विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८३
| वासुदेवमाह ॥१००॥ धिक्त्वां यस्त्वमेवमर्थ- | क्रोधपूर्वक भगवान् वासुदेवसे कहा— ॥१००॥ 'तुमको |
|---|---|
| लिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान्मया क्षान्तं तदयं | धिक्कार है, तुम बड़े ही अर्थलोलुप हो; भाई होनेके कारण |
| पन्थास्स्वेच्छया गम्यतां न मे द्वारक्या न त्वया न | ही मैं तुम्हें क्षमा किये देता हूँ। तुम्हारा मार्ग खुला हुआ है, |
| चाशेषबन्धुभिः कार्यमलमलमेभिर्मामाग्रतो- | तुम खुशीसे जा सकते हो। अब मुझे तो द्वारकासे, तुमसे |
| ऽलीकशपथैरित्याक्षिप्य तत्कथां कथञ्चित्प्रसाद्य- | अथवा और सब सगे-सम्बन्धियोंसे कोई काम नहीं है। |
| मानोऽपि न तस्थौ॥१०१॥ स विदेहपुरीं | बस, मेरे आगे इन थोथी शपथोंका अब कोई प्रयोजन |
| प्रविवेश ॥१०२॥ | नहीं।' इस प्रकार उनकी बातको काटकर बहुत कुछ |
| जनकराजश्चार्घ्यपूर्वकमेनं गृहं प्रवेश- | मनानेपर भी वे वहाँ न रुके और विदेहनगरको चले |
| यामास ॥१०३॥ स तत्रैव च तस्थौ ॥१०४॥ | गये ॥१०१-१०२॥ |
| वासुदेवोऽपि द्वारकामाजगाम ॥१०५॥ यावच्च | विदेहनगरमें पहुँचनेपर राजा जनक उन्हें अर्घ्य |
| जनकराजगृहे बलभद्रोऽवतस्थे तावद्धार्त्त- | देकर अपने घर ले आये और वे वहीं रहने |
| राष्ट्रो दुर्योधनस्तत्सकाशाद्गदाशिक्षाम- | लगे ॥१०३-१०४॥ इधर भगवान् वासुदेव द्वारकामें |
| शिक्षयत् ॥१०६॥ वर्षत्रयान्ते च | चले आये ॥१०५॥ जितने दिनोंतक बलदेवजी राजा |
| बभ्रूग्रसेनप्रभृतिभिर्यादवैर्र्न तद्रत्नं | जनकके यहाँ रहे उतने दिनतक धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन |
| कृष्णेनापहृतमिति कृतावगतिर्विदेहनगरीं गत्वा | उनसे गदायुद्ध सीखता रहा ॥१०६॥ अनन्तर बभ्रु और |
| बलदेवस्सम्प्रत्याय्य द्वारकामानीतः ॥१०७॥ | उग्रसेन आदि यादवोंके, जिन्हें यह ठीक मालूम था कि |
| अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूतसुवर्णेन | 'कृष्णने स्यमन्तकमणि नहीं ली है', विदेहनगरमें जाकर |
| भगवद्ध्यानपरोऽनवरतं यज्ञानियाज ॥१०८॥ | शपथपूर्वक विश्वास दिलानेपर बलदेवजी तीन वर्ष |
| सवनगतौ हि क्षत्रियवैश्यौ निघ्ननब्रह्महा | पश्चात् द्वारकामें चले आये ॥१०७॥ |
| भवतीत्येवम्प्रकारं दीक्षाकवचं प्रविष्ट | अक्रूरजी भी भगवद्ध्यान-परायण रहते हुए उस |
| एव तस्थौ ॥१०९॥ द्विषष्टिवर्षाण्येवं | मणिरत्नसे प्राप्त सुवर्णके द्वारा निरन्तर यज्ञानुष्ठान करने |
| तन्मणिप्रभावात्तत्रोपसर्गदुर्भिक्षमारिकामरणादिकं | लगे ॥१०८॥ यज्ञ-दीक्षित क्षत्रिय और वैश्योंके मारनेसे |
| नाभूत् ॥११०॥ अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैश्शत्रुघ्ने | ब्रह्महत्या होती है, इसलिये अक्रूरजी सदा यज्ञदीक्षारूप |
| सात्वतस्य प्रपौत्रे व्यापादिते भोजैस्सहा- | कवच धारण ही किये रहते थे ॥१०९॥ उस मणिके प्रभावसे |
| क्रूरो द्वारकामपहायापक्रान्तः ॥१११॥ | बासठ वर्षतक द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, महामारी या मृत्यु |
| तदपक्रान्तिदिनादारभ्य तत्रोपसर्गदुर्भिक्षव्या- | आदि नहीं हुए ॥११०॥ फिर अक्रूर-पक्षीय भोजवंशियोंद्वारा |
| लानावृष्टिमरिकाद्युपद्रवा बभूवुः ॥११२॥ | सात्वतके प्रपौत्र शत्रुघ्नके मारे जानेपर भोजोंके साथ अक्रूर |
| अथ यादवबलभद्रोग्रसेनसमवेतो मन्त्र- | भी द्वारकाको छोड़कर चले गये ॥१११॥ उनके जाते ही, |
| ममन्त्रयद् भगवानुरगारिकेतनः ॥११३॥ | उसी दिनसे द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, सर्प, अनावृष्टि और |
| किमिदमेकदैव प्रचुरोपद्रवागमनमेतदालोच्यता- | मरी आदि उपद्रव होने लगे ॥११२॥ |
| मित्युकतेऽन्धकनामा यदुवृद्धः प्राह ॥११४॥ | तब गरुडध्वज भगवान् कृष्ण बलभद्र और |
| अस्याक्रूरस्य पिता श्वफल्को यत्र यत्राभूत्तत्र | उग्रसेन आदि यदुवंशियोंके साथ मिलकर सलाह करने |
| तत्र दुर्भिक्षमारिकानावृष्ट्यादिकं नाभूत् ॥११५॥ | लगे ॥११३॥ 'इसका क्या कारण है जो एक साथ ही |
| काशिराजस्य विषये त्वनावृष्ट्या च श्वफल्को | इतने उपद्रवोंका आगमन हुआ, इसपर विचार करना |
| चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर अन्धक नामक एक | |
| वृद्ध यादवने कहा— ॥११४॥ 'अक्रूरके पिता श्वफल्क | |
| जहाँ-जहाँ रहते थे वहाँ-वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी और | |
| अनावृष्टि आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे ॥११५॥ | |
| एक बार काशिराजके देशमें अनावृष्टि हुई थी। तब |