ॥ तस्यापि शतध्वजः, ततः कृतिः कृतेरञ्जनः, तत्पुत्रः कुरुजित् ततोऽरिष्टनेमिः तस्माच्छ्रुतायुः श्रुतायुषः सुपार्श्वः तस्मात्सृञ्जयः, ततः क्षेमावी क्षेमाविनोऽनेनाः तस्माद्भौमरथः, तस्य सत्यरथः, तस्मादुपगुरुपगोरुपगुप्तः, तत्पुत्रः स्वागतस्तस्य च स्वानन्दः, तस्माच्च सुवर्चाः, तस्य च सुपार्श्वः, तस्यापि सुभाषः, तस्य सुश्रुतः तस्मात्सुश्रुताज्जयः तस्य पुत्रो विजयो विजयस्य ऋतः, ऋतात्सुनयः सुनयाद्वीत-हव्यः तस्माद्धृतिर्धृतेर्बहुलाश्वः, तस्य पुत्रः कृतिः ॥ ३१ ॥ कृतौ सन्तिष्ठतेऽयं जनकवंशः ॥ ३२ ॥ इत्येते मैथिलाः ॥ ३३ ॥ प्रायेणैते आत्मविद्याश्रयिणो भूपाला भवन्ति ॥ ३४ ॥ | राजाके ऐसा कहनेपर देवताओने उनको समस्त जीवोंके नेत्रोंमें अवस्थित कर दिया ॥ १८ ॥ तभीसे प्राणी निमेषोन्मेष (पलक खोलना-मूँदना) करने लगे हैं ॥ १९ ॥<br>तदनन्तर अराजकताके भयसे मुनिजनोंने उस पुत्रहीन राजाके शरीरको अरणि (शमीदण्ड)-से मँथा ॥ २० ॥ उससे एक कुमार उत्पन्न हुआ जो जन्म लेनेके कारण 'जनक' कहलाया ॥ २१-२२ ॥ इसके पिता विदेह थे इसलिये यह 'वैदेह' कहलाता है और मन्थनसे उत्पन्न होनेके कारण 'मिथि' भी कहा जाता है ॥ २३ ॥ उसके उदावसु नामक पुत्र हुआ ॥ २४ ॥ उदावसुके नन्दिवर्द्धन, नन्दिवर्द्धनके सुकेतु, सुकेतुके देवरात, देवरातके बृहदुक्थ, बृहदुक्थके महावीर्य, महावीर्यके सुधृति, सुधृतिके धृष्टकेतु, धृष्टकेतुके हर्यश्व, हर्यश्वके मनु, मनुके प्रतीक, प्रतीकके कृतरथ, कृतरथके देवमीढ, देवमीढके विबुध, विबुधके महाद्युति, महाद्युतिके कृतरात, कृतरातके महारोमा, महारोमाके सुवर्णरोमा, सुवर्णरोमाके ह्रस्वरोमा और ह्रस्वरोमाके सीरध्वज नामक पुत्र हुआ ॥ २५-२७ ॥ वह पुत्रकी कामनासे यज्ञभूमिको जोत रहा था। इसी समय हलके अग्र भागमें उसके सीता नामकी कन्या उत्पन्न हुई ॥ २८ ॥<br>सीरध्वजका भाई सांकाश्यनरेश कुशध्वज था ॥ २९ ॥ सीरध्वजके भानुमान् नामक पुत्र हुआ। भानुमान्के शतद्युम्न, शतद्युम्नके शुचि, शुचिके ऊर्जनामा, ऊर्जनामाके शतध्वज, शतध्वजके कृति, कृतिके अंजन, अंजनके कुरुजित्, कुरुजित्के अरिष्टनेमि, अरिष्टनेमिके श्रुतायु, श्रुतायुके सुपार्श्व, सुपार्श्वके सृंजय, सृंजयके क्षेमावी, क्षेमावीके अनेना, अनेनाके भौमरथ, भौमरथके सत्यरथ, सत्यरथके उपगु, उपगुके उपगुप्त, उपगुप्तके स्वागत, स्वागतके स्वानन्द, स्वानन्दके सुवर्चा, सुवर्चाके सुपार्श्व, सुपार्श्वके सुभाष, सुभाषके सुश्रुत, सुश्रुतके जय, जयके विजय, विजयके ऋत, ऋतके सुनय, सुनयके वीतहव्य, वीतहव्यके धृति, धृतिके बहुलाश्व और बहुलाश्वके कृति नामक पुत्र हुआ ॥ ३०-३१ ॥ कृतिमें ही इस जनकवंशकी समाप्ति हो जाती है ॥ ३२ ॥ ये ही मैथिलभूपालगण हैं ॥ ३३ ॥ प्रायः ये सभी राजालोग आत्मविद्याको आश्रय देनेवाले होते हैं ॥ ३४ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
२६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
छठा अध्याय
सोमवंशका वर्णन; चन्द्रमा, बुध और पुरूरवाका चरित्र
| श्रीमैत्रेय उवाच | मैत्रेयजी बोले— |
|---|---|
| सूर्यस्य वंश्या भगवन्कथिता भवता मम।<br>सोमस्याप्यखिलान्वंश्याञ्छ्रोतुमिच्छामि पार्थिवान्॥ १<br>कीर्त्यते स्थिरकीर्तीनां येषामद्यापि सन्ततिः।<br>प्रसादसुमुखस्तान्मे ब्रह्मन्नाख्यातुमर्हसि॥ २ | भगवन्! आपने सूर्यवंशीय राजाओंका वर्णन तो कर दिया, अब मैं सम्पूर्ण चन्द्रवंशीय भूपतियोंका वृत्तान्त भी सुनना चाहता हूँ। जिन स्थिरकीर्ति महाराजोंकी सन्ततिका सुयश आज भी गान किया जाता है, हे ब्रह्मन्! प्रसन्न-मुखसे आप उन्हींका वर्णन मुझसे कीजिये॥ १-२॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| श्रूयतां मुनिशार्दूल वंशः प्रथिततेजसः।<br>सोमस्यान्क्रमोत्ख्याता यत्रोर्वीपतयोऽभवन्॥ ३ | हे मुनिशार्दूल! परम तेजस्वी चन्द्रमाके वंशका क्रमशः श्रवण करो जिसमें अनेकों विख्यात राजालोग हुए हैं॥ ३॥ |
| अयं हि वंशोऽतिबलपराक्रमद्युतिशीलचेष्टावद्भिरतिगुणान्वितैर्नहुषययातिकार्तवीर्यार्जुनादिभिर्भूपालैरलङ्कृतस्तमहं कथयामि श्रूयताम्॥ ४॥ | यह वंश नहुष, ययाति, कार्तवीर्य और अर्जुन आदि अनेकों अति बल-पराक्रमशील, कान्तिमान्, क्रियावान् और सद्गुणसम्पन्न राजाओंसे अलंकृत हुआ है। सुनो, मैं उसका वर्णन करता हूँ॥ ४॥ |
| अखिलजगत्स्रष्टुर्भगवतो नारायणस्य नाभिसरोजसमुद्भवोऽब्जयोनेर्ब्रह्मणः पुत्रोऽत्रिः॥ ५॥ | सम्पूर्ण जगत्के रचयिता भगवान् नारायणके नाभि-कमलसे उत्पन्न हुए भगवान् ब्रह्माजीके पुत्र अत्रि प्रजापति थे॥ ५॥ |
| अत्रेस्सोमः॥ ६॥ | इन अत्रिके पुत्र चन्द्रमा हुए॥ ६॥ |
| तं च भगवानब्जयोनिः अशेषौषधिद्विजनक्षत्राणामाधिपत्येऽभ्यषेचयत्॥ ७॥ | कमल-योनि भगवान् ब्रह्माजीने उन्हें सम्पूर्ण औषधि, द्विजजन और नक्षत्रगणके आधिपत्यपर अभिषिक्त कर दिया था॥ ७॥ |
| स च राजसूयमकरोत्॥ ८॥ | चन्द्रमाने राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया॥ ८॥ |
| तत्प्रभावादत्युत्कृष्टाधिपत्याधिष्ठातृत्वाच्चैनं मद आविवेश॥ ९॥ | अपने प्रभाव और अति उत्कृष्ट आधिपत्यके अधिकारी होनेसे चन्द्रमापर राजमद सवार हुआ॥ ९॥ |
| मदावलेपाच्च सकलदेवगुरोर्बृहस्पतेस्तारां नाम पत्नीं जहार॥ १०॥ | तब मदोन्मत्त हो जानेके कारण उसने समस्त देवताओंके गुरु भगवान् बृहस्पतिजीकी भार्या ताराको हरण कर लिया॥ १०॥ |
| बहुशश्च बृहस्पतिचोदितेन भगवता ब्रह्मणा चोद्यमानः सकलैश्च देवर्षिभिर्याच्यमानोऽपि न मुमोच॥ ११॥ | तथा बृहस्पतिजीकी प्रेरणासे भगवान् ब्रह्माजीके बहुत कुछ कहने-सुनने और देवर्षियोंके माँगनेपर भी उसे न छोड़ा॥ ११॥ |
| तस्य चन्द्रस्य च बृहस्पतेर्द्वेषादुशना पार्ष्णिग्राहोऽभूत्॥ १२॥ | बृहस्पतिजीसे द्वेष करनेके कारण शुक्रजी भी चन्द्रमाके सहायक हो गये |
| अङ्गिरसश्च सकाशादुपलब्धविद्यो भगवान्रुद्रो बृहस्पतेः साहाय्यमकरोत्॥ १३॥ | और अंगिरासे विद्या-लाभ करनेके कारण भगवान् रुद्रने बृहस्पतिकी सहायता की [क्योंकि बृहस्पतिजी अंगिराके पुत्र हैं]॥ १२-१३॥ |
| यतश्चोशना ततो जम्भकुम्भाद्याः समस्ता एव दैत्यदानवनिकाया महान्तमुद्यमं चक्रुः॥ १४॥ | जिस पक्षमें शुक्रजी थे उस ओरसे जम्भ और कुम्भ आदि समस्त दैत्य-दानवादिनें भी [सहायता देनेमें] बड़ा उद्योग किया॥ १४॥ |
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In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अ० ६ ] * चतुर्थ अंश * २६१
| बृहस्पतेरपि सकलदेवसैन्ययुतः सहायः शक्रो- | तथा सकल देव-सेनाके सहित इन्द्र बृहस्पतिके |
| ऽभवत् ॥ १५ ॥ एवं च तयोरतीवोग्रसंग्राम- | सहायक हुए ॥ १५ ॥ इस प्रकार ताराके लिये उनमें |
| स्तारानिमित्तस्तारकामयो नामाभूत् ॥ १६ ॥ | तारकामय नामक अत्यन्त घोर युद्ध छिड़ गया ॥ १६ ॥ |
| ततश्च समस्तशस्त्राण्यसुरेषु रुद्रपुरोगमा देवा देवेषु | तब रुद्र आदि देवगण दानवोंके प्रति और दानवगण |
| चाशेषदानवा मुमुचुः ॥ १७ ॥ एवं देवासुराहव- | देवताओंके प्रति नाना प्रकारके शस्त्र छोड़ने लगे ॥ १७ ॥ |
| संक्षोभक्षुब्धहृदयमशेषमेव जगद्ब्रह्माणं शरणं | इस प्रकार देवासुर-संग्रामसे क्षुब्ध-चित्त हो सम्पूर्ण |
| जगाम ॥ १८ ॥ ततश्च भगवानब्जयो- | संसारने ब्रह्माजीकी शरण ली ॥ १८ ॥ तब भगवान् |
| निरप्युशनसं शङ्करमसुरांन्देवांश्च निवार्य बृहस्पतये | कमल-योनिने भी शुक्र, रुद्र, दानव और देवगणको |
| तारामदापयत् ॥ १९ ॥ तां चान्तःप्रसवा- | युद्धसे निवृत्त कर बृहस्पतिको तारा दिलवा दी ॥ १९ ॥ |
| मवलोक्य बृहस्पतिरप्याह ॥ २० ॥ नैष मम क्षेत्रे | उसे गर्भिणी देखकर बृहस्पतिकहा— ॥ २० ॥ |
| भवत्यान्यस्य सुतो धार्यस्समुत्सृजैनमलमलमति- | "मेरे क्षेत्रमें तुझको दूसरेका पुत्र धारण करना उचित |
| धार्ष्ट्येनैति ॥ २१ ॥ | नहीं है; इसे दूर कर, अधिक धृष्टता करना ठीक |
| नहीं" ॥ २१ ॥ | |
| सा च तेनैवमुक्तातिपतिव्रता भर्तृवचनानन्तरं | बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर उस पतिव्रताने |
| तमिषीकास्तम्बे गर्भमुत्ससर्ज ॥ २२ ॥ स | पतिके वचनानुसार वह गर्भ इषीकास्तम्ब (सींककी झाड़ी)- |
| चोत्सृष्टमात्र एवातितेजसा देवानां तेजांस्या- | में छोड़ दिया ॥ २२ ॥ उस छोड़े हुए गर्भने अपने |
| चिक्षेप ॥ २३ ॥ बृहस्पतिमिन्दुं च तस्य कुमार- | तेजसे समस्त देवताओंके तेजको मलिन कर दिया ॥ २३ ॥ |
| स्यातिचारुतया साभिलाषौ दृष्ट्वा देवास्समुत्पन्न- | तदनन्तर उस बालककी सुन्दरताके कारण बृहस्पति |
| सन्देहास्तारां पप्रच्छुः ॥ २४ ॥ सत्यं कथया- | और चन्द्रमा दोनोंको उसे लेनेके लिये उत्सुक देख देवताओंने |
| स्माकमिति सुभगे सोमस्याथ वा बृहस्पतेरयं पुत्र | सन्देह हो जानेके कारण तारासे पूछा— ॥ २४ ॥ "हे |
| इति ॥ २५ ॥ एवं तैर्रुक्ता सा तारा ह्रिया | सुभगे ! तू हमको सच-सच बता, यह पुत्र बृहस्पतिका है |
| किञ्चिन्नोवाच ॥ २६ ॥ बहुशोऽप्यभिहिता | या चन्द्रमाका ?" ॥ २५ ॥ उनके ऐसा कहनेपर |
| यदासौ देवेभ्यो नाचचक्षे ततस्स कुमारस्तां | ताराने लज्जावश कुछ भी न कहा ॥ २६ ॥ जब बहुत कुछ |
| शप्तुमुद्यतः प्राह ॥ २७ ॥ दुष्टेऽम्ब कस्मान्मम तातं | कहनेपर भी वह देवताओंसे न बोली तो वह बालक |
| नाख्यासि ॥ २८ ॥ अद्यैव ते व्यलीकलज्जा- | उसे शाप देनेके लिये उद्यत होकर बोला— ॥ २७ ॥ "अरी |
| वत्यास्तथा शास्तिमहं करोमि ॥ २९ ॥ यथा च | दुष्टा माँ ! तू मेरे पिताका नाम क्यों नहीं बतलाती ? |
| नैवमद्याप्यतिमन्थरवचना भविष्यसीति ॥ ३० ॥ | तुझ व्यर्थ लज्जावतीकी मैं अभी ऐसी गति करूँगा |
| जिससे तू आजसे ही इस प्रकार अत्यन्त धीरे-धीरे | |
| बोलना भूल जायगी" ॥ २८—३० ॥ | |
| अथ भगवान् पितामहः तं कुमारं सन्निवार्य | तदनन्तर पितामह श्रीब्रह्माजीने उस बालकको |
| स्वयमपृच्छत्तां ताराम् ॥ ३१ ॥ कथय वत्से | रोककर तारासे स्वयं ही पूछा— ॥ ३१ ॥ "बेटी ! ठीक- |
| कस्यायमात्मजः सोमस्य वा बृहस्पतेर्वा | ठीक बता यह पुत्र किसका है—बृहस्पतिका या चन्द्रमाका ?" |
| इत्युक्ता लज्जमानाह सोमस्येति ॥ ३२ ॥ ततः | इसपर उसने लज्जापूर्वक कहा—"चन्द्रमाका" ॥ ३२ ॥ |
| प्रस्फुरदुच्छ्वसितामलकपोलकान्तिर्भगवानुडु- | तब तो नक्षत्रपति भगवान् चन्द्रने उस बालकको |
| पतिः कुमारमालिङ्ग्य साधु साधु वत्स प्राज्ञोऽसीति | हृदयसे लगाकर कहा—"बहुत ठीक, बहुत ठीक, |
| बुध इति तस्य च नाम चक्रे ॥ ३३ ॥ | बेटा ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो;" और उनका नाम 'बुध' |
| रख दिया। इस समय उनके निर्मल कपोलोंकी कान्ति | |
| उच्छ्वसित और देदीप्यमान हो रही थी ॥ ३३ ॥ |
२६२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
तदाख्यातमेवैतत् स च यथेलायामात्मजं पुरूरवसमुत्पादयामास ॥ ३४ ॥ पुरूरवास्त्वतिदानशीलोऽतियज्वातितेजस्वी। यं सत्यवादिनमतिरूपवन्तं मनस्विनं मित्रावरुणशापान्मानुषे लोके मया वस्तव्यमिति कृतमतिरुर्वशी ददर्श ॥ ३५ ॥ दृष्टमात्रे च तस्मिन्नपहाय मानमशेषमपास्य स्वर्गसुखाभिलाषं तन्मनस्का भूत्वा तमेवोपतस्थे ॥ ३६ ॥ सोऽपि च तामतिशयितसकललोकस्त्रीकान्तिसौकुमार्यलावण्यगतिविलासहासादिगुणामवलोक्य तदायत्तचित्तवृत्तिर्बभूव ॥ ३७ ॥ उभयमपि तन्मनस्कमनन्यदृष्टि परित्यक्तसमस्तान्यप्रयोजनमभूत् ॥ ३८ ॥
राजा तु प्रागल्भ्यात्तामाह ॥ ३९ ॥ सुभ्रु त्वामहमभिकामोऽस्मि प्रसीदानुरागमुद्वहेत्युक्ता लज्जावखण्डितमुर्वशी तं प्राह ॥ ४० ॥ भवत्वेवं यदि मे समयपरिपालनं भवान् करोतीत्याख्याते पुनरपि तामाह ॥ ४१ ॥ आख्याहि मे समयमिति ॥ ४२ ॥ अथ पृष्टा पुनरप्यब्रवीत् ॥ ४३ ॥ शयनसमीपे ममोरणकद्वयं पुत्रभूतं नापनेयम् ॥ ४४ ॥ भवांश्च मया न नग्नो द्रष्टव्यः ॥ ४५ ॥ घृतमात्रं च ममाहार इति ॥ ४६ ॥ एवमेवेति भूपतिरप्याह ॥ ४७ ॥
तया सह स चावनिपतिरलकायां चैत्ररथादिवनेष्वमलपद्मखण्डेषु मानसादिस्सरस्स्वतिरमणीयेषु रममाणः षष्टिवर्षसहस्राण्यनुदिनप्रवर्द्धमानप्रमोदोऽनयत् ॥ ४८ ॥ उर्वशी च तदुपभोगात्प्रतिदिनप्रवर्द्धमानानुरागा अमरलोकवासेऽपि न स्पृहां चकार ॥ ४९ ॥
विना चोर्वश्या सुरलोकोऽप्सरसां सिद्धगन्धर्वाणां च नातिरमणीयोऽभवत् ॥ ५० ॥ ततश्चोर्वशीपुरूरवसोस्समयविद्विश्वावसुर्गन्धर्वसमवेतो निशि शयनाभ्याशादेकमुरणकं जहार ॥ ५१ ॥ तस्याकाशे नीयमानस्योर्वशी
बुधने जिस प्रकार इलासे अपने पुत्र पुरूरवाको उत्पन्न किया था उसका वर्णन पहले ही कर चुके हैं॥ ३४ ॥ पुरूरवा अति दानशील, अति याज्ञिक और अति तेजस्वी था। 'मित्रावरुणके शापसे मुझे मर्त्यलोकमें रहना पड़ेगा' ऐसा विचार करते हुए उर्वशी अप्सराकी दृष्टि उस अति सत्यवादी, रूपके धनी और मतिमान् राजा पुरूरवापर पड़ी ॥ ३५ ॥ देखते ही वह सम्पूर्ण मान तथा स्वर्ग-सुखकी इच्छाको छोड़कर तन्मयभावसे उसीके पास आयी ॥ ३६ ॥ राजा पुरूरवाका चित्त भी उसे संसारकी समस्त स्त्रियोंमें विशिष्ट तथा कान्ति-सुकुमारता, सुन्दरता, गतिविलास और मुसकान आदि गुणोंसे युक्त देखकर उसके वशीभूत हो गया ॥ ३७ ॥ इस प्रकार वे दोनों ही परस्पर तन्मय और अनन्यचित्त होकर और सब कामोंको भूल गये ॥ ३८ ॥
निदान राजाने निःसंकोच होकर कहा— ॥ ३९ ॥ "हे सुभ्रु ! मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ, तुम प्रसन्न होकर मुझे प्रेम-दान दो।" राजाके ऐसा कहनेपर उर्वशीने भी लज्जावश स्खलित स्वरमें कहा— ॥ ४० ॥ "यदि आप मेरी प्रतिज्ञाको निभा सकें तो अवश्य ऐसा ही हो सकता है।" यह सुनकर राजाने कहा— ॥ ४१ ॥ अच्छा, तुम अपनी प्रतिज्ञा मुझसे कहो ॥ ४२ ॥ इस प्रकार पूछनेपर वह फिर बोली— ॥ ४३ ॥ "मेरे पुत्ररूप इन दो मेषों (भेड़ों)-को आप कभी मेरी शय्यासे दूर न कर सकेंगे ॥ ४४ ॥ मैं कभी आपको नग्न न देखने पाऊँ ॥ ४५ ॥ और केवल घृत ही मेरा आहार होगा—[यही मेरी तीन प्रतिज्ञाएँ हैं]" ॥ ४६ ॥ तब राजाने कहा—"ऐसा ही होगा" ॥ ४७ ॥
तदनन्तर राजा पुरूरवाने दिन-दिन बढ़ते हुए आनन्दके साथ कभी अलकापुरीके अन्तर्गत चैत्ररथ आदि वनोंमें और कभी सुन्दर पद्मखण्डोंसे युक्त अति रमणीय मानस आदि सरोवरोंमें विहार करते हुए साठ हजार वर्ष बिता दिये ॥ ४८ ॥ उसके उपभोगसुखसे प्रतिदिन अनुरागके बढ़ते रहनेसे उर्वशीको भी देवलोकमें रहनेकी इच्छा नहीं रही ॥ ४९ ॥
इधर उर्वशीके बिना अप्सराओं, सिद्धों और गन्धर्वोंको स्वर्गलोक अत्यन्त रमणीय नहीं मालूम होता था ॥ ५० ॥ अतः उर्वशी और पुरूरवाकी प्रतिज्ञाके जाननेवाले विश्वावसुने एक दिन रात्रिके समय गन्धर्वोंके साथ जाकर उसके शयनागारके पाससे एक मेषका हरण कर लिया ॥ ५१ ॥ उसे आकाशमें ले जाते समय उर्वशीने
अ० ६] * चतुर्थ अंश * २६३
शब्दमशृणोत् ॥ ५२ ॥ एवमुवाच च ममा- नाथायाः पुत्रः केनापह्रियते कं शरणमुपया- मीति ॥ ५३ ॥ तदाकर्ण्य राजा मां नग्नं देवी वीक्ष्यतीति न ययौ ॥ ५४ ॥ अथान्यमप्युरणक- मादाय गन्धर्वा ययुः ॥ ५५ ॥ तस्याप्यपह्रिय- माणस्याकर्ण्य शब्दमाकाशे पुनरप्यनाथा- स्यहमभर्तृका कापुरुषाश्रयेत्यार्त्तरराविणी बभूव ॥ ५६ ॥
राजाप्यमर्षवशादन्धकारमेतदिति खड्गमादाय दुष्ट दुष्ट हतोऽसीति व्याहरन्नभ्यधावत् ॥ ५७ ॥ तावच्च गन्धर्वैरप्यतीवोज्ज्वला विद्युज्जनिता ॥ ५८ ॥ तत्प्रभया चोर्वशी राजानमपगताम्बरं दृष्ट्वापवृत्तसमया तत्क्षणादेवापक्रान्ता ॥ ५९ ॥ परित्यज्य तावप्युरणकौ गन्धर्वास्सुर- लोकमुपगताः ॥ ६० ॥ राजापि च तौ मेषावादायातिहृष्टमनाः स्वशयनमायातो नोर्वशीं ददर्श ॥ ६१ ॥ तां चापश्यन् व्यपगताम्बर एवोन्मत्तरूपो बभ्राम ॥ ६२ ॥ कुरुक्षेत्रे चाम्भोजसरस्यन्याभिश्चतसृभिरप्सरोभिस्सम- वेतामुर्वशीं ददर्श ॥ ६३ ॥ ततश्चोन्मत्तरूपो जाये हे तिष्ठ मनसि घोरे तिष्ठ वचसि कपटिके तिष्ठेत्येवमनेकप्रकारं सूक्तमवोचत् ॥ ६४ ॥
आह चोर्वशी ॥ ६५ ॥ महाराजालमनेना- विवेकचेष्टितेन ॥ ६६ ॥ अन्तर्वल्यहमब्दान्ते भवतात्रागन्तव्यं कुमारस्ते भविष्यति एकां च निशामहं त्वया सह वत्स्यामीत्युक्तः प्रहृष्टस्स्वपुरं जगाम ॥ ६७ ॥
तासां चाप्सरसामुर्वशी कथयामास ॥ ६८ ॥ अयं स पुरुषोत्कृष्टो येनाहमेतावन्तं कालमनुरागा- कृष्टमानसा सहोषितेति ॥ ६९ ॥ एवमुक्तास्ता- श्चाप्सरस ऊचुः ॥ ७० ॥ साधु साध्वस्य रूपमप्यनेन सहास्माकमपि सर्वकालमास्या भवेदिति ॥ ७१ ॥
अब्दे च पूर्णे स राजा तत्राजगाम ॥ ७२ ॥
उसका शब्द सुना ॥ ५२ ॥ तब वह बोली—"मुझ अनाथाके पुत्रको कौन लिये जाता है, अब मैं किसकी शरण जाऊँ ?" ॥ ५३ ॥ किन्तु यह सुनकर भी इस भयसे कि रानी मुझे नंगा देख लेगी, राजा नहीं उठा ॥ ५४ ॥ तदनन्तर गन्धर्वगण दूसरा भी मेष लेकर चल दिये ॥ ५५ ॥ उसे ले जाते समय उसका शब्द सुनकर भी उर्वशी 'हाय! मैं अनाथा और भर्तृहीना हूँ तथा एक कायरके अधीन हो गयी हूँ!' इस प्रकार कहती हुई वह आर्त्तस्वरसे विलाप करने लगी ॥ ५६ ॥
तब राजा यह सोचकर कि इस समय अन्धकार है [अतः रानी मुझे नग्न न देख सकेगी], क्रोधपूर्वक 'अरे दुष्ट! तू मारा गया' यह कहते हुए तलवार लेकर पीछे दौड़ा ॥ ५७ ॥ इसी समय गन्धर्वोंने अति उज्ज्वल विद्युत् प्रकट कर दी ॥ ५८ ॥ उसके प्रकाशमें राजाको वस्त्रहीन देखकर प्रतिज्ञा टूट जानेसे उर्वशी तुरन्त ही वहाँसे चली गयी ॥ ५९ ॥ गन्धर्वगण भी उन मेषोंको वहीं छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ६० ॥ किन्तु जब राजा उन मेषोंको लिये हुए अति प्रसन्नचित्तसे अपने शयनागारमें आया तो वहाँ उसने उर्वशीको न देखा ॥ ६१ ॥ उसे न देखनेसे वह उस वस्त्रहीन-अवस्थामें ही पागलके समान घूमने लगा ॥ ६२ ॥ घूमते-घूमते उसने एक दिन कुरुक्षेत्रके कमल-सरोवरमें अन्य चार अप्सराओंके सहित उर्वशीको देखा ॥ ६३ ॥ उसे देखकर वह उन्मत्तके समान 'हे जाये! ठहर, अरी हृदयकी निष्ठुरे! खड़ी हो जा, अरी कपट रखनेवाली! वार्तालापके लिये तनिक ठहर जा'—ऐसे अनेक वचन कहने लगा ॥ ६४ ॥
उर्वशी बोली—"महाराज! इन अज्ञानियोंकी-सी चेष्टाओंसे कोई लाभ नहीं ॥ ६५-६६ ॥ इस समय मैं गर्भवती हूँ। एक वर्ष उपरान्त आप यहीं आ जावें, उस समय आपके एक पुत्र होगा और एक रात मैं भी आपके साथ रहूँगी।" उर्वशीके ऐसा कहनेपर राजा पुरूरवा प्रसन्न- चित्तसे अपने नगरको चला गया ॥ ६७ ॥
तदनन्तर उर्वशीने अन्य अप्सराओंसे कहा— ॥ ६८ ॥ "ये वही पुरुषश्रेष्ठ हैं जिनके साथ मैं इतने दिनोंतक प्रेमाकृष्ट-चित्तसे भूमण्डलमें रही थी ॥ ६९ ॥ इसपर अन्य अप्सराओंने कहा— ॥ ७० ॥ "वाह! वाह! सचमुच इनका रूप बड़ा ही मनोहर है, इनके साथ तो सर्वदा हमारा भी सहवास हो" ॥ ७१ ॥
वर्ष समाप्त होनेपर राजा पुरूरवा वहाँ आये ॥ ७२ ॥
२६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
कुमारं चायुषमस्मै चोर्वशी ददौ ॥ ७३ ॥ दत्त्वा चैकां निशां तेन राज्ञा सहोषित्वा पञ्च पुत्रोत्पत्तये गर्भमवाप ॥ ७४ ॥ उवाचैनं राजानमस्मत्प्रीतया महाराजाय सर्व एव गन्धर्वा वरदास्संवृत्ता व्रियतां च वर इति ॥ ७५ ॥
आह च राजा ॥ ७६ ॥ विजितसकलाराति- रविहतेन्द्रियसामर्थ्यो बन्धुमानमितबलकोशोऽस्मि, नान्यदस्माकमुर्वशीसालोक्यात्राप्राप्तव्यमस्ति तदहमनया सहोर्वश्या कालं नेतुमभिलषामीत्युक्ते गन्धर्वा राज्ञेऽग्निस्थालीं ददुः ॥ ७७ ॥ ऊचुश्चैनमग्निमाम्नायानुसारी भूत्वा त्रिधा कृत्वोर्वशीसलोकतामनोरथमुद्दिश्य सम्यग्यजेथाः ततोऽवश्यमभिलषितमवाप्स्यसीत्युक्तस्तामग्नि- स्थालीमादाय जगाम ॥ ७८ ॥
अन्तरटव्यामचिन्तयत्, अहो मेऽतीव मूढता किमहमकरवम् ॥ ७९ ॥ वह्निस्थाली मयैषानीता नोर्वशीति ॥ ८० ॥ अथैनामटव्यामेवाग्निस्थालीं तत्याज स्वपुरं च जगाम ॥ ८१ ॥ व्यतीतेऽर्द्धरात्रे विनिद्रश्चाचिन्तयत् ॥ ८२ ॥ ममोर्वशी- सालोक्यप्राप्त्यर्थमग्निस्थाली गन्धर्वैर्दत्ता सा च मयाटव्यां परित्यक्ता ॥ ८३ ॥ तदहं तत्र तदाहरणाय यास्यामीत्युत्थाय तत्राप्युपगतो नाग्निस्थालीमपश्यत् ॥ ८४ ॥ शमीगर्भं चाश्वत्थमग्निस्थालीस्थाने दृष्ट्वाचिन्तयत् ॥ ८५ ॥ मयात्राग्निस्थाली निक्षिप्ता सा चाश्वत्थश्शमीगर्भोऽभूत् ॥ ८६ ॥ तदेनमेवाह- मग्निरूपमादाय स्वपुरमभिगम्यारणीं कृत्वा तदुत्पन्नाग्नेरुपास्तिं करिष्यामीति ॥ ८७ ॥
एवमेव स्वपुरमभिगम्यारणिं चकार ॥ ८८ ॥ तत्प्रमाणं चाङ्गुलैः कुर्वन् गायत्रीमपठत् ॥ ८९ ॥
उस समय उर्वशीने उन्हें 'आयु' नामक एक बालक दिया ॥ ७३ ॥ तथा उनके साथ एक रात रहकर पाँच पुत्र उत्पन्न करनेके लिये गर्भ धारण किया ॥ ७४ ॥ और कहा—'हमारे पारस्परिक स्नेहके कारण सकल गन्धर्वगण महाराजको वरदान देना चाहते हैं अतः आप अभीष्ट वर माँगिये ॥ ७५ ॥
राजा बोले—"मैंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, मेरी इन्द्रियोंकी सामर्थ्य नष्ट नहीं हुई है, मैं बन्धुजन, असंख्य सेना और कोशसे भी सम्पन्न हूँ, इस समय उर्वशीके सहवासके अतिरिक्त मुझे और कुछ भी प्राप्तव्य नहीं है। अतः मैं इस उर्वशीके साथ ही काल-यापन करना चाहता हूँ।" राजाके ऐसा कहनेपर गन्धर्वोंने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्नियुक्त पात्र) दी और कहा— "इस अग्निके वैदिक विधिसे गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्निरूप तीन भाग करके इसमें उर्वशीके सहवासकी कामनासे भलीभाँति यजन करो तो अवश्य ही तुम अपना अभीष्ट प्राप्त कर लोगे।" गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर राजा उस अग्निस्थालीको लेकर चल दिये ॥ ७६–७८ ॥
[मार्गमें] वनके अन्दर उन्होंने सोचा—'अहो! मैं कैसा मूर्ख हूँ ? मैंने यह क्या किया जो इस अग्निस्थालीको तो ले आया और उर्वशीको नहीं लाया' ॥ ७९-८० ॥ ऐसा सोचकर उस अग्निस्थालीको वनमें ही छोड़कर वे अपने नगरमें चले आये ॥ ८१ ॥ आधीरात बीत जानेके बाद निद्रा टूटनेपर राजाने सोचा— ॥ ८२ ॥ 'उर्वशीकी सन्निधि प्राप्त करनेके लिये ही गन्धर्वोंने मुझे वह अग्निस्थाली दी थी और मैंने उसे वनमें ही छोड़ दिया ॥ ८३ ॥ अतः अब मुझे उसे लानेके लिये जाना चाहिये' ऐसा सोच उठकर वे वहाँ गये, किन्तु उन्होंने उस स्थालीको वहाँ न देखा ॥ ८४ ॥ अग्निस्थालीके स्थानपर राजा पुरूरवाने एक शमीगर्भ पीपलके वृक्षको देखकर सोचा— ॥ ८५ ॥ 'मैंने यहीं तो वह अग्निस्थाली फेंकी थी। वह स्थाली ही शमीगर्भ पीपल हो गयी है ॥ ८६ ॥ अतः इस अग्निरूप अश्वत्थको ही अपने नगरमें ले जाकर इसकी अरणि बनाकर उससे उत्पन्न हुए अग्निकी ही उपासना करूँ' ॥ ८७ ॥
ऐसा सोचकर राजा उस अश्वत्थको लेकर अपने नगरमें आये और उसकी अरणि बनायी ॥ ८८ ॥ तदनन्तर उन्होंने उस काष्ठको एक-एक अंगुल करके गायत्री-मन्त्रका पाठ किया ॥ ८९ ॥
अ० ७ ] * चतुर्थ अंश * २६५
| पठतश्चाक्षरसंख्यान्येवाङ्गुलान्यरण्यभवत्॥ ९०॥ तत्राग्निं निर्मथ्याग्नित्रयमाम्नायानुसारी भूत्वा जुहाव॥ ९१॥ उर्वशीसालोक्यं फलमभिसंहितवान्॥ ९२॥ तेनैव चाग्निविधिना बहुविधान् यज्ञानिष्ट्वा गान्धर्वलोकानवाप्योर्वश्या सहावियोगमवाप॥ ९३॥ एकोऽग्निर्यादावभवत् एकेन त्वत्र मन्वन्तरे त्रेधा प्रवर्तिताः॥ ९४॥ | उसके पाठसे गायत्रीके अक्षर-संख्याके बराबर एक-एक अंगुलकी अरणियाँ हो गयीं॥ ९०॥ उनके मन्थनसे तीनों प्रकारके अग्नियोंको उत्पन्न कर उनमें वैदिक विधिसे हवन किया॥ ९१॥ तथा उर्वशीके सहवासरूप फलकी इच्छा की॥ ९२॥ तदनन्तर उसी अग्निसे नाना प्रकारके यज्ञोंका यजन करते हुए उन्होंने गन्धर्व-लोक प्राप्त किया और फिर उर्वशीसे उनका वियोग न हुआ॥ ९३॥ पूर्वकालमें एक ही अग्नि था, उस एकहीसे इस मन्वन्तरमें तीन प्रकारके अग्नियोंका प्रचार हुआ॥ ९४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
जह्नुका गंगापान तथा जमदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति
| श्रीपराशर उवाच<br>तस्याप्यायुर्धीमानमावसुर्विश्वावसुः श्रुतायुश्शतायुरयुतायुरितिसंज्ञाः षट् पुत्रा अभवन्॥ १॥ तथामावसोर्भीमनामा पुत्रोऽभवत्॥ २॥ भीमस्य काञ्चनः काञ्चनात्सुहोत्रस्तस्यापि जह्नुः॥ ३॥ योऽसौ यज्ञवाटमखिलं गङ्गाम्भसाप्लावितमवलोक्य क्रोधसंरक्तलोचनो भगवन्तं यज्ञपुरुषमात्मनि परमेण समाधिना समारोप्याखिलामेव गङ्गामपिबत्॥ ४॥ अथैनं देवर्षयः प्रसादयामासुः॥ ५॥ दुहितृत्वे चास्य गङ्गामनयन्॥ ६॥<br>जह्नोश्च सुमन्तुर्नाम पुत्रोऽभवत्॥ ७॥ तस्याप्यजकस्ततो बलाकाश्वस्तस्मात्कुशस्तस्यापि कुशाम्बकुशनाभाधूर्त्तरजसो वसुश्चेति चत्वारः पुत्रा बभूवुः॥ ८॥ तेषां कुशाम्बः शक्रतुल्यो मे पुत्रो भवेदिति तपश्चकार॥ ९॥ तं चोग्रतपसमवलोक्य मा भवत्वन्योऽस्मत्तुल्यवीर्य इत्यात्मनैवास्येन्द्रः पुत्रत्वमगच्छत्॥ १०॥ स गाधिर्नाम पुत्रः कौशिकोऽभवत्॥ ११॥<br>गाधिश्च सत्यवतीं कन्यामजनयत्॥ १२॥ | **श्रीपराशरजी बोले—**राजा पुरूरवाके परम बुद्धिमान् आयु, अमावसु, विश्वावसु, श्रुतायु, शतायु और अयुतायु नामक छः पुत्र हुए॥ १॥ अमावसुके भीम, भीमके कांचन, कांचनके सुहोत्र और सुहोत्रके जह्नु नामक पुत्र हुआ जिसने अपनी सम्पूर्ण यज्ञशालाको गंगाजलसे आप्लावित देख क्रोधसे रक्तनयन हो भगवान् यज्ञपुरुषको परम समाधिके द्वारा अपनेमें स्थापित कर सम्पूर्ण गंगाजीको पी लिया था॥ २—४॥ तब देवर्षियोंने इन्हें प्रसन्न किया और गंगाजीको इनकी पुत्रीरूपसे पाकर ले गये॥ ५-६॥<br>जह्नुके सुमन्तु नामक पुत्र हुआ॥ ७॥ सुमन्तुके अजक, अजकके बलाकाश्व, बलाकाश्वके कुश और कुशके कुशाम्ब, कुशनाभ, अधूर्त्तरजा और वसु नामक चार पुत्र हुए॥ ८॥ उनमेंसे कुशाम्बने इस इच्छासे कि मेरे इन्द्रके समान पुत्र हो, तपस्या की॥ ९॥ उसके उग्र तपको देखकर 'बलमें कोई अन्य मेरे समान न हो जाय' इस भयसे इन्द्र स्वयं ही इनका पुत्र हो गया॥ १०॥ वह गाधि नामक पुत्र कौशिक कहलाया॥ ११॥<br>गाधिने सत्यवती नामकी कन्याको जन्म दिया॥ १२॥ |
| २६६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ७ |
|---|
तां च भार्गव ऋचीको वव्रे ॥ १३ ॥ गाधिरप्यति-
रोषणायातिवृद्धाय ब्राह्मणाय दातुमनिच्छन्नेकतश्श्याम-
कर्णानामिन्दुवर्चसामनिलरंहसामश्वानां सहस्रं
कन्याशुल्कमयाचत ॥ १४ ॥ तेनाप्यृषिणा
वरुणसकाशादुपलभ्याश्वतीर्थोत्पन्नं तादृश-
मश्वसहस्रं दत्तम् ॥ १५ ॥
ततस्तामृचीकः कन्यामुपयेमे ॥ १६ ॥
ऋचीकश्च तस्याश्चरुमपत्यार्थं चकार ॥ १७ ॥
तत्प्रसादितश्च तन्मात्रे क्षत्रवरपुत्रोत्पत्तये चरुमपरं
साधयामास ॥ १८ ॥ एष चरुर्भवत्या
अयमपरश्चरुस्त्वन्मात्रा सम्यगुपयोज्य इत्युक्त्वा
वनं जगाम ॥ १९ ॥
उपयोगकाले च तां माता सत्यवतीमाह ॥ २० ॥
पुत्रि सर्व एवात्मपुत्रमतिगुणमभिलषति
नात्मजायाभ्रातृगुणेष्वतीवादृतो भवतीति ॥ २१ ॥
अतोऽर्हसि ममात्मीयं चरुं दातुं मदीयं चरुमात्मनोप-
योक्तुम् ॥ २२ ॥ मत्पुत्रेण हि सकलभूमण्डल-
परिपालनं कार्यं कियद्वा ब्राह्मणस्य बलवीर्य-
सम्पदेत्युक्ता सा स्वचरुं मात्रे दत्तवती ॥ २३ ॥
अथ वनादागत्य सत्यवतीमृषिरपश्यत् ॥ २४ ॥
आह चैनामतिपापे किमिदमकार्यं भवत्या
कृतमतिरौद्रं ते वपुर्लक्ष्यते ॥ २५ ॥ नूनं
त्वया त्वन्मातृसात्कृतश्चरुरुपयुक्तो न
युक्तमेतत् ॥ २६ ॥ मया हि तत्र चरौ
सकलैश्वर्यवीर्यशौर्यबलसम्पदारोपिता त्वदीय-
चरावप्यखिलशान्तिज्ञानतितिक्षादिब्राह्मण-
गुणसम्पत् ॥ २७ ॥ तच्च विपरीतं कुर्वत्या-
स्तवातिरौद्रास्त्रधारणपालननिष्ठः क्षत्रियाचारः
पुत्रो भविष्यति तस्याश्चोपशमरुचिर्ब्राह्मणाचार
इत्याकर्ण्यैव सा तस्य पादौ जग्राह ॥ २८ ॥
प्रणिपत्य चैनमाह ॥ २९ ॥ भगवन्मयैतदज्ञाना-
दनुष्ठितं प्रसादं मे कुरु मैवंविधः पुत्रो
भवतु काममेवंविधः पौत्रो भवत्वित्युक्ते
मुनिरप्याह ॥ ३० ॥ एवमस्त्विति ॥ ३१ ॥ | उसे भृगुपुत्र ऋचीकने वरण किया ॥ १३ ॥ गाधिने अति
क्रोधी और अति वृद्ध ब्राह्मणको कन्या न देनेकी इच्छासे
ऋचीकसे कन्याके मूल्यमें जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान्
और पवनके तुल्य वेगवान् हों, ऐसे एक सहस्र श्यामकर्ण
घोड़े माँगे ॥ १४ ॥ किन्तु महर्षि ऋचीकने अश्वतीर्थसे उत्पन्न
हुए वैसे एक सहस्र घोड़े उन्हें वरुणसे लेकर दे दिये ॥ १५ ॥
तब ऋचीकने उस कन्यासे विवाह किया ॥ १६ ॥
[तदुपरान्त एक समय] उन्होंने सन्तानकी कामनासे
सत्यवतीके लिये चरु (यज्ञीय खीर) तैयार किया ॥ १७ ॥
और उसीके द्वारा प्रसन्न किये जानेपर एक क्षत्रियश्रेष्ठ
पुत्रकी उत्पत्तिके लिये एक और चरु उसकी माताके
लिये भी बनाया ॥ १८ ॥ और 'यह चरु तुम्हारे लिये है
तथा यह तुम्हारी माताके लिये—इनका तुम यथोचित उपयोग
करना'—ऐसा कहकर वे वनको चले गये ॥ १९ ॥
उनका उपयोग करते समय सत्यवतीकी माताने
उससे कहा— ॥ २० ॥ “बेटी ! सभी लोग अपने ही लिये
सबसे अधिक गुणवान् पुत्र चाहते हैं, अपनी पत्नीके भाईके
गुणोंमें किसीकी भी विशेष रुचि नहीं होती ॥ २१ ॥ अतः
तू अपना चरु तो मुझे दे दे और मेरा तू ले ले; क्योंकि मेरे
पुत्रको तो सम्पूर्ण भूमण्डलका पालन करना होगा और
ब्राह्मणकुमारको तो बल, वीर्य तथा सम्पत्ति आदिसे लेना
ही क्या है।'' ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपना चरु अपनी
माताको दे दिया ॥ २२-२३ ॥
वनसे लौटनेपर ऋषिने सत्यवतीको देखकर कहा—
“अरी पापिनि ! तूने ऐसा क्या अकार्य किया है जिससे
तेरा शरीर ऐसा भयानक प्रतीत होता है ॥ २४-२५ ॥ अवश्य
ही तूने अपनी माताके लिये तैयार किये चरुका उपयोग
किया है, सो ठीक नहीं है ॥ २६ ॥ मैंने उसमें सम्पूर्ण
ऐश्वर्य, पराक्रम, शूरता और बलकी सम्पत्तिका आरोपण
किया था तथा तेरेमें शान्ति, ज्ञान, तितिक्षा आदि सम्पूर्ण
ब्राह्मणोचित गुणोंका समावेश किया था ॥ २७ ॥ उनका
विपरीत उपयोग करनेसे तेरे अति भयानक अस्त्र-शस्त्रधारी
पालन-कर्ममें तत्पर क्षत्रियके समान आचरणवाला पुत्र
होगा और उसके शान्तिप्रिय ब्राह्मणाचारयुक्त पुत्र होगा।”
यह सुनते ही सत्यवतीने उनके चरण पकड़ लिये और
प्रणाम करके कहा— ॥ २८-२९ ॥ “भगवन् ! अज्ञानसे ही
मैंने ऐसा किया है, अतः प्रसन्न होइये और ऐसा कीजिये
जिससे मेरा पुत्र ऐसा न हो, भले ही पौत्र ऐसा हो जाय!”
इसपर मुनिने कहा—'ऐसा ही हो।' ॥ ३०-३१ ॥