भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

२७४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२

बारहवाँ अध्याय यदुपुत्र क्रोष्टुका वंश

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—यदुपुत्र क्रोष्टुके ध्वजिनीवान्
**क्रोष्टोस्तु यदुपुत्रस्यात्मजो ध्वजिनीवान् ॥ १ ॥ ततश्च स्वातिस्ततो रुशंकू रुशंकोश्चित्ररथः ॥ २ ॥ तत्त plan: तस्यनामक पुत्र हुआ ॥ १ ॥ उसके स्वाति, स्वातिके रुशंकु, रुशंकुके चित्ररथ और चित्ररथके शशिबिन्दु नामक पुत्र हुआ जो चौदहों महारत्नोंका* स्वामी तथा चक्रवर्ती सम्राट् था ॥ २-३ ॥ शशिबिन्दुके एक लाख स्त्रियाँ और दस लाख पुत्र थे ॥ ४-५ ॥ उनमें पृथुश्रवा, पृथुकर्मा, पृथुकीर्ति, पृथुयशा, पृथुजय और पृथुदान—ये छः पुत्र प्रधान थे ॥ ६ ॥ पृथुश्रवाका पुत्र पृथुतम और उसका पुत्र उशना हुआ जिसने सौ अश्वमेध-यज्ञ किया था ॥ ७-८ ॥ उशनाके शितपु नामक पुत्र हुआ ॥ ९ ॥ शितपुके रुक्मकवच, रुक्मकवचके परावृत् तथा परावृत्‌के रुक्मेषु, पृथु, ज्यामघ, वलित और हरित नामक पाँच पुत्र हुए ॥ १०-११ ॥ इनमेंसे ज्यामघके विषयमें अब भी यह श्लोक गाया जाता है— ॥ १२ ॥
तन्तनयश्शशिबिन्दुश्चतुर्दशमहारत्नेशश्चक्रवर्त्यभवत् ॥ ३ ॥ तस्य च शतसहस्रं पत्नीनामभवत् ॥ ४ ॥ दशलक्षसंख्याश्च पुत्राः ॥ ५ ॥ तेषां च पृथुश्रवाः पृथुकर्मा पृथुकीर्तिः पृथुयशाः पृथुजयः पृथुदानः षट् पुत्राः प्रधानाः ॥ ६ ॥ पृथुश्रवसश्च पुत्रः पृथुतमः ॥ ७ ॥ तस्मादुशना यो वाजिमेधानां शतमाजहार ॥ ८ ॥ तस्य च शितपुर्नाम पुत्रोऽभवत् ॥ ९ ॥ तस्यापि रुक्मकवचस्ततः परावृत् ॥ १० ॥ परावृतो रुक्मेषुपृथुज्यामघवलितहरितसंज्ञास्तस्य पञ्चात्मजा बभूवुः ॥ ११ ॥ तस्यायमद्यापि ज्यामघस्य श्लोको गीयते ॥ १२ ॥

भार्यावश्यास्तु ये केचिद्भविष्यन्त्यथ वा मृताः।
तेषां तु ज्यामघः श्रेष्ठश्शैव्यापतिरभून्नृपः ॥ १३
संसारमें स्त्रीके वशीभूत जो-जो लोग होंगे और जो-जो पहले हो चुके हैं उनमें शैव्याका पति राजा ज्यामघ ही सर्वश्रेष्ठ है ॥ १३ ॥ उसकी स्त्री शैव्या यद्यपि निःसन्तान थी तथापि सन्तानकी इच्छा रहते हुए भी उसने उसके भयसे दूसरी स्त्रीसे विवाह नहीं किया ॥ १४ ॥

अपुत्रा तस्य सा पत्नी शैव्या नाम तथाप्यसौ।
अपत्यकामोऽपि भयान्नान्यां भार्यामविन्दत ॥ १४
एक दिन बहुत-से रथ, घोड़े और हाथियोंके संघट्टसे अत्यन्त भयानक महायुद्धमें लड़ते हुए उसने अपने समस्त शत्रुओंको जीत लिया ॥ १५ ॥

स त्वेकदा प्रभूतरथतुरंगगजसम्मर्दातिदारुणे महाहवे युद्ध्यमानः सकलमेवारिचक्रमजयत् ॥ १५


* धर्मसंहितामें चौदह रत्नोंका उल्लेख इस प्रकार किया है—
‘चक्रं रथो मणिः खड्गश्चर्म रत्नं च पञ्चमम्। केतुर्निधिश्च सप्तैव प्राणहीनानि चक्षते॥
भार्या पुरोहितश्चैव सेनानी रथकृच्च यः। पत्त्यश्वकलभाश्चेति प्राणिनः सप्त कीर्तिताः॥
चतुर्दशेति रत्नानि सर्वेषां चक्रवर्तिनाम्।’
अर्थात् चक्र, रथ, मणि, खड्ग, चर्म (ढाल), ध्वजा और निधि (खजाना)—ये सात प्राणहीन तथा स्त्री, पुरोहित, सेनापति, रथी, पदाति, अश्वारोही और गजारोही—ये सात प्राणयुक्त इस प्रकार कुल चौदह रत्न सब चक्रवर्त्तियोंके यहाँ रहते हैं।