विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ७ ] * चतुर्थ अंश * २६५
| पठतश्चाक्षरसंख्यान्येवाङ्गुलान्यरण्यभवत्॥ ९०॥ तत्राग्निं निर्मथ्याग्नित्रयमाम्नायानुसारी भूत्वा जुहाव॥ ९१॥ उर्वशीसालोक्यं फलमभिसंहितवान्॥ ९२॥ तेनैव चाग्निविधिना बहुविधान् यज्ञानिष्ट्वा गान्धर्वलोकानवाप्योर्वश्या सहावियोगमवाप॥ ९३॥ एकोऽग्निर्यादावभवत् एकेन त्वत्र मन्वन्तरे त्रेधा प्रवर्तिताः॥ ९४॥ | उसके पाठसे गायत्रीके अक्षर-संख्याके बराबर एक-एक अंगुलकी अरणियाँ हो गयीं॥ ९०॥ उनके मन्थनसे तीनों प्रकारके अग्नियोंको उत्पन्न कर उनमें वैदिक विधिसे हवन किया॥ ९१॥ तथा उर्वशीके सहवासरूप फलकी इच्छा की॥ ९२॥ तदनन्तर उसी अग्निसे नाना प्रकारके यज्ञोंका यजन करते हुए उन्होंने गन्धर्व-लोक प्राप्त किया और फिर उर्वशीसे उनका वियोग न हुआ॥ ९३॥ पूर्वकालमें एक ही अग्नि था, उस एकहीसे इस मन्वन्तरमें तीन प्रकारके अग्नियोंका प्रचार हुआ॥ ९४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
जह्नुका गंगापान तथा जमदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति
| श्रीपराशर उवाच<br>तस्याप्यायुर्धीमानमावसुर्विश्वावसुः श्रुतायुश्शतायुरयुतायुरितिसंज्ञाः षट् पुत्रा अभवन्॥ १॥ तथामावसोर्भीमनामा पुत्रोऽभवत्॥ २॥ भीमस्य काञ्चनः काञ्चनात्सुहोत्रस्तस्यापि जह्नुः॥ ३॥ योऽसौ यज्ञवाटमखिलं गङ्गाम्भसाप्लावितमवलोक्य क्रोधसंरक्तलोचनो भगवन्तं यज्ञपुरुषमात्मनि परमेण समाधिना समारोप्याखिलामेव गङ्गामपिबत्॥ ४॥ अथैनं देवर्षयः प्रसादयामासुः॥ ५॥ दुहितृत्वे चास्य गङ्गामनयन्॥ ६॥<br>जह्नोश्च सुमन्तुर्नाम पुत्रोऽभवत्॥ ७॥ तस्याप्यजकस्ततो बलाकाश्वस्तस्मात्कुशस्तस्यापि कुशाम्बकुशनाभाधूर्त्तरजसो वसुश्चेति चत्वारः पुत्रा बभूवुः॥ ८॥ तेषां कुशाम्बः शक्रतुल्यो मे पुत्रो भवेदिति तपश्चकार॥ ९॥ तं चोग्रतपसमवलोक्य मा भवत्वन्योऽस्मत्तुल्यवीर्य इत्यात्मनैवास्येन्द्रः पुत्रत्वमगच्छत्॥ १०॥ स गाधिर्नाम पुत्रः कौशिकोऽभवत्॥ ११॥<br>गाधिश्च सत्यवतीं कन्यामजनयत्॥ १२॥ | **श्रीपराशरजी बोले—**राजा पुरूरवाके परम बुद्धिमान् आयु, अमावसु, विश्वावसु, श्रुतायु, शतायु और अयुतायु नामक छः पुत्र हुए॥ १॥ अमावसुके भीम, भीमके कांचन, कांचनके सुहोत्र और सुहोत्रके जह्नु नामक पुत्र हुआ जिसने अपनी सम्पूर्ण यज्ञशालाको गंगाजलसे आप्लावित देख क्रोधसे रक्तनयन हो भगवान् यज्ञपुरुषको परम समाधिके द्वारा अपनेमें स्थापित कर सम्पूर्ण गंगाजीको पी लिया था॥ २—४॥ तब देवर्षियोंने इन्हें प्रसन्न किया और गंगाजीको इनकी पुत्रीरूपसे पाकर ले गये॥ ५-६॥<br>जह्नुके सुमन्तु नामक पुत्र हुआ॥ ७॥ सुमन्तुके अजक, अजकके बलाकाश्व, बलाकाश्वके कुश और कुशके कुशाम्ब, कुशनाभ, अधूर्त्तरजा और वसु नामक चार पुत्र हुए॥ ८॥ उनमेंसे कुशाम्बने इस इच्छासे कि मेरे इन्द्रके समान पुत्र हो, तपस्या की॥ ९॥ उसके उग्र तपको देखकर 'बलमें कोई अन्य मेरे समान न हो जाय' इस भयसे इन्द्र स्वयं ही इनका पुत्र हो गया॥ १०॥ वह गाधि नामक पुत्र कौशिक कहलाया॥ ११॥<br>गाधिने सत्यवती नामकी कन्याको जन्म दिया॥ १२॥ |