विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
कुमारं चायुषमस्मै चोर्वशी ददौ ॥ ७३ ॥ दत्त्वा चैकां निशां तेन राज्ञा सहोषित्वा पञ्च पुत्रोत्पत्तये गर्भमवाप ॥ ७४ ॥ उवाचैनं राजानमस्मत्प्रीतया महाराजाय सर्व एव गन्धर्वा वरदास्संवृत्ता व्रियतां च वर इति ॥ ७५ ॥
आह च राजा ॥ ७६ ॥ विजितसकलाराति- रविहतेन्द्रियसामर्थ्यो बन्धुमानमितबलकोशोऽस्मि, नान्यदस्माकमुर्वशीसालोक्यात्राप्राप्तव्यमस्ति तदहमनया सहोर्वश्या कालं नेतुमभिलषामीत्युक्ते गन्धर्वा राज्ञेऽग्निस्थालीं ददुः ॥ ७७ ॥ ऊचुश्चैनमग्निमाम्नायानुसारी भूत्वा त्रिधा कृत्वोर्वशीसलोकतामनोरथमुद्दिश्य सम्यग्यजेथाः ततोऽवश्यमभिलषितमवाप्स्यसीत्युक्तस्तामग्नि- स्थालीमादाय जगाम ॥ ७८ ॥
अन्तरटव्यामचिन्तयत्, अहो मेऽतीव मूढता किमहमकरवम् ॥ ७९ ॥ वह्निस्थाली मयैषानीता नोर्वशीति ॥ ८० ॥ अथैनामटव्यामेवाग्निस्थालीं तत्याज स्वपुरं च जगाम ॥ ८१ ॥ व्यतीतेऽर्द्धरात्रे विनिद्रश्चाचिन्तयत् ॥ ८२ ॥ ममोर्वशी- सालोक्यप्राप्त्यर्थमग्निस्थाली गन्धर्वैर्दत्ता सा च मयाटव्यां परित्यक्ता ॥ ८३ ॥ तदहं तत्र तदाहरणाय यास्यामीत्युत्थाय तत्राप्युपगतो नाग्निस्थालीमपश्यत् ॥ ८४ ॥ शमीगर्भं चाश्वत्थमग्निस्थालीस्थाने दृष्ट्वाचिन्तयत् ॥ ८५ ॥ मयात्राग्निस्थाली निक्षिप्ता सा चाश्वत्थश्शमीगर्भोऽभूत् ॥ ८६ ॥ तदेनमेवाह- मग्निरूपमादाय स्वपुरमभिगम्यारणीं कृत्वा तदुत्पन्नाग्नेरुपास्तिं करिष्यामीति ॥ ८७ ॥
एवमेव स्वपुरमभिगम्यारणिं चकार ॥ ८८ ॥ तत्प्रमाणं चाङ्गुलैः कुर्वन् गायत्रीमपठत् ॥ ८९ ॥
उस समय उर्वशीने उन्हें 'आयु' नामक एक बालक दिया ॥ ७३ ॥ तथा उनके साथ एक रात रहकर पाँच पुत्र उत्पन्न करनेके लिये गर्भ धारण किया ॥ ७४ ॥ और कहा—'हमारे पारस्परिक स्नेहके कारण सकल गन्धर्वगण महाराजको वरदान देना चाहते हैं अतः आप अभीष्ट वर माँगिये ॥ ७५ ॥
राजा बोले—"मैंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, मेरी इन्द्रियोंकी सामर्थ्य नष्ट नहीं हुई है, मैं बन्धुजन, असंख्य सेना और कोशसे भी सम्पन्न हूँ, इस समय उर्वशीके सहवासके अतिरिक्त मुझे और कुछ भी प्राप्तव्य नहीं है। अतः मैं इस उर्वशीके साथ ही काल-यापन करना चाहता हूँ।" राजाके ऐसा कहनेपर गन्धर्वोंने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्नियुक्त पात्र) दी और कहा— "इस अग्निके वैदिक विधिसे गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्निरूप तीन भाग करके इसमें उर्वशीके सहवासकी कामनासे भलीभाँति यजन करो तो अवश्य ही तुम अपना अभीष्ट प्राप्त कर लोगे।" गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर राजा उस अग्निस्थालीको लेकर चल दिये ॥ ७६–७८ ॥
[मार्गमें] वनके अन्दर उन्होंने सोचा—'अहो! मैं कैसा मूर्ख हूँ ? मैंने यह क्या किया जो इस अग्निस्थालीको तो ले आया और उर्वशीको नहीं लाया' ॥ ७९-८० ॥ ऐसा सोचकर उस अग्निस्थालीको वनमें ही छोड़कर वे अपने नगरमें चले आये ॥ ८१ ॥ आधीरात बीत जानेके बाद निद्रा टूटनेपर राजाने सोचा— ॥ ८२ ॥ 'उर्वशीकी सन्निधि प्राप्त करनेके लिये ही गन्धर्वोंने मुझे वह अग्निस्थाली दी थी और मैंने उसे वनमें ही छोड़ दिया ॥ ८३ ॥ अतः अब मुझे उसे लानेके लिये जाना चाहिये' ऐसा सोच उठकर वे वहाँ गये, किन्तु उन्होंने उस स्थालीको वहाँ न देखा ॥ ८४ ॥ अग्निस्थालीके स्थानपर राजा पुरूरवाने एक शमीगर्भ पीपलके वृक्षको देखकर सोचा— ॥ ८५ ॥ 'मैंने यहीं तो वह अग्निस्थाली फेंकी थी। वह स्थाली ही शमीगर्भ पीपल हो गयी है ॥ ८६ ॥ अतः इस अग्निरूप अश्वत्थको ही अपने नगरमें ले जाकर इसकी अरणि बनाकर उससे उत्पन्न हुए अग्निकी ही उपासना करूँ' ॥ ८७ ॥
ऐसा सोचकर राजा उस अश्वत्थको लेकर अपने नगरमें आये और उसकी अरणि बनायी ॥ ८८ ॥ तदनन्तर उन्होंने उस काष्ठको एक-एक अंगुल करके गायत्री-मन्त्रका पाठ किया ॥ ८९ ॥