भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 558 में से

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पृष्ठ 295

२८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३


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### **[संस्कृत मूल]**

नीतः ततश्च तत्क्षणाद्देवो ववर्ष ॥ १९६ ॥  
काशिराजपत्नयाश्च गर्भे कन्यारत्नं पूर्वमासीत् ॥ १९७ ॥ सा च कन्या पूर्णेऽपि प्रसूतिकोले नैव निश्चक्राम ॥ १९८ ॥ एवं च तस्य गर्भस्य द्वादशवर्षाण्यनिष्क्रामतो ययुः ॥ १९९ ॥ काशिराजश्च तामात्मजां गर्भस्थामाह ॥ १२० ॥ पुत्रि कस्मान्न जायसे निष्क्रम्यतामास्यं ते द्रष्टुमिच्छामि एतां च मातरं किमिति चिरं क्लेशयसीत्युक्ता गर्भस्थैव व्याजहार ॥ १२१ ॥ तात यद्येकैकां गां दिने दिने ब्राह्मणाय प्रयच्छसि तदाहमन्यैस्त्रिभिर्वर्षैरस्माद्गर्भात्तावदवश्यं निष्क्रमिष्यामीत्येतद्वचनमाकर्ण्य राजा दिने दिने ब्राह्मणाय गां प्रादात् ॥ १२२ ॥ सापि तावता कालेन जाता ॥ १२३ ॥  
ततस्तस्याः पिता गान्दिनीति नाम चकार ॥ १२४ ॥ तां च गान्दिनीं कन्यां श्वफल्कायोपकारिणे गृहमागतायार्घ्यभूतां प्रादात् ॥ १२५ ॥ तस्यामयमक्रूरः श्वफल्काज्जज्ञे ॥ १२६ ॥ तस्यैवंगुणमिथुनादुत्पत्तिः ॥ १२७ ॥ तत्कथमस्मिन्नपक्रान्तेऽत्र दुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवा न भविष्यन्ति ॥ १२८ ॥ तदयमत्रानीयतामलमतिगुणवत्यपराधान्वेषणेनेति यदुवृद्धस्यान्धकस्यैतद्वचनमाकर्ण्य केशवोग्रसेनबलभद्रपुरोगमैर्यदुभिः कृतापराधतितिक्षुभिरभयं दत्त्वा श्वफल्कपुत्रः स्वपुरमानीतः ॥ १२९ ॥ तत्र चागतमात्र एव तस्य स्यमन्तकमणेः प्रभावादनावृष्टिमारिकादुर्भिक्षव्यालाद्युपद्रवोपशमा बभूवुः ॥ १३० ॥  
कृष्णश्चिन्तयामास ॥ १३१ ॥ स्वल्पमेतत्कारणं यदयं गान्दिन्यां श्वफल्केनाक्रूरो जनितः ॥ १३२ ॥ सुमहांश्चायमनावृष्टिदुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवप्रतिषेधकारी प्रभावः ॥ १३३ ॥ तन्नूनमस्य सकाशे स महामणिः स्यमन्तकाख्यस्तिष्ठति ॥ १३४ ॥ तस्य ह्येवंविधाः प्रभावाः श्रूयन्ते ॥ १३५ ॥ अयमपि च यज्ञादनन्तर-

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### **[हिन्दी अनुवाद]**

श्वफल्कको वहाँ ले जाते ही तत्काल वर्षा होने लगी ॥ १९६ ॥  
उस समय काशिराजकी रानीके गर्भमें एक कन्यारत्न थी ॥ १९७ ॥ वह कन्या प्रसूतिकालके समाप्त होनेपर भी गर्भसे बाहर न आयी ॥ १९८ ॥ इस प्रकार उस गर्भको प्रसव हुए बिना बारह वर्ष व्यतीत हो गये ॥ १९९ ॥ तब काशिराजने अपनी उस गर्भस्थिता पुत्रीसे कहा— ॥ १२० ॥ 'बेटी ! तू उत्पन्न क्यों नहीं होती ? बाहर आ, मैं तेरा मुख देखना चाहता हूँ ॥ १२१ ॥ अपनी इस माताको तू इतने दिनोंसे क्यों कष्ट दे रही है ?' राजाके ऐसा कहनेपर उसने गर्भमें रहते हुए ही कहा—'पिताजी ! यदि आप प्रतिदिन एक गौ ब्राह्मणको दान देंगे तो अगले तीन वर्ष बीतनेपर मैं अवश्य गर्भसे बाहर आ जाऊँगी।' इस बातको सुनकर राजा प्रतिदिन ब्राह्मणको एक गौ देने लगे ॥ १२२ ॥ तब उतने समय (तीन वर्ष) बीतनेपर वह उत्पन्न हुई ॥ १२३ ॥  
पिताने उसका नाम गान्दिनी रखा ॥ १२४ ॥ और उसे अपने उपकारक श्वफल्कको घर आनेपर अर्घ्यरूपसे दे दिया ॥ १२५ ॥ उसीसे श्वफल्कके द्वारा इन अक्रूरजीका जन्म हुआ है ॥ १२६ ॥ इनकी ऐसी गुणवान् माता-पितासे उत्पत्ति है तो फिर उनके चले जानेसे यहाँ दुर्भिक्ष और महामारी आदि उपद्रव क्यों न होंगे ? ॥ १२७-१२८ ॥ अतः उनको यहाँ ले आना चाहिये, अति गुणवान्‌के अपराधकी अधिक जाँच-पड़ताल करना ठीक नहीं है। यादववृद्ध अन्धकके ऐसे वचन सुनकर कृष्ण, उग्रसेन और बलभद्र आदि यादव श्वफल्कपुत्र अक्रूरके अपराधको भुलाकर उन्हें अभयदान देकर अपने नगरमें ले आये ॥ १२९ ॥ उनके वहाँ आते ही स्यमन्तकमणिके प्रभावसे अनावृष्टि, महामारी, दुर्भिक्ष और सर्पभय आदि सभी उपद्रव शान्त हो गये ॥ १३० ॥  
तब श्रीकृष्णचन्द्रने विचार किया ॥ १३१ ॥ 'अक्रूरका जन्म गान्दिनीसे श्वफल्कके द्वारा हुआ है यह तो बहुत सामान्य कारण है ॥ १३२ ॥ किन्तु अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि उपद्रवोंको शान्त कर देनेवाला इसका प्रभाव तो अति महान् है ॥ १३३ ॥ अवश्य ही इसके पास वह स्यमन्तक नामक महामणि है ॥ १३४ ॥ उसीका ऐसा प्रभाव सुना जाता है ॥ १३५ ॥ इसे भी हम देखते हैं कि एक यज्ञके पीछे दूसरा और दूसरेके पीछे तीसरा इस प्रकार