भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 277
२६६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ७

तां च भार्गव ऋचीको वव्रे ॥ १३ ॥ गाधिरप्यति-
रोषणायातिवृद्धाय ब्राह्मणाय दातुमनिच्छन्नेकतश्श्याम-
कर्णानामिन्दुवर्चसामनिलरंहसामश्वानां सहस्रं
कन्याशुल्कमयाचत ॥ १४ ॥ तेनाप्यृषिणा
वरुणसकाशादुपलभ्याश्वतीर्थोत्पन्नं तादृश-
मश्वसहस्रं दत्तम् ॥ १५ ॥
ततस्तामृचीकः कन्यामुपयेमे ॥ १६ ॥
ऋचीकश्च तस्याश्चरुमपत्यार्थं चकार ॥ १७ ॥
तत्प्रसादितश्च तन्मात्रे क्षत्रवरपुत्रोत्पत्तये चरुमपरं
साधयामास ॥ १८ ॥ एष चरुर्भवत्या
अयमपरश्चरुस्त्वन्मात्रा सम्यगुपयोज्य इत्युक्त्वा
वनं जगाम ॥ १९ ॥
उपयोगकाले च तां माता सत्यवतीमाह ॥ २० ॥
पुत्रि सर्व एवात्मपुत्रमतिगुणमभिलषति
नात्मजायाभ्रातृगुणेष्वतीवादृतो भवतीति ॥ २१ ॥
अतोऽर्हसि ममात्मीयं चरुं दातुं मदीयं चरुमात्मनोप-
योक्तुम् ॥ २२ ॥ मत्पुत्रेण हि सकलभूमण्डल-
परिपालनं कार्यं कियद्वा ब्राह्मणस्य बलवीर्य-
सम्पदेत्युक्ता सा स्वचरुं मात्रे दत्तवती ॥ २३ ॥
अथ वनादागत्य सत्यवतीमृषिरपश्यत् ॥ २४ ॥
आह चैनामतिपापे किमिदमकार्यं भवत्या
कृतमतिरौद्रं ते वपुर्लक्ष्यते ॥ २५ ॥ नूनं
त्वया त्वन्मातृसात्कृतश्चरुरुपयुक्तो न
युक्तमेतत् ॥ २६ ॥ मया हि तत्र चरौ
सकलैश्वर्यवीर्यशौर्यबलसम्पदारोपिता त्वदीय-
चरावप्यखिलशान्तिज्ञानतितिक्षादिब्राह्मण-
गुणसम्पत् ॥ २७ ॥ तच्च विपरीतं कुर्वत्या-
स्तवातिरौद्रास्त्रधारणपालननिष्ठः क्षत्रियाचारः
पुत्रो भविष्यति तस्याश्चोपशमरुचिर्ब्राह्मणाचार
इत्याकर्ण्यैव सा तस्य पादौ जग्राह ॥ २८ ॥
प्रणिपत्य चैनमाह ॥ २९ ॥ भगवन्मयैतदज्ञाना-
दनुष्ठितं प्रसादं मे कुरु मैवंविधः पुत्रो
भवतु काममेवंविधः पौत्रो भवत्वित्युक्ते
मुनिरप्याह ॥ ३० ॥ एवमस्त्विति ॥ ३१ ॥ | उसे भृगुपुत्र ऋचीकने वरण किया ॥ १३ ॥ गाधिने अति
क्रोधी और अति वृद्ध ब्राह्मणको कन्या न देनेकी इच्छासे
ऋचीकसे कन्याके मूल्यमें जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान्
और पवनके तुल्य वेगवान् हों, ऐसे एक सहस्र श्यामकर्ण
घोड़े माँगे ॥ १४ ॥ किन्तु महर्षि ऋचीकने अश्वतीर्थसे उत्पन्न
हुए वैसे एक सहस्र घोड़े उन्हें वरुणसे लेकर दे दिये ॥ १५ ॥
तब ऋचीकने उस कन्यासे विवाह किया ॥ १६ ॥
[तदुपरान्त एक समय] उन्होंने सन्तानकी कामनासे
सत्यवतीके लिये चरु (यज्ञीय खीर) तैयार किया ॥ १७ ॥
और उसीके द्वारा प्रसन्न किये जानेपर एक क्षत्रियश्रेष्ठ
पुत्रकी उत्पत्तिके लिये एक और चरु उसकी माताके
लिये भी बनाया ॥ १८ ॥ और 'यह चरु तुम्हारे लिये है
तथा यह तुम्हारी माताके लिये—इनका तुम यथोचित उपयोग
करना'—ऐसा कहकर वे वनको चले गये ॥ १९ ॥
उनका उपयोग करते समय सत्यवतीकी माताने
उससे कहा— ॥ २० ॥ “बेटी ! सभी लोग अपने ही लिये
सबसे अधिक गुणवान् पुत्र चाहते हैं, अपनी पत्नीके भाईके
गुणोंमें किसीकी भी विशेष रुचि नहीं होती ॥ २१ ॥ अतः
तू अपना चरु तो मुझे दे दे और मेरा तू ले ले; क्योंकि मेरे
पुत्रको तो सम्पूर्ण भूमण्डलका पालन करना होगा और
ब्राह्मणकुमारको तो बल, वीर्य तथा सम्पत्ति आदिसे लेना
ही क्या है।'' ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपना चरु अपनी
माताको दे दिया ॥ २२-२३ ॥
वनसे लौटनेपर ऋषिने सत्यवतीको देखकर कहा—
“अरी पापिनि ! तूने ऐसा क्या अकार्य किया है जिससे
तेरा शरीर ऐसा भयानक प्रतीत होता है ॥ २४-२५ ॥ अवश्य
ही तूने अपनी माताके लिये तैयार किये चरुका उपयोग
किया है, सो ठीक नहीं है ॥ २६ ॥ मैंने उसमें सम्पूर्ण
ऐश्वर्य, पराक्रम, शूरता और बलकी सम्पत्तिका आरोपण
किया था तथा तेरेमें शान्ति, ज्ञान, तितिक्षा आदि सम्पूर्ण
ब्राह्मणोचित गुणोंका समावेश किया था ॥ २७ ॥ उनका
विपरीत उपयोग करनेसे तेरे अति भयानक अस्त्र-शस्त्रधारी
पालन-कर्ममें तत्पर क्षत्रियके समान आचरणवाला पुत्र
होगा और उसके शान्तिप्रिय ब्राह्मणाचारयुक्त पुत्र होगा।”
यह सुनते ही सत्यवतीने उनके चरण पकड़ लिये और
प्रणाम करके कहा— ॥ २८-२९ ॥ “भगवन् ! अज्ञानसे ही
मैंने ऐसा किया है, अतः प्रसन्न होइये और ऐसा कीजिये
जिससे मेरा पुत्र ऐसा न हो, भले ही पौत्र ऐसा हो जाय!”
इसपर मुनिने कहा—'ऐसा ही हो।' ॥ ३०-३१ ॥