भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 273

२६२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६


तदाख्यातमेवैतत् स च यथेलायामात्मजं पुरूरवसमुत्पादयामास ॥ ३४ ॥ पुरूरवास्त्वतिदानशीलोऽतियज्वातितेजस्वी। यं सत्यवादिनमतिरूपवन्तं मनस्विनं मित्रावरुणशापान्मानुषे लोके मया वस्तव्यमिति कृतमतिरुर्वशी ददर्श ॥ ३५ ॥ दृष्टमात्रे च तस्मिन्नपहाय मानमशेषमपास्य स्वर्गसुखाभिलाषं तन्मनस्का भूत्वा तमेवोपतस्थे ॥ ३६ ॥ सोऽपि च तामतिशयितसकललोकस्त्रीकान्तिसौकुमार्यलावण्यगतिविलासहासादिगुणामवलोक्य तदायत्तचित्तवृत्तिर्बभूव ॥ ३७ ॥ उभयमपि तन्मनस्कमनन्यदृष्टि परित्यक्तसमस्तान्यप्रयोजनमभूत् ॥ ३८ ॥

राजा तु प्रागल्भ्यात्तामाह ॥ ३९ ॥ सुभ्रु त्वामहमभिकामोऽस्मि प्रसीदानुरागमुद्वहेत्युक्ता लज्जावखण्डितमुर्वशी तं प्राह ॥ ४० ॥ भवत्वेवं यदि मे समयपरिपालनं भवान् करोतीत्याख्याते पुनरपि तामाह ॥ ४१ ॥ आख्याहि मे समयमिति ॥ ४२ ॥ अथ पृष्टा पुनरप्यब्रवीत् ॥ ४३ ॥ शयनसमीपे ममोरणकद्वयं पुत्रभूतं नापनेयम् ॥ ४४ ॥ भवांश्च मया न नग्नो द्रष्टव्यः ॥ ४५ ॥ घृतमात्रं च ममाहार इति ॥ ४६ ॥ एवमेवेति भूपतिरप्याह ॥ ४७ ॥

तया सह स चावनिपतिरलकायां चैत्ररथादिवनेष्वमलपद्मखण्डेषु मानसादिस्सरस्स्वतिरमणीयेषु रममाणः षष्टिवर्षसहस्राण्यनुदिनप्रवर्द्धमानप्रमोदोऽनयत् ॥ ४८ ॥ उर्वशी च तदुपभोगात्प्रतिदिनप्रवर्द्धमानानुरागा अमरलोकवासेऽपि न स्पृहां चकार ॥ ४९ ॥

विना चोर्वश्या सुरलोकोऽप्सरसां सिद्धगन्धर्वाणां च नातिरमणीयोऽभवत् ॥ ५० ॥ ततश्चोर्वशीपुरूरवसोस्समयविद्विश्वावसुर्गन्धर्वसमवेतो निशि शयनाभ्याशादेकमुरणकं जहार ॥ ५१ ॥ तस्याकाशे नीयमानस्योर्वशी


बुधने जिस प्रकार इलासे अपने पुत्र पुरूरवाको उत्पन्न किया था उसका वर्णन पहले ही कर चुके हैं॥ ३४ ॥ पुरूरवा अति दानशील, अति याज्ञिक और अति तेजस्वी था। 'मित्रावरुणके शापसे मुझे मर्त्यलोकमें रहना पड़ेगा' ऐसा विचार करते हुए उर्वशी अप्सराकी दृष्टि उस अति सत्यवादी, रूपके धनी और मतिमान् राजा पुरूरवापर पड़ी ॥ ३५ ॥ देखते ही वह सम्पूर्ण मान तथा स्वर्ग-सुखकी इच्छाको छोड़कर तन्मयभावसे उसीके पास आयी ॥ ३६ ॥ राजा पुरूरवाका चित्त भी उसे संसारकी समस्त स्त्रियोंमें विशिष्ट तथा कान्ति-सुकुमारता, सुन्दरता, गतिविलास और मुसकान आदि गुणोंसे युक्त देखकर उसके वशीभूत हो गया ॥ ३७ ॥ इस प्रकार वे दोनों ही परस्पर तन्मय और अनन्यचित्त होकर और सब कामोंको भूल गये ॥ ३८ ॥

निदान राजाने निःसंकोच होकर कहा— ॥ ३९ ॥ "हे सुभ्रु ! मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ, तुम प्रसन्न होकर मुझे प्रेम-दान दो।" राजाके ऐसा कहनेपर उर्वशीने भी लज्जावश स्खलित स्वरमें कहा— ॥ ४० ॥ "यदि आप मेरी प्रतिज्ञाको निभा सकें तो अवश्य ऐसा ही हो सकता है।" यह सुनकर राजाने कहा— ॥ ४१ ॥ अच्छा, तुम अपनी प्रतिज्ञा मुझसे कहो ॥ ४२ ॥ इस प्रकार पूछनेपर वह फिर बोली— ॥ ४३ ॥ "मेरे पुत्ररूप इन दो मेषों (भेड़ों)-को आप कभी मेरी शय्यासे दूर न कर सकेंगे ॥ ४४ ॥ मैं कभी आपको नग्न न देखने पाऊँ ॥ ४५ ॥ और केवल घृत ही मेरा आहार होगा—[यही मेरी तीन प्रतिज्ञाएँ हैं]" ॥ ४६ ॥ तब राजाने कहा—"ऐसा ही होगा" ॥ ४७ ॥

तदनन्तर राजा पुरूरवाने दिन-दिन बढ़ते हुए आनन्दके साथ कभी अलकापुरीके अन्तर्गत चैत्ररथ आदि वनोंमें और कभी सुन्दर पद्मखण्डोंसे युक्त अति रमणीय मानस आदि सरोवरोंमें विहार करते हुए साठ हजार वर्ष बिता दिये ॥ ४८ ॥ उसके उपभोगसुखसे प्रतिदिन अनुरागके बढ़ते रहनेसे उर्वशीको भी देवलोकमें रहनेकी इच्छा नहीं रही ॥ ४९ ॥

इधर उर्वशीके बिना अप्सराओं, सिद्धों और गन्धर्वोंको स्वर्गलोक अत्यन्त रमणीय नहीं मालूम होता था ॥ ५० ॥ अतः उर्वशी और पुरूरवाकी प्रतिज्ञाके जाननेवाले विश्वावसुने एक दिन रात्रिके समय गन्धर्वोंके साथ जाकर उसके शयनागारके पाससे एक मेषका हरण कर लिया ॥ ५१ ॥ उसे आकाशमें ले जाते समय उर्वशीने