विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 286, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 286
अ० १२ ] * चतुर्थ अंश * २७५
| संस्कृत मूल पाठ | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तच्चारिचक्रमपास्तपुत्रकलत्रबन्धुबलकोशं स्वमधिष्ठानं परित्यज्य दिशः प्रति विद्रुतम् ॥ १६ ॥<br>तस्मिंश्च विद्रुतेऽतित्रासलोलायतलोचनयुगलं त्राहि त्राहि मां ताताम्ब भ्रातरित्याकुलविलापविधुरं स राजकन्यरत्नमद्राक्षीत् ॥ १७ ॥ तद्दर्शनाच्च तस्यामनुरागानुगतानन्तरात्मा स नृपोऽचिन्तयत् ॥ १८ ॥ साध्विदं ममापत्यरहितस्य वन्ध्याभर्तुः साम्प्रतं विधिनापत्यकारणं कन्यरत्नमुपपादितम् ॥ १९ ॥ तदेतत्समुद्वहामीति ॥ २० ॥<br>अथवैनां स्यन्दनमारोप्य स्वमधिष्ठानं नयामि ॥ २१ ॥ तयैव देव्या शैव्यायाहमनुज्ञातस्समुद्वहामीति ॥ २२ ॥<br>अथैनां रथमारोप्य स्वनगरमगच्छत् ॥ २३ ॥<br>विजयिनं च राजानमशेषपौरभृत्यपरिजनामात्यसमेता शैव्या द्रष्टुमधिष्ठानद्वारमागता ॥ २४ ॥<br>सा चावलोक्य राज्ञः सव्यपार्श्ववर्त्तिनीं कन्यामीषदुद्धूतामर्षस्फुरदधरपल्लवा राजानमवोचत् ॥ २५ ॥ अतिचपलचित्तात्र स्यन्दने केयमारोपितेति ॥ २६ ॥ असावप्यनालोचितोत्तरवचनोऽतिभयात्तामाह स्नुषा ममेयमिति ॥ २७ ॥<br>अथैनं शैव्योवाच ॥ २८ ॥<br>नाहं प्रसूता पुत्रेण नान्या पत्न्यभवत्तव।<br>स्नुषासम्बन्धता ह्येषा कतमेन सुतेन ते ॥ २९ ॥<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्यात्मेर्ष्याकोपकलुषितावचनमुषितविवेको भयादुरुक्तपरिहारार्थमिदमवनीपतिराह ॥ ३० ॥<br>यस्ते जनिष्यत आत्मजस्तस्येयमनागतस्यैव भार्या निरूपितेत्याकर्ण्योद्भूतमृदुहासा तथेत्याह ॥ ३१ ॥ प्रविवेश च राज्ञा सहाधिष्ठानम् ॥ ३२ ॥<br>अनन्तरं चातिशुद्धलग्नहोरांशकावयवोक्तकृतपुत्रजन्मलाभगुणाढ्यसः परिणाममुपगतापि | उस समय वे समस्त शत्रुगण पुत्र, मित्र, स्त्री, सेना और कोशादिसे हीन होकर अपने-अपने स्थानोंको छोड़कर दिशा-विदिशाओंमें भाग गये ॥ १६ ॥ उनके भाग जानेपर उसने एक राजकन्याको देखा जो अत्यन्त भयसे कातर हुई विशाल आँखोंसे [देखती हुई] 'हे तात, हे मात:, हे भ्रातः! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' इस प्रकार व्याकुलतापूर्वक विलाप कर रही थी ॥ १७ ॥ उसको देखते ही उसमें अनुरक्तचित्त हो जानेसे राजाने विचार किया ॥ १८ ॥ 'यह अच्छा ही हुआ; मैं पुत्रहीन और वन्ध्याका पति हूँ; ऐसा मालूम होता है कि सन्तानकी कारणरूपा इस कन्यारत्नको विधाताने ही इस समय यहाँ भेजा है ॥ १९ ॥ तो फिर मुझे इससे विवाह कर लेना चाहिये ॥ २० ॥ अथवा इसे अपने रथपर बैठाकर अपने निवासस्थानको लिये चलता हूँ, वहाँ देवी शैव्याकी आज्ञा लेकर ही इससे विवाह कर लूँगा' ॥ २१-२२ ॥<br>तदनन्तर वे उसे रथपर चढ़ाकर अपने नगरको ले चले ॥ २३ ॥ वहाँ विजयी राजाके दर्शनके लिये सम्पूर्ण पुरवासी, सेवक, कुटुम्बीजन और मन्त्रिवर्गके सहित महारानी शैव्या नगरके द्वारपर आयी हुई थी ॥ २४ ॥ उसने राजाके वामभागमें बैठी हुई राजकन्याको देखकर क्रोधके कारण कुछ काँपते हुए होठोंसे कहा— ॥ २५ ॥ 'हे अति चपलचित्त! तुमने रथमें यह किसे बैठा रखी है?' ॥ २६ ॥ राजाको भी जब कोई उत्तर न सूझा तो अत्यन्त डरते-डरते कहा— "यह मेरी पुत्रवधू है।" ॥ २७ ॥ तब शैव्या बोली— ॥ २८ ॥<br>"मेरे तो कोई पुत्र हुआ नहीं है और आपके दूसरी कोई स्त्री भी नहीं है, फिर किस पुत्रके कारण आपका इससे पुत्रवधूका सम्बन्ध हुआ?" ॥ २९ ॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार शैव्याके ईर्ष्या और क्रोध-कलुषित वचनोंसे विवेकहीन होकर भयके कारण कही हुई असंबद्ध बातके सन्देहको दूर करनेके लिये राजाने कहा— ॥ ३० ॥ "तुम्हारे जो पुत्र होनेवाला है उस भावी शिशुकी मैंने यह पहलेसे ही भार्या निश्चित कर दी है।" यह सुनकर रानीने मधुर मुसकानके साथ कहा— 'अच्छा, ऐसा ही हो' और राजाके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥ ३१-३२ ॥<br>तदनन्तर पुत्र-लाभके गुणोंसे युक्त उस अति विशुद्ध लग्न होरांशक अवयवके समय हुए पुत्रजन्मविषयक वार्तालापके प्रभावसे गर्भधारणके योग्य अवस्था न |