भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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२७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

शैव्या स्वल्पैरेवाहोभिर्गर्भमवाप॥ ३३॥ कालेन च कुमारमजीजनत्॥ ३४॥ तस्य च विदर्भ इति पिता नाम चक्रे॥ ३५॥ स च तां स्नुषामुपयेमे ॥ ३६॥ तस्यां चासौ क्रथकैशिकसंज्ञौ पुत्रावजनयत्॥ ३७॥ पुनश्च तृतीयं रोमपादसंज्ञं पुत्रमजीजनद्यो नारदादवाप्तज्ञानवानभवत्॥ ३८॥ रोमपादाइभूद्बध्रुर्बभ्रोर्धृतिर्धृतेः कैशिकः कैशिकस्यापि चेदिः पुत्रोऽभवद् यस्य सन्ततौ चैद्या भूपालाः ॥ ३९॥

क्रथस्य स्नुषापुत्रस्य कुन्तिर्भवत्॥ ४०॥ कुन्तेर्धृष्टिर्धृष्टेर्निधृतिर्निधृतेर्दशार्हस्ततश्च व्योमा तस्यापि जीमूतस्ततश्च विकृतिस्ततश्च भीमरथः, तस्मान्नवरथस्तस्यापि दशरथस्ततश्च शकुनिः, तत्तन्अयः करम्भिः करम्भेर्देवरातोऽभवत्॥ ४१॥ तस्माद्देवक्षत्रस्तस्यापि मधुर्मधोः कुमारवंशः कुमारवंशादनुरनोः पुरुमित्रः पृथिवीपतिरभवत् ॥ ४२॥ ततश्चांशुस्तस्माच्च सत्वतः॥ ४३॥ सत्वतादेते सात्वताः ॥ ४४॥ इत्येतां ज्यामघस्य सन्ततिं सम्यक् श्रद्धासमन्वितः श्रुत्वा पुमान् मैत्रेय स्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४५॥

रहनेपर भी थोड़े ही दिनोंमें शैव्याके गर्भ रह गया और यथासमय एक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ३३-३४॥ पिताने उसका नाम विदर्भ रखा॥ ३५॥ और उसीके साथ उस पुत्रवधूका पाणिग्रहण हुआ॥ ३६॥ उससे विदर्भने क्रथ और कैशिक नामक दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ३७॥ फिर रोमपाद नामक एक तीसरे पुत्रको जन्म दिया जो नारदजीके उपदेशसे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न हो गया था॥ ३८॥ रोमपादके बभ्रु, बभ्रुके धृति, धृतिके कैशिक और कैशिकके चेदि नामक पुत्र हुआ जिसकी सन्ततिमें चैद्य राजाओंने जन्म लिया॥ ३९॥

ज्यामघकी पुत्रवधूके पुत्र क्रथके कुन्ति नामक पुत्र हुआ॥ ४०॥ कुन्तिके धृष्टि, धृष्टिके निधृति, निधृतिके दशार्ह, दशार्हके व्योमा, व्योमाके जीमूत, जीमूतके विकृति, विकृतिके भीमरथ, भीमरथके नवरथ, नवरथके दशरथ, दशरथके शकुनि, शकुनिके करम्भि, करम्भिके देवरात, देवरातके देवक्षत्र, देवक्षत्रके मधु, मधुके कुमारवंश, कुमारवंशके अनु, अनुके राजा पुरुमित्र, पुरुमित्रके अंशु और अंशुके सत्वत नामक पुत्र हुआ तथा सत्वतसे सात्वतवंशका प्रादुर्भाव हुआ॥ ४१-४४॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार ज्यामघकी सन्तानका श्रद्धापूर्वक भली प्रकार श्रवण करनेसे मनुष्य अपने समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थऽशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा

श्रीपराशर उवाच

भजनभजमानदिव्यान्धकदेवावृधमहाभोजवृष्णिसंज्ञास्सत्वतस्य पुत्रा बभूवुः॥ १॥ भजमानस्य निमिकृकणवृष्णयस्तथान्ये द्वैमात्राः शतजित्सहस्रजिदयुतजित्संज्ञास्त्रयः॥ २॥ देवावृधस्यापि बभ्रुः पुत्रोऽभवत्॥ ३॥ तयोश्चायं श्लोको गीयते॥ ४॥

यथैव शृणुमो दूरात्सम्पश्यामस्तथान्तिकात्। बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधस्समः॥ ५

पुरुषाः षट् च षष्टिश्च षट् सहस्राणि चाष्ट च। तेऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि॥ ६

श्रीपराशरजी बोले— सत्वतके भजन, भजमान, दिव्य, अन्धक, देवावृध महाभोज और वृष्णि नामक पुत्र हुए॥ १॥ भजमानके निमि, कृकण और वृष्णि तथा इनके तीन सौतेले भाई शतजित्, सहस्रजित् और अयुतजित्-ये छः पुत्र हुए॥ २॥ देवावृधके बभ्रु नामक पुत्र हुआ॥ ३॥ इन दोनों (पिता-पुत्रों)-के विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है-॥ ४॥

'जैसा हमने दूरसे सुना था वैसा ही पास जाकर भी देखा; वास्तवमें बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध तो देवताओंके समान है॥ ५॥ बभ्रु और देवावृध [-के उपदेश किये हुए मार्गका अवलम्बन करने]-से क्रमशः छः हजार चौहत्तर (६०७४) मनुष्योंने अमरपद प्राप्त किया था'॥ ६॥