भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८५

मन्यत्क्रत्वन्तरं तस्यानन्तरमन्यद्यज्ञान्तरं चाजस्त्र- मविच्छिन्नं यजतीति ॥ १३६ ॥ अल्पोपादानं चास्यासंशयमतासौ मणिवरस्तिष्ठतीति कृताध्यवसायोऽन्यत्प्रयोजनमुद्दिश्य सकलयादव- समाजमात्मगृह एवाचीकरत् ॥ १३७ ॥ तत्र चोपविष्टेष्वखिलेषु यदुषु पूर्वं प्रयोजन- मुपन्यस्य पर्यवसित च तस्मिन् प्रसंगान्तरपरिहास- कथामक्रूरेण कृत्वा जनार्दनस्तमक्रूरमाह ॥ १३८ ॥ दानपते जानीम एव वयं यथा शतधन्वना तदिदमखिलजगत्सारभूतं स्यमन्तकं रत्नं भवतः समर्पितं तदशेषराष्ट्रोपकारकं भवत्सकाशे तिष्ठति तिष्ठतु सर्व एव वयं तत्प्रभावफलभुजः किं त्वेष बलभद्रोऽस्मा- नाश्ङ्कितवांस्तदस्मत्प्रीतये दर्शयस्वेत्यभिधाय जोषं स्थिते भगवति वासुदेवे सरत्नस्सो- ऽचिन्तयत् ॥ १३९ ॥ किमत्रानुष्ठेयमन्यथा चेद् ब्रवीम्यहं तत्केवलाम्बरतिरोधानमन्विष्यन्तो रत्नमेते द्रक्ष्यन्ति अतिविरोधो न क्षेम इति सञ्चिन्त्य तमखिलजगत्कारणभूतं नारायणमाहाक्रूरः ॥ १४० ॥ भगवन्मैतत्- स्यमन्तरत्नं शतधनुषा समर्पितमपगते च तस्मिन्नद्य श्वः परश्वो वा भगवान् याचयिष्यतीति कृतमतिरतिकृच्छ्रेणैतावन्तं काल- मधारयम् ॥ १४१ ॥ तस्य च धारणक्लेशेनह- मशेषोपभोगेष्वसङ्गिमानसो न वेद्मि स्वसुख- कलामपि ॥ १४२ ॥ एतावन्मात्रमप्यशेष- राष्ट्रोपकारि धारयितुं न शक्नोति भवान्मन्यत इत्यात्मना न चोदितवान् ॥ १४३ ॥ तदिदं स्यमन्तरत्नं गृह्यतामिच्छया यस्याभिमतं तस्य समर्प्यताम् ॥ १४४ ॥ ततः स्वोदरवस्त्रनिगोपितमतिलघुकनक- समुद्गकगतं प्रकटीकृतवान् ॥ १४५ ॥ ततश्च निष्क्राम्य स्यमन्तकमणिं तस्मिन्यदुकुलसमाजे मुमोच ॥ १४६ ॥ मुक्तमात्रे च तस्मिन्नति- कान्त्या तदखिलमास्थानमुद्योतितम् ॥ १४७ ॥

निरन्तर अखण्ड यज्ञानुष्ठान करता रहता है॥ १३६॥ और इसके पास यज्ञके साधन [धन आदि] भी बहुत कम हैं; इसलिये इसमें सन्देह नहीं कि इसके पास स्यमन्तकमणि अवश्य है।' ऐसा निश्चयकर किसी और प्रयोजनके उद्देश्यसे उन्होंने सम्पूर्ण यादवोंको अपने महलमें एकत्रित किया॥ १३७॥ समस्त यदुवंशियोंके वहाँ आकर बैठ जानेके बाद प्रथम प्रयोजन बताकर उसका उपसंहार होनेपर प्रसङ्गान्तरसे अक्रूरके साथ परिहास करते हुए भगवान् कृष्णने उनसे कहा— ॥ १३८॥ "हे दानपते! जिस प्रकार शतधन्वाने तुम्हें सम्पूर्ण संसारकी सारभूत वह स्यमन्तक नामकी महामणि सोंपी थी वह हमें सब मालूम है। वह सम्पूर्ण राष्ट्रका उपकार करती हुई तुम्हारे पास है तो रहे, उसके प्रभावका फल तो हम सभी भोगते हैं, किन्तु ये बलभद्रजी हमारे ऊपर सन्देह करते थे, इसलिये हमारी प्रसन्नताके लिये आप एक बार उसे दिखला दीजिये।" भगवान् वासुदेवके ऐसा कहकर चुप हो जानेपर रत्न साथ ही लिये रहनेके कारण अक्रूरजी सोचने लगे— ॥ १३९॥ "अब मुझे क्या करना चाहिये, यदि और किसी प्रकार कहता हूँ तो केवल वस्त्रोंके ओटमें टटोलनेपर ये उसे देख ही लेंगे और इनसे अत्यन्त विरोध करनेमें हमारा कुशल नहीं है।" ऐसा सोचकर निखिल संसारके कारणस्वरूप श्रीनारायणसे अक्रूरजी बोले— ॥ १४०॥ "भगवन्! शतधन्वाने मुझे वह मणि सौंप दी थी। उसके मर जानेपर मैंने यह सोचते हुए बड़ी ही कठिनतासे इसे इतने दिन अपने पास रखा है कि भगवान् आज, कल या परसों इसे माँगेंगे ॥ १४१॥ इसकी चौकसीके क्लेशसे सम्पूर्ण भोगोंमें अनासक्तचित्त होनेके कारण मुझे सुखका लेशमात्र भी नहीं मिला॥ १४२॥ भगवान् ये विचार करते कि, यह सम्पूर्ण राष्ट्रके उपकारक इतने- से भारको भी नहीं उठा सकता, इसलिये स्वयं मैंने आपसे कहा नहीं॥ १४३॥ अब, लीजिये आपकी वह स्यमन्तकमणि यह रही, आपकी जिसे इच्छा हो उसे ही इसे दे दीजिये"॥ १४४॥ तब अक्रूरजीने अपने कटि-वस्त्रमें छिपायी हुई एक छोटी-सी सोनेकी पिटारीमें स्थित वह स्यमन्तकमणि प्रकट की और उस पिटारीसे निकालकर यादवसमाजमें रख दी॥ १४५-१४६॥ उसके रखते ही वह सम्पूर्ण स्थान उसकी तीव्र कान्तिसे देदीप्यमान होने लगा॥ १४७॥