भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

अ० ८ ] * चतुर्थ अंश * २६७

अनन्तरं च सा जमदग्निमजीजनत् ॥ ३२ ॥ तन्माता च विश्वामित्रं जनयामास ॥ ३३ ॥ सत्यवत्यपि कौशिकी नाम नद्यभवत् ॥ ३४ ॥तदनन्तर उसने जमदग्निको जन्म दिया और उसकी माताने विश्वामित्रको उत्पन्न किया तथा सत्यवती कौशिकी नामकी नदी हो गयी ॥ ३२–३४ ॥
जमदग्निरिक्ष्वाकुवंशोद्भवस्य रेणोस्तनयां रेणुकामुपयेमे ॥ ३५ ॥ तस्यां चाशेषक्षत्रहन्तारं परशुरामसंज्ञं भगवतस्सकललोकगुरोर्नारायणस्यांशं जमदग्निरजीजनत् ॥ ३६ ॥ विश्वामित्रपुत्रस्तु भार्गव एव शुनश्शेपो देवैर्दत्तः ततश्च देवरातनामाभवत् ॥ ३७ ॥ ततश्चान्ये मधुच्छन्दोधनञ्जयकृतदेवाष्टककच्छपहारीतकाख्या विश्वामित्रपुत्रा बभूवुः ॥ ३८ ॥ तेषां च बहूनि कौशिकगोत्राणि ऋष्यन्तरेषु विवाह्यान्यभवन् ॥ ३९ ॥जमदग्निने इक्ष्वाकुकुलोद्भव रेणुकी कन्या रेणुकासे विवाह किया ॥ ३५ ॥ उससे जमदग्निके सम्पूर्ण क्षत्रियोंका ध्वंस करनेवाले भगवान् परशुरामजी उत्पन्न हुए जो सकल लोक-गुरु भगवान् नारायणके अंश थे ॥ ३६ ॥ देवताओंने विश्वामित्रजीको भृगुवंशीय शुनःशेप पुत्ररूपसे दिया था। उसके पीछे उनके देवरात नामक एक पुत्र हुआ और फिर मधुच्छन्द, धनञ्जय, कृतदेव, अष्टक, कच्छप एवं हारीतक नामक और भी पुत्र हुए ॥ ३७-३८ ॥ उनसे अन्यान्य ऋषिवंशोंमें विवाहने योग्य बहुत-से कौशिकगोत्रीय पुत्र-पौत्रादि हुए ॥ ३९ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

काश्यवंशका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
पुरूरवसो ज्येष्ठः पुत्रो यस्तवायुर्नामा स राहोर्दुहितरमुपयेमे ॥ १ ॥ तस्यां च पञ्च पुत्रानुत्पादयामास ॥ २ ॥ नहुषक्षत्रवृद्धरम्भरजिसंज्ञास्तथैवानेनाः पञ्चमः पुत्रोऽभूत् ॥ ३ ॥ क्षत्रवृद्धात्सुहोत्रः पुत्रोऽभवत् ॥ ४ ॥ काश्यकाशगृत्समदास्त्रयस्तस्य पुत्रा बभूवुः ॥ ५ ॥ गृत्समदस्य शौनकश्चातुर्वर्ण्यप्रवर्तयिताभूत् ॥ ६ ॥आयु नामक जो पुरूरवाका ज्येष्ठ पुत्र था उसने राहुकी कन्यासे विवाह किया ॥ १ ॥ उससे उसके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम क्रमशः नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि और अनेना थे ॥ २–३ ॥ क्षत्रवृद्धके सुहोत्र नामक पुत्र हुआ और सुहोत्रके काश्य, काश तथा गृत्समद नामक तीन पुत्र हुए। गृत्समदका पुत्र शौनक चातुर्वर्ण्यका प्रवर्तक हुआ ॥ ४–६ ॥
काश्यस्य काशेयः काशिराजः तस्माद्राष्ट्रः, राष्ट्रस्य दीर्घतपाः पुत्रोऽभवत् ॥ ७ ॥ धन्वन्तरिस्तु दीर्घतपसः पुत्रोऽभवत् ॥ ८ ॥ स हि संसिद्धकार्यकरणस्सकलसम्भूतिष्वशेषज्ञानविद् भगवता नारायणेन चातीतसम्भूतौ तस्मै वरो दत्तः ॥ ९ ॥ काशिराजगोत्रेऽवतीर्य त्वमष्टधा सम्यगायूर्वेदं करिष्यसि यज्ञभागभुग्भविष्यसीति ॥ १० ॥काश्यका पुत्र काशिराज काशेय हुआ। उसके राष्ट्र, राष्ट्रके दीर्घतपा और दीर्घतपाके धन्वन्तरि नामक पुत्र हुआ ॥ ७-८ ॥ इस धन्वन्तरिके शरीर और इन्द्रियाँ जरा आदि विकारोंसे रहित थीं—तथा सभी जन्मोंमें यह सम्पूर्ण शास्त्रोंका जाननेवाला था। पूर्वजन्ममें भगवान् नारायणने उसे यह वर दिया था कि 'काशिराजके वंशमें उत्पन्न होकर तुम सम्पूर्ण आयुर्वेदको आठ भागोंमें विभक्त करोगे और यज्ञ-भागके भोक्ता होगे' ॥ ९-१० ॥

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