विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
शैव्या स्वल्पैरेवाहोभिर्गर्भमवाप॥ ३३॥ कालेन च कुमारमजीजनत्॥ ३४॥ तस्य च विदर्भ इति पिता नाम चक्रे॥ ३५॥ स च तां स्नुषामुपयेमे ॥ ३६॥ तस्यां चासौ क्रथकैशिकसंज्ञौ पुत्रावजनयत्॥ ३७॥ पुनश्च तृतीयं रोमपादसंज्ञं पुत्रमजीजनद्यो नारदादवाप्तज्ञानवानभवत्॥ ३८॥ रोमपादाइभूद्बध्रुर्बभ्रोर्धृतिर्धृतेः कैशिकः कैशिकस्यापि चेदिः पुत्रोऽभवद् यस्य सन्ततौ चैद्या भूपालाः ॥ ३९॥
क्रथस्य स्नुषापुत्रस्य कुन्तिर्भवत्॥ ४०॥ कुन्तेर्धृष्टिर्धृष्टेर्निधृतिर्निधृतेर्दशार्हस्ततश्च व्योमा तस्यापि जीमूतस्ततश्च विकृतिस्ततश्च भीमरथः, तस्मान्नवरथस्तस्यापि दशरथस्ततश्च शकुनिः, तत्तन्अयः करम्भिः करम्भेर्देवरातोऽभवत्॥ ४१॥ तस्माद्देवक्षत्रस्तस्यापि मधुर्मधोः कुमारवंशः कुमारवंशादनुरनोः पुरुमित्रः पृथिवीपतिरभवत् ॥ ४२॥ ततश्चांशुस्तस्माच्च सत्वतः॥ ४३॥ सत्वतादेते सात्वताः ॥ ४४॥ इत्येतां ज्यामघस्य सन्ततिं सम्यक् श्रद्धासमन्वितः श्रुत्वा पुमान् मैत्रेय स्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४५॥
रहनेपर भी थोड़े ही दिनोंमें शैव्याके गर्भ रह गया और यथासमय एक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ३३-३४॥ पिताने उसका नाम विदर्भ रखा॥ ३५॥ और उसीके साथ उस पुत्रवधूका पाणिग्रहण हुआ॥ ३६॥ उससे विदर्भने क्रथ और कैशिक नामक दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ३७॥ फिर रोमपाद नामक एक तीसरे पुत्रको जन्म दिया जो नारदजीके उपदेशसे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न हो गया था॥ ३८॥ रोमपादके बभ्रु, बभ्रुके धृति, धृतिके कैशिक और कैशिकके चेदि नामक पुत्र हुआ जिसकी सन्ततिमें चैद्य राजाओंने जन्म लिया॥ ३९॥
ज्यामघकी पुत्रवधूके पुत्र क्रथके कुन्ति नामक पुत्र हुआ॥ ४०॥ कुन्तिके धृष्टि, धृष्टिके निधृति, निधृतिके दशार्ह, दशार्हके व्योमा, व्योमाके जीमूत, जीमूतके विकृति, विकृतिके भीमरथ, भीमरथके नवरथ, नवरथके दशरथ, दशरथके शकुनि, शकुनिके करम्भि, करम्भिके देवरात, देवरातके देवक्षत्र, देवक्षत्रके मधु, मधुके कुमारवंश, कुमारवंशके अनु, अनुके राजा पुरुमित्र, पुरुमित्रके अंशु और अंशुके सत्वत नामक पुत्र हुआ तथा सत्वतसे सात्वतवंशका प्रादुर्भाव हुआ॥ ४१-४४॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार ज्यामघकी सन्तानका श्रद्धापूर्वक भली प्रकार श्रवण करनेसे मनुष्य अपने समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थऽशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा
श्रीपराशर उवाच
भजनभजमानदिव्यान्धकदेवावृधमहाभोजवृष्णिसंज्ञास्सत्वतस्य पुत्रा बभूवुः॥ १॥ भजमानस्य निमिकृकणवृष्णयस्तथान्ये द्वैमात्राः शतजित्सहस्रजिदयुतजित्संज्ञास्त्रयः॥ २॥ देवावृधस्यापि बभ्रुः पुत्रोऽभवत्॥ ३॥ तयोश्चायं श्लोको गीयते॥ ४॥
यथैव शृणुमो दूरात्सम्पश्यामस्तथान्तिकात्। बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधस्समः॥ ५
पुरुषाः षट् च षष्टिश्च षट् सहस्राणि चाष्ट च। तेऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि॥ ६
श्रीपराशरजी बोले— सत्वतके भजन, भजमान, दिव्य, अन्धक, देवावृध महाभोज और वृष्णि नामक पुत्र हुए॥ १॥ भजमानके निमि, कृकण और वृष्णि तथा इनके तीन सौतेले भाई शतजित्, सहस्रजित् और अयुतजित्-ये छः पुत्र हुए॥ २॥ देवावृधके बभ्रु नामक पुत्र हुआ॥ ३॥ इन दोनों (पिता-पुत्रों)-के विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है-॥ ४॥
'जैसा हमने दूरसे सुना था वैसा ही पास जाकर भी देखा; वास्तवमें बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध तो देवताओंके समान है॥ ५॥ बभ्रु और देवावृध [-के उपदेश किये हुए मार्गका अवलम्बन करने]-से क्रमशः छः हजार चौहत्तर (६०७४) मनुष्योंने अमरपद प्राप्त किया था'॥ ६॥
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २७७
महाभोजस्त्वतिधर्मात्मा तस्यान्वये भोजा मृत्तिकावरपुरनिवासिनो मार्त्तिकावरा बभूवुः॥ ७॥ वृष्णेः सुमित्रो युधाजिच्च पुत्रावभूताम्॥ ८॥ ततश्चानमित्रस्तथानमित्रान्निघ्नः॥ ९॥ निघ्नस्य प्रसेनस्त्राजितौ ॥ १०॥
तस्य च सत्राजितो भगवानादित्यः सखाभवत् ॥ ११ ॥ एकदा त्वम्भोनिधितीरसंश्रयः सूर्य्यं सत्राजित्तुष्टाव तन्मनस्कतया च भास्वानभिस्तूयमानोऽग्रतस्तस्थौ ॥ १२ ॥ ततस्त्वस्पष्टमूर्त्तिधरं चैनमालोक्य सत्राजित्सूर्य्यमाह ॥ १३ ॥ यथैव व्योम्नि वह्निपिण्डोपमं त्वामहमपश्यं तथैवाद्याग्रतो गतमप्यत्र भगवता किञ्चिन्न प्रसादीकृतं विशेषमुपलक्षयामीत्येवमुक्ते भगवता सूर्येण निजकण्ठादुन्मुच्य स्यमन्तकं नाम महामणिवरमवतार्यैकान्ते न्यस्तम्॥ १४॥
ततस्तमाताम्रोज्ज्वलं ह्रस्ववपुषमीषदापिंगलनयनमादित्यमद्राक्षीत्॥ १५॥ कृतप्रणिपातस्तवादिकं च सत्राजितमाह भगवानादित्यस्सहस्रदीधितिर्वरमस्मत्तोऽभिमतं वृणीष्वेति ॥ १६ ॥ स च तदेव मणिरत्नमयाचत ॥ १७ ॥ स चापि तस्मै तद्दत्त्वा दीधितिपतिर्वियति स्वधिष्ण्यमारुरोह ॥ १८ ॥
सत्राजिदप्यमलमणिरत्नसनाथकण्ठतया सूर्य इव तेजोभिरशेषदिगन्तराण्युद्भासयन् द्वारकां विवेश ॥ १९ ॥ द्वारकावासी जनस्तु तमायान्तमवेक्ष्य भगवन्तमादिपुरुषं पुरुषोत्तममवनिभारावतरणायांशेन मानुषरूपधारिणं प्रणिपत्याह ॥ २०॥ भगवन् भवन्तं द्रष्टुं नूनमयमादित्य आयातीत्युक्तो भगवानुवाच ॥ २१ ॥ भगवान्नायमादित्यः सत्राजिदयमादित्यदत्तस्यमन्तकाख्यं महामणिरत्नं बिभ्रदत्रोपयाति ॥ २२ ॥ तदेनं विश्रब्धाः पश्यतेत्युक्तास्ते तथैव ददृशुः ॥ २३ ॥
स च तं स्यमन्तकमणिमात्मनिवेशने चक्रे ॥ २४॥
महाभोज बड़ा धर्मात्मा था, उसकी सन्तानमें भोजवंशी तथा मृत्तिकावरपुर निवासी मार्त्तिकावर नृपतिगण हुए॥ ७॥ वृष्णिके दो पुत्र सुमित्र और युधाजित् हुए, उनमेंसे सुमित्रके अनमित्र, अनमित्रके निघ्न तथा निघ्नसे प्रसेन और सत्राजित्का जन्म हुआ ॥ ८-१०॥
उस सत्राजित्के मित्र भगवान् आदित्य हुए ॥ ११ ॥ एक दिन समुद्र-तटपर बैठे हुए सत्राजित्ने सूर्यभगवान्की स्तुति की। उसके तन्मय होकर स्तुति करनेसे भगवान् भास्कर उसके सम्मुख प्रकट हुए ॥ १२ ॥ उस समय उनको अस्पष्ट मूर्ति धारण किये हुए देखकर सत्राजित्ने सूर्यसे कहा- ॥ १३ ॥ "आकाशमें अग्निपिण्डके समान आपको जैसा मैंने देखा है वैसा ही सम्मुख आनेपर भी देख रहा हूँ। यहाँ आपकी प्रसादस्वरूप कुछ विशेषता मुझे नहीं दीखती।" सत्राजित्के ऐसा कहनेपर भगवान् सूर्यने अपने गलेसे स्यमन्तक नामकी उत्तम महामणि उतारकर अलग रख दी ॥ १४॥
तब सत्राजित्ने भगवान् सूर्यको देखा-उनका शरीर किंचित् ताम्रवर्ण, अति उज्ज्वल और लघु था तथा उनके नेत्र कुछ पिंगलवर्ण थे ॥ १५ ॥ तदनन्तर सत्राजित्के प्रणाम तथा स्तुति आदि कर चुकनेपर सहस्रांशु भगवान् आदित्यने उससे कहा-"तुम अपना अभीष्ट वर माँगो" ॥ १६ ॥ सत्राजित्ने उस स्यमन्तकमणिको ही माँगा ॥ १७ ॥ तब भगवान् सूर्य उसे वह मणि देकर अन्तरिक्षमें अपने स्थानको चले गये ॥ १८ ॥
फिर सत्राजित्ने उस निर्मल मणिरत्नसे अपना कण्ठ सुशोभित होनेके कारण तेजसे सूर्यके समान समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए द्वारकामें प्रवेश किया ॥ १९ ॥ द्वारकावासी लोगोंने उसे आते देख, पृथिवीका भार उतारनेके लिये अंशरूपसे अवतीर्ण हुए मनुष्यरूपधारी आदिपुरुष भगवान् पुरुषोत्तमसे प्रणाम करके कहा- ॥ २० ॥ "भगवन्! आपके दर्शनोंके लिये निश्चय ही ये भगवान् सूर्यदेव आ रहे हैं" उनके ऐसा कहनेपर भगवान्ने उनसे कहा- ॥ २१ ॥ "ये भगवान् सूर्य नहीं हैं, सत्राजित् है। यह सूर्यभगवान्से प्राप्त हुई स्यमन्तक नामकी महामणिको धारणकर यहाँ आ रहा है ॥ २२ ॥ तुमलोग अब विश्वस्त होकर इसे देखो।" भगवान्के ऐसा कहनेपर द्वारकावासी उसे उसी प्रकार देखने लगे ॥ २३ ॥
सत्राजित्ने वह स्यमन्तकमणि अपने घरमें रख दी ॥ २४॥
२७८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
प्रतिदिनं तन्मणिरत्नमष्टौ कनकभारान्- स्रवति ॥ २५ ॥ तत्प्रभावाच्च सकलस्यैव राष्ट्रस्योपसर्गोनावृष्टिब्यालाग्नचोरदुर्भिक्षादिभयं न भवति ॥ २६ ॥ अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नमुग्रसेनस्य भूपतेर्योग्यमेतदिति लिप्सां चक्रे ॥ २७ ॥ गोत्रभेदभयाच्छक्तोऽपि न जहार ॥ २८ ॥
सत्राजिद्वप्यच्युतो मामेतद्याचयिष्यतीत्यवगम्य रत्नलोभाद्भ्रात्रे प्रसेनाय तद्रत्नमदात् ॥ २९ ॥ तच्च शुचिना ध्रियमाणमशेषमेव सुवर्णस्रवादिकं गुणजातमुत्पादयति अन्यथा धारयन्तमेव हन्ती- त्यजानन्नसावपि प्रसेनेनस्तेन कण्ठसक्तेन स्यमन्तके- नाश्वमारुह्याटव्यां मृगयामगच्छत् ॥ ३० ॥ तत्र च सिंहाद्वधमवाप ॥ ३१ ॥ साश्वं च तं निहत्य सिंहोऽप्यमलमणिरत्नमास्याग्रेणादाय गन्तु- मभ्युद्यतः, ऋक्षाधिपतिना जाम्बवता दृष्टो घातितश्च ॥ ३२ ॥ जाम्बवानप्यमलमणिरत्न- मादाय स्वबिले प्रविवेश ॥ ३३ ॥ सुकुमारसंज्ञाय बालकाय च क्रीडनकमकरोत् ॥ ३४ ॥
अनागच्छति तस्मिन्प्रसेने कृष्णो मणिरत्न- मभिलषितवान्स च प्राप्तवान्नूनमेतदस्य कर्मेत्यखिल एव यदुलोकः परस्परं कर्णाकर्ण्य- कथयत् ॥ ३५ ॥
विदितलोकापवादवृत्तान्तश्च भगवान् सर्व- यदुसैन्यपरिवारपरिवृतः प्रसेनाश्वपदवी- मनुससार ॥ ३६ ॥ ददर्श चाश्वसमवेतं प्रसेनं सिंहेन विनिहतम् ॥ ३७ ॥ अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शनकृतपरिशुद्धिः सिंहपदम- नुससार ॥ ३८ ॥ ऋक्षपतिनिहतं च सिंहमप्यल्पे भूमिभागे दृष्ट्वा ततश्च तद्रत्नगौरवादृक्षस्यापि पदान्यनुययौ ॥ ३९ ॥ गिरितटे च सकलमेव तद्यदुसैन्यमवस्थाप्य तत्पदानुसारी ऋक्षबिलं प्रविवेश ॥ ४० ॥
अन्तःप्रविष्टश्च धात्र्याः सुकुमारक- मुल्लालयन्त्या वाणीं शुश्राव ॥ ४१ ॥
वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी ॥ २५ ॥ उसके प्रभावसे सम्पूर्ण राष्ट्रमें रोग, अनावृष्टि तथा सर्प, अग्नि, चोर या दुर्भिक्ष आदिका भय नहीं रहता था ॥ २६ ॥ भगवान् अच्युतको भी ऐसी इच्छा हुई कि यह दिव्य रत्न तो राजा उग्रसेनके योग्य है ॥ २७ ॥ किन्तु जातीय विद्रोहके भयसे समर्थ होते हुए भी उन्होंने उसे छीना नहीं ॥ २८ ॥
सत्राजित्को जब यह मालूम हुआ कि भगवान् मुझसे यह रत्न माँगनेवाले हैं तो उसने लोभवश उसे अपने भाई प्रसेनको दे दिया ॥ २९ ॥ किन्तु इस बातको न जानते हुए कि पवित्रतापूर्वक धारण करनेसे तो यह मणि सुवर्ण-दान आदि अनेक गुण प्रकट करती है और अशुद्धावस्थामें धारण करनेसे घातक हो जाती है, प्रसेन उसे अपने गलेमें बाँधे हुए घोड़ेपर चढ़कर मृगयाके लिये वनको चला गया ॥ ३० ॥ वहाँ उसे एक सिंहने मार डाला ॥ ३१ ॥ जब वह सिंह घोड़ेके सहित उसे मारकर उस निर्मल मणिको अपने मुँहमें लेकर चलनेको तैयार हुआ तो उसी समय ऋक्षराज जाम्बवान्ने उसे देखकर मार डाला ॥ ३२ ॥ तदनन्तर उस निर्मल मणिरत्नको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें आया ॥ ३३ ॥ और उसे सुकुमार नामक अपने बालकके लिये खिलौना बना लिया ॥ ३४ ॥
प्रसेनके न लौटनेपर सब यादवोंमें आपसमें यह कानाफूँसी होने लगी कि “कृष्ण इस मणिरत्नको लेना चाहते थे, अवश्य ही इन्होंने उसे ले लिया है— निश्चय यह इन्हींका काम है” ॥ ३५ ॥
इस लोकापवादका पता लगनेपर सम्पूर्ण यादवसेनाके सहित भगवान्ने प्रसेनके घोड़ेके चरण-चिह्नोंका अनुसरण किया और आगे जाकर देखा कि प्रसेनको घोड़ेसहित सिंहने मार डाला है ॥ ३६-३७ ॥ फिर सब लोगोंके बीच सिंहके चरण-चिह्न देख लिये जानेसे अपनी सफाई हो जानेपर भी भगवान्ने उन चिह्नोंका अनुसरण किया और थोड़ी ही दूरीपर ऋक्षराजद्वारा मारे हुए सिंहको देखा; किन्तु उस रत्नके महत्त्वके कारण उन्होंने जाम्बवान्के पद- चिह्नोंका भी अनुसरण किया ॥ ३८-३९ ॥ और सम्पूर्ण यादव-सेनाको पर्वतके तटपर छोड़कर ऋक्षराजके चरणोंका अनुसरण करते हुए स्वयं उनकी गुफामें घुस गये ॥ ४० ॥
भीतर जानेपर भगवान्ने सुकुमारको बहलाती हुई धात्रीकी यह वाणी सुनी— ॥ ४१ ॥
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २७९
[संस्कृत]
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ ४२
इत्याकर्ण्योपलब्धस्यमन्तकोऽन्तःप्रविष्टः कुमारक्रीडनकीकृतं च धात्र्या हस्ते तेजोभिर्ज्वल्यमानं स्यमन्तकं ददर्श ॥ ४३ ॥ तं च स्यमन्तकाभिलषितचक्षुषमपूर्वपुरुषमागतं समवेक्ष्य धात्री त्राहि त्राहीति व्याजहार ॥ ४४ ॥
तदार्त्तरवश्रवणानन्तरं चामर्षपूर्णहृदयः स जाम्बवानाजगाम ॥ ४५ ॥ तयोश्च परस्परमुद्धतामर्षयोर्युद्धमेकविंशतिदिनान्यभवत् ॥ ४६ ॥ ते च यदुसैनिकास्तत्र सप्ताष्टदिनानि तन्निष्क्रान्तिमुदीक्षमाणास्तस्थुः ॥ ४७ ॥ अनिष्क्रमणे च मधुरिपुरसाववश्यमत्र बिलेऽत्यन्तं नाशमवाप्तो भविष्यत्यन्यथा तस्य जीवतः कथमेतावन्ति दिनानि शत्रुजये व्याक्षेपो भविष्यतीति कृताध्यवसाया द्वारकामागम्य हतः कृष्ण इति कथयामासुः ॥ ४८ ॥ तद्वान्धवाश्च तत्कालोचितमखिलमुत्तरक्रियाकलापं चक्रुः ॥ ४९ ॥
ततश्चास्य युद्ध्यमानस्यातिश्रद्धादत्तविशिष्टोपपात्रयुक्तान्नतोयादिना श्रीकृष्णस्य बलप्राणपुष्टिरभूत् ॥ ५० ॥ इतरस्यानुदिनमतिगुरुपुरुषभेद्यमानस्य अतिनिष्ठुरप्रहारपातपीडिताखिलावयवस्य निराहारतया बलहानिरभूत् ॥ ५१ ॥ निर्जितश्च भगवता जाम्बवान्प्रणिपत्य व्याजहार ॥ ५२ ॥ सुरासुरगन्धर्वयक्षराक्षसादिभिरप्यखिलैर्भगवान् जेतुं शक्यः किमुतावनिगोचरैरल्पवीर्यैर्नर्नरवयवभूतैश्च तिर्यग्योन्यनुसृतिभिः किं पुनरस्मद्विधैरवश्यं भवताऽस्मत्स्वामिना रामेणेव नारायणस्य सकलजगत्परायणस्यांशेन भगवता भवितव्यमित्युक्तस्तस्मै भगवानखिलावनिभारावतरणार्थमवतरणमाचचक्षे ॥ ५३ ॥ प्रीत्यभिव्यज्जितकरतलस्पर्शनेन चैनमपगतयुद्धखेदं चकार ॥ ५४ ॥
[हिन्दी अनुवाद]
सिंहने प्रसेनको मारा और सिंहको जाम्बवान्ने; हे सुकुमार ! तू रो मत यह स्यमन्तकमणि तेरी ही है ॥ ४२ ॥
यह सुननेसे स्यमन्तकका पता लगनेपर भगवान्ने भीतर जाकर देखा कि सुकुमारके लिये खिलौना बनी हुई स्यमन्तकमणि धात्रीके हाथपर अपने तेजसे देदीप्यमान हो रही है ॥ ४३ ॥ स्यमन्तकमणिकी ओर अभिलाषापूर्ण दृष्टिसे देखते हुए एक विलक्षण पुरुषको वहाँ आया देख धात्री ‘त्राहि-त्राहि’ करके चिल्लाने लगी ॥ ४४ ॥
उसकी आर्त्त-वाणीको सुनकर जाम्बवान् क्रोधपूर्ण हृदयसे वहाँ आया ॥ ४५ ॥ फिर परस्पर रोष बढ़ जानेसे उन दोनोंका इक्कीस दिनतक घोर युद्ध हुआ ॥ ४६ ॥ पर्वतके पास भगवान्की प्रतीक्षा करनेवाले यादव-सैनिक सात-आठ दिनतक उनके गुफासे बाहर आनेकी बाट देखते रहे ॥ ४७ ॥ किन्तु जब इतने दिनोंतक वे उसमेंसे न निकले तो उन्होंने समझा कि ‘अवश्य ही श्रीमघुसूदन इस गुफामें मारे गये, नहीं तो जीवित रहनेपर शत्रुके जीतनेमें उन्हें इतने दिन क्यों लगते ?’ ऐसा निश्चय कर वे द्वारकामें चले आये और वहाँ कह दिया कि श्रीकृष्ण मारे गये ॥ ४८ ॥ उनके बन्धुओंने यह सुनकर समयोचित सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कर्म कर दिये ॥ ४९ ॥
इधर, अति श्रद्धापूर्वक दिये हुए विशिष्ट पात्रोंसहित इनके अन्न और जलसे युद्ध करते समय श्रीकृष्णचन्द्रके बल और प्राणकी पुष्टि हो गयी ॥ ५० ॥ तथा अति महान् पुरुषके द्वारा मर्दित होते हुए उनके अत्यन्त निष्ठुर प्रहारोंके आघातसे पीड़ित शरीरवाले जाम्बवान्का बल निराहार रहनेसे क्षीण हो गया ॥ ५१ ॥ अन्तमें भगवान्से पराजित होकर जाम्बवान्ने उन्हें प्रणाम करके कहा— ॥ ५२ ॥ “भगवन् ! आपको तो देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस आदि कोई भी नहीं जीत सकते, फिर पृथिवीतलपर रहनेवाले अल्पवीर्य मनुष्य अथवा मनुष्योंके अवयवभूत हम-जैसे तिर्यक्-यौनिगत जीवोंकी तो बात ही क्या है ? अवश्य ही आप हमारे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समान सकल लोक-प्रतिपालक भगवान् नारायणके ही अंशसे प्रकट हुए हैं।” जाम्बवान्के ऐसा कहनेपर भगवान्ने पृथिवीका भार उतारनेके लिये अपने अवतार लेनेका सम्पूर्ण वृत्तान्त उससे कह दिया और उसे प्रीतिपूर्वक अपने हाथसे छूकर युद्धके श्रमसे रहित कर दिया ॥ ५३-५४ ॥
२८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
| स च प्रणिपत्य पुनरप्येनं प्रसाद्य जाम्बवतीं नाम कन्यां गृहागतायार्घ्यभूतां ग्राहयामास ॥ ५५ ॥ स्यमन्तकaccessorमणिरत्नमपि प्रणिपत्य तस्मै प्रददौ ॥ ५६ ॥ अच्युतोऽप्यतिप्रणतात्तस्माद्ग्राह्यमपि तन्मणिरत्नमात्मसंशोधनाय जग्राह ॥ ५७ ॥ सह जाम्बवत्या स द्वारकामाजगाम ॥ ५८ ॥ | तदनन्तर जाम्बवान्ने पुनः प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न किया और घरपर आये हुए भगवान्के लिये अर्घ्यस्वरूप अपनी जाम्बवती नामकी कन्या दे दी तथा उन्हें प्रणाम करके मणिरत्न स्यमन्तक भी दे दिया ॥ ५५-५६ ॥ भगवान् अच्युतने भी उस अति विनीतसे लेनेयोग्य न होनेपर भी अपने कलंक-शोधनके लिये वह मणिरत्न ले लिया और जाम्बवतीके सहित द्वारकामें आये ॥ ५७-५८ ॥ |
| भगवदागमनोद्भूतहर्षोत्कर्षस्य द्वारकावासिजनस्य कृष्णावलोकनात्तत्क्षणमेवातिपरिणतवयसोऽपि नवयौवनमिवाभवत् ॥ ५९ ॥ दिष्ट्यादिष्ट्येति सकलयादवाः स्त्रियश्च सभाजयामासुः ॥ ६० ॥ भगवानपि यथानुभूतमशेषं यादवसमाजे यथावदाचचक्षे ॥ ६१ ॥ स्यमन्तकं च सत्राजिते दत्त्वा मिथ्याभिशस्तिपरिशुद्धिमवाप ॥ ६२ ॥ जाम्बवतीं चान्तःपुरे निवेशयामास ॥ ६३ ॥ | उस समय भगवान् कृष्णचन्द्रके आगमनसे जिनके हर्षका वेग अत्यन्त बढ़ गया है उन द्वारकावासियोंमेंसे बहुत ढली हुई अवस्थावालोंमें भी उनके दर्शनके प्रभावसे तत्काल ही मानो नवयौवनका संचार हो गया ॥ ५९ ॥ तथा सम्पूर्ण यादवगण और उनकी स्त्रियाँ 'अहोभाग्य ! अहोभाग्य !!' ऐसा कहकर उनका अभिवादन करने लगीं ॥ ६० ॥ भगवान्ने भी जो-जो बात जैसे-जैसे हुई थी वह ज्यों-की-त्यों यादव-समाजमें सुना दी और सत्राजित्को स्यमन्तकमणि देकर मिथ्या कलंकसे छुटकारा पा लिया। फिर जाम्बवतीको अपने अन्तःपुरमें पहुँचा दिया ॥ ६१-६३ ॥ |
| सत्राजिदपि मयास्याभूतमलिनमारोपितमिति जातसन्त्रासात्स्वसुतां सत्यभामां भगवते भार्यार्थं ददौ ॥ ६४ ॥ तां चाक्रूरकृतवर्मशतधन्वप्रमुखा यादवाः प्राग्वरयाम्बभूवुः ॥ ६५ ॥ ततस्तत्प्रदानादवज्ञातमेवात्मानं मन्यमानाः सत्राजिति वैरानुबन्धं चक्रुः ॥ ६६ ॥ | सत्राजित्ने भी यह सोचकर कि मैंने ही कृष्णचन्द्रको मिथ्या कलंक लगाया था, डरते-डरते उन्हें पत्नीरूपसे अपनी कन्या सत्यभामा विवाह दी ॥ ६४ ॥ उस कन्याको अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा आदि यादवोंने पहले वरण किया था ॥ ६५ ॥ अतः श्रीकृष्णचन्द्रके साथ उसे विवाह देनेसे उन्होंने अपना अपमान समझकर सत्राजित्से वैर बाँध लिया ॥ ६६ ॥ |
| अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च शतधन्वानमूचुः ॥ ६७ ॥ अयमतीव दुरात्मा सत्राजिद् योऽस्माभिर्भवता च प्रार्थितोऽप्यात्मजामस्मान् भवन्तं चाविगणय्य कृष्णाय दत्तवान् ॥ ६८ ॥ तदलमनेन जीवता घातयित्वैनं तन्महारत्नं स्यमन्तकाख्यं त्वया किं न गृह्यते वयमभ्युपपत्स्यामो यद्यच्युतस्तवोपरि वैरानुबन्धं करिष्यतीत्येवमुक्तस्तथेत्यसावप्याह ॥ ६९ ॥ | तदनन्तर अक्रूर और कृतवर्मा आदिने शतधन्वासे कहा— ॥ ६७ ॥ "यह सत्राजित् बड़ा ही दुष्ट है, देखो, इसने हमारे और आपके माँगनेपर भी हमलोगोंको कुछ भी न समझकर अपनी कन्या कृष्णचन्द्रको दे दी ॥ ६८ ॥ अतः अब इसके जीवनका प्रयोजन ही क्या है; इसको मारकर आप स्यमन्तक महामणि क्यों नहीं ले लेते हैं? पीछे, यदि अच्युत आपसे किसी प्रकारका विरोध करेंगे तो हमलोग भी आपका साथ देंगे।" उनके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने कहा—"बहुत अच्छा, ऐसा ही करेंगे" ॥ ६९ ॥ |
| जतुगृहदग्धानां पाण्डुतनयानां विदितपरमार्थोऽपि भगवान् दुर्योधनप्रयत्नशैथिल्यकरणार्थं कुल्यकरणाय वारणावतं गतः ॥ ७० ॥ | इसी समय पाण्डवोंके लाक्षागृहमें जलनेपर, यथार्थ बातको जानते हुए भी भगवान् कृष्णचन्द्र दुर्योधनके प्रयत्नको शिथिल करनेके उद्देश्यसे कुलोचित कर्म करनेके लिये वारणावत नगरको गये ॥ ७० ॥ |
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८१
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| गते च तस्मिन् सुप्तमेव सत्राजितं शतधन्वा जघान मणिरत्नं चाददात् ॥ ७१ ॥ पितृवधामर्षपूर्णा च सत्यभामा शीघ्रं स्यन्दनमारूढा वारणावतं गत्वा भगवतेऽहं प्रतिपादितेत्यक्षान्तिमतो शतधन्वनास्मत्पिता व्यापादितस्तच्च स्यमन्तक-मणिरत्नमपहृतं यस्यावभासनेनापहततिमिरं त्रैलोक्यं भविष्यति ॥ ७२ ॥ तदियं त्वदीयापहासना तदालोच्य यदत्र युक्तं तत्क्रियतामिति कृष्णमाह ॥ ७३ ॥<br><br>तया चैवमुक्तः परितुष्टान्तःकरणोऽपि कृष्णः सत्यभामाममर्षताम्रनयनः प्राह ॥ ७४ ॥ सत्ये सत्यं ममैवैषापहासना नाहमेतां तस्य दुरात्मनस्सहिष्ये ॥ ७५ ॥ न ह्यनुल्लंघ्य वरपादपं तत्कृतनीडाश्रयिणो विहङ्गमा वध्यन्ते तदलमुमुनास्मत्पुरतः शोकप्रेरितवाक्यपरिकरेणेत्युक्त्वा द्वारकामभ्येत्येकान्ते बलदेवं वासुदेवः प्राह ॥ ७६ ॥<br><br>मृगयागतं प्रसेनमटव्यां मृगपतिर्जघान ॥ ७७ ॥<br>सत्राजिदप्यधुना शतधन्वना निधनं प्रापितः ॥ ७८ ॥<br>तदुभयविनाशात्तन्मणिरत्नमावाभ्यां सामान्यं भविष्यति ॥ ७९ ॥<br>तदुत्तिष्ठारुह्यतां रथः शतधन्वनिधनायोद्यमं कुर्वित्यभिहितस्तथेति समन्विप्सितवान् ॥ ८० ॥<br><br>कृतोद्यमौ च तावुभावुपलभ्य शतधन्वा कृतवर्माणमुपेत्य पार्ष्णिपूरणकर्मनिमित्तमचोदयत् ॥ ८१ ॥ आह चैनं कृतवर्मा ॥ ८२ ॥<br>नाहं बलदेववासुदेवाभ्यां सह विरोधायालमित्युक्तश्चाक्रूरमचोदयत् ॥ ८३ ॥ असावप्याह ॥ ८४ ॥<br><br>न हि कश्चिद्भगवता पादप्रहारपरिकम्पितजगतत्रयेण सुररिपुवनितावैधव्यकारिणा प्रबलरिपुचक्राप्रतिहतचक्रेण चक्रिणा मदमुदितनयनावलोकिताखिलनशातनेनातिगुरुवैरिवारणापकर्षणाविकृतमहिमोरुसीरेण सीरिणा च सह सकलजगद्वन्द्यानाममरवराणामपि योद्धुं समर्थः किमुताहम् ॥ ८५ ॥ | उनके चले जानेपर शतधन्वाने सोते हुए सत्राजित्को मारकर वह मणिरत्न ले लिया ॥ ७१ ॥ पिताके वधसे क्रोधित हुई सत्यभामा तुरन्त ही रथपर चढ़कर वारणावत नगरमें पहुँची और भगवान् कृष्णसे बोली—"भगवन्! पिताजीने मुझे आपके करकमलोंमें सौंप दिया—इस बातको सहन न कर सकनेके कारण शतधन्वाने मेरे पिताजीको मार दिया है और उस स्यमन्तक नामक मणिरत्नको ले लिया है जिसके प्रकाशसे सम्पूर्ण त्रिलोकी भी अन्धकारशून्य हो जायगी ॥ ७२ ॥ इसमें आपकीही हँसी है इसलिये सब बातोंका विचार करके जैसा उचित समझें, करें" ॥ ७३ ॥<br><br>सत्यभामाके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होनेपर भी उनसे क्रोधसे आँखें लाल करके कहा— ॥ ७४ ॥ "सत्ये! अवश्य इसमें मेरी ही हँसी है, उस दुरात्माके इस कुकर्मको मैं सहन नहीं कर सकता, क्योंकि यदि ऊँचे वृक्षका उल्लंघन न किया जा सके तो उसपर घोंसला बनाकर रहनेवाले पक्षियोंको नहीं मार दिया जाता। [अर्थात् बड़े आदमियोंसे पार न पानेपर उनके आश्रितोंको नहीं दबाना चाहिये।] इसलिये अब तुम्हें हमारे सामने इन शोक-प्रेरित वाक्योंके कहनेकी और आवश्यकता नहीं है। [तुम शोक छोड़ दो, मैं इसका भली प्रकार बदला चुका दूँगा।]'' सत्यभामासे इस प्रकार कह भगवान् वासुदेवने द्वारकामें आकर श्रीबलदेवजीसे एकान्तमें कहा— ॥ ७५-७६ ॥ 'वनमें आखेटके लिये गये हुए प्रसेनको तो सिंहने मार दिया था ॥ ७७ ॥ अब शतधन्वाने सत्राजित्को भी मार दिया है ॥ ७८ ॥ इस प्रकार उन दोनोंके मारे जानेपर मणिरत्न स्यमन्तकपर हम दोनोंका समान अधिकार होगा ॥ ७९ ॥ इसलिये उठिये और रथपर चढ़कर शतधन्वाके मारनेका प्रयत्न कीजिये।' कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर बलदेवजीने भी 'बहुत अच्छा' कह उसे स्वीकार किया ॥ ८० ॥<br><br>कृष्ण और बलदेवको [अपने वधके लिये] उद्यत जान शतधन्वाने कृतवर्माके पास जाकर सहायताके लिये प्रार्थना की ॥ ८१ ॥ तब कृतवर्माने इससे कहा— ॥ ८२ ॥ 'मैं बलदेव और वासुदेवसे विरोध करनेमें समर्थ नहीं हूँ।' उसके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने अक्रूरसे सहायता माँगी, तो अक्रूरने भी कहा— ॥ ८३-८४ ॥ 'जो अपने पाद-प्रहारसे त्रिलोकीको कम्पायमान कर देते हैं, देवशत्रु असुरगणकी स्त्रियोंको वैधव्यदान देते हैं तथा अति प्रबल शत्रु-सेनासे भी जिनका चक्र अप्रतिहत रहता है उन चक्रधारी भगवान् वासुदेवसे तथा जो अपने मदोन्मत्त नयनोंकी चितवनसे सबका दमन करनेवाले और भयंकर शत्रुसमूहरूप हाथियोंको खींचनेके लिये अखण्ड महिमाशाली प्रचण्ड हल धारण करनेवाले हैं उन श्रीहलधरसे युद्ध करनेमें तो निखिल-लोक-वन्दनीय देवगणमें भी कोई समर्थ नहीं है फिर मेरी तो बात ही क्या है? ॥ ८५ ॥ |
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२८२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
| तदन्यश्शरणमभिलष्यतामित्युक्तश्शतधनु-<br>राह॥८६॥ यद्यस्मत्परित्राणासमर्थ<br>भवानात्मानमधिगच्छति तदयमस्मत्तस्तावन्मणिः<br>संगृह्य रक्ष्यतामिति ॥८७॥ एवमुक्तः<br>सोऽप्याह॥८८॥ यद्यन्तायामप्यवस्थायां न<br>कस्मैचिद्भगवान् कथयिष्यति तदहमेतं<br>ग्रहीष्यामीति॥८९॥ तथेत्युक्ते चाक्रूरस्तन्मणिरत्नं<br>जग्राह॥९०॥ | इसलिये तुम दूसरेकी शरण लो' अक्रूरके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने कहा—॥८६॥ 'अच्छा, यदि मेरी रक्षा करनेमें आप अपनेको सर्वथा असमर्थ समझते हैं तो मैं आपको यह मणि देता हूँ इसे लेकर इसीकी रक्षा कीजिये'॥८७॥ इसपर अक्रूरने कहा—॥८८॥ 'मैं इसे तभी ले सकता हूँ जब कि अन्तकाल उपस्थित होनेपर भी तुम किसीसे भी यह बात न कहो॥८९॥ शतधन्वाने कहा—'ऐसा ही होगा।' इसपर अक्रूरने वह मणिरत्न अपने पास रख लिया॥९०॥ |
|---|---|
| शतधनुरप्यतुलवेगां शतयोजनवाहिनीं<br>वडवामारुह्यापक्रान्तः॥९१॥ शैव्यसुग्रीव-<br>मेघपुष्पबलाहकाश्वचतुष्टययुक्तरथस्थितौ<br>बलदेववासुदेवौ तमनुप्रयातौ॥९२॥ सा च वडवा<br>शतयोजनप्रमाणमार्गमतीता पुनरपि वाह्यमाना<br>मिथिलावनोद्देशे प्राणानुत्ससर्ज॥९३॥<br>शतधनुरपि तां परित्यज्य पदातिरेवाद्ववत्॥९४॥<br>कृष्णोऽपि बलभद्रमाह ॥९५॥ तावदत्र स्यन्दने<br>भवता स्थेयमहमेनमधमाचारं पदातिरेव<br>पदातिमनुगम्य यावद्घातयामि अत्र हि भूभागे<br>दृष्टदोषास्सम्भया अतो नैतेऽश्वा भवतेमं भूमि-<br>भागमुल्लङ्घनीयाः॥९६॥ तथेत्युक्त्वा बलदेवो<br>रथ एव तस्थौ॥९७॥ | तदनन्तर शतधन्वा सौ योजनतक जानेवाली एक अत्यन्त वेगवती घोड़ीपर चढ़कर भागा॥९१॥ और शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नामक चार घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर बलदेव और वासुदेवने भी उसका पीछा किया॥९२॥ सौ योजन मार्ग पार कर जानेपर पुनः आगे ले जानेसे उस घोड़ीने मिथिला देशके वनमें प्राण छोड़ दिये॥९३॥ तब शतधन्वा उसे छोड़कर पैदल ही भागा॥९४॥ उस समय श्रीकृष्णचन्द्रने बलभद्रजीसे कहा—॥९५॥ 'आप अभी रथमें ही रहिये मैं इस पैदल दौड़ते हुए दुराचारीको पैदल जाकर ही मारे डालता हूँ। यहाँ [घोड़ीके मरने आदि] दोषोंको देखनेसे घोड़े भयभीत हो रहे हैं, इसलिये आप इन्हें और आगे न बढ़ाइयेगा॥९६॥ तब बलदेवजी 'अच्छा' ऐसा कहकर रथमें ही बैठे रहे॥९७॥ |
| कृष्णोऽपि द्विक्रोशमात्रं भूमिभागमनुसृत्य<br>दूरस्थितस्यैव चक्रं क्षिप्त्वा शतधनुषशिर-<br>श्शिच्छेद॥९८॥ तच्छरीराम्बरादिषु च बहुप्रकार-<br>मन्विच्छन्नपि स्यमन्तकमणिं नावाप यदा तदोपगम्य<br>बलभद्रमाह॥९९॥ वृथैवास्माभिः शतधनुर्घातितो<br>न प्राप्तमखिलजगत्सारभूतं तन्महारत्नं<br>स्यमन्तकाख्यमित्याकर्ण्योद्भूतकोपो बलदेवो | श्रीकृष्णचन्द्रने केवल दो ही कोसतक पीछाकर अपना चक्र फेंक दूर होनेपर भी शतधन्वाका सिर काट डाला॥९८॥ किन्तु उसके शरीर और वस्त्र आदिमें बहुत कुछ ढूँढ़नेपर भी जब स्यमन्तकमणिको न पाया तो बलभद्रजीके पास जाकर उनसे कहा—॥९९॥ "हमने शतधन्वाको व्यर्थ ही मारा, क्योंकि उसके पास सम्पूर्ण संसारकी सारभूत स्यमन्तकमणि तो मिली ही नहीं।' यह सुनकर बलदेवजीने [यह समझकर कि श्रीकृष्णचन्द्र उस मणिको छिपानेके लिये ही ऐसी बातें बना रहे हैं] |
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८३
| वासुदेवमाह ॥१००॥ धिक्त्वां यस्त्वमेवमर्थ- | क्रोधपूर्वक भगवान् वासुदेवसे कहा— ॥१००॥ 'तुमको |
|---|---|
| लिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान्मया क्षान्तं तदयं | धिक्कार है, तुम बड़े ही अर्थलोलुप हो; भाई होनेके कारण |
| पन्थास्स्वेच्छया गम्यतां न मे द्वारक्या न त्वया न | ही मैं तुम्हें क्षमा किये देता हूँ। तुम्हारा मार्ग खुला हुआ है, |
| चाशेषबन्धुभिः कार्यमलमलमेभिर्मामाग्रतो- | तुम खुशीसे जा सकते हो। अब मुझे तो द्वारकासे, तुमसे |
| ऽलीकशपथैरित्याक्षिप्य तत्कथां कथञ्चित्प्रसाद्य- | अथवा और सब सगे-सम्बन्धियोंसे कोई काम नहीं है। |
| मानोऽपि न तस्थौ॥१०१॥ स विदेहपुरीं | बस, मेरे आगे इन थोथी शपथोंका अब कोई प्रयोजन |
| प्रविवेश ॥१०२॥ | नहीं।' इस प्रकार उनकी बातको काटकर बहुत कुछ |
| जनकराजश्चार्घ्यपूर्वकमेनं गृहं प्रवेश- | मनानेपर भी वे वहाँ न रुके और विदेहनगरको चले |
| यामास ॥१०३॥ स तत्रैव च तस्थौ ॥१०४॥ | गये ॥१०१-१०२॥ |
| वासुदेवोऽपि द्वारकामाजगाम ॥१०५॥ यावच्च | विदेहनगरमें पहुँचनेपर राजा जनक उन्हें अर्घ्य |
| जनकराजगृहे बलभद्रोऽवतस्थे तावद्धार्त्त- | देकर अपने घर ले आये और वे वहीं रहने |
| राष्ट्रो दुर्योधनस्तत्सकाशाद्गदाशिक्षाम- | लगे ॥१०३-१०४॥ इधर भगवान् वासुदेव द्वारकामें |
| शिक्षयत् ॥१०६॥ वर्षत्रयान्ते च | चले आये ॥१०५॥ जितने दिनोंतक बलदेवजी राजा |
| बभ्रूग्रसेनप्रभृतिभिर्यादवैर्र्न तद्रत्नं | जनकके यहाँ रहे उतने दिनतक धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन |
| कृष्णेनापहृतमिति कृतावगतिर्विदेहनगरीं गत्वा | उनसे गदायुद्ध सीखता रहा ॥१०६॥ अनन्तर बभ्रु और |
| बलदेवस्सम्प्रत्याय्य द्वारकामानीतः ॥१०७॥ | उग्रसेन आदि यादवोंके, जिन्हें यह ठीक मालूम था कि |
| अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूतसुवर्णेन | 'कृष्णने स्यमन्तकमणि नहीं ली है', विदेहनगरमें जाकर |
| भगवद्ध्यानपरोऽनवरतं यज्ञानियाज ॥१०८॥ | शपथपूर्वक विश्वास दिलानेपर बलदेवजी तीन वर्ष |
| सवनगतौ हि क्षत्रियवैश्यौ निघ्ननब्रह्महा | पश्चात् द्वारकामें चले आये ॥१०७॥ |
| भवतीत्येवम्प्रकारं दीक्षाकवचं प्रविष्ट | अक्रूरजी भी भगवद्ध्यान-परायण रहते हुए उस |
| एव तस्थौ ॥१०९॥ द्विषष्टिवर्षाण्येवं | मणिरत्नसे प्राप्त सुवर्णके द्वारा निरन्तर यज्ञानुष्ठान करने |
| तन्मणिप्रभावात्तत्रोपसर्गदुर्भिक्षमारिकामरणादिकं | लगे ॥१०८॥ यज्ञ-दीक्षित क्षत्रिय और वैश्योंके मारनेसे |
| नाभूत् ॥११०॥ अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैश्शत्रुघ्ने | ब्रह्महत्या होती है, इसलिये अक्रूरजी सदा यज्ञदीक्षारूप |
| सात्वतस्य प्रपौत्रे व्यापादिते भोजैस्सहा- | कवच धारण ही किये रहते थे ॥१०९॥ उस मणिके प्रभावसे |
| क्रूरो द्वारकामपहायापक्रान्तः ॥१११॥ | बासठ वर्षतक द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, महामारी या मृत्यु |
| तदपक्रान्तिदिनादारभ्य तत्रोपसर्गदुर्भिक्षव्या- | आदि नहीं हुए ॥११०॥ फिर अक्रूर-पक्षीय भोजवंशियोंद्वारा |
| लानावृष्टिमरिकाद्युपद्रवा बभूवुः ॥११२॥ | सात्वतके प्रपौत्र शत्रुघ्नके मारे जानेपर भोजोंके साथ अक्रूर |
| अथ यादवबलभद्रोग्रसेनसमवेतो मन्त्र- | भी द्वारकाको छोड़कर चले गये ॥१११॥ उनके जाते ही, |
| ममन्त्रयद् भगवानुरगारिकेतनः ॥११३॥ | उसी दिनसे द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, सर्प, अनावृष्टि और |
| किमिदमेकदैव प्रचुरोपद्रवागमनमेतदालोच्यता- | मरी आदि उपद्रव होने लगे ॥११२॥ |
| मित्युकतेऽन्धकनामा यदुवृद्धः प्राह ॥११४॥ | तब गरुडध्वज भगवान् कृष्ण बलभद्र और |
| अस्याक्रूरस्य पिता श्वफल्को यत्र यत्राभूत्तत्र | उग्रसेन आदि यदुवंशियोंके साथ मिलकर सलाह करने |
| तत्र दुर्भिक्षमारिकानावृष्ट्यादिकं नाभूत् ॥११५॥ | लगे ॥११३॥ 'इसका क्या कारण है जो एक साथ ही |
| काशिराजस्य विषये त्वनावृष्ट्या च श्वफल्को | इतने उपद्रवोंका आगमन हुआ, इसपर विचार करना |
| चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर अन्धक नामक एक | |
| वृद्ध यादवने कहा— ॥११४॥ 'अक्रूरके पिता श्वफल्क | |
| जहाँ-जहाँ रहते थे वहाँ-वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी और | |
| अनावृष्टि आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे ॥११५॥ | |
| एक बार काशिराजके देशमें अनावृष्टि हुई थी। तब |
२८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
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### **[संस्कृत मूल]**
नीतः ततश्च तत्क्षणाद्देवो ववर्ष ॥ १९६ ॥
काशिराजपत्नयाश्च गर्भे कन्यारत्नं पूर्वमासीत् ॥ १९७ ॥ सा च कन्या पूर्णेऽपि प्रसूतिकोले नैव निश्चक्राम ॥ १९८ ॥ एवं च तस्य गर्भस्य द्वादशवर्षाण्यनिष्क्रामतो ययुः ॥ १९९ ॥ काशिराजश्च तामात्मजां गर्भस्थामाह ॥ १२० ॥ पुत्रि कस्मान्न जायसे निष्क्रम्यतामास्यं ते द्रष्टुमिच्छामि एतां च मातरं किमिति चिरं क्लेशयसीत्युक्ता गर्भस्थैव व्याजहार ॥ १२१ ॥ तात यद्येकैकां गां दिने दिने ब्राह्मणाय प्रयच्छसि तदाहमन्यैस्त्रिभिर्वर्षैरस्माद्गर्भात्तावदवश्यं निष्क्रमिष्यामीत्येतद्वचनमाकर्ण्य राजा दिने दिने ब्राह्मणाय गां प्रादात् ॥ १२२ ॥ सापि तावता कालेन जाता ॥ १२३ ॥
ततस्तस्याः पिता गान्दिनीति नाम चकार ॥ १२४ ॥ तां च गान्दिनीं कन्यां श्वफल्कायोपकारिणे गृहमागतायार्घ्यभूतां प्रादात् ॥ १२५ ॥ तस्यामयमक्रूरः श्वफल्काज्जज्ञे ॥ १२६ ॥ तस्यैवंगुणमिथुनादुत्पत्तिः ॥ १२७ ॥ तत्कथमस्मिन्नपक्रान्तेऽत्र दुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवा न भविष्यन्ति ॥ १२८ ॥ तदयमत्रानीयतामलमतिगुणवत्यपराधान्वेषणेनेति यदुवृद्धस्यान्धकस्यैतद्वचनमाकर्ण्य केशवोग्रसेनबलभद्रपुरोगमैर्यदुभिः कृतापराधतितिक्षुभिरभयं दत्त्वा श्वफल्कपुत्रः स्वपुरमानीतः ॥ १२९ ॥ तत्र चागतमात्र एव तस्य स्यमन्तकमणेः प्रभावादनावृष्टिमारिकादुर्भिक्षव्यालाद्युपद्रवोपशमा बभूवुः ॥ १३० ॥
कृष्णश्चिन्तयामास ॥ १३१ ॥ स्वल्पमेतत्कारणं यदयं गान्दिन्यां श्वफल्केनाक्रूरो जनितः ॥ १३२ ॥ सुमहांश्चायमनावृष्टिदुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवप्रतिषेधकारी प्रभावः ॥ १३३ ॥ तन्नूनमस्य सकाशे स महामणिः स्यमन्तकाख्यस्तिष्ठति ॥ १३४ ॥ तस्य ह्येवंविधाः प्रभावाः श्रूयन्ते ॥ १३५ ॥ अयमपि च यज्ञादनन्तर-
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### **[हिन्दी अनुवाद]**
श्वफल्कको वहाँ ले जाते ही तत्काल वर्षा होने लगी ॥ १९६ ॥
उस समय काशिराजकी रानीके गर्भमें एक कन्यारत्न थी ॥ १९७ ॥ वह कन्या प्रसूतिकालके समाप्त होनेपर भी गर्भसे बाहर न आयी ॥ १९८ ॥ इस प्रकार उस गर्भको प्रसव हुए बिना बारह वर्ष व्यतीत हो गये ॥ १९९ ॥ तब काशिराजने अपनी उस गर्भस्थिता पुत्रीसे कहा— ॥ १२० ॥ 'बेटी ! तू उत्पन्न क्यों नहीं होती ? बाहर आ, मैं तेरा मुख देखना चाहता हूँ ॥ १२१ ॥ अपनी इस माताको तू इतने दिनोंसे क्यों कष्ट दे रही है ?' राजाके ऐसा कहनेपर उसने गर्भमें रहते हुए ही कहा—'पिताजी ! यदि आप प्रतिदिन एक गौ ब्राह्मणको दान देंगे तो अगले तीन वर्ष बीतनेपर मैं अवश्य गर्भसे बाहर आ जाऊँगी।' इस बातको सुनकर राजा प्रतिदिन ब्राह्मणको एक गौ देने लगे ॥ १२२ ॥ तब उतने समय (तीन वर्ष) बीतनेपर वह उत्पन्न हुई ॥ १२३ ॥
पिताने उसका नाम गान्दिनी रखा ॥ १२४ ॥ और उसे अपने उपकारक श्वफल्कको घर आनेपर अर्घ्यरूपसे दे दिया ॥ १२५ ॥ उसीसे श्वफल्कके द्वारा इन अक्रूरजीका जन्म हुआ है ॥ १२६ ॥ इनकी ऐसी गुणवान् माता-पितासे उत्पत्ति है तो फिर उनके चले जानेसे यहाँ दुर्भिक्ष और महामारी आदि उपद्रव क्यों न होंगे ? ॥ १२७-१२८ ॥ अतः उनको यहाँ ले आना चाहिये, अति गुणवान्के अपराधकी अधिक जाँच-पड़ताल करना ठीक नहीं है। यादववृद्ध अन्धकके ऐसे वचन सुनकर कृष्ण, उग्रसेन और बलभद्र आदि यादव श्वफल्कपुत्र अक्रूरके अपराधको भुलाकर उन्हें अभयदान देकर अपने नगरमें ले आये ॥ १२९ ॥ उनके वहाँ आते ही स्यमन्तकमणिके प्रभावसे अनावृष्टि, महामारी, दुर्भिक्ष और सर्पभय आदि सभी उपद्रव शान्त हो गये ॥ १३० ॥
तब श्रीकृष्णचन्द्रने विचार किया ॥ १३१ ॥ 'अक्रूरका जन्म गान्दिनीसे श्वफल्कके द्वारा हुआ है यह तो बहुत सामान्य कारण है ॥ १३२ ॥ किन्तु अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि उपद्रवोंको शान्त कर देनेवाला इसका प्रभाव तो अति महान् है ॥ १३३ ॥ अवश्य ही इसके पास वह स्यमन्तक नामक महामणि है ॥ १३४ ॥ उसीका ऐसा प्रभाव सुना जाता है ॥ १३५ ॥ इसे भी हम देखते हैं कि एक यज्ञके पीछे दूसरा और दूसरेके पीछे तीसरा इस प्रकार
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८५
मन्यत्क्रत्वन्तरं तस्यानन्तरमन्यद्यज्ञान्तरं चाजस्त्र- मविच्छिन्नं यजतीति ॥ १३६ ॥ अल्पोपादानं चास्यासंशयमतासौ मणिवरस्तिष्ठतीति कृताध्यवसायोऽन्यत्प्रयोजनमुद्दिश्य सकलयादव- समाजमात्मगृह एवाचीकरत् ॥ १३७ ॥ तत्र चोपविष्टेष्वखिलेषु यदुषु पूर्वं प्रयोजन- मुपन्यस्य पर्यवसित च तस्मिन् प्रसंगान्तरपरिहास- कथामक्रूरेण कृत्वा जनार्दनस्तमक्रूरमाह ॥ १३८ ॥ दानपते जानीम एव वयं यथा शतधन्वना तदिदमखिलजगत्सारभूतं स्यमन्तकं रत्नं भवतः समर्पितं तदशेषराष्ट्रोपकारकं भवत्सकाशे तिष्ठति तिष्ठतु सर्व एव वयं तत्प्रभावफलभुजः किं त्वेष बलभद्रोऽस्मा- नाश्ङ्कितवांस्तदस्मत्प्रीतये दर्शयस्वेत्यभिधाय जोषं स्थिते भगवति वासुदेवे सरत्नस्सो- ऽचिन्तयत् ॥ १३९ ॥ किमत्रानुष्ठेयमन्यथा चेद् ब्रवीम्यहं तत्केवलाम्बरतिरोधानमन्विष्यन्तो रत्नमेते द्रक्ष्यन्ति अतिविरोधो न क्षेम इति सञ्चिन्त्य तमखिलजगत्कारणभूतं नारायणमाहाक्रूरः ॥ १४० ॥ भगवन्मैतत्- स्यमन्तरत्नं शतधनुषा समर्पितमपगते च तस्मिन्नद्य श्वः परश्वो वा भगवान् याचयिष्यतीति कृतमतिरतिकृच्छ्रेणैतावन्तं काल- मधारयम् ॥ १४१ ॥ तस्य च धारणक्लेशेनह- मशेषोपभोगेष्वसङ्गिमानसो न वेद्मि स्वसुख- कलामपि ॥ १४२ ॥ एतावन्मात्रमप्यशेष- राष्ट्रोपकारि धारयितुं न शक्नोति भवान्मन्यत इत्यात्मना न चोदितवान् ॥ १४३ ॥ तदिदं स्यमन्तरत्नं गृह्यतामिच्छया यस्याभिमतं तस्य समर्प्यताम् ॥ १४४ ॥ ततः स्वोदरवस्त्रनिगोपितमतिलघुकनक- समुद्गकगतं प्रकटीकृतवान् ॥ १४५ ॥ ततश्च निष्क्राम्य स्यमन्तकमणिं तस्मिन्यदुकुलसमाजे मुमोच ॥ १४६ ॥ मुक्तमात्रे च तस्मिन्नति- कान्त्या तदखिलमास्थानमुद्योतितम् ॥ १४७ ॥
निरन्तर अखण्ड यज्ञानुष्ठान करता रहता है॥ १३६॥ और इसके पास यज्ञके साधन [धन आदि] भी बहुत कम हैं; इसलिये इसमें सन्देह नहीं कि इसके पास स्यमन्तकमणि अवश्य है।' ऐसा निश्चयकर किसी और प्रयोजनके उद्देश्यसे उन्होंने सम्पूर्ण यादवोंको अपने महलमें एकत्रित किया॥ १३७॥ समस्त यदुवंशियोंके वहाँ आकर बैठ जानेके बाद प्रथम प्रयोजन बताकर उसका उपसंहार होनेपर प्रसङ्गान्तरसे अक्रूरके साथ परिहास करते हुए भगवान् कृष्णने उनसे कहा— ॥ १३८॥ "हे दानपते! जिस प्रकार शतधन्वाने तुम्हें सम्पूर्ण संसारकी सारभूत वह स्यमन्तक नामकी महामणि सोंपी थी वह हमें सब मालूम है। वह सम्पूर्ण राष्ट्रका उपकार करती हुई तुम्हारे पास है तो रहे, उसके प्रभावका फल तो हम सभी भोगते हैं, किन्तु ये बलभद्रजी हमारे ऊपर सन्देह करते थे, इसलिये हमारी प्रसन्नताके लिये आप एक बार उसे दिखला दीजिये।" भगवान् वासुदेवके ऐसा कहकर चुप हो जानेपर रत्न साथ ही लिये रहनेके कारण अक्रूरजी सोचने लगे— ॥ १३९॥ "अब मुझे क्या करना चाहिये, यदि और किसी प्रकार कहता हूँ तो केवल वस्त्रोंके ओटमें टटोलनेपर ये उसे देख ही लेंगे और इनसे अत्यन्त विरोध करनेमें हमारा कुशल नहीं है।" ऐसा सोचकर निखिल संसारके कारणस्वरूप श्रीनारायणसे अक्रूरजी बोले— ॥ १४०॥ "भगवन्! शतधन्वाने मुझे वह मणि सौंप दी थी। उसके मर जानेपर मैंने यह सोचते हुए बड़ी ही कठिनतासे इसे इतने दिन अपने पास रखा है कि भगवान् आज, कल या परसों इसे माँगेंगे ॥ १४१॥ इसकी चौकसीके क्लेशसे सम्पूर्ण भोगोंमें अनासक्तचित्त होनेके कारण मुझे सुखका लेशमात्र भी नहीं मिला॥ १४२॥ भगवान् ये विचार करते कि, यह सम्पूर्ण राष्ट्रके उपकारक इतने- से भारको भी नहीं उठा सकता, इसलिये स्वयं मैंने आपसे कहा नहीं॥ १४३॥ अब, लीजिये आपकी वह स्यमन्तकमणि यह रही, आपकी जिसे इच्छा हो उसे ही इसे दे दीजिये"॥ १४४॥ तब अक्रूरजीने अपने कटि-वस्त्रमें छिपायी हुई एक छोटी-सी सोनेकी पिटारीमें स्थित वह स्यमन्तकमणि प्रकट की और उस पिटारीसे निकालकर यादवसमाजमें रख दी॥ १४५-१४६॥ उसके रखते ही वह सम्पूर्ण स्थान उसकी तीव्र कान्तिसे देदीप्यमान होने लगा॥ १४७॥
२८६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १३
अथाहाक्रूरः स एष मणिः शतधन्वनास्माकं समर्पितः यस्यायं स एनं गृह्णातु इति ॥ १४८ ॥ तमालोक्य सर्वयादवानां साधुसाध्विति विस्मितमनसां वाचोऽश्रूयन्त ॥ १४९ ॥ तमालोक्यातीव बलभद्रो ममायमच्युतेनैव सामान्यस्समन्वीप्सित इति कृतस्पृहोऽभूत् ॥ १५० ॥ ममैवायं पितृधनमित्यतीव च सत्यभामापि स्पृहयाञ्चकार ॥ १५१ ॥ बलसत्यावलोकनात्कृष्णोऽप्यात्मानं गोचक्रान्तरावस्थितमिव मेने ॥ १५२ ॥ सकलयादवसमक्षं चाक्रूरमाह ॥ १५३ ॥ एतद्धि मणिरत्नमात्मसंशोधनाय एतेषां यदूनां मया दर्शितम् एतच्च मम बलभद्रस्य च सामान्यं पितृधनं चैतत् सत्यभामाया नान्यस्यैतत् ॥ १५४ ॥ एतच्च सर्वकालं शुचिना ब्रह्मचर्यादिगुणवता ध्रियमाणमशेषराष्ट्रस्योपकारकमशुचिना ध्रियमाणमाधारमेव हन्ति ॥ १५५ ॥ अतोऽहमस्य षोडशस्त्रीसहस्रपरिग्रहादसमर्थो धारणे कथमेतत् सत्यभामा स्वीकरोति ॥ १५६ ॥ आर्यबलभद्रेणापि मदिरापानाद्यशेषोपभोगपरित्यागः कार्यः ॥ १५७ ॥ तदलं यदुलोकोऽयं बलभद्रः अहं च सत्या च त्वां दानपते प्रार्थयामः ॥ १५८ ॥ तद्भवानेव धारयितुं समर्थः ॥ १५९ ॥ त्वद्धृतं चास्य राष्ट्रस्योपकारकं तद्द्वानशेषाष्ट्रनिमित्तमेतत्पूर्ववद्धारयत्वन्यन्न वक्तव्यमित्युक्तो दानपतिस्तथेत्याह जग्राह च तन्महारत्नम् ॥ १६० ॥ ततः प्रभृत्यक्रूरः प्रकटेनैव तेनातिजाज्वल्यमानेनात्मकण्ठावसक्तेनादित्य इवांशुमाली चचार ॥ १६१ ॥ इत्येतद्भगवतो मिथ्याभिशस्तिप्रक्षालनं यः स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति अव्याहताखिलेन्द्रियश्चाखिलपापमोक्षमवाप्नोति ॥ १६२ ॥
तब अक्रूरजीने कहा—'मुझे यह मणि शतधन्वाने दी थी, यह जिसकी हो वह ले ले॥ १४८॥ उसको देखनेपर सभी यादवोंका विस्मयपूर्वक 'साधु, साधु' यह वचन सुना गया॥ १४९॥ उसे देखकर बलभद्रजीने 'अच्युतके ही समान इसपर मेरा भी अधिकार है' इस प्रकार अपनी अधिक स्पृहा दिखलायी॥ १५०॥ तथा 'यह मेरी ही पैतृक सम्पत्ति है' इस तरह सत्यभामाने भी उसके लिये अपनी उत्कट अभिलाषा प्रकट की॥ १५१॥ बलभद्र और सत्यभामाको देखकर कृष्णचन्द्रने अपनेको बैल और पहियेके बीचमें पड़े हुए जीवके समान दोनों ओरसे संकटग्रस्त देखा॥ १५२॥ और समस्त यादवोंके सामने वे अक्रूरजीसे बोले—॥ १५३॥ "इस मणिरत्नको मैंने अपनी सफाई देनेके लिये ही इन यादवोंको दिखवाया था। इस मणिपर मेरा और बलभद्रजीका तो समान अधिकार है और सत्यभामाकी यह पैतृक सम्पत्ति है; और किसीका इसपर कोई अधिकार नहीं है॥ १५४॥ यह मणि सदा शुद्ध और ब्रह्मचर्य आदि गुणयुक्त रहकर धारण करनेसे सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करती है और अशुद्धावस्थामें धारण करनेसे अपने आश्रयदाताको भी मार डालती है॥ १५५॥ मेरे सोलह हजार स्त्रियाँ हैं, इसलिये मैं इसके धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ, इसीलिये सत्यभामा भी इसको कैसे धारण कर सकती है?॥ १५६॥ आर्य बलभद्रको भी इसके कारणसे मदिरापान आदि सम्पूर्ण भोगोंको त्यागना पड़ेगा॥ १५७॥ इसलिये हे दानपते! ये यादवगण, बलभद्रजी, मैं और सत्यभामा सब मिलकर आपसे प्रार्थना करते हैं कि इसे धारण करनेमें आप ही समर्थ हैं॥ १५८-१५९॥ आपके धारण करनेसे यह सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करेगी, इसलिये सम्पूर्ण राष्ट्रके मंगलके लिये आप ही इसे पूर्ववत् धारण कीजिये; इस विषयमें आप और कुछ भी न कहें।" भगवान्के ऐसा कहनेपर दानपति अक्रूरने 'जो आज्ञा' कह वह महारत्न ले लिया। तबसे अक्रूरजी सबके सामने उस अति देदीप्यमान मणिको अपने गलेमें धारणकर सूर्यके समान किरण-जालसे युक्त होकर विचरने लगे॥ १६०-१६१॥ भगवान्के मिथ्या-कलंक-शोधनरूप इस प्रसंगका जो कोई स्मरण करेगा उसे कभी थोड़ा-सा भी मिथ्या कलंक न लगेगा, उसकी समस्त इन्द्रियाँ समर्थ रहेंगी तथा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ १६२॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अ० १४] * चतुर्थ अंश * २८७
चौदहवाँ अध्याय
अनमित्र और अन्धकके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अनमित्रस्य पुत्रः शिनिर्नामाभवत् ॥ १ ॥ तस्यापि सत्यकः सत्यकात्सात्यकिर्युयुधानापरनामा ॥ २ ॥ तस्मादपि सञ्जयः तत्पुत्रश्च कुणिः कुणेर्युगन्धरः ॥ ३ ॥ इत्येते शैनेयाः ॥ ४ ॥ | अनमित्रके शिनि नामक पुत्र हुआ; शिनिके सत्यक और सत्यकसे सात्यकिका जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम युयुधान था ॥ १–२ ॥ तदनन्तर सात्यकिके संजय, संजयके कुणि और कुणिसे युगन्धरका जन्म हुआ। ये सब शैनेय नामसे विख्यात हुए ॥ ३–४ ॥ |
| अनमित्रस्यान्वये पृश्निस्तस्मात् श्वफल्कः तत्प्रभावः कथित एव ॥ ५ ॥ श्वफल्कस्यान्यः कनीयांश्चित्रको नाम भ्राता ॥ ६ ॥ श्वफल्कादक्रूरो गान्दिन्यामभवत् ॥ ७ ॥ तथोपमद्गुमृदामृदविश्वारिमेजयरिगिरिक्षत्रोपक्षत्रशतघ्नारिमर्दनधर्मदृग्दृष्टधर्मगन्धमोजवाहप्रतिवाहाख्याः पुत्राः ॥ ८ ॥ सुताराख्या कन्या च ॥ ९ ॥ देववानुपदेवश्चाक्रूरपुत्रौ ॥ १० ॥ पृथुविपृथुप्रमुखाश्चित्रकस्य पुत्रा बहवो बभूवुः ॥ ११ ॥ | अनमित्रके वंशमें ही पृश्निका जन्म हुआ और पृश्निसे श्वफल्ककी उत्पत्ति हुई जिसका प्रभाव पहले वर्णन कर चुके हैं। श्वफल्कका चित्रक नामक एक छोटा भाई और था ॥ ५–६ ॥ श्वफल्कके गान्दिनीसे अक्रूरका जन्म हुआ ॥ ७ ॥ तथा [एक दूसरी स्त्रीसे] उपमद्गु, मृदामृद्, विश्वारि, मेजय, गिरिक्षत्र, उपक्षत्र, शतघ्न, अरिमर्दन, धर्मदृक्, दृष्टधर्म, गन्धमोज, वाह और प्रतिवाह नामक पुत्र तथा सुतारानाम्नी कन्याका जन्म हुआ ॥ ८–९ ॥ देववान् और उपदेव ये दो अक्रूरके पुत्र थे ॥ १० ॥ तथा चित्रकके पृथु, विपृथु आदि अनेक पुत्र थे ॥ ११ ॥ |
| कुकुरभजमानशुचिकम्बलबर्हिषाख्यास्तथान्धकस्य चत्वारः पुत्राः ॥ १२ ॥ कुकुराद्धृष्टः तस्माच्च कपोतरामा ततश्च विलोमा तस्मादपि तुम्बुरुसखोऽभवदनुसंज्ञश्च ॥ १३ ॥ अनोरा नकदुन्दुभिः, ततश्चाभिजिद् अभिजितः पुनर्वसुः ॥ १४ ॥ तस्याप्याहुक आहुकी च कन्या ॥ १५ ॥ आहुकस्य देवकोग्रसेनौ द्वौ पुत्रौ ॥ १६ ॥ देववानुपदेवः सहदेवो देवरक्षितश्च देवकस्य चत्वारः पुत्राः ॥ १७ ॥ तेषां वृकदेवोपदेवा देवरक्षिता श्रीदेवा शान्तिदेवा सहदेवा देवकी च सप्त भगिन्यः ॥ १८ ॥ ताश्च सर्वा वसुदेव उपयेमे ॥ १९ ॥ उग्रसेनस्यापि कंसन्यग्रोधसुनामानकाहशङ्कुसुभूमिराष्ट्रपालयुद्धतुष्टिसुतुष्टिमत्संज्ञाः पुत्रा बभूवुः ॥ २० ॥ कंसाकंसवतीसुतनुराष्ट्रपालिकाह्वाश्चोग्रसेनस्य तनूजाः कन्याः ॥ २१ ॥ | कुकुर, भजमान, शुचिकम्बल और बर्हिष–ये चार अन्धकके पुत्र हुए ॥ १२ ॥ इनमेंसे कुकुरसे धृष्ट, धृष्टसे कपोतरामा, कपोतरामासे विलोमा तथा विलोमासे तुम्बुरुके मित्र अनुका जन्म हुआ ॥ १३ ॥ अनुसे आनकदुन्दुभि, उससे अभिजित्, अभिजित्से पुनर्वसु और पुनर्वसुसे आहुक नामक पुत्र और आहुकीनाम्नी कन्याका जन्म हुआ ॥ १४–१५ ॥ आहुकके देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए ॥ १६ ॥ उनमेंसे देवकके देववान्, उपदेव, सहदेव और देवरक्षित नामक चार पुत्र हुए ॥ १७ ॥ इन चारोंकी वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा और देवकी–ये सात भगिनियाँ थीं ॥ १८ ॥ ये सब वसुदेवजीको विवाही गयी थीं ॥ १९ ॥ उग्रसेनके भी कंस, न्यग्रोध, सुनाम, आनकाह, शंकु, सुभूमि, राष्ट्रपाल, युद्धतुष्टि और सुतुष्टिमान् नामक पुत्र तथा कंसा, कंसवती, सुतनु और राष्ट्रपालिका नामकी कन्याएँ हुईं ॥ २०–२१ ॥ |
२८८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४
भजमानाच्च विदूरथः पुत्रोऽभवत् ॥ २२॥
विदूरथाच्छूरः शूराच्छमी शमिनः प्रतिक्षत्रः
तस्मात्स्वयंभोजस्ततश्च हृदिकः ॥ २३ ॥ तस्यापि
कृतवर्मशतधनुर्देवार्हदेवगर्भाद्याः पुत्रा
बभूवुः ॥ २४ ॥ देवगर्भस्यापि शूरः ॥ २५॥
शूरस्यापि मारिषा नाम पत्न्यभवत् ॥ २६ ॥ तस्यां
चासौ दशपुत्रानजनयद्वसुदेवपूर्वान् ॥ २७॥
वसुदेवस्य जातमात्रस्यैव तद्गृहे
भगवदंशावतारमव्याहतदृष्ट्या पश्यद्भिर्देवैर्दिव्या-
नकदुन्दुभयो वादिताः ॥ २८ ॥
ततश्चासावानकदुन्दुभिसंज्ञामवाप ॥ २९ ॥ तस्य
च देवभागदेवश्रवोऽष्टकककुच्चक्र वत्सधा-
रकस्सृञ्जयश्यामशमिकगण्डूषसंज्ञा नव
भ्रातरोऽभवन् ॥ ३० ॥ पृथा श्रुतदेवा श्रुतकीर्तिः
श्रुतश्रवा राजाधिदेवी च वसुदेवादीनां पञ्च
भगिन्योऽभवन् ॥ ३१ ॥
शूरस्य कुन्तिर्नाम सखाभवत् ॥ ३२॥
तस्मै चापुत्राय पृथामात्मजां विधिना शूरो
दत्तवान् ॥ ३३॥ तां च पाण्डुरुवाह ॥ ३४ ॥
तस्यां च धर्मानिलेन्द्रैर्युधिष्ठिरभीमसेनार्जुना-
ख्यास्त्रयः पुत्रास्समुत्पादिताः ॥ ३५ ॥
पूर्वमेवानूढायाञ्च भगवता भास्वता कानीनः
कर्णो नाम पुत्रोऽजनयत ॥ ३६ ॥ तस्याश्च सपत्नी
माद्री नामाभूत् ॥ ३७ ॥ तस्यां च नासत्यदस्राभ्यां
नकुलसहदेवौ पाण्डोः पुत्रौ जनितौ ॥ ३८ ॥
श्रुतदेवां तु वृद्धधर्मा नाम कारूश
उपयेमे ॥ ३९ ॥ तस्यां च दन्तवक्रो नाम महासुरो
जज्ञे ॥ ४० ॥ श्रुतकीर्तिमपि केकयराज
उपयेमे ॥ ४१ ॥ तस्यां च सन्तर्दनादयः कैकेयाः
पञ्च पुत्रा बभूवुः ॥ ४२ ॥ राजाधिदेव्यामावन्त्यौ
विन्दानुविन्दौ जज्ञाते ॥ ४३ ॥ श्रुतश्रवसमपि
चेदिराजो दमघोषनामोपयेमे ॥ ४४ ॥ तस्यां
च शिशुपालमुत्पादयामास ॥ ४५ ॥ स
वा पूर्वमप्युदारविक्रमो दैत्यानामादि-
पुरुषो हिरण्यकशिपुरभवत् ॥ ४६ ॥
भजमानका पुत्र विदूरथ हुआ; विदूरथके शूर, शूरके शमी, शमीके प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रके स्वयंभोज, स्वयंभोजके हृदिक तथा हृदिकके कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह और देवगर्भ आदि पुत्र हुए। देवगर्भके पुत्र शूरसेन थे॥ २२—२५॥ शूरसेनकी मारिषा नामकी पत्नी थी। उससे उन्होंने वसुदेव आदि दस पुत्र उत्पन्न किये॥ २६-२७॥ वसुदेवके जन्म लेते ही देवताओंने अपना अव्याहत दृष्टिसे यह देखकर कि इनके घरमें भगवान् अंशावतार लेंगे, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बजाये थे॥ २८॥ इसीलिये इनका नाम आनकदुन्दुभि भी हुआ॥ २९॥ इनके देवभाग, देवश्रवा, अष्टक, ककुच्चक्र, वत्सधारक, सृंजय, श्याम, शमिक और गण्डूष नामक नौ भाई थे॥ ३०॥ तथा इन वसुदेव आदि दस भाइयोंकी पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी—ये पाँच बहिनें थीं॥ ३१॥
शूरसेनके कुन्ति नामक एक मित्र थे॥ ३२॥ वे निःसन्तान थे, अतः शूरसेनने दत्तक-विधिसे उन्हें अपनी पृथा नामकी कन्या दे दी थी॥ ३३॥ उसका राजा पाण्डुके साथ विवाह हुआ॥ ३४॥ उसके धर्म, वायु और इन्द्रके द्वारा क्रमशः युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन नामक तीन पुत्र हुए॥ ३५॥ इनके पहले इसके अविवाहितावस्थामें ही भगवान् सूर्यके द्वारा कर्ण नामक एक कानीन* पुत्र और हुआ था॥ ३६॥ इसकी माद्री नामकी एक सपत्नी थी॥ ३७॥ उसके अश्विनीकुमारोंद्वारा नकुल और सहदेव नामक पाण्डुके दो पुत्र हुए॥ ३८॥
शूरसेनकी दूसरी कन्या श्रुतदेवाका कारूश-नरेश वृद्धधर्मासे विवाह हुआ था॥ ३९॥ उससे दन्तवक्र नामक महादैत्य उत्पन्न हुआ॥ ४०॥ श्रुतकीर्तिको केकयराजने विवाहा था॥ ४१॥ उससे केकय-नरेशके सन्तर्दन आदि पाँच पुत्र हुए॥ ४२॥ राजाधिदेवीसे अवन्तिदेशीय विन्द और अनुविन्दका जन्म हुआ॥ ४३॥ श्रुतश्रवाका भी चेदिराज दमघोषने पाणिग्रहण किया॥ ४४॥ उससे शिशुपालका जन्म हुआ॥ ४५॥ पूर्वजन्ममें यह अतिशय पराक्रमी हिरण्यकशिपु नामक दैत्योंका मूल पुरुष हुआ था जिसे सकल लोकगुरु
* अविवाहिता कन्याके गर्भसे हुए पुत्रको 'कानीन' कहते हैं।
अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २८९
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यश्च भगवता सकललोकगुरुणा नरसिंहेन घातितः ॥ ४७॥ पुनरपि अक्षयवीर्यशौर्यसम्पत्पराक्रमगुणस्समाक्रान्तसकलत्रैलोक्येश्वरप्रभावो दशाननो नामाभूत् ॥ ४८॥ बहुकालोपभुक्तभगवत्सकाशावाप्तशरीरपातोद्भवपुण्यफलो भगवता राघवरूपिणा सोऽपि निधनमुपपादितः ॥ ४९॥ पुनश्चेदिराजस्य दमघोषस्यात्मजश्शिशुपालनामाभवत् ॥ ५०॥ शिशुपालत्वेऽपि भगवतो भूभारावतारणायावतीर्णांशस्य पुण्डरीकनयनाख्यस्योपरि द्वेषानुबन्धमतितराञ्चकार ॥ ५१॥ भगवता च स निधनमुपनीतस्तत्रैव परमात्मभूते मनस एकाग्रतया सायुज्यमवाप ॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्नो यथाभिलषितं ददाति तथा अप्रसन्नोऽपि निघ्नन् दिव्यमनुपमं स्थानं प्रयच्छति ॥ ५३॥ | भगवान् नृसिंहने मारा था॥ ४६-४७॥ तदनन्तर यह अक्षय, वीर्य, शौर्य, सम्पत्ति और पराक्रम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त त्रिभुवनके स्वामी इन्द्रके भी प्रभावको दबानेवाला दशानन हुआ॥ ४८॥ स्वयं भगवान्के हाथसे ही मारे जानेके पुण्यसे प्राप्त हुए नाना भोगोंको वह बहुत समयतक भोगते हुए अन्तमें राघवरूपधारी भगवान्के ही द्वारा मारा गया॥ ४९॥ उसके पीछे यह चेदिराज दमघोषका पुत्र शिशुपाल हुआ॥ ५०॥ शिशुपाल होनेपर भी वह भू-भार-हरणके लिये अवतीर्ण हुए भगवदंशस्वरूप भगवान् पुण्डरीकाक्षमें अत्यन्त द्वेषबुद्धि करने लगा॥ ५१॥ अन्तमें भगवान्के हाथसे ही मारे जानेपर उन परमात्मामें ही मन लगे रहनेके कारण सायुज्य-मोक्ष प्राप्त किया॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्न होते हैं तब जिस प्रकार यथेच्छ फल देते हैं, उसी प्रकार अप्रसन्न होकर मारनेपर भी वे अनुपम दिव्यलोककी प्राप्ति कराते हैं॥ ५३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
शिशुपालके पूर्व-जन्मान्तरोंका तथा वसुदेवजीकी सन्ततिका वर्णन
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>हिरण्यकशिपुत्वे च रावणत्वे च विष्णुना।<br>अवाप निहतो भोगानप्राप्यानमरैरपि ॥ १<br>न लयं तत्र तेनैव निहतः स कथं पुनः।<br>सम्प्राप्तः शिशुपालत्वे सायुज्यं शाश्वते हरौ ॥ २<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वधर्मभृतां वर।<br>कौतूहलपरेणैतत्पृष्टो मे वक्तुमर्हसि ॥ ३<br>श्रीपराशर उवाच<br>दैत्येश्वरस्य वधायाखिललोकोत्पत्तिस्थितिविनाशकारिणा पूर्वं तनुग्रहणं कुर्वता नृसिंहरूपमाविष्कृतम्॥ ४॥ तत्र च हिरण्यकशिपोर्विष्णुरयमित्येतन्न मनस्यभूत्॥ ५॥ निरतिशयपुण्यसमुद्भूतमेतत्सत्त्वजातमिति ॥ ६॥ | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! पूर्वजन्मोंमें हिरण्यकशिपु और रावण होनेपर इस शिशुपालने भगवान् विष्णुके द्वारा मारे जानेसे देव-दुर्लभ भोगोंको तो प्राप्त किया, किन्तु यह उनमें लीन नहीं हुआ; फिर इस जन्ममें ही उनके द्वारा मारे जानेपर इसने सनातन पुरुष श्रीहरिमें सायुज्य-मोक्ष कैसे प्राप्त किया?॥ १-२॥ हे समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनिवर! यह बात सुननेकी मुझे बड़ी ही इच्छा है। मैंने अत्यन्त कुतूहलवश होकर आपसे यह प्रश्न किया है, कृपया इसका निरूपण कीजिये॥ ३॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**प्रथम जन्ममें दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले भगवान्ने शरीर ग्रहण करते समय नृसिंहरूप प्रकट किया था॥ ४॥ उस समय हिरण्यकशिपुके चित्तमें यह भाव नहीं हुआ था कि ये विष्णुभगवान् हैं॥ ५॥ केवल इतना ही विचार हुआ कि यह कोई निरतिशय पुण्य-समूहसे उत्पन्न हुआ प्राणी है॥ ६॥ |
२९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| रज उद्रेकप्रेरितैकाग्रमतिस्तद्भावनायोगात्ततोऽवाप्त- | रजोगुणके उत्कर्षसे प्रेरित हो उसकी मति [उस विपरीत |
| वधहेतुकीं निरतिशयामेवाखिलत्रैलोक्याधिक्य- | भावनाके अनुसार] दृढ़ हो गयी। अतः उसके भीतर |
| धारिणीं दशाननत्वे भोगसम्पदमवाप ॥ ७ ॥ न तु | ईश्वरीय भावनाका योग न होनेसे भगवान्के द्वारा मारे |
| स तस्मिन्ननादिनिधने परब्रह्मभूते भगवत्यनालम्बिनि | जानेके कारण ही रावणका जन्म लेनेपर उसने सम्पूर्ण |
| कृते मनसस्तल्लयमवाप ॥ ८ ॥ | त्रिलोकीमें सर्वाधिक भोग-सम्पत्ति प्राप्त की ॥ ७ ॥ उन |
| एवं दशाननत्वेऽप्यनङ्गपराधीनतया जानकी- | अनादि-निधन, परब्रह्मस्वरूप, निराधार भगवान्में चित्त |
| समासक्तचेतसा भगवता दाशरथिरूपधारिणा | न लगानेके कारण वह उन्हींमें लीन नहीं हुआ ॥ ८ ॥ |
| हतस्य तद्रूपदर्शनमेवासीत्, नायमच्युत इत्यासक्ति- | इसी प्रकार रावण होनेपर भी कामवश जानकीजीमें |
| र्विपद्यतोऽन्तःकरणे मानुषबुद्धिरेव केवल- | चित्त लग जानेसे भगवान् दशरथनन्दन रामके द्वारा मारे |
| मस्याभूत् ॥ ९ ॥ | जानेपर केवल उनके रूपका ही दर्शन हुआ था; 'ये अच्युत |
| पुनरप्यच्युतविनिपातमात्रफलमखिलभूमण्डल- | हैं' ऐसी आसक्ति नहीं हुई, बल्कि मरते समय इसके |
| श्लाघ्यचेदिराजकुले जन्म अव्याहतैश्वर्यं | अन्तःकरणमें केवल मनुष्यबुद्धि ही रही ॥ ९ ॥ |
| शिशुपालत्वेऽप्यवाप ॥ १० ॥ तत्र त्वखिलाना- | फिर श्रीअच्युतके द्वारा मारे जानेके फलस्वरूप इसने |
| मेव स भगवन्नाम्नां त्वङ्कारकारणमभवत् ॥ ११ ॥ | सम्पूर्ण भूमण्डलमें प्रशंसित चेदिराजके कुलमें शिशुपालरूपसे |
| ततश्च तत्कालकृतानां तेषामशेषाणा- | जन्म लेकर भी अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त किया ॥ १० ॥ उस |
| मेवाच्युतनाम्नामनवरतमनेकजन्मसु वर्द्धित- | जन्ममें वह भगवान्के प्रत्येक नामोंमें तुच्छताकी भावना |
| विद्वेषानुबन्धिश्चित्तो विनिन्दन्सन्तर्जनादिषूच्चारण- | करने लगा ॥ ११ ॥ उसका हृदय अनेक जन्मके द्वेषानुबन्धसे |
| मकरोत् ॥ १२ ॥ तच्च रूपमुत्फुल्लपद्मदलाम- | युक्त था, अतः वह उनकी निन्दा और तिरस्कार आदि |
| लाक्षमत्युज्ज्वलपीतवस्त्रधार्यमलकिरीटकेयूरहार- | करते हुए भगवान्के सम्पूर्ण समयानुसार लीलाकृत नामोंका |
| कटकादिशोभितमुदारचतुर्बाहुशङ्खचक्रगदाधर- | निरन्तर उच्चारण करता था ॥ १२ ॥ खिले हुए कमलदलके |
| मतिप्ररूढवैरानुभावादटनभोजनस्नानासन- | समान जिसकी निर्मल आँखें हैं, जो उज्ज्वल पीताम्बर तथा |
| शयनादिष्वशेषावस्थान्तरेषु नान्यत्रोपययावस्य | निर्मल किरीट, केयूर, हार और कटकादि धारण किये हुए |
| चेतसः ॥ १३ ॥ ततस्तमेवाक्रोशेषूच्चारयंस्तमेव | हैं तथा जिसकी लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं और जो शंख, |
| हृदयेन धारयन्नात्मवधाय यावद्भगवद्धस्तचक्रांशु- | चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं, भगवान्का वह |
| मालोज्ज्वलमक्षयतेजस्स्वरूपं ब्रह्मभूतमपगत- | दिव्य रूप अत्यन्त वैरानुबन्धके कारण भ्रमण, भोजन, |
| द्वेषादिदोषं भगवन्तमद्राक्षीत् ॥ १४ ॥ तावच्च | स्नान, आसन और शयन आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें कभी |
| भगवच्चक्रेणाशुव्यापादितस्तत्स्मरणदग्धाखिलाघ- | उसके चित्तसे दूर न होता था ॥ १३ ॥ फिर गाली देते समय |
| सञ्चयो भगवन्तान्तमुपनीतस्तस्मिन्नेव | उन्हींका नामोच्चारण करते हुए और हृदयमें भी उन्हींका |
| लयमुपययौ ॥ १५ ॥ एतत्तवाखिलं मयाभि- | ध्यान धरते हुए जिस समय वह अपने वधके लिये हाथमें |
| हितम् ॥ १६ ॥ अयं हि भगवान् कीर्तितश्च संस्मृतश्च | धारण किये चक्रके उज्ज्वल किरणजालसे सुशोभित, अक्षय |
| द्वेषानुबन्धेनापि अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं | तेजस्वरूप द्वेषादि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित ब्रह्मभूत भगवान्को |
| प्रयच्छति किमुत सम्यग्भक्तिमतामिति ॥ १७ ॥ | देख रहा था ॥ १४ ॥ उसी समय तुरन्त भगवच्चक्रसे मारा |
| गया; भगवत्स्मरणके कारण सम्पूर्ण पापराशिके दग्ध हो | |
| जानेसे भगवान्के द्वारा उसका अन्त हुआ और वह उन्हींमें | |
| लीन हो गया ॥ १५ ॥ इस प्रकार इस सम्पूर्ण रहस्यका मैंने | |
| तुमसे वर्णन किया ॥ १६ ॥ अहो! वे भगवान् तो द्वेषानुबन्धके | |
| कारण भी कीर्तन और स्मरण करनेसे सम्पूर्ण देवता और | |
| असुरोंको दुर्लभ परमफल देते हैं, फिर सम्यक् भक्तिसम्पन्न | |
| पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥ |
अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २९१
वसुदेवस्य त्वानकदुन्दुभेः पौरवीरोहिणी- मदिराभद्रादेवकीप्रमुखा बह्व्यः पत्न्यो- ऽभवन् ॥ १८ ॥ बलभद्रशठसारणदुर्मदादीन्पुत्रा- न्रोहिण्यामानकदुन्दुभिरुत्पादयामास ॥ १९ ॥ बलदेवोऽपि रेवत्यां विशठोल्मुकौ पुत्राव- जनयत् ॥ २० ॥ साष्टिर्माष्टिशिशुसत्यधृतिप्रमुखाः सारणात्मजाः ॥ २१ ॥ भद्राश्वभद्रबाहुदुर्मभूताद्या रोहिण्याः कुलजाः ॥ २२ ॥ नन्दोपनन्द- कृतकाद्या मदिरायास्तनयाः ॥ २३ ॥ भद्रायाश्चोपनिधिगदाद्याः ॥ २४ ॥ वैशाल्यां च कौशिकमेकमेवाजनयत् ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभेर्देवक्यामपि कीर्तिमत्सुषेणो- दायभद्रसेनऋजुदासभद्रदेवाख्याः षट् पुत्रा जज्ञिरे ॥ २६ ॥ तांश्च सर्वानैव कंसो घातितवान् ॥ २७ ॥ अनन्तरं च सप्तमं गर्भमर्द्धरात्रे भगवत्प्रहिता योगनिद्रा रोहिण्या जठरमाकृष्य नीतवती ॥ २८ ॥ कर्षणाच्चासावपि संकर्षणाख्या- मगमत् ॥ २९ ॥ ततश्च सकलजगन्महा- तरुमूलभूतो भूतभविष्यदादिसकलसुरासुरमुनि- जनमनसामप्यगोचरोऽब्जभवप्रमुखैरनलमुखैः प्रणम्यावनिभारहरणाय प्रसादितो भगवाननादि- मध्यनिधनो देवकीगर्भमवततार वासुदेवः ॥ ३० ॥ तत्प्रसादविवर्द्धमानोरुमहिमा च योगनिद्रा नन्दगोपपत्या यशोदाया गर्भ- मधिष्ठितवती ॥ ३१ ॥ सुप्रसन्नादित्यचन्द्रादिग्रह- मव्यालादिभयं स्वस्थमानसमखिलमे- वैतज्जगदपास्ताधर्ममभवत्तस्मिंश्च पुण्डरी- कनयने जायमाने ॥ ३२ ॥ जातेन च तेनाखिल- मेवैतत्सन्मार्गवर्त्ति जगदक्रियत् ॥ ३३ ॥
भगवतोऽप्यत्र मर्त्यलोकेऽवतीर्णस्य षोडशसहस्राण्येकोत्तरशताधिकानि भार्याणाम- भवन् ॥ ३४ ॥ तासां च रुक्मिणीसत्यभामाजाम्ब- वतीचारुहासिनीप्रमुखा ह्यष्टौ पत्न्यः प्रधाना बभूवुः ॥ ३५ ॥ तासु चाष्टावयुतानिलक्षं च पुत्राणां
आनकदुन्दुभि वसुदेवजीके पौरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा और देवकी आदि बहुत-सी स्त्रियाँ थीं ॥ १८ ॥ उनमें रोहिणीसे वसुदेवजीने बलभद्र, शठ, सारण और दुर्मद आदि कई पुत्र उत्पन्न किये ॥ १९ ॥ तथा बलभद्रजीके रेवतीसे विशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए ॥ २० ॥ साष्टि, माष्टि, सत्य और धृति आदि सारणके पुत्र थे ॥ २१ ॥ इनके अतिरिक्त भद्राश्व, भद्रबाहु, दुर्मम और भूत आदि भी रोहिणीहीकी सन्तानमें थे ॥ २२ ॥ नन्द, उपनन्द और कृतक आदि मदिराके तथा उपनिधि और गद आदि भद्राके पुत्र थे ॥ २३-२४ ॥ वैशालीके गर्भसे कौशिक नामक केवल एक ही पुत्र हुआ ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभिके देवकीसे कीर्तिमान्, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास तथा भद्रदेव नामक छः पुत्र हुए ॥ २६ ॥ इन सबको कंसने मार डाला था ॥ २७ ॥ पीछे भगवान्की प्रेरणासे योगमायाने देवकीके सातवें गर्भको आधी रातके समय खींचकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया ॥ २८ ॥ आकर्षण करनेसे इस गर्भका नाम संकर्षण हुआ ॥ २९ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप महावृक्षके मूलस्वरूप भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालीन सम्पूर्ण देव, असुर और मुनिजनकी बुद्धिके अगम्य तथा ब्रह्मा और अग्नि आदि देवताओंद्धारा प्रणाम करके भूभारहरणके लिये प्रसन्न किये गये आदि, मध्य और अन्तहीन भगवान् वासुदेवने देवकीके गर्भसे अवतार लिया तथा उन्हींकी कृपासे बढ़ी हुई महिमावाली योगनिद्रा भी नन्दगोपकी पत्नी यशोदाके गर्भमें स्थित हुई ॥ ३०-३१ ॥ उन कमलनयन भगवान्के प्रकट होनेपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहोंसे सम्पन्न सर्पादिके भयसे शून्य, अधर्मादिसे रहित तथा स्वस्थचित्त हो गया ॥ ३२ ॥ उन्होंने प्रकट होकर इस सम्पूर्ण संसारको सन्मार्गावलम्बी कर दिया ॥ ३३ ॥
इस मर्त्यलोकमें अवतीर्ण हुए भगवान्की सोलह हजार एक सौ एक रानियाँ थीं ॥ ३४ ॥ उनमें रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और चारुहासिनी आदि आठ मुख्य थीं ॥ ३५ ॥ अनादि भगवान् अखिलमूर्तिने उनसे एक
२९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
भगवानखिलमूर्तिरनादिमानजनयत् ॥ ३६ ॥
तेषां च प्रद्युम्नचारुदेष्णासाम्बादयस्त्रयोदश प्रधानाः ॥ ३७ ॥
प्रद्युम्नोऽपि रुक्मिणस्तनयां रुक्मवतीं नामोपयेमे ॥ ३८ ॥
तस्यामनिरुद्धो जज्ञे ॥ ३९ ॥
अनिरुद्धोऽपि रुक्मिण एव पौत्रीं सुभद्रां नामोपयेमे ॥ ४० ॥
तस्यामस्य वज्रो जज्ञे ॥ ४१ ॥
वज्रस्य प्रतिबाहुस्तस्यापि सुचारुः ॥ ४२ ॥
एवमनेकशतसहस्रपुरुषसंख्यस्य यदुकुलस्य पुत्रसंख्या वर्षशतैरपि वक्तुं न शक्यते ॥ ४३ ॥
यतो हि श्लोकाविमावत्र चरितार्थौ ॥ ४४ ॥
तिस्रः कोट्यस्सहस्राणामष्टाशीतिशतानि च।
कुमाराणां गृहाचार्याश्चापयोगेषु ये रताः ॥ ४५
संख्यानं यादवानां कः करिष्यति महात्मनाम्।
यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते सदाहुकः ॥ ४६
देवासुरे हता ये तु दैतेयास्सुमहाबलाः।
उत्पन्नास्ते मनुष्येषु जनोपद्रवकारिणः ॥ ४७
तेषामुत्सादनार्थाय भुवि देवा यदोः कुले।
अवतीर्णाः कुलशतं यत्रैकाभ्यधिकं द्विज ॥ ४८
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य ववृधुस्सर्वयादवाः ॥ ४९
इति प्रसूतिं वृष्णीनां यः शृणोति नरः सदा।
स सर्वैः पातकैर्मुक्त्तो विष्णुलोकं प्रपद्यते ॥ ५०
लाख अस्सी हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३६ ॥
उनमेंसे प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और साम्ब आदि तेरह पुत्र प्रधान थे ॥ ३७ ॥
प्रद्युम्नने भी रुक्मीकी पुत्री रुक्मवतीसे विवाह किया था ॥ ३८ ॥
उससे अनिरुद्धका जन्म हुआ ॥ ३९ ॥
अनिरुद्धने भी रुक्मीकी पौत्री सुभद्रासे विवाह किया था ॥ ४० ॥
उससे वज्र उत्पन्न हुआ ॥ ४१ ॥
वज्रका पुत्र प्रतिबाहु तथा प्रतिबाहुका सुचारु था ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सैकड़ों हजार पुरुषोंकी संख्यावाले यदुकुलकी सन्तानोंकी गणना सौ वर्षमें भी नहीं की जा सकती ॥ ४३ ॥
क्योंकि इस विषयमें ये दो श्लोक चरितार्थ हैं— ॥ ४४ ॥
जो गृहाचार्य यादवकुमारोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेमें तत्पर रहते थे उनकी संख्या तीन करोड़ अठ्ठासी लाख थी, फिर उन महात्मा यादवोंकी गणना तो कर ही कौन सकता है? जहाँ हजारों और लाखोंकी संख्यामें सर्वदा यदुराज उग्रसेन रहते थे ॥ ४५-४६ ॥
देवासुर-संग्राममें जो महाबली दैत्यगण मारे गये थे वे मनुष्यलोकमें उपद्रव करनेवाले राजालोग होकर उत्पन्न हुए ॥ ४७ ॥
उनका नाश करनेके लिये देवताओंने यदुवंशमें जन्म लिया जिसमें कि एक सौ एक कुल थे ॥ ४८ ॥
उनका नियन्त्रण और स्वामित्व भगवान् विष्णुने ही किया। वे समस्त यादवगण उनकी आज्ञानुसार ही वृद्धिको प्राप्त हुए ॥ ४९ ॥
इस प्रकार जो पुरुष इस वृष्णिवंशकी उत्पत्तिके विवरणको सुनता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ५० ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अ० १६—१८ ] * चतुर्थ अंश * २१३
सोलहवाँ अध्याय
तुर्वसुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| इत्येष समासस्तस्ते यदोर्वंशः कथितः॥ १॥ अथ तुर्वसोर्वंशमवधारय॥ २॥ तुर्वसोर्वह्निरात्मजः, वह्नेर्भागो भार्गाद्भानुस्ततश्च त्रयीसानुस्तस्माच्च करन्दमस्तस्यापि मरुत्तः॥ ३॥ सोऽनपत्योऽभवत्॥ ४॥ ततश्च पौरवं दुष्यन्तं पुत्रमकल्पयत्॥ ५॥ एवं ययातिशापात्तद्वंशः पौरवमेव वंशं समाश्रितवान्॥ ६॥ | इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपसे यदुके वंशका वर्णन किया॥ १॥ अब तुर्वसुके वंशका वर्णन सुनो॥ २॥ तुर्वसुका पुत्र वह्नि था, वह्निका भार्ग, भार्गका भानु, भानुका त्रयीसानु, त्रयीसानुका करन्दम और करन्दमका पुत्र मरुत्त था॥ ३॥ मरुत्त निस्सन्तान था॥ ४॥ इसलिये उसने पुरुवंशीय दुष्यन्तको पुत्ररूपसे स्वीकार कर लिया॥ ५॥ इस प्रकार ययातिके शापसे तुर्वसुके वंशने पुरुवंशका ही आश्रय लिया॥ ६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
द्रुह्युवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| द्रुह्योस्तु तनयो बभ्रुः॥ १॥ बभ्रोस्सेतुः॥ २॥ सेतुपुत्र आरब्धनामा॥ ३॥ आरब्धस्यात्मजो गान्धारो गान्धारस्य धर्मो धर्माद् घृतः घृताद् दुर्दमस्ततः प्रचेताः॥ ४॥ प्रचेतसः पुत्रश्शतधर्मा बहुलानां म्लेच्छानामुदीच्यानामाधिपत्यमकरोत्॥ ५॥ | द्रुह्युका पुत्र बभ्रु था, बभ्रुका सेतु, सेतुका आरब्ध, आरब्धका गान्धार, गान्धारका धर्म, धर्मका घृत, घृतका दुर्दम, दुर्दमका प्रचेता तथा प्रचेताका पुत्र शतधर्म था। इसने उत्तरवर्ती बहुत-से म्लेच्छोंका आधिपत्य किया॥ १—५॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
अठारहवाँ अध्याय
अनुवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| ययातेश्चतुर्थपुत्रस्यानोस्सभानलचक्षुःपरमेषुसंज्ञास्त्रयः पुत्राः बभूवुः॥ १॥ सभानलपुत्रः कालानलः॥ २॥ कालानलात्सृञ्जयः॥ ३॥ सृञ्जयात्पुरञ्जयः॥ ४॥ पुरञ्जयाज्जनमेजयः॥ ५॥ | ययातिके चौथे पुत्र अनुके सभानल, चक्षु और परमेषु नामक तीन पुत्र थे। सभानलका पुत्र कालानल हुआ तथा कालानलके सृंजय, सृंजयके पुरंजय, पुरंजयके जनमेजय, |
| २९४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १८ |
|---|
| तस्मान्महाशालः ॥ ६ ॥ तस्माच्च महामनाः ॥ ७ ॥ तस्मादुशीनरतितिक्षू द्वौ पुत्रावुत्पन्नौ ॥ ८ ॥<br><br>उशीनरस्यापि शिबिनृगनरकृमिवर्माख्याः पञ्च पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ पृषदश्वसुवीरकेक्यमद्रका-श्चत्वारश्शिबिपुत्राः ॥ १० ॥ तितिक्षोरपि रुशद्रथः पुत्रोऽभूत् ॥ ११ ॥ तस्यापि हेमो हेमस्यापि सुतपाः सुतपसश्च बलिः ॥ १२ ॥ यस्य क्षेत्रे दीर्घतमसाङ्गवङ्गकलिङ्गसुह्मपौण्ड्राख्यं वालेयं क्षत्रमजन्यत ॥ १३ ॥ तन्नामसन्ततिसंज्ञाश्च पञ्चविषया बभूवुः ॥ १४ ॥ अङ्गादनपानस्ततो दिविरथस्तस्माद्धर्मरथः ॥ १५ ॥ ततश्चित्ररथो रोमपादसंज्ञः ॥ १६ ॥ यस्य दशरथो मित्रं जज्ञे ॥ १७ ॥ यस्याजपुत्रो दशरथश्शान्तां नाम कन्यामनपत्यस्य दुहितृत्वे युयोज ॥ १८ ॥<br><br>रोमपादाच्चतुरङ्गस्तस्मात्पृथुलाक्षः ॥ १९ ॥ ततश्चम्पो यश्चम्पां निवेशयामास ॥ २० ॥ चम्पस्य हर्यङ्गो नामात्मजोऽभूत् ॥ २१ ॥ हर्यङ्गाद्भद्ररथो भद्ररथाद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्बृहत्कर्मा बृहत्कर्मणश्च बृहद्भानुस्तस्माच्च बृहन्मना बृहन्मनसो जयद्रथः ॥ २२ ॥ जयद्रथो ब्रह्मक्षत्रात्तरालसम्भूत्यां पत्न्यां विजयं नाम पुत्रमजीजनत् ॥ २३ ॥ विजयश्च धृतिं पुत्रमवाप ॥ २४ ॥ तस्यापि धृतव्रतः पुत्रोऽभूत् ॥ २५ ॥ धृतव्रतात्सत्यकर्मा ॥ २६ ॥ सत्यकर्मणस्त्वतिरथः ॥ २७ ॥ यो गङ्गाप्लवतो मञ्जूषागतं पृथापविद्धं कर्णं पुत्रमवाप ॥ २८ ॥ कर्णाद्वृषसेनः इत्येतदन्ता अङ्गवंश्याः ॥ २९ ॥ अतश्च पुरुवंशं श्रोतुमर्हसि ॥ ३० ॥ | जनमेजयके महाशाल, महाशालके महामना और महामनाके उशीनर तथा तितिक्षु नामक दो पुत्र हुए ॥ १–८ ॥<br><br>उशीनरके शिबि, नृग, नर, कृमि और वर्म नामक पाँच पुत्र हुए ॥ ९ ॥ उनमेंसे शिबिके पृषदश्व, सुवीर, केकय और मद्रक—ये चार पुत्र थे ॥ १० ॥ तितिक्षुका पुत्र रुशद्रथ हुआ। उसके हेम, हेमके सुतपा तथा सुतपाके बलि नामक पुत्र हुआ ॥ ११–१२ ॥ इस बलिके क्षेत्र (रानी)-में दीर्घतमा नामक मुनिने अंग, वंग, कलिंग, सुह्म और पौण्ड्र नामक पाँच वालेय क्षत्रिय उत्पन्न किये ॥ १३ ॥ इन बलिपुत्रोंकी सन्ततिके नामानुसार पाँच देशोंके भी ये ही नाम पड़े ॥ १४ ॥ इनमेंसे अंगसे अनपान, अनपानसे दिविरथ, दिविरथसे धर्मरथ और धर्मरथसे चित्ररथका जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम रोमपाद था। इस रोमपादके मित्र दशरथजी थे, अजके पुत्र दशरथजीने रोमपादको सन्तानहीन देखकर उन्हें पुत्रीरूपसे अपनी शान्ता नामकी कन्या गोद दे दी थी ॥ १५–१८ ॥<br><br>रोमपादका पुत्र चतुरंग था। चतुरंगके पृथुलाक्ष तथा पृथुलाक्षके चम्प नामक पुत्र हुआ जिसने चम्पा नामकी पुरी बसायी थी ॥ १९–२० ॥ चम्पके हर्यंग नामक पुत्र हुआ, हर्यंगसे भद्ररथ, भद्ररथसे बृहद्रथ, बृहद्रथसे बृहत्कर्मा बृहत्कर्मासे बृहद्भानु, बृहद्भानुसे बृहन्मना, बृहन्मनासे जयद्रथका जन्म हुआ ॥ २१–२२ ॥ जयद्रथकी ब्राह्मण और क्षत्रियके संसर्गसे उत्पन्न हुई पत्नीके गर्भसे विजय नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ २३ ॥ विजयके धृति नामक पुत्र हुआ, धृतिके धृतव्रत, धृतव्रतके सत्यकर्मा और सत्यकर्माके अतिरथका जन्म हुआ जिसने कि [स्नानके लिये] गंगाजीमें जानेपर पिटारीमें रखकर पृथाद्वारा बहाये हुए कर्णको पुत्ररूपसे पाया था। इस कर्णका पुत्र वृषसेन था। बस, अंगवंश इतना ही है ॥ २४–२९ ॥ इसके आगे पुरुवंशका वर्णन सुनो ॥ ३० ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९५
उन्नीसवाँ अध्याय
पुरुवंश
श्रीपराशर उवाच
पुरोर्जनमेजयस्तस्यापि प्रचिन्वान् प्रचिन्वतः प्रवीरः प्रवीरान्मनस्युर्मनस्योश्चाभयदस्तस्यापि सुद्युस्सुद्योर्बहुगतस्तस्यापि संयातिस्संयातेरहंयातिस्ततो रौद्राश्वः ॥ १ ॥
ऋतेषुकक्षेपुस्थण्डिलेषुकृतेषुजलेषुधर्मेषुधृतेषुस्थलेषसन्नतेषुवनेषुनामानो रौद्राश्वस्य दश पुत्रा बभूवुः ॥ २ ॥ ऋतेषोरन्तिनारः पुत्रोऽभूत् ॥ ३ ॥ सुमतिम्प्रतिरथं ध्रुवं चाप्यन्तिनारः पुत्रानवाप ॥ ४ ॥ अप्रतिरथस्य कण्वः पुत्रोऽभूत् ॥ ५ ॥ तस्यापि मेधातिथिः ॥ ६ ॥ यतः काण्वायना द्विजा बभूवुः ॥ ७ ॥ अप्रतिरथस्यापरः पुत्रोऽभूदैलीनः ॥ ८ ॥ ऐलीनस्य दुष्यन्ताद्याश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ दुष्यन्ताच्चक्रवर्ती भरतोऽभूत् ॥ १० ॥ यन्नामहेतुर्देवैश्लोको गीयते ॥ ११ ॥
माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाश्शकुन्तलाम् ॥ १२ ॥
रेतोधाः पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ १३ ॥
भरतस्य पत्नीत्रये नव पुत्रा बभूवुः ॥ १४ ॥ नैते ममानुरूपा इत्यभिहितास्तन्मातरः परित्यागभयात्तत्पुत्रान्जघ्नुः ॥ १५ ॥ ततोऽस्य वितथे पुत्रजन्मनि पुत्रार्थिनो मरुत्सोमयाजिनो दीर्घतमसः पाष्ण्र्यपास्ताद्बृहस्पतिवीर्यादुतथ्यपत्यां ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजाख्यः पुत्रो मरुद्भिर्दत्तः ॥ १६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— पुरूका पुत्र जनमेजय था। जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्का प्रवीर, प्रवीरका मनस्यु, मनस्युका अभयद, अभयदका सुद्यु, सुद्युका बहुगत, बहुगतका संयाति, संयातिक अहंयाति तथा अहंयातिका पुत्र रौद्राश्व था॥ १॥
रौद्राश्वके ऋतेषु, कक्षेपु, स्थण्डिलेषु, कृतेषु, जलेषु, धर्मेषु, धृतेषु, स्थलेषु, सन्नतेषु और वनेषु नामक दस पुत्र थे॥ २॥ ऋतेषुका पुत्र अन्तिनार हुआ तथा अन्तिनारके सुमति, अप्रतिरथ और ध्रुव नामक तीन पुत्रोंने जन्म लिया॥ ३-४॥ इनमेंसे अप्रतिरथका पुत्र कण्व और कण्वका मेधातिथि हुआ जिसकी सन्तान काण्वायन ब्राह्मण हुए॥ ५-७॥ अप्रतिरथका दूसरा पुत्र ऐलीन था॥ ८॥ इस ऐलीनके दुष्यन्त आदि चार पुत्र हुए॥ ९॥ दुष्यन्तके यहाँ चक्रवर्ती सम्राट् भरतका जन्म हुआ जिसके नामके विषयमें देवगणने इस श्लोकका गान किया था— ॥ १०-११॥
"माता तो केवल चमड़ेकी धौंकनीके समान है, पुत्रपर अधिकार तो पिताका ही है, पुत्र जिसके द्वारा जन्म ग्रहण करता है उसीका स्वरूप होता है। हे दुष्यन्त ! तू इस पुत्रका पालन-पोषण कर, शकुन्तलाका अपमान न कर। हे नरदेव ! अपने ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र अपने पिताको यमलोकसे [उद्धार कर स्वर्गलोकको] ले जाता है। 'इस पुत्रके आधान करनेवाले तुम्हीं हो'— शकुन्तलाने यह बात ठीक ही कही है'॥ १२-१३॥
भरतके तीन स्त्रियाँ थीं जिनसे उनके नौ पुत्र हुए॥ १४॥ भरतके यह कहनेपर कि 'ये मेरे अनुरूप नहीं हैं', उनकी माताओंने इस भयसे कि राजा हमको त्याग न दें, उन पुत्रोंको मार डाला॥ १५॥ इस प्रकार पुत्र-जन्मके विफल हो जानेसे भरतने पुत्रकी कामनासे मरुत्सोम नामक यज्ञ किया। उस यज्ञके अन्तमें मरुद्गणने उन्हें भरद्वाज नामक एक बालक पुत्ररूपसे दिया जो उतथ्यपत्नी ममताके गर्भमें स्थित दीर्घतमा मुनिके पाद-प्रहारसे स्खलित हुए बृहस्पतिजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था॥ १६॥