भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 558 में से

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पृष्ठ 272

अ० ६ ] * चतुर्थ अंश * २६१


बृहस्पतेरपि सकलदेवसैन्ययुतः सहायः शक्रो-तथा सकल देव-सेनाके सहित इन्द्र बृहस्पतिके
ऽभवत् ॥ १५ ॥ एवं च तयोरतीवोग्रसंग्राम-सहायक हुए ॥ १५ ॥ इस प्रकार ताराके लिये उनमें
स्तारानिमित्तस्तारकामयो नामाभूत् ॥ १६ ॥तारकामय नामक अत्यन्त घोर युद्ध छिड़ गया ॥ १६ ॥
ततश्च समस्तशस्त्राण्यसुरेषु रुद्रपुरोगमा देवा देवेषुतब रुद्र आदि देवगण दानवोंके प्रति और दानवगण
चाशेषदानवा मुमुचुः ॥ १७ ॥ एवं देवासुराहव-देवताओंके प्रति नाना प्रकारके शस्त्र छोड़ने लगे ॥ १७ ॥
संक्षोभक्षुब्धहृदयमशेषमेव जगद्ब्रह्माणं शरणंइस प्रकार देवासुर-संग्रामसे क्षुब्ध-चित्त हो सम्पूर्ण
जगाम ॥ १८ ॥ ततश्च भगवानब्जयो-संसारने ब्रह्माजीकी शरण ली ॥ १८ ॥ तब भगवान्
निरप्युशनसं शङ्करमसुरांन्देवांश्च निवार्य बृहस्पतयेकमल-योनिने भी शुक्र, रुद्र, दानव और देवगणको
तारामदापयत् ॥ १९ ॥ तां चान्तःप्रसवा-युद्धसे निवृत्त कर बृहस्पतिको तारा दिलवा दी ॥ १९ ॥
मवलोक्य बृहस्पतिरप्याह ॥ २० ॥ नैष मम क्षेत्रेउसे गर्भिणी देखकर बृहस्पतिकहा— ॥ २० ॥
भवत्यान्यस्य सुतो धार्यस्समुत्सृजैनमलमलमति-"मेरे क्षेत्रमें तुझको दूसरेका पुत्र धारण करना उचित
धार्ष्ट्येनैति ॥ २१ ॥नहीं है; इसे दूर कर, अधिक धृष्टता करना ठीक
नहीं" ॥ २१ ॥
सा च तेनैवमुक्तातिपतिव्रता भर्तृवचनानन्तरंबृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर उस पतिव्रताने
तमिषीकास्तम्बे गर्भमुत्ससर्ज ॥ २२ ॥ सपतिके वचनानुसार वह गर्भ इषीकास्तम्ब (सींककी झाड़ी)-
चोत्सृष्टमात्र एवातितेजसा देवानां तेजांस्या-में छोड़ दिया ॥ २२ ॥ उस छोड़े हुए गर्भने अपने
चिक्षेप ॥ २३ ॥ बृहस्पतिमिन्दुं च तस्य कुमार-तेजसे समस्त देवताओंके तेजको मलिन कर दिया ॥ २३ ॥
स्यातिचारुतया साभिलाषौ दृष्ट्वा देवास्समुत्पन्न-तदनन्तर उस बालककी सुन्दरताके कारण बृहस्पति
सन्देहास्तारां पप्रच्छुः ॥ २४ ॥ सत्यं कथया-और चन्द्रमा दोनोंको उसे लेनेके लिये उत्सुक देख देवताओंने
स्माकमिति सुभगे सोमस्याथ वा बृहस्पतेरयं पुत्रसन्देह हो जानेके कारण तारासे पूछा— ॥ २४ ॥ "हे
इति ॥ २५ ॥ एवं तैर्रुक्ता सा तारा ह्रियासुभगे ! तू हमको सच-सच बता, यह पुत्र बृहस्पतिका है
किञ्चिन्नोवाच ॥ २६ ॥ बहुशोऽप्यभिहिताया चन्द्रमाका ?" ॥ २५ ॥ उनके ऐसा कहनेपर
यदासौ देवेभ्यो नाचचक्षे ततस्स कुमारस्तांताराने लज्जावश कुछ भी न कहा ॥ २६ ॥ जब बहुत कुछ
शप्तुमुद्यतः प्राह ॥ २७ ॥ दुष्टेऽम्ब कस्मान्मम तातंकहनेपर भी वह देवताओंसे न बोली तो वह बालक
नाख्यासि ॥ २८ ॥ अद्यैव ते व्यलीकलज्जा-उसे शाप देनेके लिये उद्यत होकर बोला— ॥ २७ ॥ "अरी
वत्यास्तथा शास्तिमहं करोमि ॥ २९ ॥ यथा चदुष्टा माँ ! तू मेरे पिताका नाम क्यों नहीं बतलाती ?
नैवमद्याप्यतिमन्थरवचना भविष्यसीति ॥ ३० ॥तुझ व्यर्थ लज्जावतीकी मैं अभी ऐसी गति करूँगा
जिससे तू आजसे ही इस प्रकार अत्यन्त धीरे-धीरे
बोलना भूल जायगी" ॥ २८—३० ॥
अथ भगवान् पितामहः तं कुमारं सन्निवार्यतदनन्तर पितामह श्रीब्रह्माजीने उस बालकको
स्वयमपृच्छत्तां ताराम् ॥ ३१ ॥ कथय वत्सेरोककर तारासे स्वयं ही पूछा— ॥ ३१ ॥ "बेटी ! ठीक-
कस्यायमात्मजः सोमस्य वा बृहस्पतेर्वाठीक बता यह पुत्र किसका है—बृहस्पतिका या चन्द्रमाका ?"
इत्युक्ता लज्जमानाह सोमस्येति ॥ ३२ ॥ ततःइसपर उसने लज्जापूर्वक कहा—"चन्द्रमाका" ॥ ३२ ॥
प्रस्फुरदुच्छ्वसितामलकपोलकान्तिर्भगवानुडु-तब तो नक्षत्रपति भगवान् चन्द्रने उस बालकको
पतिः कुमारमालिङ्ग्य साधु साधु वत्स प्राज्ञोऽसीतिहृदयसे लगाकर कहा—"बहुत ठीक, बहुत ठीक,
बुध इति तस्य च नाम चक्रे ॥ ३३ ॥बेटा ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो;" और उनका नाम 'बुध'
रख दिया। इस समय उनके निर्मल कपोलोंकी कान्ति
उच्छ्वसित और देदीप्यमान हो रही थी ॥ ३३ ॥