विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६] * चतुर्थ अंश * २६३
शब्दमशृणोत् ॥ ५२ ॥ एवमुवाच च ममा- नाथायाः पुत्रः केनापह्रियते कं शरणमुपया- मीति ॥ ५३ ॥ तदाकर्ण्य राजा मां नग्नं देवी वीक्ष्यतीति न ययौ ॥ ५४ ॥ अथान्यमप्युरणक- मादाय गन्धर्वा ययुः ॥ ५५ ॥ तस्याप्यपह्रिय- माणस्याकर्ण्य शब्दमाकाशे पुनरप्यनाथा- स्यहमभर्तृका कापुरुषाश्रयेत्यार्त्तरराविणी बभूव ॥ ५६ ॥
राजाप्यमर्षवशादन्धकारमेतदिति खड्गमादाय दुष्ट दुष्ट हतोऽसीति व्याहरन्नभ्यधावत् ॥ ५७ ॥ तावच्च गन्धर्वैरप्यतीवोज्ज्वला विद्युज्जनिता ॥ ५८ ॥ तत्प्रभया चोर्वशी राजानमपगताम्बरं दृष्ट्वापवृत्तसमया तत्क्षणादेवापक्रान्ता ॥ ५९ ॥ परित्यज्य तावप्युरणकौ गन्धर्वास्सुर- लोकमुपगताः ॥ ६० ॥ राजापि च तौ मेषावादायातिहृष्टमनाः स्वशयनमायातो नोर्वशीं ददर्श ॥ ६१ ॥ तां चापश्यन् व्यपगताम्बर एवोन्मत्तरूपो बभ्राम ॥ ६२ ॥ कुरुक्षेत्रे चाम्भोजसरस्यन्याभिश्चतसृभिरप्सरोभिस्सम- वेतामुर्वशीं ददर्श ॥ ६३ ॥ ततश्चोन्मत्तरूपो जाये हे तिष्ठ मनसि घोरे तिष्ठ वचसि कपटिके तिष्ठेत्येवमनेकप्रकारं सूक्तमवोचत् ॥ ६४ ॥
आह चोर्वशी ॥ ६५ ॥ महाराजालमनेना- विवेकचेष्टितेन ॥ ६६ ॥ अन्तर्वल्यहमब्दान्ते भवतात्रागन्तव्यं कुमारस्ते भविष्यति एकां च निशामहं त्वया सह वत्स्यामीत्युक्तः प्रहृष्टस्स्वपुरं जगाम ॥ ६७ ॥
तासां चाप्सरसामुर्वशी कथयामास ॥ ६८ ॥ अयं स पुरुषोत्कृष्टो येनाहमेतावन्तं कालमनुरागा- कृष्टमानसा सहोषितेति ॥ ६९ ॥ एवमुक्तास्ता- श्चाप्सरस ऊचुः ॥ ७० ॥ साधु साध्वस्य रूपमप्यनेन सहास्माकमपि सर्वकालमास्या भवेदिति ॥ ७१ ॥
अब्दे च पूर्णे स राजा तत्राजगाम ॥ ७२ ॥
उसका शब्द सुना ॥ ५२ ॥ तब वह बोली—"मुझ अनाथाके पुत्रको कौन लिये जाता है, अब मैं किसकी शरण जाऊँ ?" ॥ ५३ ॥ किन्तु यह सुनकर भी इस भयसे कि रानी मुझे नंगा देख लेगी, राजा नहीं उठा ॥ ५४ ॥ तदनन्तर गन्धर्वगण दूसरा भी मेष लेकर चल दिये ॥ ५५ ॥ उसे ले जाते समय उसका शब्द सुनकर भी उर्वशी 'हाय! मैं अनाथा और भर्तृहीना हूँ तथा एक कायरके अधीन हो गयी हूँ!' इस प्रकार कहती हुई वह आर्त्तस्वरसे विलाप करने लगी ॥ ५६ ॥
तब राजा यह सोचकर कि इस समय अन्धकार है [अतः रानी मुझे नग्न न देख सकेगी], क्रोधपूर्वक 'अरे दुष्ट! तू मारा गया' यह कहते हुए तलवार लेकर पीछे दौड़ा ॥ ५७ ॥ इसी समय गन्धर्वोंने अति उज्ज्वल विद्युत् प्रकट कर दी ॥ ५८ ॥ उसके प्रकाशमें राजाको वस्त्रहीन देखकर प्रतिज्ञा टूट जानेसे उर्वशी तुरन्त ही वहाँसे चली गयी ॥ ५९ ॥ गन्धर्वगण भी उन मेषोंको वहीं छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ६० ॥ किन्तु जब राजा उन मेषोंको लिये हुए अति प्रसन्नचित्तसे अपने शयनागारमें आया तो वहाँ उसने उर्वशीको न देखा ॥ ६१ ॥ उसे न देखनेसे वह उस वस्त्रहीन-अवस्थामें ही पागलके समान घूमने लगा ॥ ६२ ॥ घूमते-घूमते उसने एक दिन कुरुक्षेत्रके कमल-सरोवरमें अन्य चार अप्सराओंके सहित उर्वशीको देखा ॥ ६३ ॥ उसे देखकर वह उन्मत्तके समान 'हे जाये! ठहर, अरी हृदयकी निष्ठुरे! खड़ी हो जा, अरी कपट रखनेवाली! वार्तालापके लिये तनिक ठहर जा'—ऐसे अनेक वचन कहने लगा ॥ ६४ ॥
उर्वशी बोली—"महाराज! इन अज्ञानियोंकी-सी चेष्टाओंसे कोई लाभ नहीं ॥ ६५-६६ ॥ इस समय मैं गर्भवती हूँ। एक वर्ष उपरान्त आप यहीं आ जावें, उस समय आपके एक पुत्र होगा और एक रात मैं भी आपके साथ रहूँगी।" उर्वशीके ऐसा कहनेपर राजा पुरूरवा प्रसन्न- चित्तसे अपने नगरको चला गया ॥ ६७ ॥
तदनन्तर उर्वशीने अन्य अप्सराओंसे कहा— ॥ ६८ ॥ "ये वही पुरुषश्रेष्ठ हैं जिनके साथ मैं इतने दिनोंतक प्रेमाकृष्ट-चित्तसे भूमण्डलमें रही थी ॥ ६९ ॥ इसपर अन्य अप्सराओंने कहा— ॥ ७० ॥ "वाह! वाह! सचमुच इनका रूप बड़ा ही मनोहर है, इनके साथ तो सर्वदा हमारा भी सहवास हो" ॥ ७१ ॥
वर्ष समाप्त होनेपर राजा पुरूरवा वहाँ आये ॥ ७२ ॥