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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

२६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६

कुमारं चायुषमस्मै चोर्वशी ददौ ॥ ७३ ॥ दत्त्वा चैकां निशां तेन राज्ञा सहोषित्वा पञ्च पुत्रोत्पत्तये गर्भमवाप ॥ ७४ ॥ उवाचैनं राजानमस्मत्प्रीतया महाराजाय सर्व एव गन्धर्वा वरदास्संवृत्ता व्रियतां च वर इति ॥ ७५ ॥

आह च राजा ॥ ७६ ॥ विजितसकलाराति- रविहतेन्द्रियसामर्थ्यो बन्धुमानमितबलकोशोऽस्मि, नान्यदस्माकमुर्वशीसालोक्यात्राप्राप्तव्यमस्ति तदहमनया सहोर्वश्या कालं नेतुमभिलषामीत्युक्ते गन्धर्वा राज्ञेऽग्निस्थालीं ददुः ॥ ७७ ॥ ऊचुश्चैनमग्निमाम्नायानुसारी भूत्वा त्रिधा कृत्वोर्वशीसलोकतामनोरथमुद्दिश्य सम्यग्यजेथाः ततोऽवश्यमभिलषितमवाप्स्यसीत्युक्तस्तामग्नि- स्थालीमादाय जगाम ॥ ७८ ॥

अन्तरटव्यामचिन्तयत्, अहो मेऽतीव मूढता किमहमकरवम् ॥ ७९ ॥ वह्निस्थाली मयैषानीता नोर्वशीति ॥ ८० ॥ अथैनामटव्यामेवाग्निस्थालीं तत्याज स्वपुरं च जगाम ॥ ८१ ॥ व्यतीतेऽर्द्धरात्रे विनिद्रश्चाचिन्तयत् ॥ ८२ ॥ ममोर्वशी- सालोक्यप्राप्त्यर्थमग्निस्थाली गन्धर्वैर्दत्ता सा च मयाटव्यां परित्यक्ता ॥ ८३ ॥ तदहं तत्र तदाहरणाय यास्यामीत्युत्थाय तत्राप्युपगतो नाग्निस्थालीमपश्यत् ॥ ८४ ॥ शमीगर्भं चाश्वत्थमग्निस्थालीस्थाने दृष्ट्वाचिन्तयत् ॥ ८५ ॥ मयात्राग्निस्थाली निक्षिप्ता सा चाश्वत्थश्शमीगर्भोऽभूत् ॥ ८६ ॥ तदेनमेवाह- मग्निरूपमादाय स्वपुरमभिगम्यारणीं कृत्वा तदुत्पन्नाग्नेरुपास्तिं करिष्यामीति ॥ ८७ ॥

एवमेव स्वपुरमभिगम्यारणिं चकार ॥ ८८ ॥ तत्प्रमाणं चाङ्गुलैः कुर्वन् गायत्रीमपठत् ॥ ८९ ॥


उस समय उर्वशीने उन्हें 'आयु' नामक एक बालक दिया ॥ ७३ ॥ तथा उनके साथ एक रात रहकर पाँच पुत्र उत्पन्न करनेके लिये गर्भ धारण किया ॥ ७४ ॥ और कहा—'हमारे पारस्परिक स्नेहके कारण सकल गन्धर्वगण महाराजको वरदान देना चाहते हैं अतः आप अभीष्ट वर माँगिये ॥ ७५ ॥

राजा बोले—"मैंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, मेरी इन्द्रियोंकी सामर्थ्य नष्ट नहीं हुई है, मैं बन्धुजन, असंख्य सेना और कोशसे भी सम्पन्न हूँ, इस समय उर्वशीके सहवासके अतिरिक्त मुझे और कुछ भी प्राप्तव्य नहीं है। अतः मैं इस उर्वशीके साथ ही काल-यापन करना चाहता हूँ।" राजाके ऐसा कहनेपर गन्धर्वोंने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्नियुक्त पात्र) दी और कहा— "इस अग्निके वैदिक विधिसे गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्निरूप तीन भाग करके इसमें उर्वशीके सहवासकी कामनासे भलीभाँति यजन करो तो अवश्य ही तुम अपना अभीष्ट प्राप्त कर लोगे।" गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर राजा उस अग्निस्थालीको लेकर चल दिये ॥ ७६–७८ ॥

[मार्गमें] वनके अन्दर उन्होंने सोचा—'अहो! मैं कैसा मूर्ख हूँ ? मैंने यह क्या किया जो इस अग्निस्थालीको तो ले आया और उर्वशीको नहीं लाया' ॥ ७९-८० ॥ ऐसा सोचकर उस अग्निस्थालीको वनमें ही छोड़कर वे अपने नगरमें चले आये ॥ ८१ ॥ आधीरात बीत जानेके बाद निद्रा टूटनेपर राजाने सोचा— ॥ ८२ ॥ 'उर्वशीकी सन्निधि प्राप्त करनेके लिये ही गन्धर्वोंने मुझे वह अग्निस्थाली दी थी और मैंने उसे वनमें ही छोड़ दिया ॥ ८३ ॥ अतः अब मुझे उसे लानेके लिये जाना चाहिये' ऐसा सोच उठकर वे वहाँ गये, किन्तु उन्होंने उस स्थालीको वहाँ न देखा ॥ ८४ ॥ अग्निस्थालीके स्थानपर राजा पुरूरवाने एक शमीगर्भ पीपलके वृक्षको देखकर सोचा— ॥ ८५ ॥ 'मैंने यहीं तो वह अग्निस्थाली फेंकी थी। वह स्थाली ही शमीगर्भ पीपल हो गयी है ॥ ८६ ॥ अतः इस अग्निरूप अश्वत्थको ही अपने नगरमें ले जाकर इसकी अरणि बनाकर उससे उत्पन्न हुए अग्निकी ही उपासना करूँ' ॥ ८७ ॥

ऐसा सोचकर राजा उस अश्वत्थको लेकर अपने नगरमें आये और उसकी अरणि बनायी ॥ ८८ ॥ तदनन्तर उन्होंने उस काष्ठको एक-एक अंगुल करके गायत्री-मन्त्रका पाठ किया ॥ ८९ ॥

अ० ७ ] * चतुर्थ अंश * २६५

पठतश्चाक्षरसंख्यान्येवाङ्गुलान्यरण्यभवत्॥ ९०॥ तत्राग्निं निर्मथ्याग्नित्रयमाम्नायानुसारी भूत्वा जुहाव॥ ९१॥ उर्वशीसालोक्यं फलमभिसंहितवान्॥ ९२॥ तेनैव चाग्निविधिना बहुविधान् यज्ञानिष्ट्वा गान्धर्वलोकानवाप्योर्वश्या सहावियोगमवाप॥ ९३॥ एकोऽग्निर्यादावभवत् एकेन त्वत्र मन्वन्तरे त्रेधा प्रवर्तिताः॥ ९४॥उसके पाठसे गायत्रीके अक्षर-संख्याके बराबर एक-एक अंगुलकी अरणियाँ हो गयीं॥ ९०॥ उनके मन्थनसे तीनों प्रकारके अग्नियोंको उत्पन्न कर उनमें वैदिक विधिसे हवन किया॥ ९१॥ तथा उर्वशीके सहवासरूप फलकी इच्छा की॥ ९२॥ तदनन्तर उसी अग्निसे नाना प्रकारके यज्ञोंका यजन करते हुए उन्होंने गन्धर्व-लोक प्राप्त किया और फिर उर्वशीसे उनका वियोग न हुआ॥ ९३॥ पूर्वकालमें एक ही अग्नि था, उस एकहीसे इस मन्वन्तरमें तीन प्रकारके अग्नियोंका प्रचार हुआ॥ ९४॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

जह्नुका गंगापान तथा जमदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति

श्रीपराशर उवाच<br>तस्याप्यायुर्धीमानमावसुर्विश्वावसुः श्रुतायुश्शतायुरयुतायुरितिसंज्ञाः षट् पुत्रा अभवन्॥ १॥ तथामावसोर्भीमनामा पुत्रोऽभवत्॥ २॥ भीमस्य काञ्चनः काञ्चनात्सुहोत्रस्तस्यापि जह्नुः॥ ३॥ योऽसौ यज्ञवाटमखिलं गङ्गाम्भसाप्लावितमवलोक्य क्रोधसंरक्तलोचनो भगवन्तं यज्ञपुरुषमात्मनि परमेण समाधिना समारोप्याखिलामेव गङ्गामपिबत्॥ ४॥ अथैनं देवर्षयः प्रसादयामासुः॥ ५॥ दुहितृत्वे चास्य गङ्गामनयन्॥ ६॥<br>जह्नोश्च सुमन्तुर्नाम पुत्रोऽभवत्॥ ७॥ तस्याप्यजकस्ततो बलाकाश्वस्तस्मात्कुशस्तस्यापि कुशाम्बकुशनाभाधूर्त्तरजसो वसुश्चेति चत्वारः पुत्रा बभूवुः॥ ८॥ तेषां कुशाम्बः शक्रतुल्यो मे पुत्रो भवेदिति तपश्चकार॥ ९॥ तं चोग्रतपसमवलोक्य मा भवत्वन्योऽस्मत्तुल्यवीर्य इत्यात्मनैवास्येन्द्रः पुत्रत्वमगच्छत्॥ १०॥ स गाधिर्नाम पुत्रः कौशिकोऽभवत्॥ ११॥<br>गाधिश्च सत्यवतीं कन्यामजनयत्॥ १२॥**श्रीपराशरजी बोले—**राजा पुरूरवाके परम बुद्धिमान् आयु, अमावसु, विश्वावसु, श्रुतायु, शतायु और अयुतायु नामक छः पुत्र हुए॥ १॥ अमावसुके भीम, भीमके कांचन, कांचनके सुहोत्र और सुहोत्रके जह्नु नामक पुत्र हुआ जिसने अपनी सम्पूर्ण यज्ञशालाको गंगाजलसे आप्लावित देख क्रोधसे रक्तनयन हो भगवान् यज्ञपुरुषको परम समाधिके द्वारा अपनेमें स्थापित कर सम्पूर्ण गंगाजीको पी लिया था॥ २—४॥ तब देवर्षियोंने इन्हें प्रसन्न किया और गंगाजीको इनकी पुत्रीरूपसे पाकर ले गये॥ ५-६॥<br>जह्नुके सुमन्तु नामक पुत्र हुआ॥ ७॥ सुमन्तुके अजक, अजकके बलाकाश्व, बलाकाश्वके कुश और कुशके कुशाम्ब, कुशनाभ, अधूर्त्तरजा और वसु नामक चार पुत्र हुए॥ ८॥ उनमेंसे कुशाम्बने इस इच्छासे कि मेरे इन्द्रके समान पुत्र हो, तपस्या की॥ ९॥ उसके उग्र तपको देखकर 'बलमें कोई अन्य मेरे समान न हो जाय' इस भयसे इन्द्र स्वयं ही इनका पुत्र हो गया॥ १०॥ वह गाधि नामक पुत्र कौशिक कहलाया॥ ११॥<br>गाधिने सत्यवती नामकी कन्याको जन्म दिया॥ १२॥
२६६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ७

तां च भार्गव ऋचीको वव्रे ॥ १३ ॥ गाधिरप्यति-
रोषणायातिवृद्धाय ब्राह्मणाय दातुमनिच्छन्नेकतश्श्याम-
कर्णानामिन्दुवर्चसामनिलरंहसामश्वानां सहस्रं
कन्याशुल्कमयाचत ॥ १४ ॥ तेनाप्यृषिणा
वरुणसकाशादुपलभ्याश्वतीर्थोत्पन्नं तादृश-
मश्वसहस्रं दत्तम् ॥ १५ ॥
ततस्तामृचीकः कन्यामुपयेमे ॥ १६ ॥
ऋचीकश्च तस्याश्चरुमपत्यार्थं चकार ॥ १७ ॥
तत्प्रसादितश्च तन्मात्रे क्षत्रवरपुत्रोत्पत्तये चरुमपरं
साधयामास ॥ १८ ॥ एष चरुर्भवत्या
अयमपरश्चरुस्त्वन्मात्रा सम्यगुपयोज्य इत्युक्त्वा
वनं जगाम ॥ १९ ॥
उपयोगकाले च तां माता सत्यवतीमाह ॥ २० ॥
पुत्रि सर्व एवात्मपुत्रमतिगुणमभिलषति
नात्मजायाभ्रातृगुणेष्वतीवादृतो भवतीति ॥ २१ ॥
अतोऽर्हसि ममात्मीयं चरुं दातुं मदीयं चरुमात्मनोप-
योक्तुम् ॥ २२ ॥ मत्पुत्रेण हि सकलभूमण्डल-
परिपालनं कार्यं कियद्वा ब्राह्मणस्य बलवीर्य-
सम्पदेत्युक्ता सा स्वचरुं मात्रे दत्तवती ॥ २३ ॥
अथ वनादागत्य सत्यवतीमृषिरपश्यत् ॥ २४ ॥
आह चैनामतिपापे किमिदमकार्यं भवत्या
कृतमतिरौद्रं ते वपुर्लक्ष्यते ॥ २५ ॥ नूनं
त्वया त्वन्मातृसात्कृतश्चरुरुपयुक्तो न
युक्तमेतत् ॥ २६ ॥ मया हि तत्र चरौ
सकलैश्वर्यवीर्यशौर्यबलसम्पदारोपिता त्वदीय-
चरावप्यखिलशान्तिज्ञानतितिक्षादिब्राह्मण-
गुणसम्पत् ॥ २७ ॥ तच्च विपरीतं कुर्वत्या-
स्तवातिरौद्रास्त्रधारणपालननिष्ठः क्षत्रियाचारः
पुत्रो भविष्यति तस्याश्चोपशमरुचिर्ब्राह्मणाचार
इत्याकर्ण्यैव सा तस्य पादौ जग्राह ॥ २८ ॥
प्रणिपत्य चैनमाह ॥ २९ ॥ भगवन्मयैतदज्ञाना-
दनुष्ठितं प्रसादं मे कुरु मैवंविधः पुत्रो
भवतु काममेवंविधः पौत्रो भवत्वित्युक्ते
मुनिरप्याह ॥ ३० ॥ एवमस्त्विति ॥ ३१ ॥ | उसे भृगुपुत्र ऋचीकने वरण किया ॥ १३ ॥ गाधिने अति
क्रोधी और अति वृद्ध ब्राह्मणको कन्या न देनेकी इच्छासे
ऋचीकसे कन्याके मूल्यमें जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान्
और पवनके तुल्य वेगवान् हों, ऐसे एक सहस्र श्यामकर्ण
घोड़े माँगे ॥ १४ ॥ किन्तु महर्षि ऋचीकने अश्वतीर्थसे उत्पन्न
हुए वैसे एक सहस्र घोड़े उन्हें वरुणसे लेकर दे दिये ॥ १५ ॥
तब ऋचीकने उस कन्यासे विवाह किया ॥ १६ ॥
[तदुपरान्त एक समय] उन्होंने सन्तानकी कामनासे
सत्यवतीके लिये चरु (यज्ञीय खीर) तैयार किया ॥ १७ ॥
और उसीके द्वारा प्रसन्न किये जानेपर एक क्षत्रियश्रेष्ठ
पुत्रकी उत्पत्तिके लिये एक और चरु उसकी माताके
लिये भी बनाया ॥ १८ ॥ और 'यह चरु तुम्हारे लिये है
तथा यह तुम्हारी माताके लिये—इनका तुम यथोचित उपयोग
करना'—ऐसा कहकर वे वनको चले गये ॥ १९ ॥
उनका उपयोग करते समय सत्यवतीकी माताने
उससे कहा— ॥ २० ॥ “बेटी ! सभी लोग अपने ही लिये
सबसे अधिक गुणवान् पुत्र चाहते हैं, अपनी पत्नीके भाईके
गुणोंमें किसीकी भी विशेष रुचि नहीं होती ॥ २१ ॥ अतः
तू अपना चरु तो मुझे दे दे और मेरा तू ले ले; क्योंकि मेरे
पुत्रको तो सम्पूर्ण भूमण्डलका पालन करना होगा और
ब्राह्मणकुमारको तो बल, वीर्य तथा सम्पत्ति आदिसे लेना
ही क्या है।'' ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपना चरु अपनी
माताको दे दिया ॥ २२-२३ ॥
वनसे लौटनेपर ऋषिने सत्यवतीको देखकर कहा—
“अरी पापिनि ! तूने ऐसा क्या अकार्य किया है जिससे
तेरा शरीर ऐसा भयानक प्रतीत होता है ॥ २४-२५ ॥ अवश्य
ही तूने अपनी माताके लिये तैयार किये चरुका उपयोग
किया है, सो ठीक नहीं है ॥ २६ ॥ मैंने उसमें सम्पूर्ण
ऐश्वर्य, पराक्रम, शूरता और बलकी सम्पत्तिका आरोपण
किया था तथा तेरेमें शान्ति, ज्ञान, तितिक्षा आदि सम्पूर्ण
ब्राह्मणोचित गुणोंका समावेश किया था ॥ २७ ॥ उनका
विपरीत उपयोग करनेसे तेरे अति भयानक अस्त्र-शस्त्रधारी
पालन-कर्ममें तत्पर क्षत्रियके समान आचरणवाला पुत्र
होगा और उसके शान्तिप्रिय ब्राह्मणाचारयुक्त पुत्र होगा।”
यह सुनते ही सत्यवतीने उनके चरण पकड़ लिये और
प्रणाम करके कहा— ॥ २८-२९ ॥ “भगवन् ! अज्ञानसे ही
मैंने ऐसा किया है, अतः प्रसन्न होइये और ऐसा कीजिये
जिससे मेरा पुत्र ऐसा न हो, भले ही पौत्र ऐसा हो जाय!”
इसपर मुनिने कहा—'ऐसा ही हो।' ॥ ३०-३१ ॥

अ० ८ ] * चतुर्थ अंश * २६७

अनन्तरं च सा जमदग्निमजीजनत् ॥ ३२ ॥ तन्माता च विश्वामित्रं जनयामास ॥ ३३ ॥ सत्यवत्यपि कौशिकी नाम नद्यभवत् ॥ ३४ ॥तदनन्तर उसने जमदग्निको जन्म दिया और उसकी माताने विश्वामित्रको उत्पन्न किया तथा सत्यवती कौशिकी नामकी नदी हो गयी ॥ ३२–३४ ॥
जमदग्निरिक्ष्वाकुवंशोद्भवस्य रेणोस्तनयां रेणुकामुपयेमे ॥ ३५ ॥ तस्यां चाशेषक्षत्रहन्तारं परशुरामसंज्ञं भगवतस्सकललोकगुरोर्नारायणस्यांशं जमदग्निरजीजनत् ॥ ३६ ॥ विश्वामित्रपुत्रस्तु भार्गव एव शुनश्शेपो देवैर्दत्तः ततश्च देवरातनामाभवत् ॥ ३७ ॥ ततश्चान्ये मधुच्छन्दोधनञ्जयकृतदेवाष्टककच्छपहारीतकाख्या विश्वामित्रपुत्रा बभूवुः ॥ ३८ ॥ तेषां च बहूनि कौशिकगोत्राणि ऋष्यन्तरेषु विवाह्यान्यभवन् ॥ ३९ ॥जमदग्निने इक्ष्वाकुकुलोद्भव रेणुकी कन्या रेणुकासे विवाह किया ॥ ३५ ॥ उससे जमदग्निके सम्पूर्ण क्षत्रियोंका ध्वंस करनेवाले भगवान् परशुरामजी उत्पन्न हुए जो सकल लोक-गुरु भगवान् नारायणके अंश थे ॥ ३६ ॥ देवताओंने विश्वामित्रजीको भृगुवंशीय शुनःशेप पुत्ररूपसे दिया था। उसके पीछे उनके देवरात नामक एक पुत्र हुआ और फिर मधुच्छन्द, धनञ्जय, कृतदेव, अष्टक, कच्छप एवं हारीतक नामक और भी पुत्र हुए ॥ ३७-३८ ॥ उनसे अन्यान्य ऋषिवंशोंमें विवाहने योग्य बहुत-से कौशिकगोत्रीय पुत्र-पौत्रादि हुए ॥ ३९ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

काश्यवंशका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
पुरूरवसो ज्येष्ठः पुत्रो यस्तवायुर्नामा स राहोर्दुहितरमुपयेमे ॥ १ ॥ तस्यां च पञ्च पुत्रानुत्पादयामास ॥ २ ॥ नहुषक्षत्रवृद्धरम्भरजिसंज्ञास्तथैवानेनाः पञ्चमः पुत्रोऽभूत् ॥ ३ ॥ क्षत्रवृद्धात्सुहोत्रः पुत्रोऽभवत् ॥ ४ ॥ काश्यकाशगृत्समदास्त्रयस्तस्य पुत्रा बभूवुः ॥ ५ ॥ गृत्समदस्य शौनकश्चातुर्वर्ण्यप्रवर्तयिताभूत् ॥ ६ ॥आयु नामक जो पुरूरवाका ज्येष्ठ पुत्र था उसने राहुकी कन्यासे विवाह किया ॥ १ ॥ उससे उसके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम क्रमशः नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि और अनेना थे ॥ २–३ ॥ क्षत्रवृद्धके सुहोत्र नामक पुत्र हुआ और सुहोत्रके काश्य, काश तथा गृत्समद नामक तीन पुत्र हुए। गृत्समदका पुत्र शौनक चातुर्वर्ण्यका प्रवर्तक हुआ ॥ ४–६ ॥
काश्यस्य काशेयः काशिराजः तस्माद्राष्ट्रः, राष्ट्रस्य दीर्घतपाः पुत्रोऽभवत् ॥ ७ ॥ धन्वन्तरिस्तु दीर्घतपसः पुत्रोऽभवत् ॥ ८ ॥ स हि संसिद्धकार्यकरणस्सकलसम्भूतिष्वशेषज्ञानविद् भगवता नारायणेन चातीतसम्भूतौ तस्मै वरो दत्तः ॥ ९ ॥ काशिराजगोत्रेऽवतीर्य त्वमष्टधा सम्यगायूर्वेदं करिष्यसि यज्ञभागभुग्भविष्यसीति ॥ १० ॥काश्यका पुत्र काशिराज काशेय हुआ। उसके राष्ट्र, राष्ट्रके दीर्घतपा और दीर्घतपाके धन्वन्तरि नामक पुत्र हुआ ॥ ७-८ ॥ इस धन्वन्तरिके शरीर और इन्द्रियाँ जरा आदि विकारोंसे रहित थीं—तथा सभी जन्मोंमें यह सम्पूर्ण शास्त्रोंका जाननेवाला था। पूर्वजन्ममें भगवान् नारायणने उसे यह वर दिया था कि 'काशिराजके वंशमें उत्पन्न होकर तुम सम्पूर्ण आयुर्वेदको आठ भागोंमें विभक्त करोगे और यज्ञ-भागके भोक्ता होगे' ॥ ९-१० ॥

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२६८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ९
तस्य च धन्वन्तरेः पुत्रः केतुमान् केतुमतो भीमरथस्तस्यापि दिवोदासस्तस्यापि प्रतर्दनः ॥ ११ ॥ स च मद्रश्रेण्यवंशविनाशनादशेषशत्रवोऽनेन जिता इति शत्रुजिदभवत् ॥ १२ ॥ तेन च प्रीतिमदात्मपुत्रो वत्सवत्सेत्यभिहितो वत्सोऽभवत् ॥ १३ ॥ सत्यपरतया ऋतध्वजसंज्ञामवाप ॥ १४ ॥ ततश्च कुवलयनामानमश्वं लेभे ततः कुवलयाश्व इत्यस्यां पृथिव्यां प्रथितः ॥ १५ ॥ तस्य च वत्सस्य पुत्रोऽलर्कनामाभवद् यस्यायमद्यापि श्लोको गीयते ॥ १६ ॥<br>षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>अलर्कादपरो नान्यो बुभुजे मेदिनीं युवा ॥ १७<br>तस्याप्यलर्कस्य सन्नतिनामाभवदात्मजः ॥ १८ ॥ सन्नतेः सुनीथस्तस्यापि सुकेतुस्तस्माच्च धर्मकेतुर्जज्ञे ॥ १९ ॥ ततश्च सत्यकेतुस्तस्माद्विभुस्तत्तनयस्सुविभुस्ततश्च सुकुमारस्तस्यापि धृष्टकेतुस्ततश्च वीतिहोत्रस्तस्माद्भार्गो भार्गस्य भार्गभूमिस्ततश्चातुर्वर्ण्यप्रवृत्तिरित्येते काश्यभूभृतः कथिताः ॥ २० ॥ रजेस्तु सन्ततिः श्रूयताम् ॥ २१ ॥धन्वन्तरिका पुत्र केतुमान्, केतुमान्का भीमरथ, भीमरथका दिवोदास तथा दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन हुआ ॥ ११ ॥ उसने मद्रश्रेण्यवंशका नाश करके समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त की थी, इसलिये उसका नाम 'शत्रुजित्' हुआ ॥ १२ ॥ दिवोदासने अपने इस पुत्र (प्रतर्दन)-से अत्यन्त प्रेमवश 'वत्स, वत्स' कहा था, इसलिये इसका नाम 'वत्स' हुआ ॥ १३ ॥ अत्यन्त सत्यपरायण होनेके कारण इसका नाम 'ऋतध्वज' हुआ ॥ १४ ॥ तदनन्तर इसने कुवलय नामक अपूर्व अश्व प्राप्त किया। इसलिये यह इस पृथिवीतलपर 'कुवलयाश्व' नामसे विख्यात हुआ ॥ १५ ॥ इस वत्सके अलर्क नामक पुत्र हुआ जिसके विषयमें यह श्लोक आजतक गाया जाता है— ॥ १६ ॥<br>'पूर्वकालमें अलर्कके अतिरिक्त और किसीने भी छाछठ सहस्र वर्षतक युवावस्थामें रहकर पृथिवीका भोग नहीं किया' ॥ १७ ॥<br>उस अलर्कके भी सन्नति नामक पुत्र हुआ; सन्नतिके सुनीथ, सुनीथके सुकेतु, सुकेतुके धर्मकेतु, धर्मकेतुके सत्यकेतु, सत्यकेतुके विभु, विभुके सुविभु, सुविभुके सुकुमार, सुकुमारके धृष्टकेतु, धृष्टकेतुके वीतिहोत्र, वीतिहोत्रके भार्ग और भार्गके भार्गभूमि नामक पुत्र हुआ; भार्गभूमिसे चातुर्वर्ण्यका प्रचार हुआ। इस प्रकार काश्यवंशके राजाओंका वर्णन हो चुका अब रजिकी सन्तानका विवरण सुनो ॥ १८–२१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


नवाँ अध्याय

महाराज रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र

श्रीपराशर उवाच<br>रजेस्तु पञ्च पुत्रशतान्यतुलबलपराक्रमसाराण्यासन् ॥ १ ॥ देवासुरसंग्रामारम्भे च परस्परवधेप्सवो देवाश्चासुराश्च ब्रह्माणमुपेत्य पप्रच्छुः ॥ २ ॥ भगवन्नस्माकमत्र विरोधे कतरः पक्षो जेता भविष्यतीति ॥ ३ ॥ अथाह भगवान् ॥ ४ ॥ येषामर्थे राजिरात्तायुधो योत्स्यति तत्पक्षो जेतेति ॥ ५ ॥**श्रीपराशरजी बोले—**रजिके अतुलित बल-पराक्रमशाली पाँच सौ पुत्र थे ॥ १ ॥ एक बार देवासुर-संग्रामके आरम्भमें एक-दूसरेको मारनेकी इच्छावाले देवता और दैत्योंने ब्रह्माजीके पास जाकर पूछा—"भगवन्! हम दोनोंके पारस्परिक कलहमें कौन-सा पक्ष जीतेगा?" ॥ २-३ ॥ तब भगवान् ब्रह्माजी बोले—"जिस पक्षकी ओरसे राजा रजि शस्त्र धारणकर युद्ध करेगा उसी पक्षकी विजय होगी" ॥ ४-५ ॥

अ० ९] * चतुर्थ अंश * २६१

अथ दैत्यैरुपैत्य राजिरात्मसाहाय्यादानायाभ्यर्थितः प्राह॥ ६॥ योत्स्येऽहं भवदर्थे यद्यहममरजयाद्भवतामिन्द्रो भविष्यामीत्याकर्ण्यैतत्तैरभिहितम् ॥ ७॥ न वयमन्यथा वदिष्यामोऽन्यथा करिष्यामोऽस्माकमिन्द्रः प्रह्लादस्तदर्थमेवायमुद्यम इत्युक्त्वा गतेष्वसुरेषु देवैरप्यसाववनिपतिरेवमेवोक्तस्तेनापि च तथैवोक्ते देवैरिन्द्रस्त्वं भविष्यसीति समन्वीप्सितम् ॥ ८ ॥तब दैत्यों ने जाकर रजि से अपनी सहायता के लिये प्रार्थना की, इस पर रजि बोले- ॥ ६ ॥ "यदि देवताओं को जीतने पर मैं आपलोगों का इन्द्र हो सकूँ तो आपके पक्ष में लड़ सकता हूँ॥ ७॥ यह सुनकर दैत्यों ने कहा- "हमलोग एक बात कहकर उसके विरुद्ध दूसरी तरह का आचरण नहीं करते। हमारे इन्द्र तो प्रह्लाद जी हैं और उन्हीं के लिये हमारा यह सम्पूर्ण उद्योग है", ऐसा कहकर जब दैत्यगण चले गये तो देवताओं ने भी आकर राजा से उसी प्रकार प्रार्थना की और उनसे भी उसने वही बात कही। तब देवताओं ने यह कहकर कि 'आप ही हमारे इन्द्र होंगे' उसकी बात स्वीकार कर ली॥ ८ ॥
रजिनापि देवसैन्यसहायनानेकैर्महास्त्रैस्तदशेषमहासुरबलं निष्षूदितम् ॥ ९॥ अथ जितारिपक्षश्च देवेन्द्रो रजिचरणयुगलमात्मनः शिरसा निपीड्याह ॥ १० ॥ भयत्राणान्नदानाद्द्रवानस्मत्पिताऽशेषलोकानामुत्तमोत्तमो भवान् यस्याहं पुत्रस्त्रिलोकेन्द्रः ॥ ११॥अतः रजि ने देव-सेना की सहायता करते हुए अनेक महान् अस्त्रों से दैत्यों की सम्पूर्ण सेना नष्ट कर दी॥ ९॥ तदनन्तर शत्रु-पक्ष को जीत चुकने पर देवराज इन्द्र ने रजि के दोनों चरणों को अपने मस्तक पर रखकर कहा- ॥ १०॥ 'भय से रक्षा करने और अन्न-दान देने के कारण आप हमारे पिता हैं, आप सम्पूर्ण लोकों में सर्वोत्तम हैं; क्योंकि मैं त्रिलोकेन्द्र आपका पुत्र हूँ' ॥ ११ ॥
स चापि राजा प्रहस्याह ॥ १२॥ एवमस्त्वेवमस्त्वनतिक्रमणीया हि वैरिपक्षादप्यनेकविधचाटुवाक्यगर्भा प्रणतिरित्युक्त्वा स्वपुरं जगाम ॥ १३ ॥इस पर राजा ने हँसकर कहा-'अच्छा, ऐसा ही सही। शत्रु पक्ष की भी नाना प्रकार की चाटुवाक्ययुक्त अनुनय-विनय का अतिक्रमण करना उचित नहीं होता [फिर स्वपक्ष की तो बात ही क्या है]।' ऐसा कहकर वे अपनी राजधानी को चले गये ॥ १२-१३ ॥
शतक्रतुरपीन्द्रत्वं चकार ॥ १४ ॥ स्वर्गते तु रजौ नारदर्षिचोदिता रजिपुत्राश्शतक्रतुमात्मपितृपुत्रं समाचाराद्राज्यं याचितवन्तः ॥ १५ ॥ अप्रदानेन च विजित्येन्द्रमतिबलिनः स्वयमिन्द्रत्वं चक्रुः ॥ १६ ॥इस प्रकार शतक्रतु ही इन्द्र-पद पर स्थित हुआ। पीछे, रजि के स्वर्गवासी होने पर देवर्षि नारद जी की प्रेरणा से रजि के पुत्रों ने अपने पिता के पुत्रभाव को प्राप्त हुए शतक्रतु से व्यवहार के अनुसार अपने पिता का राज्य माँगा ॥ १४-१५ ॥ किन्तु जब उसने न दिया, तो उन महाबलवान् रजि-पुत्रों ने इन्द्र को जीतकर स्वयं ही इन्द्र-पद का भोग किया ॥ १६ ॥
ततश्च बहुतिथे काले ह्यतीते बृहस्पतिमेकान्ते दृष्ट्वा अपहृतत्रैलोक्ययज्ञभागः शतक्रतुरुवाच ॥ १७ ॥ बदरीफलमात्रमप्यर्हसि ममाप्यायनाय पुरोडाशखण्डं दातुमित्युक्तो बृहस्पतिरुवाच ॥ १८॥ यद्येवं त्वयाहं पूर्वमेव चोदितस्स्यां तन्मया त्वदर्थं किमकत्र्त्तव्यमित्यल्पैरेवाहोभिस्त्वां निजं पदं प्रापयिष्यामीत्यभिधाय तेषामनुदिनमाभिचारिकं बुद्धिमोहाय शक्रस्य तेजोऽभिवृद्धये जुहाव ॥ १९ ॥फिर बहुत-सा समय बीत जाने पर एक दिन बृहस्पति जी को एकान्त में बैठे देख त्रिलोकी के यज्ञभाग से वंचित हुए शतक्रतु ने उनसे कहा- ॥ १७ ॥ क्या 'आप मेरी तृप्ति के लिये एक बेर के बराबर भी पुरोडाशखण्ड मुझे दे सकते हैं?' उनके ऐसा कहने पर बृहस्पति जी बोले- ॥ १८ ॥ 'यदि ऐसा है, तो पहले ही तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा? तुम्हारे लिये भला मैं क्या नहीं कर सकता? अच्छा, अब थोड़े ही दिनों में मैं तुम्हें अपने पद पर स्थित कर दूँगा।' ऐसा कह बृहस्पति जी रजि-पुत्रों की बुद्धिको मोहित करने के लिये अभिचार और इन्द्र की तेजोवृद्धि के लिये हवन करने लगे॥ १९॥

२७० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०


ते चापि तेन बुद्धिमोहेनाभिभूयमाना ब्रह्मद्विषो धर्मत्यागिनो वेदवादपराङ्मुखा बभूवुः ॥ २० ॥ ततस्तानपेतधर्माचारानिन्द्रो जघान ॥ २१ ॥ पुरोहिताप्यायिततेजाश्च शक्रो दिवमाक्रमत् ॥ २२ ॥

एतदिन्द्रस्य स्वपदच्यवनादारोहणं श्रुत्वा पुरुषः स्वपदभ्रंशं दौरात्म्यं च नाप्नोति ॥ २३ ॥

रम्भस्त्वनपत्योऽभवत् ॥ २४ ॥ क्षत्रवृद्धसुतः प्रतिक्षत्रोऽभवत् ॥ २५ ॥ तत्पुत्रः सञ्जयस्तस्यापि जयस्तस्यापि विजयस्तस्माच्च जज्ञे कृतः ॥ २६ ॥ तस्य च हर्यधनो हर्यधनसुतस्सहदेवस्तस्माददीनस्तस्य जयसेनस्ततश्च संस्कृतिस्तत्पुत्रः क्षत्रधर्मा इत्येते क्षत्रवृद्धस्य वंश्याः ॥ २७ ॥ ततो नहुषवंशं प्रवक्ष्यामि ॥ २८ ॥

बुद्धिको मोहित करनेवाले उस अभिचार-कर्मसे अभिभूत हो जानेके कारण रजि-पुत्र ब्राह्मण-विरोधी, धर्म-त्यागी और वेद-विमुख हो गये ॥ २० ॥ तब धर्माचारहीन हो जानेसे इन्द्रने उन्हें मार डाला ॥ २१ ॥ और पुरोहितजीके द्वारा तेजोवृद्ध होकर स्वर्गपर अपना अधिकार जमा लिया ॥ २२ ॥

इस प्रकार इन्द्रके अपने पदसे गिरकर उसपर फिर आरूढ़ होनेके इस प्रसंगको सुननेसे पुरुष अपने पदसे पतित नहीं होता और उसमें कभी दुष्टता नहीं आती ॥ २३ ॥

[आयुका दूसरा पुत्र] रम्भ सन्तानहीन हुआ ॥ २४ ॥ क्षत्रवृद्धका पुत्र प्रतिक्षत्र हुआ, प्रतिक्षत्रका संजय, संजयका जय, जयका विजय, विजयका कृत, कृतका हर्यधन, हर्यधनका सहदेव, सहदेवका अदीन, अदीनका जयसेन, जयसेनका संस्कृति और संस्कृतिका पुत्र क्षत्रधर्मा हुआ। ये सब क्षत्रवृद्धके वंशज हुए ॥ २५—२७ ॥ अब मैं नहुषवंशका वर्णन करूँगा ॥ २८ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥


दसवाँ अध्याय

ययातिका चरित्र

श्रीपराशर उवाच
यतिययातिसंयात्यायातिवियातिकृतिसंज्ञा नहुषस्य षट् पुत्रा महाबलपराक्रमा बभूवुः ॥ १ ॥ यतिस्तु राज्यं नैच्छत् ॥ २ ॥ ययातिस्तु भूपद्भवत् ॥ ३ ॥ उशनसश्च दुहितरं देवयानीं वार्षपर्वणीं च शर्मिष्ठामुपयेमे ॥ ४ ॥ अत्रानुवंशश्लोको भवति ॥ ५ ॥
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ६
काव्यशापाच्चाकालेनैव ययातिर्जरामवाप ॥ ७ ॥ प्रसन्नशुक्रवचनाच्च स्वजरां सङ्क्रामयितुं ज्येष्ठं पुत्रं यदुमुवाच ॥ ८ ॥ वत्स त्वन्मातामहशापादियमकालेनैव जरा ममोपस्थिता तामहं तस्यैवानुग्रहाद्भवतस्सञ्चारयामि ॥ ९ ॥

श्रीपराशरजी बोले— नहुषके यति, ययाति, संयाति, आयाति, वियाति और कृति नामक छः महाबल-विक्रमशाली पुत्र हुए ॥ १ ॥ यतिने राज्यकी इच्छा नहीं की, इसलिये ययाति ही राजा हुआ ॥ २-३ ॥ ययातिने शुक्राचार्यजीकी पुत्री देवयानी और वृषपर्वाकी कन्या शर्मिष्ठासे विवाह किया था ॥ ४ ॥ उनके वंशके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ ५ ॥
'देवयानीने यदु और तुर्वसुको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरुको उत्पन्न किया' ॥ ६ ॥
ययातिको शुक्राचार्यजीके शापसे असमय ही वृद्धावस्थाने घेर लिया था ॥ ७ ॥ पीछे शुक्रजीके प्रसन्न होकर कहनेपर उन्होंने अपनी वृद्धावस्थाको ग्रहण करनेके लिये बड़े पुत्र यदुसे कहा— ॥ ८ ॥ 'वत्स ! तुम्हारे नानाजीके शापसे मुझे असमयमें ही वृद्धावस्थाने घेर लिया है, अब उन्हींकी कृपासे मैं उसे तुमको देना चाहता हूँ ॥ ९ ॥

अ० १० ] * चतुर्थ अंश * २७१


  एकं वर्षसहस्रमतृप्तोऽस्मि विषयेषु त्वद्वयसा विषयान्हं भोक्तुमिच्छामि ॥ १० ॥ नात्र भवता प्रत्याख्यानं कर्त्तव्यमित्युक्तस्स यदुर्नैच्छत्तां जरामादातुम् ॥ ११ ॥ तं च पिता शशाप त्वत्प्रसूतिर्न राज्यार्हा भविष्यतीति ॥ १२ ॥<br>  अनन्तरं च तुर्वसुं द्रुह्युमनुं च पृथिवीपतिर्जराग्रहणार्थं स्वयौवनप्रदानाय चाभ्यर्थयामास ॥ १३ ॥ तैरप्येकैकेन प्रत्याख्यातस्ताञ्छशाप ॥ १४ ॥ अथ शर्मिष्ठातनयमशेषकनीयांसं पूरुं तथैवाह ॥ १५ ॥ स चातिप्रवणमतिः सबहुमानं पितरं प्रणम्य महाप्रसादोऽयमस्माकमित्युदारमभिधाय जरां जग्राह ॥ १६ ॥ स्वकीयं च यौवनं स्वपित्रे ददौ ॥ १७ ॥<br>  सोऽपि पौरवं यौवनमासाद्य धर्माविरोधेन यथाकामं यथाकालोपपन्नं यथोत्साहं विषयांश्चचार ॥ १८ ॥ सम्यक् च प्रजापालनमकरोत् ॥ १९ ॥ विश्वाच्या देवयान्या च सहोपभोगं भुक्त्वा कामाना मन्तं प्राप्स्यामीत्यनुदिनं उन्मनस्को बभूव ॥ २० ॥ अनुदिनं चोपभोगतः कामानतिरम्यान्मेने ॥ २१ ॥ ततश्चैवमगायत ॥ २२ ॥<br>न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।<br>हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्द्धते ॥ २३<br>यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।<br>एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ॥ २४<br>यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् ।<br>समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वास्सुखमया दिशः ॥ २५<br>या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।<br>तां तृष्णां सन्त्यजेत्प्राज्ञस्सुखैनैवाभिपूर्यते ॥ २६<br>जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।<br>धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यतः ॥ २७<br>पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः ।<br>तथाप्यनुदिनं तृष्णा मम तेषूपजायते ॥ २८  मैं अभी विषय-भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ, इसलिये एक सहस्र वर्षतक मैं तुम्हारी युवावस्थासे उन्हें भोगना चाहता हूँ॥ १०॥ इस विषयमें तुम्हें किसी प्रकारकी आनाकानी नहीं करनी चाहिये।' किन्तु पिताके ऐसा कहनेपर भी यदुने वृद्धावस्थाको ग्रहण करना न चाहा॥ ११॥ तब पिताने उसे शाप दिया कि तेरी सन्तान राज्य-पदके योग्य न होगी॥ १२॥<br>  फिर राजा ययातिने तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुसे भी अपना यौवन देकर वृद्धावस्था ग्रहण करनेके लिये कहा; तथा उनमेंसे प्रत्येकके अस्वीकार करनेपर उन्होंने उन सभीको शाप दे दिया॥ १३-१४॥ अन्तमें सबसे छोटे शर्मिष्ठाके पुत्र पूरुसे भी वही बात कही तो उसने अति नम्रता और आदरके साथ पिताको प्रणाम करके उदारतापूर्वक कहा—'यह तो हमारे ऊपर आपका महान् अनुग्रह है।' ऐसा कहकर पूरुने अपने पिताकी वृद्धावस्था ग्रहण कर उन्हें अपना यौवन दे दिया॥ १५—१७॥<br>  राजा ययातिने पूरुका यौवन लेकर समयानुसार प्राप्त हुए यथेच्छ विषयोंको अपने उत्साहके अनुसार धर्मपूर्वक भोगा और अपनी प्रजाका भली प्रकार पालन किया॥ १८-१९॥ फिर विश्वाची और देवयानीके साथ विविध भोगोंको भोगते हुए 'मैं कामनाओंका अन्त कर दूँगा'—ऐसे सोचते-सोचते वे प्रतिदिन [भोगोंके लिये] उत्कण्ठित रहने लगे॥ २०॥ और निरन्तर भोगते रहनेसे उन कामनाओंको अत्यन्त प्रिय मानने लगे; तदुपरान्त उन्होंने इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट किया॥ २१-२२॥<br>  'भोगोंकी तृष्णा उनके भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती, बल्कि घृताहुतिसे अग्निके समान वह बढ़ती ही जाती है॥ २३॥ सम्पूर्ण पृथिवीमें जितने भी धान्य, यव, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं वे सब एक मनुष्यके लिये भी सन्तोषजनक नहीं हैं, इसलिये तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये॥ २४॥ जिस समय कोई पुरुष किसी भी प्राणीके लिये पापमयी भावना नहीं करता, उस समय उस समदर्शीके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी हो जाती हैं॥ २५॥ दुर्मतियोंके लिये जो अत्यन्त दुस्त्यज है तथा वृद्धावस्थामें भी जो शिथिल नहीं होती, बुद्धिमान् पुरुष उस तृष्णाको त्यागकर सुखसे परिपूर्ण हो जाता है॥ २६॥ अवस्थाके जीर्ण होनेपर केश और दाँत तो जीर्ण हो जाते हैं किन्तु जीवन और धनकी आशाएँ उसके जीर्ण होनेपर भी नहीं जीर्ण होतीं ॥ २७ ॥ विषयोंमें आसक्त रहते हुए मुझे एक सहस्र वर्ष बीत गये, फिर भी नित्य ही उनमें मेरी कामना होती है ॥ २८ ॥

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२७२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११


तस्मादेतामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्‍याधाय मानसम्।
निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैस्सह॥ २९

श्रीपराशर उवाच
पूरोस्सकाशादादाय जरां दत्त्वा च यौवनम्।
राज्येऽभिषिच्य पूरुं च प्रययौ तपसे वनम्॥ ३०
दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं च समादिशत्।
प्रतीच्यां च तथा द्रुह्युं दक्षिणायां ततो यदुम्॥ ३१
उदीच्यां च तथैवानुं कृत्वा मण्डलिनो नृपान्।
सर्वपृथ्वीपतिं पूरुं सोऽभिषिच्य वनं ययौ॥ ३२

अतः अब मैं इसे छोड़कर और अपने चित्तको भगवान्‌में ही स्थिरकर निर्द्वन्द्व और निर्मम होकर [वनमें] मृगोंके साथ विचरूँगा॥ २९॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर राजा ययातिने पूरुसे अपनी वृद्धावस्था लेकर उसका यौवन दे दिया और उसे राज्य-पदपर अभिषिक्त कर वनको चले गये॥ ३०॥ उन्होंने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसुको, पश्चिममें द्रुह्युको, दक्षिणमें यदुको और उत्तरमें अनुको माण्डलिकपदपर नियुक्त किया; तथा पूरुको सम्पूर्ण भूमण्डलके राज्यपर अभिषिक्तकर स्वयं वनको चले गये॥ ३१-३२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे दशमोऽध्यायः॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

यदुवंशका वर्णन और सहस्रार्जुनका चरित्र

श्रीपराशर उवाच
अतः परं ययातेः प्रथमपुत्रस्य यदोर्वंशमहं कथयामि॥ १॥ यत्राशेषलोकनिवासो मनुष्य-सिद्धगन्धर्वयक्षराक्षसगुह्यककिंपुरुषाप्सरउरग-विहगदैत्यदानवादित्यरुद्रवस्वश्विमरुद्देवर्षिभि-र्मुमुक्षुभिर्धर्मार्थकाममोक्षार्थिभिश्च तत्तत्फल-लाभाय सदाभिष्टुतोऽपरिच्छेद्यमाहात्म्यांशेन भगवाननादिनिधनो विष्णुरवततार॥ २॥ अत्र श्लोकः॥ ३॥

यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति॥ ४

सहस्रजित्क्रोष्टुनलनहुषसंज्ञाश्चत्वारो यदुपुत्रा बभूवुः॥ ५॥ सहस्रजित्पुत्रश्शतजित्॥ ६॥ तस्य हैहयहेहयवेणुहयास्त्रयः पुत्रा बभूवुः॥ ७॥ हैहयपुत्रो धर्मस्तस्यापि धर्मनेत्रस्ततः कुन्तिः कुन्तेः सहजित्॥ ८॥ तत्तनयो महिष्मान् योऽसौ माहिष्मतीं पुरीं निवासयामास॥ ९॥ तस्माद्भद्रश्रेण्यस्ततो दुर्ददस्तस्माद्धनको धनकस्य कृतवीर्यकृताग्नि

**श्रीपराशरजी बोले—**अब मैं ययातिके प्रथम पुत्र यदुके वंशका वर्णन करता हूँ, जिसमें कि मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, किंपुरुष, अप्सरा, सर्प, पक्षी, दैत्य, दानव, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, देवर्षि, मुमुक्षु तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके अभिलाषी पुरुषोंद्वारा सर्वदा स्तुति किये जानेवाले, अखिललोक-विश्राम आद्यन्तहीन भगवान् विष्णुने अपने अपरिमित महत्त्वशाली अंशसे अवतार लिया था। इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—॥ १-३॥

‘जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्मने अवतार लिया था, उस यदुवंशका श्रवण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है’॥ ४॥

यदुके सहस्रजित्, क्रोष्टु, नल और नहुष नामक चार पुत्र हुए। सहस्रजित्‌के शतजित् और शतजित्‌के हैहय, हेहय तथा वेणुहय नामक तीन पुत्र हुए॥ ५-७॥ हैहयका पुत्र धर्म, धर्मका धर्मनेत्र, धर्मनेत्रका कुन्ति, कुन्तिका सहजित् तथा सहजित्‌का पुत्र महिष्मान् हुआ, जिसने माहिष्मतीपुरीको बसाया॥ ८-९॥ महिष्मान्‌के भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यके दुर्दम, दुर्दमके धनक तथा धनकके


अ० ११]
* चतुर्थ अंश *
२७३


कृतधर्मकृतौजसश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः॥ १०॥
कृतवीर्यादर्जुनस्सप्तद्वीपाधिपतिर्बाहुसहस्रो जज्ञे॥ ११॥ योऽसौ भगवदंशमत्रिकुलप्रसूतं दत्तात्रेयाख्यमाराध्य बाहुसहस्रमधर्मसेवानिवारणं स्वधर्मसेवित्वं रणे पृथिवीजयं धर्मतश्चानुपालनमरातिभ्योऽपराजयमखिलजगत्प्रख्यातपुरुषाच्च मृत्युमित्येतान्वरानभिलषिताँल्लेभे च॥ १२॥ तेनेयमशेषद्वीपवती पृथिवी सम्यक्परिपालिता॥ १३॥ दशयज्ञसहस्राण्यसावयजत्॥ १४॥ तस्य च श्लोकोऽद्यापि गीयते॥ १५॥

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः।
यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रयेण श्रुतेन च॥ १६

अनष्टद्रव्यता च तस्य राज्येऽभवत्॥ १७॥ एवं च पञ्चाशीतिवर्षसहस्राण्यव्याहतारोग्यश्रीबलपराक्रमो राज्यमकरोत्॥ १८॥ माहिष्मत्यां दिग्विजयमभ्यागतो नर्मदाजलावगाहनक्रीडातिपानमदाकुलेनायत्नेनैव तेनाशेषदेवदैत्यगन्धर्वेशजयोद्भूतमदावलेपोऽपि रावणः पशुरिव बद्ध्वा स्वनगरैकान्ते स्थापितः॥ १९॥ यश्च पञ्चाशीतिवर्षसहस्रोपलक्षणकालावसाने भगवन्नारायणांशेन परशुरामेणोपसंहृतः॥ २०॥ तस्य च पुत्रशतप्रधानाः पञ्च पुत्रा बभूवुः शूरशूरसेनवृषसेनमधुजयध्वजसंज्ञाः॥ २१॥

जयध्वजात्तालजङ्घः पुत्रोऽभवत्॥ २२॥ तालजङ्घस्य तालजङ्घाख्यं पुत्रशतमासीत्॥ २३॥ एषां ज्येष्ठो वीतिहोत्रस्तथान्यौ भरतः॥ २४॥ भरताद्वृषः॥ २५॥ वृषस्य पुत्रो मधुरभवत्॥ २६॥ तस्यापि वृष्णिप्रमुखं पुत्रशतमासीत्॥ २७॥ यतो वृष्णिसंज्ञामेतद्गोत्रमवाप॥ २८॥ मधुसंज्ञाहेतुश्च मधुरभवत्॥ २९॥ यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति॥ ३०॥


हिन्दी अनुवाद

कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतधर्म और कृतौजा नामक चार पुत्र हुए॥ १०॥

कृतवीर्यके सहस्र भुजाओंवाले सप्तद्वीपाधिपति अर्जुनका जन्म हुआ॥ ११॥ सहस्रार्जुनने अत्रिकुलमें उत्पन्न भगवदंशरूप श्रीदत्तात्रेयजीकी उपासना कर 'सहस्र भुजाएँ, अधर्माचरणका निवारण, स्वधर्मका सेवन, युद्धके द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विजय, धर्मानुसार प्रजा-पालन, शत्रुओंसे अपराजय तथा त्रिलोकप्रसिद्ध पुरुषसे मृत्यु'—ऐसे कई वर माँगे और प्राप्त किये थे॥ १२॥ अर्जुनने इस सम्पूर्ण सप्तद्वीपवती पृथिवीका पालन तथा दस हजार यज्ञोंका अनुष्ठान किया था॥ १३-१४॥ उसके विषयमें यह श्लोक आजतक कहा जाता है—॥ १५॥

'यज्ञ, दान, तप, विनय और विद्यामें कार्तवीर्य—सहस्रार्जुनकी समता कोई भी राजा नहीं कर सकता'॥ १६॥

उसके राज्यमें कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता था॥ १७॥ इस प्रकार उसने बल, पराक्रम, आरोग्य और सम्पत्तिको सर्वथा सुरक्षित रखते हुए पचासी हजार वर्ष राज्य किया॥ १८॥ एक दिन जब वह अतिशय मद्य-पानसे व्याकुल हुआ नर्मदा नदीमें जल-क्रीडा कर रहा था, उसकी राजधानी माहिष्मतीपुरीपर दिग्विजयके लिये आये हुए सम्पूर्ण देव, दानव, गन्धर्व और राजाओंके विजयमदसे उन्मत्त रावणने आक्रमण किया, उस समय उसने अनायास ही रावणको पशुके समान बाँधकर अपने नगरके एक निर्जन स्थानमें रख दिया॥ १९॥ इस सहस्रार्जुनका पचासी हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् नारायणके अंशावतार परशुरामजीने वध किया था॥ २०॥ इसके सौ पुत्रोंमेंसे शूर, शूरसेन, वृषसेन, मधु और जयध्वज—ये पाँच प्रधान थे॥ २१॥

जयध्वजका पुत्र तालजंघ हुआ और तालजंघके तालजंघ नामक सौ पुत्र हुए इनमें सबसे बड़ा वीतिहोत्र तथा दूसरा भरत था॥ २२-२४॥ भरतके वृष, वृषके मधु और मधुके वृष्णि आदि सौ पुत्र हुए॥ २५-२७॥ वृष्णिके कारण यह वंश वृष्णि कहलाया॥ २८॥ मधुके कारण इसकी मधु-संज्ञा हुई॥ २९॥ और यदुके नामानुसार इस वंशके लोग यादव कहलाये॥ ३०॥


इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥

२७४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२

बारहवाँ अध्याय यदुपुत्र क्रोष्टुका वंश

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—यदुपुत्र क्रोष्टुके ध्वजिनीवान्
**क्रोष्टोस्तु यदुपुत्रस्यात्मजो ध्वजिनीवान् ॥ १ ॥ ततश्च स्वातिस्ततो रुशंकू रुशंकोश्चित्ररथः ॥ २ ॥ तत्त plan: तस्यनामक पुत्र हुआ ॥ १ ॥ उसके स्वाति, स्वातिके रुशंकु, रुशंकुके चित्ररथ और चित्ररथके शशिबिन्दु नामक पुत्र हुआ जो चौदहों महारत्नोंका* स्वामी तथा चक्रवर्ती सम्राट् था ॥ २-३ ॥ शशिबिन्दुके एक लाख स्त्रियाँ और दस लाख पुत्र थे ॥ ४-५ ॥ उनमें पृथुश्रवा, पृथुकर्मा, पृथुकीर्ति, पृथुयशा, पृथुजय और पृथुदान—ये छः पुत्र प्रधान थे ॥ ६ ॥ पृथुश्रवाका पुत्र पृथुतम और उसका पुत्र उशना हुआ जिसने सौ अश्वमेध-यज्ञ किया था ॥ ७-८ ॥ उशनाके शितपु नामक पुत्र हुआ ॥ ९ ॥ शितपुके रुक्मकवच, रुक्मकवचके परावृत् तथा परावृत्‌के रुक्मेषु, पृथु, ज्यामघ, वलित और हरित नामक पाँच पुत्र हुए ॥ १०-११ ॥ इनमेंसे ज्यामघके विषयमें अब भी यह श्लोक गाया जाता है— ॥ १२ ॥
तन्तनयश्शशिबिन्दुश्चतुर्दशमहारत्नेशश्चक्रवर्त्यभवत् ॥ ३ ॥ तस्य च शतसहस्रं पत्नीनामभवत् ॥ ४ ॥ दशलक्षसंख्याश्च पुत्राः ॥ ५ ॥ तेषां च पृथुश्रवाः पृथुकर्मा पृथुकीर्तिः पृथुयशाः पृथुजयः पृथुदानः षट् पुत्राः प्रधानाः ॥ ६ ॥ पृथुश्रवसश्च पुत्रः पृथुतमः ॥ ७ ॥ तस्मादुशना यो वाजिमेधानां शतमाजहार ॥ ८ ॥ तस्य च शितपुर्नाम पुत्रोऽभवत् ॥ ९ ॥ तस्यापि रुक्मकवचस्ततः परावृत् ॥ १० ॥ परावृतो रुक्मेषुपृथुज्यामघवलितहरितसंज्ञास्तस्य पञ्चात्मजा बभूवुः ॥ ११ ॥ तस्यायमद्यापि ज्यामघस्य श्लोको गीयते ॥ १२ ॥

भार्यावश्यास्तु ये केचिद्भविष्यन्त्यथ वा मृताः।
तेषां तु ज्यामघः श्रेष्ठश्शैव्यापतिरभून्नृपः ॥ १३
संसारमें स्त्रीके वशीभूत जो-जो लोग होंगे और जो-जो पहले हो चुके हैं उनमें शैव्याका पति राजा ज्यामघ ही सर्वश्रेष्ठ है ॥ १३ ॥ उसकी स्त्री शैव्या यद्यपि निःसन्तान थी तथापि सन्तानकी इच्छा रहते हुए भी उसने उसके भयसे दूसरी स्त्रीसे विवाह नहीं किया ॥ १४ ॥

अपुत्रा तस्य सा पत्नी शैव्या नाम तथाप्यसौ।
अपत्यकामोऽपि भयान्नान्यां भार्यामविन्दत ॥ १४
एक दिन बहुत-से रथ, घोड़े और हाथियोंके संघट्टसे अत्यन्त भयानक महायुद्धमें लड़ते हुए उसने अपने समस्त शत्रुओंको जीत लिया ॥ १५ ॥

स त्वेकदा प्रभूतरथतुरंगगजसम्मर्दातिदारुणे महाहवे युद्ध्यमानः सकलमेवारिचक्रमजयत् ॥ १५


* धर्मसंहितामें चौदह रत्नोंका उल्लेख इस प्रकार किया है—
‘चक्रं रथो मणिः खड्गश्चर्म रत्नं च पञ्चमम्। केतुर्निधिश्च सप्तैव प्राणहीनानि चक्षते॥
भार्या पुरोहितश्चैव सेनानी रथकृच्च यः। पत्त्यश्वकलभाश्चेति प्राणिनः सप्त कीर्तिताः॥
चतुर्दशेति रत्नानि सर्वेषां चक्रवर्तिनाम्।’
अर्थात् चक्र, रथ, मणि, खड्ग, चर्म (ढाल), ध्वजा और निधि (खजाना)—ये सात प्राणहीन तथा स्त्री, पुरोहित, सेनापति, रथी, पदाति, अश्वारोही और गजारोही—ये सात प्राणयुक्त इस प्रकार कुल चौदह रत्न सब चक्रवर्त्तियोंके यहाँ रहते हैं।

अ० १२ ] * चतुर्थ अंश * २७५


संस्कृत मूल पाठहिन्दी अनुवाद
तच्चारिचक्रमपास्तपुत्रकलत्रबन्धुबलकोशं स्वमधिष्ठानं परित्यज्य दिशः प्रति विद्रुतम् ॥ १६ ॥<br>तस्मिंश्च विद्रुतेऽतित्रासलोलायतलोचनयुगलं त्राहि त्राहि मां ताताम्ब भ्रातरित्याकुलविलापविधुरं स राजकन्यरत्नमद्राक्षीत् ॥ १७ ॥ तद्दर्शनाच्च तस्यामनुरागानुगतानन्तरात्मा स नृपोऽचिन्तयत् ॥ १८ ॥ साध्विदं ममापत्यरहितस्य वन्ध्याभर्तुः साम्प्रतं विधिनापत्यकारणं कन्यरत्नमुपपादितम् ॥ १९ ॥ तदेतत्समुद्वहामीति ॥ २० ॥<br>अथवैनां स्यन्दनमारोप्य स्वमधिष्ठानं नयामि ॥ २१ ॥ तयैव देव्या शैव्यायाहमनुज्ञातस्समुद्वहामीति ॥ २२ ॥<br>अथैनां रथमारोप्य स्वनगरमगच्छत् ॥ २३ ॥<br>विजयिनं च राजानमशेषपौरभृत्यपरिजनामात्यसमेता शैव्या द्रष्टुमधिष्ठानद्वारमागता ॥ २४ ॥<br>सा चावलोक्य राज्ञः सव्यपार्श्ववर्त्तिनीं कन्यामीषदुद्धूतामर्षस्फुरदधरपल्लवा राजानमवोचत् ॥ २५ ॥ अतिचपलचित्तात्र स्यन्दने केयमारोपितेति ॥ २६ ॥ असावप्यनालोचितोत्तरवचनोऽतिभयात्तामाह स्नुषा ममेयमिति ॥ २७ ॥<br>अथैनं शैव्योवाच ॥ २८ ॥<br>नाहं प्रसूता पुत्रेण नान्या पत्न्यभवत्तव।<br>स्नुषासम्बन्धता ह्येषा कतमेन सुतेन ते ॥ २९ ॥<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्यात्मेर्ष्याकोपकलुषितावचनमुषितविवेको भयादुरुक्तपरिहारार्थमिदमवनीपतिराह ॥ ३० ॥<br>यस्ते जनिष्यत आत्मजस्तस्येयमनागतस्यैव भार्या निरूपितेत्याकर्ण्योद्भूतमृदुहासा तथेत्याह ॥ ३१ ॥ प्रविवेश च राज्ञा सहाधिष्ठानम् ॥ ३२ ॥<br>अनन्तरं चातिशुद्धलग्नहोरांशकावयवोक्तकृतपुत्रजन्मलाभगुणाढ्यसः परिणाममुपगतापिउस समय वे समस्त शत्रुगण पुत्र, मित्र, स्त्री, सेना और कोशादिसे हीन होकर अपने-अपने स्थानोंको छोड़कर दिशा-विदिशाओंमें भाग गये ॥ १६ ॥ उनके भाग जानेपर उसने एक राजकन्याको देखा जो अत्यन्त भयसे कातर हुई विशाल आँखोंसे [देखती हुई] 'हे तात, हे मात:, हे भ्रातः! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' इस प्रकार व्याकुलतापूर्वक विलाप कर रही थी ॥ १७ ॥ उसको देखते ही उसमें अनुरक्तचित्त हो जानेसे राजाने विचार किया ॥ १८ ॥ 'यह अच्छा ही हुआ; मैं पुत्रहीन और वन्ध्याका पति हूँ; ऐसा मालूम होता है कि सन्तानकी कारणरूपा इस कन्यारत्नको विधाताने ही इस समय यहाँ भेजा है ॥ १९ ॥ तो फिर मुझे इससे विवाह कर लेना चाहिये ॥ २० ॥ अथवा इसे अपने रथपर बैठाकर अपने निवासस्थानको लिये चलता हूँ, वहाँ देवी शैव्याकी आज्ञा लेकर ही इससे विवाह कर लूँगा' ॥ २१-२२ ॥<br>तदनन्तर वे उसे रथपर चढ़ाकर अपने नगरको ले चले ॥ २३ ॥ वहाँ विजयी राजाके दर्शनके लिये सम्पूर्ण पुरवासी, सेवक, कुटुम्बीजन और मन्त्रिवर्गके सहित महारानी शैव्या नगरके द्वारपर आयी हुई थी ॥ २४ ॥ उसने राजाके वामभागमें बैठी हुई राजकन्याको देखकर क्रोधके कारण कुछ काँपते हुए होठोंसे कहा— ॥ २५ ॥ 'हे अति चपलचित्त! तुमने रथमें यह किसे बैठा रखी है?' ॥ २६ ॥ राजाको भी जब कोई उत्तर न सूझा तो अत्यन्त डरते-डरते कहा— "यह मेरी पुत्रवधू है।" ॥ २७ ॥ तब शैव्या बोली— ॥ २८ ॥<br>"मेरे तो कोई पुत्र हुआ नहीं है और आपके दूसरी कोई स्त्री भी नहीं है, फिर किस पुत्रके कारण आपका इससे पुत्रवधूका सम्बन्ध हुआ?" ॥ २९ ॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार शैव्याके ईर्ष्या और क्रोध-कलुषित वचनोंसे विवेकहीन होकर भयके कारण कही हुई असंबद्ध बातके सन्देहको दूर करनेके लिये राजाने कहा— ॥ ३० ॥ "तुम्हारे जो पुत्र होनेवाला है उस भावी शिशुकी मैंने यह पहलेसे ही भार्या निश्चित कर दी है।" यह सुनकर रानीने मधुर मुसकानके साथ कहा— 'अच्छा, ऐसा ही हो' और राजाके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥ ३१-३२ ॥<br>तदनन्तर पुत्र-लाभके गुणोंसे युक्त उस अति विशुद्ध लग्न होरांशक अवयवके समय हुए पुत्रजन्मविषयक वार्तालापके प्रभावसे गर्भधारणके योग्य अवस्था न

२७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

शैव्या स्वल्पैरेवाहोभिर्गर्भमवाप॥ ३३॥ कालेन च कुमारमजीजनत्॥ ३४॥ तस्य च विदर्भ इति पिता नाम चक्रे॥ ३५॥ स च तां स्नुषामुपयेमे ॥ ३६॥ तस्यां चासौ क्रथकैशिकसंज्ञौ पुत्रावजनयत्॥ ३७॥ पुनश्च तृतीयं रोमपादसंज्ञं पुत्रमजीजनद्यो नारदादवाप्तज्ञानवानभवत्॥ ३८॥ रोमपादाइभूद्बध्रुर्बभ्रोर्धृतिर्धृतेः कैशिकः कैशिकस्यापि चेदिः पुत्रोऽभवद् यस्य सन्ततौ चैद्या भूपालाः ॥ ३९॥

क्रथस्य स्नुषापुत्रस्य कुन्तिर्भवत्॥ ४०॥ कुन्तेर्धृष्टिर्धृष्टेर्निधृतिर्निधृतेर्दशार्हस्ततश्च व्योमा तस्यापि जीमूतस्ततश्च विकृतिस्ततश्च भीमरथः, तस्मान्नवरथस्तस्यापि दशरथस्ततश्च शकुनिः, तत्तन्अयः करम्भिः करम्भेर्देवरातोऽभवत्॥ ४१॥ तस्माद्देवक्षत्रस्तस्यापि मधुर्मधोः कुमारवंशः कुमारवंशादनुरनोः पुरुमित्रः पृथिवीपतिरभवत् ॥ ४२॥ ततश्चांशुस्तस्माच्च सत्वतः॥ ४३॥ सत्वतादेते सात्वताः ॥ ४४॥ इत्येतां ज्यामघस्य सन्ततिं सम्यक् श्रद्धासमन्वितः श्रुत्वा पुमान् मैत्रेय स्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४५॥

रहनेपर भी थोड़े ही दिनोंमें शैव्याके गर्भ रह गया और यथासमय एक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ३३-३४॥ पिताने उसका नाम विदर्भ रखा॥ ३५॥ और उसीके साथ उस पुत्रवधूका पाणिग्रहण हुआ॥ ३६॥ उससे विदर्भने क्रथ और कैशिक नामक दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ३७॥ फिर रोमपाद नामक एक तीसरे पुत्रको जन्म दिया जो नारदजीके उपदेशसे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न हो गया था॥ ३८॥ रोमपादके बभ्रु, बभ्रुके धृति, धृतिके कैशिक और कैशिकके चेदि नामक पुत्र हुआ जिसकी सन्ततिमें चैद्य राजाओंने जन्म लिया॥ ३९॥

ज्यामघकी पुत्रवधूके पुत्र क्रथके कुन्ति नामक पुत्र हुआ॥ ४०॥ कुन्तिके धृष्टि, धृष्टिके निधृति, निधृतिके दशार्ह, दशार्हके व्योमा, व्योमाके जीमूत, जीमूतके विकृति, विकृतिके भीमरथ, भीमरथके नवरथ, नवरथके दशरथ, दशरथके शकुनि, शकुनिके करम्भि, करम्भिके देवरात, देवरातके देवक्षत्र, देवक्षत्रके मधु, मधुके कुमारवंश, कुमारवंशके अनु, अनुके राजा पुरुमित्र, पुरुमित्रके अंशु और अंशुके सत्वत नामक पुत्र हुआ तथा सत्वतसे सात्वतवंशका प्रादुर्भाव हुआ॥ ४१-४४॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार ज्यामघकी सन्तानका श्रद्धापूर्वक भली प्रकार श्रवण करनेसे मनुष्य अपने समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थऽशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा

श्रीपराशर उवाच

भजनभजमानदिव्यान्धकदेवावृधमहाभोजवृष्णिसंज्ञास्सत्वतस्य पुत्रा बभूवुः॥ १॥ भजमानस्य निमिकृकणवृष्णयस्तथान्ये द्वैमात्राः शतजित्सहस्रजिदयुतजित्संज्ञास्त्रयः॥ २॥ देवावृधस्यापि बभ्रुः पुत्रोऽभवत्॥ ३॥ तयोश्चायं श्लोको गीयते॥ ४॥

यथैव शृणुमो दूरात्सम्पश्यामस्तथान्तिकात्। बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधस्समः॥ ५

पुरुषाः षट् च षष्टिश्च षट् सहस्राणि चाष्ट च। तेऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि॥ ६

श्रीपराशरजी बोले— सत्वतके भजन, भजमान, दिव्य, अन्धक, देवावृध महाभोज और वृष्णि नामक पुत्र हुए॥ १॥ भजमानके निमि, कृकण और वृष्णि तथा इनके तीन सौतेले भाई शतजित्, सहस्रजित् और अयुतजित्-ये छः पुत्र हुए॥ २॥ देवावृधके बभ्रु नामक पुत्र हुआ॥ ३॥ इन दोनों (पिता-पुत्रों)-के विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है-॥ ४॥

'जैसा हमने दूरसे सुना था वैसा ही पास जाकर भी देखा; वास्तवमें बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध तो देवताओंके समान है॥ ५॥ बभ्रु और देवावृध [-के उपदेश किये हुए मार्गका अवलम्बन करने]-से क्रमशः छः हजार चौहत्तर (६०७४) मनुष्योंने अमरपद प्राप्त किया था'॥ ६॥

अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २७७


महाभोजस्त्वतिधर्मात्मा तस्यान्वये भोजा मृत्तिकावरपुरनिवासिनो मार्त्तिकावरा बभूवुः॥ ७॥ वृष्णेः सुमित्रो युधाजिच्च पुत्रावभूताम्॥ ८॥ ततश्चानमित्रस्तथानमित्रान्निघ्नः॥ ९॥ निघ्नस्य प्रसेनस्त्राजितौ ॥ १०॥

तस्य च सत्राजितो भगवानादित्यः सखाभवत् ॥ ११ ॥ एकदा त्वम्भोनिधितीरसंश्रयः सूर्य्यं सत्राजित्तुष्टाव तन्मनस्कतया च भास्वानभिस्तूयमानोऽग्रतस्तस्थौ ॥ १२ ॥ ततस्त्वस्पष्टमूर्त्तिधरं चैनमालोक्य सत्राजित्सूर्य्यमाह ॥ १३ ॥ यथैव व्योम्नि वह्निपिण्डोपमं त्वामहमपश्यं तथैवाद्याग्रतो गतमप्यत्र भगवता किञ्चिन्न प्रसादीकृतं विशेषमुपलक्षयामीत्येवमुक्ते भगवता सूर्येण निजकण्ठादुन्मुच्य स्यमन्तकं नाम महामणिवरमवतार्यैकान्ते न्यस्तम्॥ १४॥

ततस्तमाताम्रोज्ज्वलं ह्रस्ववपुषमीषदापिंगलनयनमादित्यमद्राक्षीत्॥ १५॥ कृतप्रणिपातस्तवादिकं च सत्राजितमाह भगवानादित्यस्सहस्रदीधितिर्वरमस्मत्तोऽभिमतं वृणीष्वेति ॥ १६ ॥ स च तदेव मणिरत्नमयाचत ॥ १७ ॥ स चापि तस्मै तद्दत्त्वा दीधितिपतिर्वियति स्वधिष्ण्यमारुरोह ॥ १८ ॥

सत्राजिदप्यमलमणिरत्नसनाथकण्ठतया सूर्य इव तेजोभिरशेषदिगन्तराण्युद्भासयन् द्वारकां विवेश ॥ १९ ॥ द्वारकावासी जनस्तु तमायान्तमवेक्ष्य भगवन्तमादिपुरुषं पुरुषोत्तममवनिभारावतरणायांशेन मानुषरूपधारिणं प्रणिपत्याह ॥ २०॥ भगवन् भवन्तं द्रष्टुं नूनमयमादित्य आयातीत्युक्तो भगवानुवाच ॥ २१ ॥ भगवान्नायमादित्यः सत्राजिदयमादित्यदत्तस्यमन्तकाख्यं महामणिरत्नं बिभ्रदत्रोपयाति ॥ २२ ॥ तदेनं विश्रब्धाः पश्यतेत्युक्तास्ते तथैव ददृशुः ॥ २३ ॥

स च तं स्यमन्तकमणिमात्मनिवेशने चक्रे ॥ २४॥


महाभोज बड़ा धर्मात्मा था, उसकी सन्तानमें भोजवंशी तथा मृत्तिकावरपुर निवासी मार्त्तिकावर नृपतिगण हुए॥ ७॥ वृष्णिके दो पुत्र सुमित्र और युधाजित् हुए, उनमेंसे सुमित्रके अनमित्र, अनमित्रके निघ्न तथा निघ्नसे प्रसेन और सत्राजित्का जन्म हुआ ॥ ८-१०॥

उस सत्राजित्के मित्र भगवान् आदित्य हुए ॥ ११ ॥ एक दिन समुद्र-तटपर बैठे हुए सत्राजित्ने सूर्यभगवान्की स्तुति की। उसके तन्मय होकर स्तुति करनेसे भगवान् भास्कर उसके सम्मुख प्रकट हुए ॥ १२ ॥ उस समय उनको अस्पष्ट मूर्ति धारण किये हुए देखकर सत्राजित्ने सूर्यसे कहा- ॥ १३ ॥ "आकाशमें अग्निपिण्डके समान आपको जैसा मैंने देखा है वैसा ही सम्मुख आनेपर भी देख रहा हूँ। यहाँ आपकी प्रसादस्वरूप कुछ विशेषता मुझे नहीं दीखती।" सत्राजित्के ऐसा कहनेपर भगवान् सूर्यने अपने गलेसे स्यमन्तक नामकी उत्तम महामणि उतारकर अलग रख दी ॥ १४॥

तब सत्राजित्ने भगवान् सूर्यको देखा-उनका शरीर किंचित् ताम्रवर्ण, अति उज्ज्वल और लघु था तथा उनके नेत्र कुछ पिंगलवर्ण थे ॥ १५ ॥ तदनन्तर सत्राजित्के प्रणाम तथा स्तुति आदि कर चुकनेपर सहस्रांशु भगवान् आदित्यने उससे कहा-"तुम अपना अभीष्ट वर माँगो" ॥ १६ ॥ सत्राजित्ने उस स्यमन्तकमणिको ही माँगा ॥ १७ ॥ तब भगवान् सूर्य उसे वह मणि देकर अन्तरिक्षमें अपने स्थानको चले गये ॥ १८ ॥

फिर सत्राजित्ने उस निर्मल मणिरत्नसे अपना कण्ठ सुशोभित होनेके कारण तेजसे सूर्यके समान समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए द्वारकामें प्रवेश किया ॥ १९ ॥ द्वारकावासी लोगोंने उसे आते देख, पृथिवीका भार उतारनेके लिये अंशरूपसे अवतीर्ण हुए मनुष्यरूपधारी आदिपुरुष भगवान् पुरुषोत्तमसे प्रणाम करके कहा- ॥ २० ॥ "भगवन्! आपके दर्शनोंके लिये निश्चय ही ये भगवान् सूर्यदेव आ रहे हैं" उनके ऐसा कहनेपर भगवान्ने उनसे कहा- ॥ २१ ॥ "ये भगवान् सूर्य नहीं हैं, सत्राजित् है। यह सूर्यभगवान्से प्राप्त हुई स्यमन्तक नामकी महामणिको धारणकर यहाँ आ रहा है ॥ २२ ॥ तुमलोग अब विश्वस्त होकर इसे देखो।" भगवान्के ऐसा कहनेपर द्वारकावासी उसे उसी प्रकार देखने लगे ॥ २३ ॥

सत्राजित्ने वह स्यमन्तकमणि अपने घरमें रख दी ॥ २४॥

२७८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

प्रतिदिनं तन्मणिरत्नमष्टौ कनकभारान्- स्रवति ॥ २५ ॥ तत्प्रभावाच्च सकलस्यैव राष्ट्रस्योपसर्गोनावृष्टिब्यालाग्नचोरदुर्भिक्षादिभयं न भवति ॥ २६ ॥ अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नमुग्रसेनस्य भूपतेर्योग्यमेतदिति लिप्सां चक्रे ॥ २७ ॥ गोत्रभेदभयाच्छक्तोऽपि न जहार ॥ २८ ॥

सत्राजिद्वप्यच्युतो मामेतद्याचयिष्यतीत्यवगम्य रत्नलोभाद्भ्रात्रे प्रसेनाय तद्रत्नमदात् ॥ २९ ॥ तच्च शुचिना ध्रियमाणमशेषमेव सुवर्णस्रवादिकं गुणजातमुत्पादयति अन्यथा धारयन्तमेव हन्ती- त्यजानन्नसावपि प्रसेनेनस्तेन कण्ठसक्तेन स्यमन्तके- नाश्वमारुह्याटव्यां मृगयामगच्छत् ॥ ३० ॥ तत्र च सिंहाद्वधमवाप ॥ ३१ ॥ साश्वं च तं निहत्य सिंहोऽप्यमलमणिरत्नमास्याग्रेणादाय गन्तु- मभ्युद्यतः, ऋक्षाधिपतिना जाम्बवता दृष्टो घातितश्च ॥ ३२ ॥ जाम्बवानप्यमलमणिरत्न- मादाय स्वबिले प्रविवेश ॥ ३३ ॥ सुकुमारसंज्ञाय बालकाय च क्रीडनकमकरोत् ॥ ३४ ॥

अनागच्छति तस्मिन्प्रसेने कृष्णो मणिरत्न- मभिलषितवान्स च प्राप्तवान्नूनमेतदस्य कर्मेत्यखिल एव यदुलोकः परस्परं कर्णाकर्ण्य- कथयत् ॥ ३५ ॥

विदितलोकापवादवृत्तान्तश्च भगवान् सर्व- यदुसैन्यपरिवारपरिवृतः प्रसेनाश्वपदवी- मनुससार ॥ ३६ ॥ ददर्श चाश्वसमवेतं प्रसेनं सिंहेन विनिहतम् ॥ ३७ ॥ अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शनकृतपरिशुद्धिः सिंहपदम- नुससार ॥ ३८ ॥ ऋक्षपतिनिहतं च सिंहमप्यल्पे भूमिभागे दृष्ट्वा ततश्च तद्रत्नगौरवादृक्षस्यापि पदान्यनुययौ ॥ ३९ ॥ गिरितटे च सकलमेव तद्यदुसैन्यमवस्थाप्य तत्पदानुसारी ऋक्षबिलं प्रविवेश ॥ ४० ॥

अन्तःप्रविष्टश्च धात्र्याः सुकुमारक- मुल्लालयन्त्या वाणीं शुश्राव ॥ ४१ ॥

वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी ॥ २५ ॥ उसके प्रभावसे सम्पूर्ण राष्ट्रमें रोग, अनावृष्टि तथा सर्प, अग्नि, चोर या दुर्भिक्ष आदिका भय नहीं रहता था ॥ २६ ॥ भगवान् अच्युतको भी ऐसी इच्छा हुई कि यह दिव्य रत्न तो राजा उग्रसेनके योग्य है ॥ २७ ॥ किन्तु जातीय विद्रोहके भयसे समर्थ होते हुए भी उन्होंने उसे छीना नहीं ॥ २८ ॥

सत्राजित्को जब यह मालूम हुआ कि भगवान् मुझसे यह रत्न माँगनेवाले हैं तो उसने लोभवश उसे अपने भाई प्रसेनको दे दिया ॥ २९ ॥ किन्तु इस बातको न जानते हुए कि पवित्रतापूर्वक धारण करनेसे तो यह मणि सुवर्ण-दान आदि अनेक गुण प्रकट करती है और अशुद्धावस्थामें धारण करनेसे घातक हो जाती है, प्रसेन उसे अपने गलेमें बाँधे हुए घोड़ेपर चढ़कर मृगयाके लिये वनको चला गया ॥ ३० ॥ वहाँ उसे एक सिंहने मार डाला ॥ ३१ ॥ जब वह सिंह घोड़ेके सहित उसे मारकर उस निर्मल मणिको अपने मुँहमें लेकर चलनेको तैयार हुआ तो उसी समय ऋक्षराज जाम्बवान्ने उसे देखकर मार डाला ॥ ३२ ॥ तदनन्तर उस निर्मल मणिरत्नको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें आया ॥ ३३ ॥ और उसे सुकुमार नामक अपने बालकके लिये खिलौना बना लिया ॥ ३४ ॥

प्रसेनके न लौटनेपर सब यादवोंमें आपसमें यह कानाफूँसी होने लगी कि “कृष्ण इस मणिरत्नको लेना चाहते थे, अवश्य ही इन्होंने उसे ले लिया है— निश्चय यह इन्हींका काम है” ॥ ३५ ॥

इस लोकापवादका पता लगनेपर सम्पूर्ण यादवसेनाके सहित भगवान्‌ने प्रसेनके घोड़ेके चरण-चिह्नोंका अनुसरण किया और आगे जाकर देखा कि प्रसेनको घोड़ेसहित सिंहने मार डाला है ॥ ३६-३७ ॥ फिर सब लोगोंके बीच सिंहके चरण-चिह्न देख लिये जानेसे अपनी सफाई हो जानेपर भी भगवान्‌ने उन चिह्नोंका अनुसरण किया और थोड़ी ही दूरीपर ऋक्षराजद्वारा मारे हुए सिंहको देखा; किन्तु उस रत्नके महत्त्वके कारण उन्होंने जाम्बवान्‌के पद- चिह्नोंका भी अनुसरण किया ॥ ३८-३९ ॥ और सम्पूर्ण यादव-सेनाको पर्वतके तटपर छोड़कर ऋक्षराजके चरणोंका अनुसरण करते हुए स्वयं उनकी गुफामें घुस गये ॥ ४० ॥

भीतर जानेपर भगवान्‌ने सुकुमारको बहलाती हुई धात्रीकी यह वाणी सुनी— ॥ ४१ ॥

अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २७९


[संस्कृत]

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ ४२
  इत्याकर्ण्योपलब्धस्यमन्तकोऽन्तःप्रविष्टः कुमारक्रीडनकीकृतं च धात्र्या हस्ते तेजोभिर्ज्वल्यमानं स्यमन्तकं ददर्श ॥ ४३ ॥ तं च स्यमन्तकाभिलषितचक्षुषमपूर्वपुरुषमागतं समवेक्ष्य धात्री त्राहि त्राहीति व्याजहार ॥ ४४ ॥
  तदार्त्तरवश्रवणानन्तरं चामर्षपूर्णहृदयः स जाम्बवानाजगाम ॥ ४५ ॥ तयोश्च परस्परमुद्धतामर्षयोर्युद्धमेकविंशतिदिनान्यभवत् ॥ ४६ ॥ ते च यदुसैनिकास्तत्र सप्ताष्टदिनानि तन्निष्क्रान्तिमुदीक्षमाणास्तस्थुः ॥ ४७ ॥ अनिष्क्रमणे च मधुरिपुरसाववश्यमत्र बिलेऽत्यन्तं नाशमवाप्तो भविष्यत्यन्यथा तस्य जीवतः कथमेतावन्ति दिनानि शत्रुजये व्याक्षेपो भविष्यतीति कृताध्यवसाया द्वारकामागम्य हतः कृष्ण इति कथयामासुः ॥ ४८ ॥ तद्वान्धवाश्च तत्कालोचितमखिलमुत्तरक्रियाकलापं चक्रुः ॥ ४९ ॥
  ततश्चास्य युद्ध्यमानस्यातिश्रद्धादत्तविशिष्टोपपात्रयुक्तान्नतोयादिना श्रीकृष्णस्य बलप्राणपुष्टिरभूत् ॥ ५० ॥ इतरस्यानुदिनमतिगुरुपुरुषभेद्यमानस्य अतिनिष्ठुरप्रहारपातपीडिताखिलावयवस्य निराहारतया बलहानिरभूत् ॥ ५१ ॥ निर्जितश्च भगवता जाम्बवान्प्रणिपत्य व्याजहार ॥ ५२ ॥ सुरासुरगन्धर्वयक्षराक्षसादिभिरप्यखिलैर्भगवान् जेतुं शक्यः किमुतावनिगोचरैरल्पवीर्यैर्नर्नरवयवभूतैश्च तिर्यग्योन्यनुसृतिभिः किं पुनरस्मद्विधैरवश्यं भवताऽस्मत्स्वामिना रामेणेव नारायणस्य सकलजगत्परायणस्यांशेन भगवता भवितव्यमित्युक्तस्तस्मै भगवानखिलावनिभारावतरणार्थमवतरणमाचचक्षे ॥ ५३ ॥ प्रीत्यभिव्यज्जितकरतलस्पर्शनेन चैनमपगतयुद्धखेदं चकार ॥ ५४ ॥


[हिन्दी अनुवाद]

  सिंहने प्रसेनको मारा और सिंहको जाम्बवान्ने; हे सुकुमार ! तू रो मत यह स्यमन्तकमणि तेरी ही है ॥ ४२ ॥
  यह सुननेसे स्यमन्तकका पता लगनेपर भगवान्ने भीतर जाकर देखा कि सुकुमारके लिये खिलौना बनी हुई स्यमन्तकमणि धात्रीके हाथपर अपने तेजसे देदीप्यमान हो रही है ॥ ४३ ॥ स्यमन्तकमणिकी ओर अभिलाषापूर्ण दृष्टिसे देखते हुए एक विलक्षण पुरुषको वहाँ आया देख धात्री ‘त्राहि-त्राहि’ करके चिल्लाने लगी ॥ ४४ ॥
  उसकी आर्त्त-वाणीको सुनकर जाम्बवान् क्रोधपूर्ण हृदयसे वहाँ आया ॥ ४५ ॥ फिर परस्पर रोष बढ़ जानेसे उन दोनोंका इक्कीस दिनतक घोर युद्ध हुआ ॥ ४६ ॥ पर्वतके पास भगवान्की प्रतीक्षा करनेवाले यादव-सैनिक सात-आठ दिनतक उनके गुफासे बाहर आनेकी बाट देखते रहे ॥ ४७ ॥ किन्तु जब इतने दिनोंतक वे उसमेंसे न निकले तो उन्होंने समझा कि ‘अवश्य ही श्रीमघुसूदन इस गुफामें मारे गये, नहीं तो जीवित रहनेपर शत्रुके जीतनेमें उन्हें इतने दिन क्यों लगते ?’ ऐसा निश्चय कर वे द्वारकामें चले आये और वहाँ कह दिया कि श्रीकृष्ण मारे गये ॥ ४८ ॥ उनके बन्धुओंने यह सुनकर समयोचित सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कर्म कर दिये ॥ ४९ ॥
  इधर, अति श्रद्धापूर्वक दिये हुए विशिष्ट पात्रोंसहित इनके अन्न और जलसे युद्ध करते समय श्रीकृष्णचन्द्रके बल और प्राणकी पुष्टि हो गयी ॥ ५० ॥ तथा अति महान् पुरुषके द्वारा मर्दित होते हुए उनके अत्यन्त निष्ठुर प्रहारोंके आघातसे पीड़ित शरीरवाले जाम्बवान्का बल निराहार रहनेसे क्षीण हो गया ॥ ५१ ॥ अन्तमें भगवान्से पराजित होकर जाम्बवान्ने उन्हें प्रणाम करके कहा— ॥ ५२ ॥ “भगवन् ! आपको तो देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस आदि कोई भी नहीं जीत सकते, फिर पृथिवीतलपर रहनेवाले अल्पवीर्य मनुष्य अथवा मनुष्योंके अवयवभूत हम-जैसे तिर्यक्-यौनिगत जीवोंकी तो बात ही क्या है ? अवश्य ही आप हमारे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समान सकल लोक-प्रतिपालक भगवान् नारायणके ही अंशसे प्रकट हुए हैं।” जाम्बवान्के ऐसा कहनेपर भगवान्ने पृथिवीका भार उतारनेके लिये अपने अवतार लेनेका सम्पूर्ण वृत्तान्त उससे कह दिया और उसे प्रीतिपूर्वक अपने हाथसे छूकर युद्धके श्रमसे रहित कर दिया ॥ ५३-५४ ॥

२८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

स च प्रणिपत्य पुनरप्येनं प्रसाद्य जाम्बवतीं नाम कन्यां गृहागतायार्घ्यभूतां ग्राहयामास ॥ ५५ ॥ स्यमन्तकaccessorमणिरत्नमपि प्रणिपत्य तस्मै प्रददौ ॥ ५६ ॥ अच्युतोऽप्यतिप्रणतात्तस्माद्ग्राह्यमपि तन्मणिरत्नमात्मसंशोधनाय जग्राह ॥ ५७ ॥ सह जाम्बवत्या स द्वारकामाजगाम ॥ ५८ ॥तदनन्तर जाम्बवान्ने पुनः प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न किया और घरपर आये हुए भगवान्के लिये अर्घ्यस्वरूप अपनी जाम्बवती नामकी कन्या दे दी तथा उन्हें प्रणाम करके मणिरत्न स्यमन्तक भी दे दिया ॥ ५५-५६ ॥ भगवान् अच्युतने भी उस अति विनीतसे लेनेयोग्य न होनेपर भी अपने कलंक-शोधनके लिये वह मणिरत्न ले लिया और जाम्बवतीके सहित द्वारकामें आये ॥ ५७-५८ ॥
भगवदागमनोद्भूतहर्षोत्कर्षस्य द्वारकावासिजनस्य कृष्णावलोकनात्तत्क्षणमेवातिपरिणतवयसोऽपि नवयौवनमिवाभवत् ॥ ५९ ॥ दिष्ट्यादिष्ट्येति सकलयादवाः स्त्रियश्च सभाजयामासुः ॥ ६० ॥ भगवानपि यथानुभूतमशेषं यादवसमाजे यथावदाचचक्षे ॥ ६१ ॥ स्यमन्तकं च सत्राजिते दत्त्वा मिथ्याभिशस्तिपरिशुद्धिमवाप ॥ ६२ ॥ जाम्बवतीं चान्तःपुरे निवेशयामास ॥ ६३ ॥उस समय भगवान् कृष्णचन्द्रके आगमनसे जिनके हर्षका वेग अत्यन्त बढ़ गया है उन द्वारकावासियोंमेंसे बहुत ढली हुई अवस्थावालोंमें भी उनके दर्शनके प्रभावसे तत्काल ही मानो नवयौवनका संचार हो गया ॥ ५९ ॥ तथा सम्पूर्ण यादवगण और उनकी स्त्रियाँ 'अहोभाग्य ! अहोभाग्य !!' ऐसा कहकर उनका अभिवादन करने लगीं ॥ ६० ॥ भगवान्ने भी जो-जो बात जैसे-जैसे हुई थी वह ज्यों-की-त्यों यादव-समाजमें सुना दी और सत्राजित्को स्यमन्तकमणि देकर मिथ्या कलंकसे छुटकारा पा लिया। फिर जाम्बवतीको अपने अन्तःपुरमें पहुँचा दिया ॥ ६१-६३ ॥
सत्राजिदपि मयास्याभूतमलिनमारोपितमिति जातसन्त्रासात्स्वसुतां सत्यभामां भगवते भार्यार्थं ददौ ॥ ६४ ॥ तां चाक्रूरकृतवर्मशतधन्वप्रमुखा यादवाः प्राग्वरयाम्बभूवुः ॥ ६५ ॥ ततस्तत्प्रदानादवज्ञातमेवात्मानं मन्यमानाः सत्राजिति वैरानुबन्धं चक्रुः ॥ ६६ ॥सत्राजित्ने भी यह सोचकर कि मैंने ही कृष्णचन्द्रको मिथ्या कलंक लगाया था, डरते-डरते उन्हें पत्नीरूपसे अपनी कन्या सत्यभामा विवाह दी ॥ ६४ ॥ उस कन्याको अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा आदि यादवोंने पहले वरण किया था ॥ ६५ ॥ अतः श्रीकृष्णचन्द्रके साथ उसे विवाह देनेसे उन्होंने अपना अपमान समझकर सत्राजित्से वैर बाँध लिया ॥ ६६ ॥
अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च शतधन्वानमूचुः ॥ ६७ ॥ अयमतीव दुरात्मा सत्राजिद् योऽस्माभिर्भवता च प्रार्थितोऽप्यात्मजामस्मान् भवन्तं चाविगणय्य कृष्णाय दत्तवान् ॥ ६८ ॥ तदलमनेन जीवता घातयित्वैनं तन्महारत्नं स्यमन्तकाख्यं त्वया किं न गृह्यते वयमभ्युपपत्स्यामो यद्यच्युतस्तवोपरि वैरानुबन्धं करिष्यतीत्येवमुक्तस्तथेत्यसावप्याह ॥ ६९ ॥तदनन्तर अक्रूर और कृतवर्मा आदिने शतधन्वासे कहा— ॥ ६७ ॥ "यह सत्राजित् बड़ा ही दुष्ट है, देखो, इसने हमारे और आपके माँगनेपर भी हमलोगोंको कुछ भी न समझकर अपनी कन्या कृष्णचन्द्रको दे दी ॥ ६८ ॥ अतः अब इसके जीवनका प्रयोजन ही क्या है; इसको मारकर आप स्यमन्तक महामणि क्यों नहीं ले लेते हैं? पीछे, यदि अच्युत आपसे किसी प्रकारका विरोध करेंगे तो हमलोग भी आपका साथ देंगे।" उनके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने कहा—"बहुत अच्छा, ऐसा ही करेंगे" ॥ ६९ ॥
जतुगृहदग्धानां पाण्डुतनयानां विदितपरमार्थोऽपि भगवान् दुर्योधनप्रयत्नशैथिल्यकरणार्थं कुल्यकरणाय वारणावतं गतः ॥ ७० ॥इसी समय पाण्डवोंके लाक्षागृहमें जलनेपर, यथार्थ बातको जानते हुए भी भगवान् कृष्णचन्द्र दुर्योधनके प्रयत्नको शिथिल करनेके उद्देश्यसे कुलोचित कर्म करनेके लिये वारणावत नगरको गये ॥ ७० ॥

अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८१


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
गते च तस्मिन् सुप्तमेव सत्राजितं शतधन्वा जघान मणिरत्नं चाददात् ॥ ७१ ॥ पितृवधामर्षपूर्णा च सत्यभामा शीघ्रं स्यन्दनमारूढा वारणावतं गत्वा भगवतेऽहं प्रतिपादितेत्यक्षान्तिमतो शतधन्वनास्मत्पिता व्यापादितस्तच्च स्यमन्तक-मणिरत्नमपहृतं यस्यावभासनेनापहततिमिरं त्रैलोक्यं भविष्यति ॥ ७२ ॥ तदियं त्वदीयापहासना तदालोच्य यदत्र युक्तं तत्क्रियतामिति कृष्णमाह ॥ ७३ ॥<br><br>तया चैवमुक्तः परितुष्टान्तःकरणोऽपि कृष्णः सत्यभामाममर्षताम्रनयनः प्राह ॥ ७४ ॥ सत्ये सत्यं ममैवैषापहासना नाहमेतां तस्य दुरात्मनस्सहिष्ये ॥ ७५ ॥ न ह्यनुल्लंघ्य वरपादपं तत्कृतनीडाश्रयिणो विहङ्गमा वध्यन्ते तदलमुमुनास्मत्पुरतः शोकप्रेरितवाक्यपरिकरेणेत्युक्त्वा द्वारकामभ्येत्येकान्ते बलदेवं वासुदेवः प्राह ॥ ७६ ॥<br><br>मृगयागतं प्रसेनमटव्यां मृगपतिर्जघान ॥ ७७ ॥<br>सत्राजिदप्यधुना शतधन्वना निधनं प्रापितः ॥ ७८ ॥<br>तदुभयविनाशात्तन्मणिरत्नमावाभ्यां सामान्यं भविष्यति ॥ ७९ ॥<br>तदुत्तिष्ठारुह्यतां रथः शतधन्वनिधनायोद्यमं कुर्वित्यभिहितस्तथेति समन्विप्सितवान् ॥ ८० ॥<br><br>कृतोद्यमौ च तावुभावुपलभ्य शतधन्वा कृतवर्माणमुपेत्य पार्ष्णिपूरणकर्मनिमित्तमचोदयत् ॥ ८१ ॥ आह चैनं कृतवर्मा ॥ ८२ ॥<br>नाहं बलदेववासुदेवाभ्यां सह विरोधायालमित्युक्तश्चाक्रूरमचोदयत् ॥ ८३ ॥ असावप्याह ॥ ८४ ॥<br><br>न हि कश्चिद्भगवता पादप्रहारपरिकम्पितजगतत्रयेण सुररिपुवनितावैधव्यकारिणा प्रबलरिपुचक्राप्रतिहतचक्रेण चक्रिणा मदमुदितनयनावलोकिताखिलनशातनेनातिगुरुवैरिवारणापकर्षणाविकृतमहिमोरुसीरेण सीरिणा च सह सकलजगद्वन्द्यानाममरवराणामपि योद्धुं समर्थः किमुताहम् ॥ ८५ ॥उनके चले जानेपर शतधन्वाने सोते हुए सत्राजित्को मारकर वह मणिरत्न ले लिया ॥ ७१ ॥ पिताके वधसे क्रोधित हुई सत्यभामा तुरन्त ही रथपर चढ़कर वारणावत नगरमें पहुँची और भगवान् कृष्णसे बोली—"भगवन्! पिताजीने मुझे आपके करकमलोंमें सौंप दिया—इस बातको सहन न कर सकनेके कारण शतधन्वाने मेरे पिताजीको मार दिया है और उस स्यमन्तक नामक मणिरत्नको ले लिया है जिसके प्रकाशसे सम्पूर्ण त्रिलोकी भी अन्धकारशून्य हो जायगी ॥ ७२ ॥ इसमें आपकीही हँसी है इसलिये सब बातोंका विचार करके जैसा उचित समझें, करें" ॥ ७३ ॥<br><br>सत्यभामाके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होनेपर भी उनसे क्रोधसे आँखें लाल करके कहा— ॥ ७४ ॥ "सत्ये! अवश्य इसमें मेरी ही हँसी है, उस दुरात्माके इस कुकर्मको मैं सहन नहीं कर सकता, क्योंकि यदि ऊँचे वृक्षका उल्लंघन न किया जा सके तो उसपर घोंसला बनाकर रहनेवाले पक्षियोंको नहीं मार दिया जाता। [अर्थात् बड़े आदमियोंसे पार न पानेपर उनके आश्रितोंको नहीं दबाना चाहिये।] इसलिये अब तुम्हें हमारे सामने इन शोक-प्रेरित वाक्योंके कहनेकी और आवश्यकता नहीं है। [तुम शोक छोड़ दो, मैं इसका भली प्रकार बदला चुका दूँगा।]'' सत्यभामासे इस प्रकार कह भगवान् वासुदेवने द्वारकामें आकर श्रीबलदेवजीसे एकान्तमें कहा— ॥ ७५-७६ ॥ 'वनमें आखेटके लिये गये हुए प्रसेनको तो सिंहने मार दिया था ॥ ७७ ॥ अब शतधन्वाने सत्राजित्को भी मार दिया है ॥ ७८ ॥ इस प्रकार उन दोनोंके मारे जानेपर मणिरत्न स्यमन्तकपर हम दोनोंका समान अधिकार होगा ॥ ७९ ॥ इसलिये उठिये और रथपर चढ़कर शतधन्वाके मारनेका प्रयत्न कीजिये।' कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर बलदेवजीने भी 'बहुत अच्छा' कह उसे स्वीकार किया ॥ ८० ॥<br><br>कृष्ण और बलदेवको [अपने वधके लिये] उद्यत जान शतधन्वाने कृतवर्माके पास जाकर सहायताके लिये प्रार्थना की ॥ ८१ ॥ तब कृतवर्माने इससे कहा— ॥ ८२ ॥ 'मैं बलदेव और वासुदेवसे विरोध करनेमें समर्थ नहीं हूँ।' उसके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने अक्रूरसे सहायता माँगी, तो अक्रूरने भी कहा— ॥ ८३-८४ ॥ 'जो अपने पाद-प्रहारसे त्रिलोकीको कम्पायमान कर देते हैं, देवशत्रु असुरगणकी स्त्रियोंको वैधव्यदान देते हैं तथा अति प्रबल शत्रु-सेनासे भी जिनका चक्र अप्रतिहत रहता है उन चक्रधारी भगवान् वासुदेवसे तथा जो अपने मदोन्मत्त नयनोंकी चितवनसे सबका दमन करनेवाले और भयंकर शत्रुसमूहरूप हाथियोंको खींचनेके लिये अखण्ड महिमाशाली प्रचण्ड हल धारण करनेवाले हैं उन श्रीहलधरसे युद्ध करनेमें तो निखिल-लोक-वन्दनीय देवगणमें भी कोई समर्थ नहीं है फिर मेरी तो बात ही क्या है? ॥ ८५ ॥

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२८२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३


तदन्यश्शरणमभिलष्यतामित्युक्तश्शतधनु-<br>राह॥८६॥ यद्यस्मत्परित्राणासमर्थ<br>भवानात्मानमधिगच्छति तदयमस्मत्तस्तावन्मणिः<br>संगृह्य रक्ष्यतामिति ॥८७॥ एवमुक्तः<br>सोऽप्याह॥८८॥ यद्यन्तायामप्यवस्थायां न<br>कस्मैचिद्भगवान् कथयिष्यति तदहमेतं<br>ग्रहीष्यामीति॥८९॥ तथेत्युक्ते चाक्रूरस्तन्मणिरत्नं<br>जग्राह॥९०॥इसलिये तुम दूसरेकी शरण लो' अक्रूरके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने कहा—॥८६॥ 'अच्छा, यदि मेरी रक्षा करनेमें आप अपनेको सर्वथा असमर्थ समझते हैं तो मैं आपको यह मणि देता हूँ इसे लेकर इसीकी रक्षा कीजिये'॥८७॥ इसपर अक्रूरने कहा—॥८८॥ 'मैं इसे तभी ले सकता हूँ जब कि अन्तकाल उपस्थित होनेपर भी तुम किसीसे भी यह बात न कहो॥८९॥ शतधन्वाने कहा—'ऐसा ही होगा।' इसपर अक्रूरने वह मणिरत्न अपने पास रख लिया॥९०॥
शतधनुरप्यतुलवेगां शतयोजनवाहिनीं<br>वडवामारुह्यापक्रान्तः॥९१॥ शैव्यसुग्रीव-<br>मेघपुष्पबलाहकाश्वचतुष्टययुक्तरथस्थितौ<br>बलदेववासुदेवौ तमनुप्रयातौ॥९२॥ सा च वडवा<br>शतयोजनप्रमाणमार्गमतीता पुनरपि वाह्यमाना<br>मिथिलावनोद्देशे प्राणानुत्ससर्ज॥९३॥<br>शतधनुरपि तां परित्यज्य पदातिरेवाद्ववत्॥९४॥<br>कृष्णोऽपि बलभद्रमाह ॥९५॥ तावदत्र स्यन्दने<br>भवता स्थेयमहमेनमधमाचारं पदातिरेव<br>पदातिमनुगम्य यावद्घातयामि अत्र हि भूभागे<br>दृष्टदोषास्सम्भया अतो नैतेऽश्वा भवतेमं भूमि-<br>भागमुल्लङ्घनीयाः॥९६॥ तथेत्युक्त्वा बलदेवो<br>रथ एव तस्थौ॥९७॥तदनन्तर शतधन्वा सौ योजनतक जानेवाली एक अत्यन्त वेगवती घोड़ीपर चढ़कर भागा॥९१॥ और शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नामक चार घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर बलदेव और वासुदेवने भी उसका पीछा किया॥९२॥ सौ योजन मार्ग पार कर जानेपर पुनः आगे ले जानेसे उस घोड़ीने मिथिला देशके वनमें प्राण छोड़ दिये॥९३॥ तब शतधन्वा उसे छोड़कर पैदल ही भागा॥९४॥ उस समय श्रीकृष्णचन्द्रने बलभद्रजीसे कहा—॥९५॥ 'आप अभी रथमें ही रहिये मैं इस पैदल दौड़ते हुए दुराचारीको पैदल जाकर ही मारे डालता हूँ। यहाँ [घोड़ीके मरने आदि] दोषोंको देखनेसे घोड़े भयभीत हो रहे हैं, इसलिये आप इन्हें और आगे न बढ़ाइयेगा॥९६॥ तब बलदेवजी 'अच्छा' ऐसा कहकर रथमें ही बैठे रहे॥९७॥
कृष्णोऽपि द्विक्रोशमात्रं भूमिभागमनुसृत्य<br>दूरस्थितस्यैव चक्रं क्षिप्त्वा शतधनुषशिर-<br>श्शिच्छेद॥९८॥ तच्छरीराम्बरादिषु च बहुप्रकार-<br>मन्विच्छन्नपि स्यमन्तकमणिं नावाप यदा तदोपगम्य<br>बलभद्रमाह॥९९॥ वृथैवास्माभिः शतधनुर्घातितो<br>न प्राप्तमखिलजगत्सारभूतं तन्महारत्नं<br>स्यमन्तकाख्यमित्याकर्ण्योद्भूतकोपो बलदेवोश्रीकृष्णचन्द्रने केवल दो ही कोसतक पीछाकर अपना चक्र फेंक दूर होनेपर भी शतधन्वाका सिर काट डाला॥९८॥ किन्तु उसके शरीर और वस्त्र आदिमें बहुत कुछ ढूँढ़नेपर भी जब स्यमन्तकमणिको न पाया तो बलभद्रजीके पास जाकर उनसे कहा—॥९९॥ "हमने शतधन्वाको व्यर्थ ही मारा, क्योंकि उसके पास सम्पूर्ण संसारकी सारभूत स्यमन्तकमणि तो मिली ही नहीं।' यह सुनकर बलदेवजीने [यह समझकर कि श्रीकृष्णचन्द्र उस मणिको छिपानेके लिये ही ऐसी बातें बना रहे हैं]

अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८३

वासुदेवमाह ॥१००॥ धिक्त्वां यस्त्वमेवमर्थ-क्रोधपूर्वक भगवान् वासुदेवसे कहा— ॥१००॥ 'तुमको
लिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान्मया क्षान्तं तदयंधिक्कार है, तुम बड़े ही अर्थलोलुप हो; भाई होनेके कारण
पन्थास्स्वेच्छया गम्यतां न मे द्वारक्या न त्वया नही मैं तुम्हें क्षमा किये देता हूँ। तुम्हारा मार्ग खुला हुआ है,
चाशेषबन्धुभिः कार्यमलमलमेभिर्मामाग्रतो-तुम खुशीसे जा सकते हो। अब मुझे तो द्वारकासे, तुमसे
ऽलीकशपथैरित्याक्षिप्य तत्कथां कथञ्चित्प्रसाद्य-अथवा और सब सगे-सम्बन्धियोंसे कोई काम नहीं है।
मानोऽपि न तस्थौ॥१०१॥ स विदेहपुरींबस, मेरे आगे इन थोथी शपथोंका अब कोई प्रयोजन
प्रविवेश ॥१०२॥नहीं।' इस प्रकार उनकी बातको काटकर बहुत कुछ
जनकराजश्चार्घ्यपूर्वकमेनं गृहं प्रवेश-मनानेपर भी वे वहाँ न रुके और विदेहनगरको चले
यामास ॥१०३॥ स तत्रैव च तस्थौ ॥१०४॥गये ॥१०१-१०२॥
वासुदेवोऽपि द्वारकामाजगाम ॥१०५॥ यावच्चविदेहनगरमें पहुँचनेपर राजा जनक उन्हें अर्घ्य
जनकराजगृहे बलभद्रोऽवतस्थे तावद्धार्त्त-देकर अपने घर ले आये और वे वहीं रहने
राष्ट्रो दुर्योधनस्तत्सकाशाद्गदाशिक्षाम-लगे ॥१०३-१०४॥ इधर भगवान् वासुदेव द्वारकामें
शिक्षयत् ॥१०६॥ वर्षत्रयान्ते चचले आये ॥१०५॥ जितने दिनोंतक बलदेवजी राजा
बभ्रूग्रसेनप्रभृतिभिर्यादवैर्र्न तद्रत्नंजनकके यहाँ रहे उतने दिनतक धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन
कृष्णेनापहृतमिति कृतावगतिर्विदेहनगरीं गत्वाउनसे गदायुद्ध सीखता रहा ॥१०६॥ अनन्तर बभ्रु और
बलदेवस्सम्प्रत्याय्य द्वारकामानीतः ॥१०७॥उग्रसेन आदि यादवोंके, जिन्हें यह ठीक मालूम था कि
अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूतसुवर्णेन'कृष्णने स्यमन्तकमणि नहीं ली है', विदेहनगरमें जाकर
भगवद्ध्यानपरोऽनवरतं यज्ञानियाज ॥१०८॥शपथपूर्वक विश्वास दिलानेपर बलदेवजी तीन वर्ष
सवनगतौ हि क्षत्रियवैश्यौ निघ्ननब्रह्महापश्चात् द्वारकामें चले आये ॥१०७॥
भवतीत्येवम्प्रकारं दीक्षाकवचं प्रविष्टअक्रूरजी भी भगवद्ध्यान-परायण रहते हुए उस
एव तस्थौ ॥१०९॥ द्विषष्टिवर्षाण्येवंमणिरत्नसे प्राप्त सुवर्णके द्वारा निरन्तर यज्ञानुष्ठान करने
तन्मणिप्रभावात्तत्रोपसर्गदुर्भिक्षमारिकामरणादिकंलगे ॥१०८॥ यज्ञ-दीक्षित क्षत्रिय और वैश्योंके मारनेसे
नाभूत् ॥११०॥ अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैश्शत्रुघ्नेब्रह्महत्या होती है, इसलिये अक्रूरजी सदा यज्ञदीक्षारूप
सात्वतस्य प्रपौत्रे व्यापादिते भोजैस्सहा-कवच धारण ही किये रहते थे ॥१०९॥ उस मणिके प्रभावसे
क्रूरो द्वारकामपहायापक्रान्तः ॥१११॥बासठ वर्षतक द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, महामारी या मृत्यु
तदपक्रान्तिदिनादारभ्य तत्रोपसर्गदुर्भिक्षव्या-आदि नहीं हुए ॥११०॥ फिर अक्रूर-पक्षीय भोजवंशियोंद्वारा
लानावृष्टिमरिकाद्युपद्रवा बभूवुः ॥११२॥सात्वतके प्रपौत्र शत्रुघ्नके मारे जानेपर भोजोंके साथ अक्रूर
अथ यादवबलभद्रोग्रसेनसमवेतो मन्त्र-भी द्वारकाको छोड़कर चले गये ॥१११॥ उनके जाते ही,
ममन्त्रयद् भगवानुरगारिकेतनः ॥११३॥उसी दिनसे द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, सर्प, अनावृष्टि और
किमिदमेकदैव प्रचुरोपद्रवागमनमेतदालोच्यता-मरी आदि उपद्रव होने लगे ॥११२॥
मित्युकतेऽन्धकनामा यदुवृद्धः प्राह ॥११४॥तब गरुडध्वज भगवान् कृष्ण बलभद्र और
अस्याक्रूरस्य पिता श्वफल्को यत्र यत्राभूत्तत्रउग्रसेन आदि यदुवंशियोंके साथ मिलकर सलाह करने
तत्र दुर्भिक्षमारिकानावृष्ट्यादिकं नाभूत् ॥११५॥लगे ॥११३॥ 'इसका क्या कारण है जो एक साथ ही
काशिराजस्य विषये त्वनावृष्ट्या च श्वफल्कोइतने उपद्रवोंका आगमन हुआ, इसपर विचार करना
चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर अन्धक नामक एक
वृद्ध यादवने कहा— ॥११४॥ 'अक्रूरके पिता श्वफल्क
जहाँ-जहाँ रहते थे वहाँ-वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी और
अनावृष्टि आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे ॥११५॥
एक बार काशिराजके देशमें अनावृष्टि हुई थी। तब