विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८३
| वासुदेवमाह ॥१००॥ धिक्त्वां यस्त्वमेवमर्थ- | क्रोधपूर्वक भगवान् वासुदेवसे कहा— ॥१००॥ 'तुमको |
|---|---|
| लिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान्मया क्षान्तं तदयं | धिक्कार है, तुम बड़े ही अर्थलोलुप हो; भाई होनेके कारण |
| पन्थास्स्वेच्छया गम्यतां न मे द्वारक्या न त्वया न | ही मैं तुम्हें क्षमा किये देता हूँ। तुम्हारा मार्ग खुला हुआ है, |
| चाशेषबन्धुभिः कार्यमलमलमेभिर्मामाग्रतो- | तुम खुशीसे जा सकते हो। अब मुझे तो द्वारकासे, तुमसे |
| ऽलीकशपथैरित्याक्षिप्य तत्कथां कथञ्चित्प्रसाद्य- | अथवा और सब सगे-सम्बन्धियोंसे कोई काम नहीं है। |
| मानोऽपि न तस्थौ॥१०१॥ स विदेहपुरीं | बस, मेरे आगे इन थोथी शपथोंका अब कोई प्रयोजन |
| प्रविवेश ॥१०२॥ | नहीं।' इस प्रकार उनकी बातको काटकर बहुत कुछ |
| जनकराजश्चार्घ्यपूर्वकमेनं गृहं प्रवेश- | मनानेपर भी वे वहाँ न रुके और विदेहनगरको चले |
| यामास ॥१०३॥ स तत्रैव च तस्थौ ॥१०४॥ | गये ॥१०१-१०२॥ |
| वासुदेवोऽपि द्वारकामाजगाम ॥१०५॥ यावच्च | विदेहनगरमें पहुँचनेपर राजा जनक उन्हें अर्घ्य |
| जनकराजगृहे बलभद्रोऽवतस्थे तावद्धार्त्त- | देकर अपने घर ले आये और वे वहीं रहने |
| राष्ट्रो दुर्योधनस्तत्सकाशाद्गदाशिक्षाम- | लगे ॥१०३-१०४॥ इधर भगवान् वासुदेव द्वारकामें |
| शिक्षयत् ॥१०६॥ वर्षत्रयान्ते च | चले आये ॥१०५॥ जितने दिनोंतक बलदेवजी राजा |
| बभ्रूग्रसेनप्रभृतिभिर्यादवैर्र्न तद्रत्नं | जनकके यहाँ रहे उतने दिनतक धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन |
| कृष्णेनापहृतमिति कृतावगतिर्विदेहनगरीं गत्वा | उनसे गदायुद्ध सीखता रहा ॥१०६॥ अनन्तर बभ्रु और |
| बलदेवस्सम्प्रत्याय्य द्वारकामानीतः ॥१०७॥ | उग्रसेन आदि यादवोंके, जिन्हें यह ठीक मालूम था कि |
| अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूतसुवर्णेन | 'कृष्णने स्यमन्तकमणि नहीं ली है', विदेहनगरमें जाकर |
| भगवद्ध्यानपरोऽनवरतं यज्ञानियाज ॥१०८॥ | शपथपूर्वक विश्वास दिलानेपर बलदेवजी तीन वर्ष |
| सवनगतौ हि क्षत्रियवैश्यौ निघ्ननब्रह्महा | पश्चात् द्वारकामें चले आये ॥१०७॥ |
| भवतीत्येवम्प्रकारं दीक्षाकवचं प्रविष्ट | अक्रूरजी भी भगवद्ध्यान-परायण रहते हुए उस |
| एव तस्थौ ॥१०९॥ द्विषष्टिवर्षाण्येवं | मणिरत्नसे प्राप्त सुवर्णके द्वारा निरन्तर यज्ञानुष्ठान करने |
| तन्मणिप्रभावात्तत्रोपसर्गदुर्भिक्षमारिकामरणादिकं | लगे ॥१०८॥ यज्ञ-दीक्षित क्षत्रिय और वैश्योंके मारनेसे |
| नाभूत् ॥११०॥ अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैश्शत्रुघ्ने | ब्रह्महत्या होती है, इसलिये अक्रूरजी सदा यज्ञदीक्षारूप |
| सात्वतस्य प्रपौत्रे व्यापादिते भोजैस्सहा- | कवच धारण ही किये रहते थे ॥१०९॥ उस मणिके प्रभावसे |
| क्रूरो द्वारकामपहायापक्रान्तः ॥१११॥ | बासठ वर्षतक द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, महामारी या मृत्यु |
| तदपक्रान्तिदिनादारभ्य तत्रोपसर्गदुर्भिक्षव्या- | आदि नहीं हुए ॥११०॥ फिर अक्रूर-पक्षीय भोजवंशियोंद्वारा |
| लानावृष्टिमरिकाद्युपद्रवा बभूवुः ॥११२॥ | सात्वतके प्रपौत्र शत्रुघ्नके मारे जानेपर भोजोंके साथ अक्रूर |
| अथ यादवबलभद्रोग्रसेनसमवेतो मन्त्र- | भी द्वारकाको छोड़कर चले गये ॥१११॥ उनके जाते ही, |
| ममन्त्रयद् भगवानुरगारिकेतनः ॥११३॥ | उसी दिनसे द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, सर्प, अनावृष्टि और |
| किमिदमेकदैव प्रचुरोपद्रवागमनमेतदालोच्यता- | मरी आदि उपद्रव होने लगे ॥११२॥ |
| मित्युकतेऽन्धकनामा यदुवृद्धः प्राह ॥११४॥ | तब गरुडध्वज भगवान् कृष्ण बलभद्र और |
| अस्याक्रूरस्य पिता श्वफल्को यत्र यत्राभूत्तत्र | उग्रसेन आदि यदुवंशियोंके साथ मिलकर सलाह करने |
| तत्र दुर्भिक्षमारिकानावृष्ट्यादिकं नाभूत् ॥११५॥ | लगे ॥११३॥ 'इसका क्या कारण है जो एक साथ ही |
| काशिराजस्य विषये त्वनावृष्ट्या च श्वफल्को | इतने उपद्रवोंका आगमन हुआ, इसपर विचार करना |
| चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर अन्धक नामक एक | |
| वृद्ध यादवने कहा— ॥११४॥ 'अक्रूरके पिता श्वफल्क | |
| जहाँ-जहाँ रहते थे वहाँ-वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी और | |
| अनावृष्टि आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे ॥११५॥ | |
| एक बार काशिराजके देशमें अनावृष्टि हुई थी। तब |
२८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
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### **[संस्कृत मूल]**
नीतः ततश्च तत्क्षणाद्देवो ववर्ष ॥ १९६ ॥
काशिराजपत्नयाश्च गर्भे कन्यारत्नं पूर्वमासीत् ॥ १९७ ॥ सा च कन्या पूर्णेऽपि प्रसूतिकोले नैव निश्चक्राम ॥ १९८ ॥ एवं च तस्य गर्भस्य द्वादशवर्षाण्यनिष्क्रामतो ययुः ॥ १९९ ॥ काशिराजश्च तामात्मजां गर्भस्थामाह ॥ १२० ॥ पुत्रि कस्मान्न जायसे निष्क्रम्यतामास्यं ते द्रष्टुमिच्छामि एतां च मातरं किमिति चिरं क्लेशयसीत्युक्ता गर्भस्थैव व्याजहार ॥ १२१ ॥ तात यद्येकैकां गां दिने दिने ब्राह्मणाय प्रयच्छसि तदाहमन्यैस्त्रिभिर्वर्षैरस्माद्गर्भात्तावदवश्यं निष्क्रमिष्यामीत्येतद्वचनमाकर्ण्य राजा दिने दिने ब्राह्मणाय गां प्रादात् ॥ १२२ ॥ सापि तावता कालेन जाता ॥ १२३ ॥
ततस्तस्याः पिता गान्दिनीति नाम चकार ॥ १२४ ॥ तां च गान्दिनीं कन्यां श्वफल्कायोपकारिणे गृहमागतायार्घ्यभूतां प्रादात् ॥ १२५ ॥ तस्यामयमक्रूरः श्वफल्काज्जज्ञे ॥ १२६ ॥ तस्यैवंगुणमिथुनादुत्पत्तिः ॥ १२७ ॥ तत्कथमस्मिन्नपक्रान्तेऽत्र दुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवा न भविष्यन्ति ॥ १२८ ॥ तदयमत्रानीयतामलमतिगुणवत्यपराधान्वेषणेनेति यदुवृद्धस्यान्धकस्यैतद्वचनमाकर्ण्य केशवोग्रसेनबलभद्रपुरोगमैर्यदुभिः कृतापराधतितिक्षुभिरभयं दत्त्वा श्वफल्कपुत्रः स्वपुरमानीतः ॥ १२९ ॥ तत्र चागतमात्र एव तस्य स्यमन्तकमणेः प्रभावादनावृष्टिमारिकादुर्भिक्षव्यालाद्युपद्रवोपशमा बभूवुः ॥ १३० ॥
कृष्णश्चिन्तयामास ॥ १३१ ॥ स्वल्पमेतत्कारणं यदयं गान्दिन्यां श्वफल्केनाक्रूरो जनितः ॥ १३२ ॥ सुमहांश्चायमनावृष्टिदुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवप्रतिषेधकारी प्रभावः ॥ १३३ ॥ तन्नूनमस्य सकाशे स महामणिः स्यमन्तकाख्यस्तिष्ठति ॥ १३४ ॥ तस्य ह्येवंविधाः प्रभावाः श्रूयन्ते ॥ १३५ ॥ अयमपि च यज्ञादनन्तर-
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### **[हिन्दी अनुवाद]**
श्वफल्कको वहाँ ले जाते ही तत्काल वर्षा होने लगी ॥ १९६ ॥
उस समय काशिराजकी रानीके गर्भमें एक कन्यारत्न थी ॥ १९७ ॥ वह कन्या प्रसूतिकालके समाप्त होनेपर भी गर्भसे बाहर न आयी ॥ १९८ ॥ इस प्रकार उस गर्भको प्रसव हुए बिना बारह वर्ष व्यतीत हो गये ॥ १९९ ॥ तब काशिराजने अपनी उस गर्भस्थिता पुत्रीसे कहा— ॥ १२० ॥ 'बेटी ! तू उत्पन्न क्यों नहीं होती ? बाहर आ, मैं तेरा मुख देखना चाहता हूँ ॥ १२१ ॥ अपनी इस माताको तू इतने दिनोंसे क्यों कष्ट दे रही है ?' राजाके ऐसा कहनेपर उसने गर्भमें रहते हुए ही कहा—'पिताजी ! यदि आप प्रतिदिन एक गौ ब्राह्मणको दान देंगे तो अगले तीन वर्ष बीतनेपर मैं अवश्य गर्भसे बाहर आ जाऊँगी।' इस बातको सुनकर राजा प्रतिदिन ब्राह्मणको एक गौ देने लगे ॥ १२२ ॥ तब उतने समय (तीन वर्ष) बीतनेपर वह उत्पन्न हुई ॥ १२३ ॥
पिताने उसका नाम गान्दिनी रखा ॥ १२४ ॥ और उसे अपने उपकारक श्वफल्कको घर आनेपर अर्घ्यरूपसे दे दिया ॥ १२५ ॥ उसीसे श्वफल्कके द्वारा इन अक्रूरजीका जन्म हुआ है ॥ १२६ ॥ इनकी ऐसी गुणवान् माता-पितासे उत्पत्ति है तो फिर उनके चले जानेसे यहाँ दुर्भिक्ष और महामारी आदि उपद्रव क्यों न होंगे ? ॥ १२७-१२८ ॥ अतः उनको यहाँ ले आना चाहिये, अति गुणवान्के अपराधकी अधिक जाँच-पड़ताल करना ठीक नहीं है। यादववृद्ध अन्धकके ऐसे वचन सुनकर कृष्ण, उग्रसेन और बलभद्र आदि यादव श्वफल्कपुत्र अक्रूरके अपराधको भुलाकर उन्हें अभयदान देकर अपने नगरमें ले आये ॥ १२९ ॥ उनके वहाँ आते ही स्यमन्तकमणिके प्रभावसे अनावृष्टि, महामारी, दुर्भिक्ष और सर्पभय आदि सभी उपद्रव शान्त हो गये ॥ १३० ॥
तब श्रीकृष्णचन्द्रने विचार किया ॥ १३१ ॥ 'अक्रूरका जन्म गान्दिनीसे श्वफल्कके द्वारा हुआ है यह तो बहुत सामान्य कारण है ॥ १३२ ॥ किन्तु अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि उपद्रवोंको शान्त कर देनेवाला इसका प्रभाव तो अति महान् है ॥ १३३ ॥ अवश्य ही इसके पास वह स्यमन्तक नामक महामणि है ॥ १३४ ॥ उसीका ऐसा प्रभाव सुना जाता है ॥ १३५ ॥ इसे भी हम देखते हैं कि एक यज्ञके पीछे दूसरा और दूसरेके पीछे तीसरा इस प्रकार
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८५
मन्यत्क्रत्वन्तरं तस्यानन्तरमन्यद्यज्ञान्तरं चाजस्त्र- मविच्छिन्नं यजतीति ॥ १३६ ॥ अल्पोपादानं चास्यासंशयमतासौ मणिवरस्तिष्ठतीति कृताध्यवसायोऽन्यत्प्रयोजनमुद्दिश्य सकलयादव- समाजमात्मगृह एवाचीकरत् ॥ १३७ ॥ तत्र चोपविष्टेष्वखिलेषु यदुषु पूर्वं प्रयोजन- मुपन्यस्य पर्यवसित च तस्मिन् प्रसंगान्तरपरिहास- कथामक्रूरेण कृत्वा जनार्दनस्तमक्रूरमाह ॥ १३८ ॥ दानपते जानीम एव वयं यथा शतधन्वना तदिदमखिलजगत्सारभूतं स्यमन्तकं रत्नं भवतः समर्पितं तदशेषराष्ट्रोपकारकं भवत्सकाशे तिष्ठति तिष्ठतु सर्व एव वयं तत्प्रभावफलभुजः किं त्वेष बलभद्रोऽस्मा- नाश्ङ्कितवांस्तदस्मत्प्रीतये दर्शयस्वेत्यभिधाय जोषं स्थिते भगवति वासुदेवे सरत्नस्सो- ऽचिन्तयत् ॥ १३९ ॥ किमत्रानुष्ठेयमन्यथा चेद् ब्रवीम्यहं तत्केवलाम्बरतिरोधानमन्विष्यन्तो रत्नमेते द्रक्ष्यन्ति अतिविरोधो न क्षेम इति सञ्चिन्त्य तमखिलजगत्कारणभूतं नारायणमाहाक्रूरः ॥ १४० ॥ भगवन्मैतत्- स्यमन्तरत्नं शतधनुषा समर्पितमपगते च तस्मिन्नद्य श्वः परश्वो वा भगवान् याचयिष्यतीति कृतमतिरतिकृच्छ्रेणैतावन्तं काल- मधारयम् ॥ १४१ ॥ तस्य च धारणक्लेशेनह- मशेषोपभोगेष्वसङ्गिमानसो न वेद्मि स्वसुख- कलामपि ॥ १४२ ॥ एतावन्मात्रमप्यशेष- राष्ट्रोपकारि धारयितुं न शक्नोति भवान्मन्यत इत्यात्मना न चोदितवान् ॥ १४३ ॥ तदिदं स्यमन्तरत्नं गृह्यतामिच्छया यस्याभिमतं तस्य समर्प्यताम् ॥ १४४ ॥ ततः स्वोदरवस्त्रनिगोपितमतिलघुकनक- समुद्गकगतं प्रकटीकृतवान् ॥ १४५ ॥ ततश्च निष्क्राम्य स्यमन्तकमणिं तस्मिन्यदुकुलसमाजे मुमोच ॥ १४६ ॥ मुक्तमात्रे च तस्मिन्नति- कान्त्या तदखिलमास्थानमुद्योतितम् ॥ १४७ ॥
निरन्तर अखण्ड यज्ञानुष्ठान करता रहता है॥ १३६॥ और इसके पास यज्ञके साधन [धन आदि] भी बहुत कम हैं; इसलिये इसमें सन्देह नहीं कि इसके पास स्यमन्तकमणि अवश्य है।' ऐसा निश्चयकर किसी और प्रयोजनके उद्देश्यसे उन्होंने सम्पूर्ण यादवोंको अपने महलमें एकत्रित किया॥ १३७॥ समस्त यदुवंशियोंके वहाँ आकर बैठ जानेके बाद प्रथम प्रयोजन बताकर उसका उपसंहार होनेपर प्रसङ्गान्तरसे अक्रूरके साथ परिहास करते हुए भगवान् कृष्णने उनसे कहा— ॥ १३८॥ "हे दानपते! जिस प्रकार शतधन्वाने तुम्हें सम्पूर्ण संसारकी सारभूत वह स्यमन्तक नामकी महामणि सोंपी थी वह हमें सब मालूम है। वह सम्पूर्ण राष्ट्रका उपकार करती हुई तुम्हारे पास है तो रहे, उसके प्रभावका फल तो हम सभी भोगते हैं, किन्तु ये बलभद्रजी हमारे ऊपर सन्देह करते थे, इसलिये हमारी प्रसन्नताके लिये आप एक बार उसे दिखला दीजिये।" भगवान् वासुदेवके ऐसा कहकर चुप हो जानेपर रत्न साथ ही लिये रहनेके कारण अक्रूरजी सोचने लगे— ॥ १३९॥ "अब मुझे क्या करना चाहिये, यदि और किसी प्रकार कहता हूँ तो केवल वस्त्रोंके ओटमें टटोलनेपर ये उसे देख ही लेंगे और इनसे अत्यन्त विरोध करनेमें हमारा कुशल नहीं है।" ऐसा सोचकर निखिल संसारके कारणस्वरूप श्रीनारायणसे अक्रूरजी बोले— ॥ १४०॥ "भगवन्! शतधन्वाने मुझे वह मणि सौंप दी थी। उसके मर जानेपर मैंने यह सोचते हुए बड़ी ही कठिनतासे इसे इतने दिन अपने पास रखा है कि भगवान् आज, कल या परसों इसे माँगेंगे ॥ १४१॥ इसकी चौकसीके क्लेशसे सम्पूर्ण भोगोंमें अनासक्तचित्त होनेके कारण मुझे सुखका लेशमात्र भी नहीं मिला॥ १४२॥ भगवान् ये विचार करते कि, यह सम्पूर्ण राष्ट्रके उपकारक इतने- से भारको भी नहीं उठा सकता, इसलिये स्वयं मैंने आपसे कहा नहीं॥ १४३॥ अब, लीजिये आपकी वह स्यमन्तकमणि यह रही, आपकी जिसे इच्छा हो उसे ही इसे दे दीजिये"॥ १४४॥ तब अक्रूरजीने अपने कटि-वस्त्रमें छिपायी हुई एक छोटी-सी सोनेकी पिटारीमें स्थित वह स्यमन्तकमणि प्रकट की और उस पिटारीसे निकालकर यादवसमाजमें रख दी॥ १४५-१४६॥ उसके रखते ही वह सम्पूर्ण स्थान उसकी तीव्र कान्तिसे देदीप्यमान होने लगा॥ १४७॥
२८६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १३
अथाहाक्रूरः स एष मणिः शतधन्वनास्माकं समर्पितः यस्यायं स एनं गृह्णातु इति ॥ १४८ ॥ तमालोक्य सर्वयादवानां साधुसाध्विति विस्मितमनसां वाचोऽश्रूयन्त ॥ १४९ ॥ तमालोक्यातीव बलभद्रो ममायमच्युतेनैव सामान्यस्समन्वीप्सित इति कृतस्पृहोऽभूत् ॥ १५० ॥ ममैवायं पितृधनमित्यतीव च सत्यभामापि स्पृहयाञ्चकार ॥ १५१ ॥ बलसत्यावलोकनात्कृष्णोऽप्यात्मानं गोचक्रान्तरावस्थितमिव मेने ॥ १५२ ॥ सकलयादवसमक्षं चाक्रूरमाह ॥ १५३ ॥ एतद्धि मणिरत्नमात्मसंशोधनाय एतेषां यदूनां मया दर्शितम् एतच्च मम बलभद्रस्य च सामान्यं पितृधनं चैतत् सत्यभामाया नान्यस्यैतत् ॥ १५४ ॥ एतच्च सर्वकालं शुचिना ब्रह्मचर्यादिगुणवता ध्रियमाणमशेषराष्ट्रस्योपकारकमशुचिना ध्रियमाणमाधारमेव हन्ति ॥ १५५ ॥ अतोऽहमस्य षोडशस्त्रीसहस्रपरिग्रहादसमर्थो धारणे कथमेतत् सत्यभामा स्वीकरोति ॥ १५६ ॥ आर्यबलभद्रेणापि मदिरापानाद्यशेषोपभोगपरित्यागः कार्यः ॥ १५७ ॥ तदलं यदुलोकोऽयं बलभद्रः अहं च सत्या च त्वां दानपते प्रार्थयामः ॥ १५८ ॥ तद्भवानेव धारयितुं समर्थः ॥ १५९ ॥ त्वद्धृतं चास्य राष्ट्रस्योपकारकं तद्द्वानशेषाष्ट्रनिमित्तमेतत्पूर्ववद्धारयत्वन्यन्न वक्तव्यमित्युक्तो दानपतिस्तथेत्याह जग्राह च तन्महारत्नम् ॥ १६० ॥ ततः प्रभृत्यक्रूरः प्रकटेनैव तेनातिजाज्वल्यमानेनात्मकण्ठावसक्तेनादित्य इवांशुमाली चचार ॥ १६१ ॥ इत्येतद्भगवतो मिथ्याभिशस्तिप्रक्षालनं यः स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति अव्याहताखिलेन्द्रियश्चाखिलपापमोक्षमवाप्नोति ॥ १६२ ॥
तब अक्रूरजीने कहा—'मुझे यह मणि शतधन्वाने दी थी, यह जिसकी हो वह ले ले॥ १४८॥ उसको देखनेपर सभी यादवोंका विस्मयपूर्वक 'साधु, साधु' यह वचन सुना गया॥ १४९॥ उसे देखकर बलभद्रजीने 'अच्युतके ही समान इसपर मेरा भी अधिकार है' इस प्रकार अपनी अधिक स्पृहा दिखलायी॥ १५०॥ तथा 'यह मेरी ही पैतृक सम्पत्ति है' इस तरह सत्यभामाने भी उसके लिये अपनी उत्कट अभिलाषा प्रकट की॥ १५१॥ बलभद्र और सत्यभामाको देखकर कृष्णचन्द्रने अपनेको बैल और पहियेके बीचमें पड़े हुए जीवके समान दोनों ओरसे संकटग्रस्त देखा॥ १५२॥ और समस्त यादवोंके सामने वे अक्रूरजीसे बोले—॥ १५३॥ "इस मणिरत्नको मैंने अपनी सफाई देनेके लिये ही इन यादवोंको दिखवाया था। इस मणिपर मेरा और बलभद्रजीका तो समान अधिकार है और सत्यभामाकी यह पैतृक सम्पत्ति है; और किसीका इसपर कोई अधिकार नहीं है॥ १५४॥ यह मणि सदा शुद्ध और ब्रह्मचर्य आदि गुणयुक्त रहकर धारण करनेसे सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करती है और अशुद्धावस्थामें धारण करनेसे अपने आश्रयदाताको भी मार डालती है॥ १५५॥ मेरे सोलह हजार स्त्रियाँ हैं, इसलिये मैं इसके धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ, इसीलिये सत्यभामा भी इसको कैसे धारण कर सकती है?॥ १५६॥ आर्य बलभद्रको भी इसके कारणसे मदिरापान आदि सम्पूर्ण भोगोंको त्यागना पड़ेगा॥ १५७॥ इसलिये हे दानपते! ये यादवगण, बलभद्रजी, मैं और सत्यभामा सब मिलकर आपसे प्रार्थना करते हैं कि इसे धारण करनेमें आप ही समर्थ हैं॥ १५८-१५९॥ आपके धारण करनेसे यह सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करेगी, इसलिये सम्पूर्ण राष्ट्रके मंगलके लिये आप ही इसे पूर्ववत् धारण कीजिये; इस विषयमें आप और कुछ भी न कहें।" भगवान्के ऐसा कहनेपर दानपति अक्रूरने 'जो आज्ञा' कह वह महारत्न ले लिया। तबसे अक्रूरजी सबके सामने उस अति देदीप्यमान मणिको अपने गलेमें धारणकर सूर्यके समान किरण-जालसे युक्त होकर विचरने लगे॥ १६०-१६१॥ भगवान्के मिथ्या-कलंक-शोधनरूप इस प्रसंगका जो कोई स्मरण करेगा उसे कभी थोड़ा-सा भी मिथ्या कलंक न लगेगा, उसकी समस्त इन्द्रियाँ समर्थ रहेंगी तथा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ १६२॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अ० १४] * चतुर्थ अंश * २८७
चौदहवाँ अध्याय
अनमित्र और अन्धकके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अनमित्रस्य पुत्रः शिनिर्नामाभवत् ॥ १ ॥ तस्यापि सत्यकः सत्यकात्सात्यकिर्युयुधानापरनामा ॥ २ ॥ तस्मादपि सञ्जयः तत्पुत्रश्च कुणिः कुणेर्युगन्धरः ॥ ३ ॥ इत्येते शैनेयाः ॥ ४ ॥ | अनमित्रके शिनि नामक पुत्र हुआ; शिनिके सत्यक और सत्यकसे सात्यकिका जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम युयुधान था ॥ १–२ ॥ तदनन्तर सात्यकिके संजय, संजयके कुणि और कुणिसे युगन्धरका जन्म हुआ। ये सब शैनेय नामसे विख्यात हुए ॥ ३–४ ॥ |
| अनमित्रस्यान्वये पृश्निस्तस्मात् श्वफल्कः तत्प्रभावः कथित एव ॥ ५ ॥ श्वफल्कस्यान्यः कनीयांश्चित्रको नाम भ्राता ॥ ६ ॥ श्वफल्कादक्रूरो गान्दिन्यामभवत् ॥ ७ ॥ तथोपमद्गुमृदामृदविश्वारिमेजयरिगिरिक्षत्रोपक्षत्रशतघ्नारिमर्दनधर्मदृग्दृष्टधर्मगन्धमोजवाहप्रतिवाहाख्याः पुत्राः ॥ ८ ॥ सुताराख्या कन्या च ॥ ९ ॥ देववानुपदेवश्चाक्रूरपुत्रौ ॥ १० ॥ पृथुविपृथुप्रमुखाश्चित्रकस्य पुत्रा बहवो बभूवुः ॥ ११ ॥ | अनमित्रके वंशमें ही पृश्निका जन्म हुआ और पृश्निसे श्वफल्ककी उत्पत्ति हुई जिसका प्रभाव पहले वर्णन कर चुके हैं। श्वफल्कका चित्रक नामक एक छोटा भाई और था ॥ ५–६ ॥ श्वफल्कके गान्दिनीसे अक्रूरका जन्म हुआ ॥ ७ ॥ तथा [एक दूसरी स्त्रीसे] उपमद्गु, मृदामृद्, विश्वारि, मेजय, गिरिक्षत्र, उपक्षत्र, शतघ्न, अरिमर्दन, धर्मदृक्, दृष्टधर्म, गन्धमोज, वाह और प्रतिवाह नामक पुत्र तथा सुतारानाम्नी कन्याका जन्म हुआ ॥ ८–९ ॥ देववान् और उपदेव ये दो अक्रूरके पुत्र थे ॥ १० ॥ तथा चित्रकके पृथु, विपृथु आदि अनेक पुत्र थे ॥ ११ ॥ |
| कुकुरभजमानशुचिकम्बलबर्हिषाख्यास्तथान्धकस्य चत्वारः पुत्राः ॥ १२ ॥ कुकुराद्धृष्टः तस्माच्च कपोतरामा ततश्च विलोमा तस्मादपि तुम्बुरुसखोऽभवदनुसंज्ञश्च ॥ १३ ॥ अनोरा नकदुन्दुभिः, ततश्चाभिजिद् अभिजितः पुनर्वसुः ॥ १४ ॥ तस्याप्याहुक आहुकी च कन्या ॥ १५ ॥ आहुकस्य देवकोग्रसेनौ द्वौ पुत्रौ ॥ १६ ॥ देववानुपदेवः सहदेवो देवरक्षितश्च देवकस्य चत्वारः पुत्राः ॥ १७ ॥ तेषां वृकदेवोपदेवा देवरक्षिता श्रीदेवा शान्तिदेवा सहदेवा देवकी च सप्त भगिन्यः ॥ १८ ॥ ताश्च सर्वा वसुदेव उपयेमे ॥ १९ ॥ उग्रसेनस्यापि कंसन्यग्रोधसुनामानकाहशङ्कुसुभूमिराष्ट्रपालयुद्धतुष्टिसुतुष्टिमत्संज्ञाः पुत्रा बभूवुः ॥ २० ॥ कंसाकंसवतीसुतनुराष्ट्रपालिकाह्वाश्चोग्रसेनस्य तनूजाः कन्याः ॥ २१ ॥ | कुकुर, भजमान, शुचिकम्बल और बर्हिष–ये चार अन्धकके पुत्र हुए ॥ १२ ॥ इनमेंसे कुकुरसे धृष्ट, धृष्टसे कपोतरामा, कपोतरामासे विलोमा तथा विलोमासे तुम्बुरुके मित्र अनुका जन्म हुआ ॥ १३ ॥ अनुसे आनकदुन्दुभि, उससे अभिजित्, अभिजित्से पुनर्वसु और पुनर्वसुसे आहुक नामक पुत्र और आहुकीनाम्नी कन्याका जन्म हुआ ॥ १४–१५ ॥ आहुकके देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए ॥ १६ ॥ उनमेंसे देवकके देववान्, उपदेव, सहदेव और देवरक्षित नामक चार पुत्र हुए ॥ १७ ॥ इन चारोंकी वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा और देवकी–ये सात भगिनियाँ थीं ॥ १८ ॥ ये सब वसुदेवजीको विवाही गयी थीं ॥ १९ ॥ उग्रसेनके भी कंस, न्यग्रोध, सुनाम, आनकाह, शंकु, सुभूमि, राष्ट्रपाल, युद्धतुष्टि और सुतुष्टिमान् नामक पुत्र तथा कंसा, कंसवती, सुतनु और राष्ट्रपालिका नामकी कन्याएँ हुईं ॥ २०–२१ ॥ |
२८८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४
भजमानाच्च विदूरथः पुत्रोऽभवत् ॥ २२॥
विदूरथाच्छूरः शूराच्छमी शमिनः प्रतिक्षत्रः
तस्मात्स्वयंभोजस्ततश्च हृदिकः ॥ २३ ॥ तस्यापि
कृतवर्मशतधनुर्देवार्हदेवगर्भाद्याः पुत्रा
बभूवुः ॥ २४ ॥ देवगर्भस्यापि शूरः ॥ २५॥
शूरस्यापि मारिषा नाम पत्न्यभवत् ॥ २६ ॥ तस्यां
चासौ दशपुत्रानजनयद्वसुदेवपूर्वान् ॥ २७॥
वसुदेवस्य जातमात्रस्यैव तद्गृहे
भगवदंशावतारमव्याहतदृष्ट्या पश्यद्भिर्देवैर्दिव्या-
नकदुन्दुभयो वादिताः ॥ २८ ॥
ततश्चासावानकदुन्दुभिसंज्ञामवाप ॥ २९ ॥ तस्य
च देवभागदेवश्रवोऽष्टकककुच्चक्र वत्सधा-
रकस्सृञ्जयश्यामशमिकगण्डूषसंज्ञा नव
भ्रातरोऽभवन् ॥ ३० ॥ पृथा श्रुतदेवा श्रुतकीर्तिः
श्रुतश्रवा राजाधिदेवी च वसुदेवादीनां पञ्च
भगिन्योऽभवन् ॥ ३१ ॥
शूरस्य कुन्तिर्नाम सखाभवत् ॥ ३२॥
तस्मै चापुत्राय पृथामात्मजां विधिना शूरो
दत्तवान् ॥ ३३॥ तां च पाण्डुरुवाह ॥ ३४ ॥
तस्यां च धर्मानिलेन्द्रैर्युधिष्ठिरभीमसेनार्जुना-
ख्यास्त्रयः पुत्रास्समुत्पादिताः ॥ ३५ ॥
पूर्वमेवानूढायाञ्च भगवता भास्वता कानीनः
कर्णो नाम पुत्रोऽजनयत ॥ ३६ ॥ तस्याश्च सपत्नी
माद्री नामाभूत् ॥ ३७ ॥ तस्यां च नासत्यदस्राभ्यां
नकुलसहदेवौ पाण्डोः पुत्रौ जनितौ ॥ ३८ ॥
श्रुतदेवां तु वृद्धधर्मा नाम कारूश
उपयेमे ॥ ३९ ॥ तस्यां च दन्तवक्रो नाम महासुरो
जज्ञे ॥ ४० ॥ श्रुतकीर्तिमपि केकयराज
उपयेमे ॥ ४१ ॥ तस्यां च सन्तर्दनादयः कैकेयाः
पञ्च पुत्रा बभूवुः ॥ ४२ ॥ राजाधिदेव्यामावन्त्यौ
विन्दानुविन्दौ जज्ञाते ॥ ४३ ॥ श्रुतश्रवसमपि
चेदिराजो दमघोषनामोपयेमे ॥ ४४ ॥ तस्यां
च शिशुपालमुत्पादयामास ॥ ४५ ॥ स
वा पूर्वमप्युदारविक्रमो दैत्यानामादि-
पुरुषो हिरण्यकशिपुरभवत् ॥ ४६ ॥
भजमानका पुत्र विदूरथ हुआ; विदूरथके शूर, शूरके शमी, शमीके प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रके स्वयंभोज, स्वयंभोजके हृदिक तथा हृदिकके कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह और देवगर्भ आदि पुत्र हुए। देवगर्भके पुत्र शूरसेन थे॥ २२—२५॥ शूरसेनकी मारिषा नामकी पत्नी थी। उससे उन्होंने वसुदेव आदि दस पुत्र उत्पन्न किये॥ २६-२७॥ वसुदेवके जन्म लेते ही देवताओंने अपना अव्याहत दृष्टिसे यह देखकर कि इनके घरमें भगवान् अंशावतार लेंगे, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बजाये थे॥ २८॥ इसीलिये इनका नाम आनकदुन्दुभि भी हुआ॥ २९॥ इनके देवभाग, देवश्रवा, अष्टक, ककुच्चक्र, वत्सधारक, सृंजय, श्याम, शमिक और गण्डूष नामक नौ भाई थे॥ ३०॥ तथा इन वसुदेव आदि दस भाइयोंकी पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी—ये पाँच बहिनें थीं॥ ३१॥
शूरसेनके कुन्ति नामक एक मित्र थे॥ ३२॥ वे निःसन्तान थे, अतः शूरसेनने दत्तक-विधिसे उन्हें अपनी पृथा नामकी कन्या दे दी थी॥ ३३॥ उसका राजा पाण्डुके साथ विवाह हुआ॥ ३४॥ उसके धर्म, वायु और इन्द्रके द्वारा क्रमशः युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन नामक तीन पुत्र हुए॥ ३५॥ इनके पहले इसके अविवाहितावस्थामें ही भगवान् सूर्यके द्वारा कर्ण नामक एक कानीन* पुत्र और हुआ था॥ ३६॥ इसकी माद्री नामकी एक सपत्नी थी॥ ३७॥ उसके अश्विनीकुमारोंद्वारा नकुल और सहदेव नामक पाण्डुके दो पुत्र हुए॥ ३८॥
शूरसेनकी दूसरी कन्या श्रुतदेवाका कारूश-नरेश वृद्धधर्मासे विवाह हुआ था॥ ३९॥ उससे दन्तवक्र नामक महादैत्य उत्पन्न हुआ॥ ४०॥ श्रुतकीर्तिको केकयराजने विवाहा था॥ ४१॥ उससे केकय-नरेशके सन्तर्दन आदि पाँच पुत्र हुए॥ ४२॥ राजाधिदेवीसे अवन्तिदेशीय विन्द और अनुविन्दका जन्म हुआ॥ ४३॥ श्रुतश्रवाका भी चेदिराज दमघोषने पाणिग्रहण किया॥ ४४॥ उससे शिशुपालका जन्म हुआ॥ ४५॥ पूर्वजन्ममें यह अतिशय पराक्रमी हिरण्यकशिपु नामक दैत्योंका मूल पुरुष हुआ था जिसे सकल लोकगुरु
* अविवाहिता कन्याके गर्भसे हुए पुत्रको 'कानीन' कहते हैं।
अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २८९
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यश्च भगवता सकललोकगुरुणा नरसिंहेन घातितः ॥ ४७॥ पुनरपि अक्षयवीर्यशौर्यसम्पत्पराक्रमगुणस्समाक्रान्तसकलत्रैलोक्येश्वरप्रभावो दशाननो नामाभूत् ॥ ४८॥ बहुकालोपभुक्तभगवत्सकाशावाप्तशरीरपातोद्भवपुण्यफलो भगवता राघवरूपिणा सोऽपि निधनमुपपादितः ॥ ४९॥ पुनश्चेदिराजस्य दमघोषस्यात्मजश्शिशुपालनामाभवत् ॥ ५०॥ शिशुपालत्वेऽपि भगवतो भूभारावतारणायावतीर्णांशस्य पुण्डरीकनयनाख्यस्योपरि द्वेषानुबन्धमतितराञ्चकार ॥ ५१॥ भगवता च स निधनमुपनीतस्तत्रैव परमात्मभूते मनस एकाग्रतया सायुज्यमवाप ॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्नो यथाभिलषितं ददाति तथा अप्रसन्नोऽपि निघ्नन् दिव्यमनुपमं स्थानं प्रयच्छति ॥ ५३॥ | भगवान् नृसिंहने मारा था॥ ४६-४७॥ तदनन्तर यह अक्षय, वीर्य, शौर्य, सम्पत्ति और पराक्रम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त त्रिभुवनके स्वामी इन्द्रके भी प्रभावको दबानेवाला दशानन हुआ॥ ४८॥ स्वयं भगवान्के हाथसे ही मारे जानेके पुण्यसे प्राप्त हुए नाना भोगोंको वह बहुत समयतक भोगते हुए अन्तमें राघवरूपधारी भगवान्के ही द्वारा मारा गया॥ ४९॥ उसके पीछे यह चेदिराज दमघोषका पुत्र शिशुपाल हुआ॥ ५०॥ शिशुपाल होनेपर भी वह भू-भार-हरणके लिये अवतीर्ण हुए भगवदंशस्वरूप भगवान् पुण्डरीकाक्षमें अत्यन्त द्वेषबुद्धि करने लगा॥ ५१॥ अन्तमें भगवान्के हाथसे ही मारे जानेपर उन परमात्मामें ही मन लगे रहनेके कारण सायुज्य-मोक्ष प्राप्त किया॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्न होते हैं तब जिस प्रकार यथेच्छ फल देते हैं, उसी प्रकार अप्रसन्न होकर मारनेपर भी वे अनुपम दिव्यलोककी प्राप्ति कराते हैं॥ ५३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
शिशुपालके पूर्व-जन्मान्तरोंका तथा वसुदेवजीकी सन्ततिका वर्णन
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>हिरण्यकशिपुत्वे च रावणत्वे च विष्णुना।<br>अवाप निहतो भोगानप्राप्यानमरैरपि ॥ १<br>न लयं तत्र तेनैव निहतः स कथं पुनः।<br>सम्प्राप्तः शिशुपालत्वे सायुज्यं शाश्वते हरौ ॥ २<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वधर्मभृतां वर।<br>कौतूहलपरेणैतत्पृष्टो मे वक्तुमर्हसि ॥ ३<br>श्रीपराशर उवाच<br>दैत्येश्वरस्य वधायाखिललोकोत्पत्तिस्थितिविनाशकारिणा पूर्वं तनुग्रहणं कुर्वता नृसिंहरूपमाविष्कृतम्॥ ४॥ तत्र च हिरण्यकशिपोर्विष्णुरयमित्येतन्न मनस्यभूत्॥ ५॥ निरतिशयपुण्यसमुद्भूतमेतत्सत्त्वजातमिति ॥ ६॥ | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! पूर्वजन्मोंमें हिरण्यकशिपु और रावण होनेपर इस शिशुपालने भगवान् विष्णुके द्वारा मारे जानेसे देव-दुर्लभ भोगोंको तो प्राप्त किया, किन्तु यह उनमें लीन नहीं हुआ; फिर इस जन्ममें ही उनके द्वारा मारे जानेपर इसने सनातन पुरुष श्रीहरिमें सायुज्य-मोक्ष कैसे प्राप्त किया?॥ १-२॥ हे समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनिवर! यह बात सुननेकी मुझे बड़ी ही इच्छा है। मैंने अत्यन्त कुतूहलवश होकर आपसे यह प्रश्न किया है, कृपया इसका निरूपण कीजिये॥ ३॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**प्रथम जन्ममें दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले भगवान्ने शरीर ग्रहण करते समय नृसिंहरूप प्रकट किया था॥ ४॥ उस समय हिरण्यकशिपुके चित्तमें यह भाव नहीं हुआ था कि ये विष्णुभगवान् हैं॥ ५॥ केवल इतना ही विचार हुआ कि यह कोई निरतिशय पुण्य-समूहसे उत्पन्न हुआ प्राणी है॥ ६॥ |
२९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| रज उद्रेकप्रेरितैकाग्रमतिस्तद्भावनायोगात्ततोऽवाप्त- | रजोगुणके उत्कर्षसे प्रेरित हो उसकी मति [उस विपरीत |
| वधहेतुकीं निरतिशयामेवाखिलत्रैलोक्याधिक्य- | भावनाके अनुसार] दृढ़ हो गयी। अतः उसके भीतर |
| धारिणीं दशाननत्वे भोगसम्पदमवाप ॥ ७ ॥ न तु | ईश्वरीय भावनाका योग न होनेसे भगवान्के द्वारा मारे |
| स तस्मिन्ननादिनिधने परब्रह्मभूते भगवत्यनालम्बिनि | जानेके कारण ही रावणका जन्म लेनेपर उसने सम्पूर्ण |
| कृते मनसस्तल्लयमवाप ॥ ८ ॥ | त्रिलोकीमें सर्वाधिक भोग-सम्पत्ति प्राप्त की ॥ ७ ॥ उन |
| एवं दशाननत्वेऽप्यनङ्गपराधीनतया जानकी- | अनादि-निधन, परब्रह्मस्वरूप, निराधार भगवान्में चित्त |
| समासक्तचेतसा भगवता दाशरथिरूपधारिणा | न लगानेके कारण वह उन्हींमें लीन नहीं हुआ ॥ ८ ॥ |
| हतस्य तद्रूपदर्शनमेवासीत्, नायमच्युत इत्यासक्ति- | इसी प्रकार रावण होनेपर भी कामवश जानकीजीमें |
| र्विपद्यतोऽन्तःकरणे मानुषबुद्धिरेव केवल- | चित्त लग जानेसे भगवान् दशरथनन्दन रामके द्वारा मारे |
| मस्याभूत् ॥ ९ ॥ | जानेपर केवल उनके रूपका ही दर्शन हुआ था; 'ये अच्युत |
| पुनरप्यच्युतविनिपातमात्रफलमखिलभूमण्डल- | हैं' ऐसी आसक्ति नहीं हुई, बल्कि मरते समय इसके |
| श्लाघ्यचेदिराजकुले जन्म अव्याहतैश्वर्यं | अन्तःकरणमें केवल मनुष्यबुद्धि ही रही ॥ ९ ॥ |
| शिशुपालत्वेऽप्यवाप ॥ १० ॥ तत्र त्वखिलाना- | फिर श्रीअच्युतके द्वारा मारे जानेके फलस्वरूप इसने |
| मेव स भगवन्नाम्नां त्वङ्कारकारणमभवत् ॥ ११ ॥ | सम्पूर्ण भूमण्डलमें प्रशंसित चेदिराजके कुलमें शिशुपालरूपसे |
| ततश्च तत्कालकृतानां तेषामशेषाणा- | जन्म लेकर भी अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त किया ॥ १० ॥ उस |
| मेवाच्युतनाम्नामनवरतमनेकजन्मसु वर्द्धित- | जन्ममें वह भगवान्के प्रत्येक नामोंमें तुच्छताकी भावना |
| विद्वेषानुबन्धिश्चित्तो विनिन्दन्सन्तर्जनादिषूच्चारण- | करने लगा ॥ ११ ॥ उसका हृदय अनेक जन्मके द्वेषानुबन्धसे |
| मकरोत् ॥ १२ ॥ तच्च रूपमुत्फुल्लपद्मदलाम- | युक्त था, अतः वह उनकी निन्दा और तिरस्कार आदि |
| लाक्षमत्युज्ज्वलपीतवस्त्रधार्यमलकिरीटकेयूरहार- | करते हुए भगवान्के सम्पूर्ण समयानुसार लीलाकृत नामोंका |
| कटकादिशोभितमुदारचतुर्बाहुशङ्खचक्रगदाधर- | निरन्तर उच्चारण करता था ॥ १२ ॥ खिले हुए कमलदलके |
| मतिप्ररूढवैरानुभावादटनभोजनस्नानासन- | समान जिसकी निर्मल आँखें हैं, जो उज्ज्वल पीताम्बर तथा |
| शयनादिष्वशेषावस्थान्तरेषु नान्यत्रोपययावस्य | निर्मल किरीट, केयूर, हार और कटकादि धारण किये हुए |
| चेतसः ॥ १३ ॥ ततस्तमेवाक्रोशेषूच्चारयंस्तमेव | हैं तथा जिसकी लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं और जो शंख, |
| हृदयेन धारयन्नात्मवधाय यावद्भगवद्धस्तचक्रांशु- | चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं, भगवान्का वह |
| मालोज्ज्वलमक्षयतेजस्स्वरूपं ब्रह्मभूतमपगत- | दिव्य रूप अत्यन्त वैरानुबन्धके कारण भ्रमण, भोजन, |
| द्वेषादिदोषं भगवन्तमद्राक्षीत् ॥ १४ ॥ तावच्च | स्नान, आसन और शयन आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें कभी |
| भगवच्चक्रेणाशुव्यापादितस्तत्स्मरणदग्धाखिलाघ- | उसके चित्तसे दूर न होता था ॥ १३ ॥ फिर गाली देते समय |
| सञ्चयो भगवन्तान्तमुपनीतस्तस्मिन्नेव | उन्हींका नामोच्चारण करते हुए और हृदयमें भी उन्हींका |
| लयमुपययौ ॥ १५ ॥ एतत्तवाखिलं मयाभि- | ध्यान धरते हुए जिस समय वह अपने वधके लिये हाथमें |
| हितम् ॥ १६ ॥ अयं हि भगवान् कीर्तितश्च संस्मृतश्च | धारण किये चक्रके उज्ज्वल किरणजालसे सुशोभित, अक्षय |
| द्वेषानुबन्धेनापि अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं | तेजस्वरूप द्वेषादि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित ब्रह्मभूत भगवान्को |
| प्रयच्छति किमुत सम्यग्भक्तिमतामिति ॥ १७ ॥ | देख रहा था ॥ १४ ॥ उसी समय तुरन्त भगवच्चक्रसे मारा |
| गया; भगवत्स्मरणके कारण सम्पूर्ण पापराशिके दग्ध हो | |
| जानेसे भगवान्के द्वारा उसका अन्त हुआ और वह उन्हींमें | |
| लीन हो गया ॥ १५ ॥ इस प्रकार इस सम्पूर्ण रहस्यका मैंने | |
| तुमसे वर्णन किया ॥ १६ ॥ अहो! वे भगवान् तो द्वेषानुबन्धके | |
| कारण भी कीर्तन और स्मरण करनेसे सम्पूर्ण देवता और | |
| असुरोंको दुर्लभ परमफल देते हैं, फिर सम्यक् भक्तिसम्पन्न | |
| पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥ |
अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २९१
वसुदेवस्य त्वानकदुन्दुभेः पौरवीरोहिणी- मदिराभद्रादेवकीप्रमुखा बह्व्यः पत्न्यो- ऽभवन् ॥ १८ ॥ बलभद्रशठसारणदुर्मदादीन्पुत्रा- न्रोहिण्यामानकदुन्दुभिरुत्पादयामास ॥ १९ ॥ बलदेवोऽपि रेवत्यां विशठोल्मुकौ पुत्राव- जनयत् ॥ २० ॥ साष्टिर्माष्टिशिशुसत्यधृतिप्रमुखाः सारणात्मजाः ॥ २१ ॥ भद्राश्वभद्रबाहुदुर्मभूताद्या रोहिण्याः कुलजाः ॥ २२ ॥ नन्दोपनन्द- कृतकाद्या मदिरायास्तनयाः ॥ २३ ॥ भद्रायाश्चोपनिधिगदाद्याः ॥ २४ ॥ वैशाल्यां च कौशिकमेकमेवाजनयत् ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभेर्देवक्यामपि कीर्तिमत्सुषेणो- दायभद्रसेनऋजुदासभद्रदेवाख्याः षट् पुत्रा जज्ञिरे ॥ २६ ॥ तांश्च सर्वानैव कंसो घातितवान् ॥ २७ ॥ अनन्तरं च सप्तमं गर्भमर्द्धरात्रे भगवत्प्रहिता योगनिद्रा रोहिण्या जठरमाकृष्य नीतवती ॥ २८ ॥ कर्षणाच्चासावपि संकर्षणाख्या- मगमत् ॥ २९ ॥ ततश्च सकलजगन्महा- तरुमूलभूतो भूतभविष्यदादिसकलसुरासुरमुनि- जनमनसामप्यगोचरोऽब्जभवप्रमुखैरनलमुखैः प्रणम्यावनिभारहरणाय प्रसादितो भगवाननादि- मध्यनिधनो देवकीगर्भमवततार वासुदेवः ॥ ३० ॥ तत्प्रसादविवर्द्धमानोरुमहिमा च योगनिद्रा नन्दगोपपत्या यशोदाया गर्भ- मधिष्ठितवती ॥ ३१ ॥ सुप्रसन्नादित्यचन्द्रादिग्रह- मव्यालादिभयं स्वस्थमानसमखिलमे- वैतज्जगदपास्ताधर्ममभवत्तस्मिंश्च पुण्डरी- कनयने जायमाने ॥ ३२ ॥ जातेन च तेनाखिल- मेवैतत्सन्मार्गवर्त्ति जगदक्रियत् ॥ ३३ ॥
भगवतोऽप्यत्र मर्त्यलोकेऽवतीर्णस्य षोडशसहस्राण्येकोत्तरशताधिकानि भार्याणाम- भवन् ॥ ३४ ॥ तासां च रुक्मिणीसत्यभामाजाम्ब- वतीचारुहासिनीप्रमुखा ह्यष्टौ पत्न्यः प्रधाना बभूवुः ॥ ३५ ॥ तासु चाष्टावयुतानिलक्षं च पुत्राणां
आनकदुन्दुभि वसुदेवजीके पौरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा और देवकी आदि बहुत-सी स्त्रियाँ थीं ॥ १८ ॥ उनमें रोहिणीसे वसुदेवजीने बलभद्र, शठ, सारण और दुर्मद आदि कई पुत्र उत्पन्न किये ॥ १९ ॥ तथा बलभद्रजीके रेवतीसे विशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए ॥ २० ॥ साष्टि, माष्टि, सत्य और धृति आदि सारणके पुत्र थे ॥ २१ ॥ इनके अतिरिक्त भद्राश्व, भद्रबाहु, दुर्मम और भूत आदि भी रोहिणीहीकी सन्तानमें थे ॥ २२ ॥ नन्द, उपनन्द और कृतक आदि मदिराके तथा उपनिधि और गद आदि भद्राके पुत्र थे ॥ २३-२४ ॥ वैशालीके गर्भसे कौशिक नामक केवल एक ही पुत्र हुआ ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभिके देवकीसे कीर्तिमान्, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास तथा भद्रदेव नामक छः पुत्र हुए ॥ २६ ॥ इन सबको कंसने मार डाला था ॥ २७ ॥ पीछे भगवान्की प्रेरणासे योगमायाने देवकीके सातवें गर्भको आधी रातके समय खींचकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया ॥ २८ ॥ आकर्षण करनेसे इस गर्भका नाम संकर्षण हुआ ॥ २९ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप महावृक्षके मूलस्वरूप भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालीन सम्पूर्ण देव, असुर और मुनिजनकी बुद्धिके अगम्य तथा ब्रह्मा और अग्नि आदि देवताओंद्धारा प्रणाम करके भूभारहरणके लिये प्रसन्न किये गये आदि, मध्य और अन्तहीन भगवान् वासुदेवने देवकीके गर्भसे अवतार लिया तथा उन्हींकी कृपासे बढ़ी हुई महिमावाली योगनिद्रा भी नन्दगोपकी पत्नी यशोदाके गर्भमें स्थित हुई ॥ ३०-३१ ॥ उन कमलनयन भगवान्के प्रकट होनेपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहोंसे सम्पन्न सर्पादिके भयसे शून्य, अधर्मादिसे रहित तथा स्वस्थचित्त हो गया ॥ ३२ ॥ उन्होंने प्रकट होकर इस सम्पूर्ण संसारको सन्मार्गावलम्बी कर दिया ॥ ३३ ॥
इस मर्त्यलोकमें अवतीर्ण हुए भगवान्की सोलह हजार एक सौ एक रानियाँ थीं ॥ ३४ ॥ उनमें रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और चारुहासिनी आदि आठ मुख्य थीं ॥ ३५ ॥ अनादि भगवान् अखिलमूर्तिने उनसे एक
२९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
भगवानखिलमूर्तिरनादिमानजनयत् ॥ ३६ ॥
तेषां च प्रद्युम्नचारुदेष्णासाम्बादयस्त्रयोदश प्रधानाः ॥ ३७ ॥
प्रद्युम्नोऽपि रुक्मिणस्तनयां रुक्मवतीं नामोपयेमे ॥ ३८ ॥
तस्यामनिरुद्धो जज्ञे ॥ ३९ ॥
अनिरुद्धोऽपि रुक्मिण एव पौत्रीं सुभद्रां नामोपयेमे ॥ ४० ॥
तस्यामस्य वज्रो जज्ञे ॥ ४१ ॥
वज्रस्य प्रतिबाहुस्तस्यापि सुचारुः ॥ ४२ ॥
एवमनेकशतसहस्रपुरुषसंख्यस्य यदुकुलस्य पुत्रसंख्या वर्षशतैरपि वक्तुं न शक्यते ॥ ४३ ॥
यतो हि श्लोकाविमावत्र चरितार्थौ ॥ ४४ ॥
तिस्रः कोट्यस्सहस्राणामष्टाशीतिशतानि च।
कुमाराणां गृहाचार्याश्चापयोगेषु ये रताः ॥ ४५
संख्यानं यादवानां कः करिष्यति महात्मनाम्।
यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते सदाहुकः ॥ ४६
देवासुरे हता ये तु दैतेयास्सुमहाबलाः।
उत्पन्नास्ते मनुष्येषु जनोपद्रवकारिणः ॥ ४७
तेषामुत्सादनार्थाय भुवि देवा यदोः कुले।
अवतीर्णाः कुलशतं यत्रैकाभ्यधिकं द्विज ॥ ४८
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य ववृधुस्सर्वयादवाः ॥ ४९
इति प्रसूतिं वृष्णीनां यः शृणोति नरः सदा।
स सर्वैः पातकैर्मुक्त्तो विष्णुलोकं प्रपद्यते ॥ ५०
लाख अस्सी हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३६ ॥
उनमेंसे प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और साम्ब आदि तेरह पुत्र प्रधान थे ॥ ३७ ॥
प्रद्युम्नने भी रुक्मीकी पुत्री रुक्मवतीसे विवाह किया था ॥ ३८ ॥
उससे अनिरुद्धका जन्म हुआ ॥ ३९ ॥
अनिरुद्धने भी रुक्मीकी पौत्री सुभद्रासे विवाह किया था ॥ ४० ॥
उससे वज्र उत्पन्न हुआ ॥ ४१ ॥
वज्रका पुत्र प्रतिबाहु तथा प्रतिबाहुका सुचारु था ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सैकड़ों हजार पुरुषोंकी संख्यावाले यदुकुलकी सन्तानोंकी गणना सौ वर्षमें भी नहीं की जा सकती ॥ ४३ ॥
क्योंकि इस विषयमें ये दो श्लोक चरितार्थ हैं— ॥ ४४ ॥
जो गृहाचार्य यादवकुमारोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेमें तत्पर रहते थे उनकी संख्या तीन करोड़ अठ्ठासी लाख थी, फिर उन महात्मा यादवोंकी गणना तो कर ही कौन सकता है? जहाँ हजारों और लाखोंकी संख्यामें सर्वदा यदुराज उग्रसेन रहते थे ॥ ४५-४६ ॥
देवासुर-संग्राममें जो महाबली दैत्यगण मारे गये थे वे मनुष्यलोकमें उपद्रव करनेवाले राजालोग होकर उत्पन्न हुए ॥ ४७ ॥
उनका नाश करनेके लिये देवताओंने यदुवंशमें जन्म लिया जिसमें कि एक सौ एक कुल थे ॥ ४८ ॥
उनका नियन्त्रण और स्वामित्व भगवान् विष्णुने ही किया। वे समस्त यादवगण उनकी आज्ञानुसार ही वृद्धिको प्राप्त हुए ॥ ४९ ॥
इस प्रकार जो पुरुष इस वृष्णिवंशकी उत्पत्तिके विवरणको सुनता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ५० ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अ० १६—१८ ] * चतुर्थ अंश * २१३
सोलहवाँ अध्याय
तुर्वसुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| इत्येष समासस्तस्ते यदोर्वंशः कथितः॥ १॥ अथ तुर्वसोर्वंशमवधारय॥ २॥ तुर्वसोर्वह्निरात्मजः, वह्नेर्भागो भार्गाद्भानुस्ततश्च त्रयीसानुस्तस्माच्च करन्दमस्तस्यापि मरुत्तः॥ ३॥ सोऽनपत्योऽभवत्॥ ४॥ ततश्च पौरवं दुष्यन्तं पुत्रमकल्पयत्॥ ५॥ एवं ययातिशापात्तद्वंशः पौरवमेव वंशं समाश्रितवान्॥ ६॥ | इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपसे यदुके वंशका वर्णन किया॥ १॥ अब तुर्वसुके वंशका वर्णन सुनो॥ २॥ तुर्वसुका पुत्र वह्नि था, वह्निका भार्ग, भार्गका भानु, भानुका त्रयीसानु, त्रयीसानुका करन्दम और करन्दमका पुत्र मरुत्त था॥ ३॥ मरुत्त निस्सन्तान था॥ ४॥ इसलिये उसने पुरुवंशीय दुष्यन्तको पुत्ररूपसे स्वीकार कर लिया॥ ५॥ इस प्रकार ययातिके शापसे तुर्वसुके वंशने पुरुवंशका ही आश्रय लिया॥ ६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
द्रुह्युवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| द्रुह्योस्तु तनयो बभ्रुः॥ १॥ बभ्रोस्सेतुः॥ २॥ सेतुपुत्र आरब्धनामा॥ ३॥ आरब्धस्यात्मजो गान्धारो गान्धारस्य धर्मो धर्माद् घृतः घृताद् दुर्दमस्ततः प्रचेताः॥ ४॥ प्रचेतसः पुत्रश्शतधर्मा बहुलानां म्लेच्छानामुदीच्यानामाधिपत्यमकरोत्॥ ५॥ | द्रुह्युका पुत्र बभ्रु था, बभ्रुका सेतु, सेतुका आरब्ध, आरब्धका गान्धार, गान्धारका धर्म, धर्मका घृत, घृतका दुर्दम, दुर्दमका प्रचेता तथा प्रचेताका पुत्र शतधर्म था। इसने उत्तरवर्ती बहुत-से म्लेच्छोंका आधिपत्य किया॥ १—५॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
अठारहवाँ अध्याय
अनुवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| ययातेश्चतुर्थपुत्रस्यानोस्सभानलचक्षुःपरमेषुसंज्ञास्त्रयः पुत्राः बभूवुः॥ १॥ सभानलपुत्रः कालानलः॥ २॥ कालानलात्सृञ्जयः॥ ३॥ सृञ्जयात्पुरञ्जयः॥ ४॥ पुरञ्जयाज्जनमेजयः॥ ५॥ | ययातिके चौथे पुत्र अनुके सभानल, चक्षु और परमेषु नामक तीन पुत्र थे। सभानलका पुत्र कालानल हुआ तथा कालानलके सृंजय, सृंजयके पुरंजय, पुरंजयके जनमेजय, |
| २९४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १८ |
|---|
| तस्मान्महाशालः ॥ ६ ॥ तस्माच्च महामनाः ॥ ७ ॥ तस्मादुशीनरतितिक्षू द्वौ पुत्रावुत्पन्नौ ॥ ८ ॥<br><br>उशीनरस्यापि शिबिनृगनरकृमिवर्माख्याः पञ्च पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ पृषदश्वसुवीरकेक्यमद्रका-श्चत्वारश्शिबिपुत्राः ॥ १० ॥ तितिक्षोरपि रुशद्रथः पुत्रोऽभूत् ॥ ११ ॥ तस्यापि हेमो हेमस्यापि सुतपाः सुतपसश्च बलिः ॥ १२ ॥ यस्य क्षेत्रे दीर्घतमसाङ्गवङ्गकलिङ्गसुह्मपौण्ड्राख्यं वालेयं क्षत्रमजन्यत ॥ १३ ॥ तन्नामसन्ततिसंज्ञाश्च पञ्चविषया बभूवुः ॥ १४ ॥ अङ्गादनपानस्ततो दिविरथस्तस्माद्धर्मरथः ॥ १५ ॥ ततश्चित्ररथो रोमपादसंज्ञः ॥ १६ ॥ यस्य दशरथो मित्रं जज्ञे ॥ १७ ॥ यस्याजपुत्रो दशरथश्शान्तां नाम कन्यामनपत्यस्य दुहितृत्वे युयोज ॥ १८ ॥<br><br>रोमपादाच्चतुरङ्गस्तस्मात्पृथुलाक्षः ॥ १९ ॥ ततश्चम्पो यश्चम्पां निवेशयामास ॥ २० ॥ चम्पस्य हर्यङ्गो नामात्मजोऽभूत् ॥ २१ ॥ हर्यङ्गाद्भद्ररथो भद्ररथाद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्बृहत्कर्मा बृहत्कर्मणश्च बृहद्भानुस्तस्माच्च बृहन्मना बृहन्मनसो जयद्रथः ॥ २२ ॥ जयद्रथो ब्रह्मक्षत्रात्तरालसम्भूत्यां पत्न्यां विजयं नाम पुत्रमजीजनत् ॥ २३ ॥ विजयश्च धृतिं पुत्रमवाप ॥ २४ ॥ तस्यापि धृतव्रतः पुत्रोऽभूत् ॥ २५ ॥ धृतव्रतात्सत्यकर्मा ॥ २६ ॥ सत्यकर्मणस्त्वतिरथः ॥ २७ ॥ यो गङ्गाप्लवतो मञ्जूषागतं पृथापविद्धं कर्णं पुत्रमवाप ॥ २८ ॥ कर्णाद्वृषसेनः इत्येतदन्ता अङ्गवंश्याः ॥ २९ ॥ अतश्च पुरुवंशं श्रोतुमर्हसि ॥ ३० ॥ | जनमेजयके महाशाल, महाशालके महामना और महामनाके उशीनर तथा तितिक्षु नामक दो पुत्र हुए ॥ १–८ ॥<br><br>उशीनरके शिबि, नृग, नर, कृमि और वर्म नामक पाँच पुत्र हुए ॥ ९ ॥ उनमेंसे शिबिके पृषदश्व, सुवीर, केकय और मद्रक—ये चार पुत्र थे ॥ १० ॥ तितिक्षुका पुत्र रुशद्रथ हुआ। उसके हेम, हेमके सुतपा तथा सुतपाके बलि नामक पुत्र हुआ ॥ ११–१२ ॥ इस बलिके क्षेत्र (रानी)-में दीर्घतमा नामक मुनिने अंग, वंग, कलिंग, सुह्म और पौण्ड्र नामक पाँच वालेय क्षत्रिय उत्पन्न किये ॥ १३ ॥ इन बलिपुत्रोंकी सन्ततिके नामानुसार पाँच देशोंके भी ये ही नाम पड़े ॥ १४ ॥ इनमेंसे अंगसे अनपान, अनपानसे दिविरथ, दिविरथसे धर्मरथ और धर्मरथसे चित्ररथका जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम रोमपाद था। इस रोमपादके मित्र दशरथजी थे, अजके पुत्र दशरथजीने रोमपादको सन्तानहीन देखकर उन्हें पुत्रीरूपसे अपनी शान्ता नामकी कन्या गोद दे दी थी ॥ १५–१८ ॥<br><br>रोमपादका पुत्र चतुरंग था। चतुरंगके पृथुलाक्ष तथा पृथुलाक्षके चम्प नामक पुत्र हुआ जिसने चम्पा नामकी पुरी बसायी थी ॥ १९–२० ॥ चम्पके हर्यंग नामक पुत्र हुआ, हर्यंगसे भद्ररथ, भद्ररथसे बृहद्रथ, बृहद्रथसे बृहत्कर्मा बृहत्कर्मासे बृहद्भानु, बृहद्भानुसे बृहन्मना, बृहन्मनासे जयद्रथका जन्म हुआ ॥ २१–२२ ॥ जयद्रथकी ब्राह्मण और क्षत्रियके संसर्गसे उत्पन्न हुई पत्नीके गर्भसे विजय नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ २३ ॥ विजयके धृति नामक पुत्र हुआ, धृतिके धृतव्रत, धृतव्रतके सत्यकर्मा और सत्यकर्माके अतिरथका जन्म हुआ जिसने कि [स्नानके लिये] गंगाजीमें जानेपर पिटारीमें रखकर पृथाद्वारा बहाये हुए कर्णको पुत्ररूपसे पाया था। इस कर्णका पुत्र वृषसेन था। बस, अंगवंश इतना ही है ॥ २४–२९ ॥ इसके आगे पुरुवंशका वर्णन सुनो ॥ ३० ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९५
उन्नीसवाँ अध्याय
पुरुवंश
श्रीपराशर उवाच
पुरोर्जनमेजयस्तस्यापि प्रचिन्वान् प्रचिन्वतः प्रवीरः प्रवीरान्मनस्युर्मनस्योश्चाभयदस्तस्यापि सुद्युस्सुद्योर्बहुगतस्तस्यापि संयातिस्संयातेरहंयातिस्ततो रौद्राश्वः ॥ १ ॥
ऋतेषुकक्षेपुस्थण्डिलेषुकृतेषुजलेषुधर्मेषुधृतेषुस्थलेषसन्नतेषुवनेषुनामानो रौद्राश्वस्य दश पुत्रा बभूवुः ॥ २ ॥ ऋतेषोरन्तिनारः पुत्रोऽभूत् ॥ ३ ॥ सुमतिम्प्रतिरथं ध्रुवं चाप्यन्तिनारः पुत्रानवाप ॥ ४ ॥ अप्रतिरथस्य कण्वः पुत्रोऽभूत् ॥ ५ ॥ तस्यापि मेधातिथिः ॥ ६ ॥ यतः काण्वायना द्विजा बभूवुः ॥ ७ ॥ अप्रतिरथस्यापरः पुत्रोऽभूदैलीनः ॥ ८ ॥ ऐलीनस्य दुष्यन्ताद्याश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ दुष्यन्ताच्चक्रवर्ती भरतोऽभूत् ॥ १० ॥ यन्नामहेतुर्देवैश्लोको गीयते ॥ ११ ॥
माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाश्शकुन्तलाम् ॥ १२ ॥
रेतोधाः पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ १३ ॥
भरतस्य पत्नीत्रये नव पुत्रा बभूवुः ॥ १४ ॥ नैते ममानुरूपा इत्यभिहितास्तन्मातरः परित्यागभयात्तत्पुत्रान्जघ्नुः ॥ १५ ॥ ततोऽस्य वितथे पुत्रजन्मनि पुत्रार्थिनो मरुत्सोमयाजिनो दीर्घतमसः पाष्ण्र्यपास्ताद्बृहस्पतिवीर्यादुतथ्यपत्यां ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजाख्यः पुत्रो मरुद्भिर्दत्तः ॥ १६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— पुरूका पुत्र जनमेजय था। जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्का प्रवीर, प्रवीरका मनस्यु, मनस्युका अभयद, अभयदका सुद्यु, सुद्युका बहुगत, बहुगतका संयाति, संयातिक अहंयाति तथा अहंयातिका पुत्र रौद्राश्व था॥ १॥
रौद्राश्वके ऋतेषु, कक्षेपु, स्थण्डिलेषु, कृतेषु, जलेषु, धर्मेषु, धृतेषु, स्थलेषु, सन्नतेषु और वनेषु नामक दस पुत्र थे॥ २॥ ऋतेषुका पुत्र अन्तिनार हुआ तथा अन्तिनारके सुमति, अप्रतिरथ और ध्रुव नामक तीन पुत्रोंने जन्म लिया॥ ३-४॥ इनमेंसे अप्रतिरथका पुत्र कण्व और कण्वका मेधातिथि हुआ जिसकी सन्तान काण्वायन ब्राह्मण हुए॥ ५-७॥ अप्रतिरथका दूसरा पुत्र ऐलीन था॥ ८॥ इस ऐलीनके दुष्यन्त आदि चार पुत्र हुए॥ ९॥ दुष्यन्तके यहाँ चक्रवर्ती सम्राट् भरतका जन्म हुआ जिसके नामके विषयमें देवगणने इस श्लोकका गान किया था— ॥ १०-११॥
"माता तो केवल चमड़ेकी धौंकनीके समान है, पुत्रपर अधिकार तो पिताका ही है, पुत्र जिसके द्वारा जन्म ग्रहण करता है उसीका स्वरूप होता है। हे दुष्यन्त ! तू इस पुत्रका पालन-पोषण कर, शकुन्तलाका अपमान न कर। हे नरदेव ! अपने ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र अपने पिताको यमलोकसे [उद्धार कर स्वर्गलोकको] ले जाता है। 'इस पुत्रके आधान करनेवाले तुम्हीं हो'— शकुन्तलाने यह बात ठीक ही कही है'॥ १२-१३॥
भरतके तीन स्त्रियाँ थीं जिनसे उनके नौ पुत्र हुए॥ १४॥ भरतके यह कहनेपर कि 'ये मेरे अनुरूप नहीं हैं', उनकी माताओंने इस भयसे कि राजा हमको त्याग न दें, उन पुत्रोंको मार डाला॥ १५॥ इस प्रकार पुत्र-जन्मके विफल हो जानेसे भरतने पुत्रकी कामनासे मरुत्सोम नामक यज्ञ किया। उस यज्ञके अन्तमें मरुद्गणने उन्हें भरद्वाज नामक एक बालक पुत्ररूपसे दिया जो उतथ्यपत्नी ममताके गर्भमें स्थित दीर्घतमा मुनिके पाद-प्रहारसे स्खलित हुए बृहस्पतिजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था॥ १६॥
२९६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १९
| तस्यापि नामनिर्वचनश्लोकः पठ्यते ॥ १७ ॥<br>मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते ।<br>यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ १८<br>भरद्वाजस्स वितथे पुत्रजन्मनि मरुद्भिर्दत्तस्ततो<br>वितथसंज्ञामवाप ॥ १९ ॥ वितथस्यापि मन्युः<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २० ॥ बृहत्क्षत्रमहावीर्यनरगर्गा<br>अभवन्मन्युपुत्राः ॥ २१ ॥ नरस्य सङ्कृतिस्सङ्कृते-<br>र्गुरुप्रीतिरन्तिदेवौ ॥ २२ ॥ गर्गाच्छिनिः,<br>ततश्च गार्ग्यशैन्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो<br>बभूवुः ॥ २३ ॥ महावीर्याच्च दुरुक्षयो नाम<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २४ ॥ तस्य त्रय्यारुणिः पुष्करिण्यो<br>कपिश्च पुत्रत्रयमभूत् ॥ २५ ॥ तच्च पुत्रत्रितयमपि<br>पश्चाद्विप्रतामुपजगाम ॥ २६ ॥ बृहत्क्षत्रस्य<br>सुहोत्रः ॥ २७ ॥ सुहोत्राद्धस्ती य इदं हस्तिनापुर-<br>मावासयामास ॥ २८ ॥<br>अजमीढद्विजमीढपुरुमीढास्त्रयो हस्तिनस्त-<br>नयाः ॥ २९ ॥ अजमीढात्कण्वः ॥ ३० ॥<br>कण्वान्मेधातिथिः ॥ ३१ ॥ यतः काण्वायना<br>द्विजाः ॥ ३२ ॥ अजमीढस्यान्यः पुत्रो<br>बृहदिषुः ॥ ३३ ॥ बृहदिषोर्बृहद्धनुर्बृहद्धनुषश्च<br>बृहत्कर्मा ततश्च जयद्रथस्तस्मादपि<br>विश्वजित् ॥ ३४ ॥ ततश्च सेनजित् ॥ ३५ ॥<br>रुचिराश्वकाश्यदृढहनुवत्सहनुसंज्ञास्सेनजितः<br>पुत्राः ॥ ३६ ॥ रुचिराश्वपुत्रः पृथुसेनः<br>पृथुसेनात्पारः ॥ ३७ ॥ पारान्नीलः ॥ ३८ ॥<br>तस्यैकशतं पुत्राणाम् ॥ ३९ ॥ तेषां प्रधानः<br>काम्पिल्याधिपतिस्समरः ॥ ४० ॥ समरस्यापि<br>पारसुपारसदश्वास्त्रयः पुत्राः ॥ ४१ ॥ सुपारात्पृथुः<br>पृथोस्सुकृतिस्ततो विभ्राजः ॥ ४२ ॥<br>तस्माच्चाणुहः ॥ ४३ ॥ यश्शुकदुहितरं कीर्तिं<br>नामोपयेमे ॥ ४४ ॥ अणुहाद्ब्रह्मदत्तः ॥ ४५ ॥<br>ततश्च विष्वक्सेनस्तस्मादुदक्सेनः ॥ ४६ ॥<br>भल्लाभस्तस्य चात्मजः ॥ ४७ ॥ | उसके नामकरणके विषयमें भी यह श्लोक कहा<br>जाता है— ॥ १७ ॥<br>“पुत्रोत्पत्तिके अनन्तर बृहस्पतिने ममतासे कहा—<br>‘हे मूढे! यह पुत्र द्वाज (हम दोनोंसे उत्पन्न हुआ)<br>है तू इसका भरण कर।' तब ममताने भी कहा—<br>‘हे बृहस्पते! यह पुत्र द्वाज (हम दोनोंसे उत्पन्न<br>हुआ) है अतः तुम इसका भरण करो।' इस प्रकार<br>परस्पर विवाद करते हुए उसके माता-पिता चले गये,<br>इसलिये उसका नाम 'भरद्वाज' पड़ा”॥ १८॥<br>पुत्र-जन्म वितथ (विफल) होनेपर मरुद्गणने राजा<br>भरतको भरद्वाज दिया था, इसलिये उसका नाम 'वितथ'<br>भी हुआ॥ १९॥ वितथका पुत्र मन्यु हुआ और मन्युके<br>बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और गर्ग आदि कई पुत्र<br>हुए॥ २०-२१॥ नरका पुत्र संकृति और संकृतिके गुरुप्रीति<br>एवं रन्तिदेव नामक दो पुत्र हुए॥ २२॥ गर्गसे शिनिका<br>जन्म हुआ जिससे कि गार्ग्य और शैन्य नामसे विख्यात<br>क्षत्रोपेत ब्राह्मण उत्पन्न हुए॥ २३॥ महावीर्यका पुत्र दुरुक्षय<br>हुआ॥ २४॥ उसके त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य और कपि नामक<br>तीन पुत्र हुए॥ २५॥ ये तीनों पुत्र पीछे ब्राह्मण हो गये<br>थे॥ २६॥ बृहत्क्षत्रका पुत्र सुहोत्र, सुहोत्रका पुत्र हस्ती था<br>जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था॥ २७-२८॥<br>हस्तीके तीन पुत्र अजमीढ, द्विजमीढ और पुरुमीढ<br>थे। अजमीढके कण्व और कण्वके मेधातिथि नामक<br>पुत्र हुआ जिससे कि काण्वायन ब्राह्मण उत्पन्न<br>हुए॥ २९-३२॥ अजमीढका दूसरा पुत्र बृहदिषु था॥ ३३॥<br>बृहदिषुके बृहद्धनु, बृहद्धनुके बृहत्कर्मा, बृहत्कर्मके जयद्रथ,<br>जयद्रथके विश्वजित् तथा विश्वजित्के सेनजित्का जन्म<br>हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काश्य, दृढहनु और वत्सहनु<br>नामक चार पुत्र हुए॥ ३४-३६॥ रुचिराश्वके पृथुसेन,<br>पृथुसेनके पार और पारके नीलका जन्म हुआ। इस<br>नीलके सौ पुत्र थे, जिनमें काम्पिल्यनरेश समर प्रधान<br>था॥ ३७-४०॥ समरके पार, सुपार और सदश्व नामक<br>तीन पुत्र थे॥ ४१॥ सुपारके पृथु, पृथुके सुकृति, सुकृतिके<br>विभ्राज और विभ्राजके अणुह नामक पुत्र हुआ,<br>जिसने शुककन्या कीर्तिसे विवाह किया था॥ ४२-४४॥<br>अणुहसे ब्रह्मदत्तका जन्म हुआ। ब्रह्मदत्तसे विष्वक्सेन,<br>विष्वक्सेनसे उदक्सेन तथा उदक्सेनसे भल्लाभ नामक<br>पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४५-४७॥ |
अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| द्विजमीढस्य तु यवीनरसंज्ञः पुत्रः ॥४८॥ तस्यापि धृतिमांस्तस्माच्च सत्यधृतिस्ततश्च दृढनेमिस्तस्माच्च सुपाश्र्वस्ततस्सुमतिस्ततश्च सन्नतिमान् ॥४९॥ सन्नतिमन्तः कृतः पुत्रोऽभूत् ॥५०॥ यं हिरण्यनाभो योगमध्यापयामास ॥५१॥ यश्चतुर्विंशतिं प्राच्यसामगानां संहिताश्चकार ॥५२॥ कृताच्चोग्रायुधः ॥५३॥ येन प्राचुर्येण नीपक्षयः कृतः ॥५४॥ उग्रायुधात्क्षेम्यः क्षेम्यात्सुधीरस्तस्मादरिपुञ्जयस्तस्माच्च बहुरथ इत्येते पौरवाः ॥५५॥ | द्विजमीढका पुत्र यवीनर था ॥४८॥ उसका धृतिमान्, धृतिमान्का सत्यधृति, सत्यधृतिका दृढनेमि, दृढनेमिका सुपाश्र्व, सुपाश्र्वका सुमति, सुमतिका सन्नतिमान् तथा सन्नतिमान्का पुत्र कृत हुआ जिसे हिरण्यनाभने योगविद्याकी शिक्षा दी थी तथा जिसने प्राच्य सामग श्रुतियोंकी चौबीस संहिताएँ रची थीं ॥४९–५२॥ कृतका पुत्र उग्रायुध था जिसने अनेकों नीपवंशीय क्षत्रियोंका नाश किया ॥५३-५४॥ उग्रायुधके क्षेम्य, क्षेम्यके सुधीर, सुधीरके रिपुंजय और रिपुंजयसे बहुरथने जन्म लिया। ये सब पुरुवंशीय राजागण हुए ॥५५॥ |
| अजमीढस्य नलिनी नाम पत्नी तस्या नीलसंज्ञः पुत्रोऽभवत् ॥५६॥ तस्मादपि शान्तिः शान्तेस्सुशान्तिस्सुशान्तेः पुरञ्जयस्तस्माच्च ऋक्षः ॥५७॥ ततश्च हर्यश्वः ॥५८॥ तस्मान्मुद्गलसृञ्जयबृहदिषुयवीनरकाम्पिल्यसंज्ञाः पञ्चानामेव तेषां विषयाणां रक्षणायालमेते मत्पुत्रा इति पित्राभिहिताः पाञ्चालाः ॥५९॥ | अजमीढकी नलिनीनाम्नी एक भार्या थी। उसके नील नामक एक पुत्र हुआ ॥५६॥ नीलके शान्ति, शान्तिके सुशान्ति, सुशान्तिके पुरंजय, पुरंजयके ऋक्ष और ऋक्षके हर्यश्व नामक पुत्र हुआ ॥५७-५८॥ हर्यश्वके मुद्गल, सृंजय, बृहदिषु, यवीनर और काम्पिल्य नामक पाँच पुत्र हुए। पिताने कहा था कि मेरे ये पुत्र मेरे आश्रित पाँचों देशोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, इसलिये वे पांचाल कहलाये ॥५९॥ |
| मुद्गलाच्च मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो बभूवुः ॥६०॥ मुद्गलाद्बृहदश्वः ॥६१॥ बृहदश्वादिवोदासोऽहल्या च मिथुनमभूत् ॥६२॥ शरद्वतश्चाहल्यायां शतानन्दोऽभवत् ॥६३॥ शतानन्दात्सत्यधृतिर्धनुर्वेदन्तगो जज्ञे ॥६४॥ सत्यधृतेर्वरप्सरसमूर्वशीं दृष्ट्वा रेतस्कन्नं शरस्तम्बे पपात ॥६५॥ तच्च द्विधागतमपत्यद्वयं कुमारः कन्या चाभवत् ॥६६॥ तौ च मृगयामुपयातश्शान्तनुर्दृष्ट्वा कृपया जग्राह ॥६७॥ ततः कुमारः कृपः कन्या चाश्वत्थाम्नो जननी कृपी द्रोणाचार्यस्य पत्न्यभवत् ॥६८॥ | मुद्गलसे मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई ॥६०॥ मुद्गलसे बृहदश्व और बृहदश्वसे दिवोदास नामक पुत्र एवं अहल्या नामकी एक कन्याका जन्म हुआ ॥६१-६२॥ अहल्यासे महर्षि गौतमके द्वारा शतानन्दका जन्म हुआ ॥६३॥ शतानन्दसे धनुर्वेदका पारदर्शी सत्यधृति उत्पन्न हुआ ॥६४॥ एक बार अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीको देखनेसे सत्यधृतिका वीर्य स्खलित होकर शरस्तम्ब (सरकण्डे)-पर पड़ा ॥६५॥ उससे दो भागोंमें बँट जानेके कारण पुत्र और पुत्रीरूप दो सन्तानें उत्पन्न हुईं ॥६६॥ उन्हें मृगयाके लिये गये हुए राजा शान्तनु कृपावश ले आये ॥६७॥ तदनन्तर पुत्रका नाम कृप हुआ और कन्या अश्वत्थामाकी माता द्रोणाचार्यकी पत्नी कृपी हुई ॥६८॥ |
| दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायुः ॥६९॥ मित्रायोश्च्यवनो नाम राजा ॥७०॥ च्यवनात्सुदासः सुदासात्सौदासरः सौदासात्सहदेवस्तस्यापि सोमकः ॥७१॥ सोमकाज्जन्तुः पुत्रशतज्येष्ठोऽभवत् ॥७२॥ तेषां यवीयान् पृषतः पृषताद्द्रुपदस्तस्माच्च धृष्टद्युम्नस्ततो धृष्टकेतुः ॥७३॥ | दिवोदासका पुत्र मित्रायु हुआ ॥६९॥ मित्रायुका पुत्र च्यवन नामक राजा हुआ, च्यवनका सुदास, सुदासका सौदासर, सौदासका सहदेव, सहदेवका सोमक और सोमकके सौ पुत्र हुए जिनमें जन्तु सबसे बड़ा और पृषत सबसे छोटा था। पृषतका पुत्र द्रुपद, द्रुपदका धृष्टद्युम्न और धृष्टद्युम्नका पुत्र धृष्टकेतु था ॥७०–७३॥ |
| २९८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २० |
|---|
| अजमीढस्यान्य ऋक्षनामा पुत्रोऽभवत् ॥ ७४ ॥ तस्य संवरणः ॥ ७५ ॥ संवरणात्कुरुः ॥ ७६ ॥ य इदं धर्मक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं चकार ॥ ७७ ॥ सुधनुर्जह्नुपरीक्षित्प्रमुखाः कुरोः पुत्रा बभूवुः ॥ ७८ ॥ सुधनुषः पुत्रस्सुहोत्रस्तस्माच्च्यवनश्च्यवनात् कृतकः ॥ ७९ ॥ ततश्चोपरिचरो वसुः ॥ ८० ॥ बृहद्रथप्रत्यग्रकुशाम्बुकुचेल्मात्स्यप्रमुखा वसोः पुत्रास्सप्ताजायन्त ॥ ८१ ॥ बृहद्रथात्कुशाग्रः कुशाग्राद्वृषभो वृषभात् पुष्पवान् तस्मात्सत्यहितस्तस्मात्सुधन्वा तस्य च जतुः ॥ ८२ ॥ बृहद्रथाच्चान्यश्शकलद्वयजन्मा जरया संहितो जरासन्धनामा ॥ ८३ ॥ तस्मात्सहदेवस्सहदेवात्सोमपस्ततश्च श्रुतश्रवाः ॥ ८४ ॥ इत्येते मया मागधा भूपालाः कथिताः ॥ ८५ ॥ | अजमीढका ऋक्ष नामक एक पुत्र और था ॥ ७४ ॥ उसका पुत्र संवरण हुआ तथा संवरणका पुत्र कुरु था जिसने कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रकी स्थापना की ॥ ७५-७७ ॥ कुरुके पुत्र सुधनु, जह्नु और परीक्षित् आदि हुए ॥ ७८ ॥ सुधनुका पुत्र सुहोत्र था, सुहोत्रका च्यवन, च्यवनका कृतक और कृतकका पुत्र उपरिचर वसु हुआ ॥ ७९-८० ॥ वसुके बृहद्रथ, प्रत्यग्र, कुशाम्बु, कुचेल और मात्स्य आदि सात पुत्र थे ॥ ८१ ॥ इनमेंसे बृहद्रथके कुशाग्र, कुशाग्रके वृषभ, वृषभके पुष्पवान्, पुष्पवान्के सत्यहित, सत्यहितके सुधन्वा और सुधन्वाके जतुका जन्म हुआ ॥ ८२ ॥ बृहद्रथके दो खण्डोंमें विभक्त एक पुत्र और हुआ था जो कि जराके द्वारा जोड़ दिये जानेपर जरासन्ध कहलाया ॥ ८३ ॥ उससे सहदेवका जन्म हुआ तथा सहदेवसे सोमप और सोमपसे श्रुतिश्रवाकी उत्पत्ति हुई ॥ ८४ ॥ इस प्रकार मैंने तुमसे यह मागध भूपालोंका वर्णन कर दिया है ॥ ८५ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेंऽशे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
कुरुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—[कुरुपुत्र] परीक्षित्के |
|---|---|
| परीक्षितो जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्राः ॥ १ ॥ जह्नोस्तु सुरथो नामात्मजो बभूव ॥ २ ॥ तस्यापि विदूरथः ॥ ३ ॥ तस्मात्सार्वभौमस्सार्वभौमाज्जयसेनस्तस्मादाराधितस्ततश्चायुतायुरयुतायोरक्रोधनः ॥ ४ ॥ तस्माद्देवातिथिः ॥ ५ ॥ ततश्च ऋक्षोऽन्योऽभवत् ॥ ६ ॥ ऋक्षाद्भीमसेनस्ततश्च दिलीपः ॥ ७ ॥ दिलीपात् प्रतीपः ॥ ८ ॥ | जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र हुए, तथा जह्नुके सुरथ नामक एक पुत्र हुआ ॥ १-२ ॥ सुरथके विदूरथका जन्म हुआ। विदूरथके सार्वभौम, सार्वभौमके जयसेन, जयसेनके आराधित, आराधितके अयुतायु, अयुतायुके अक्रोधन, अक्रोधनके देवातिथि तथा देवातिथिके [अजमीढके पुत्र ऋक्षसे भिन्न] दूसरे ऋक्षका जन्म हुआ ॥ ३-६ ॥ ऋक्षसे भीमसेन, भीमसेनसे दिलीप और दिलीपसे प्रतीप नामक पुत्र हुआ ॥ ७-८ ॥ |
| तस्यापि देवापिशान्तनुबाहीकसंज्ञास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ देवापिर्बाल एवारण्यं विवेश ॥ १० ॥ शान्तनुस्तु महीपालोऽभूत् ॥ ११ ॥ अयं च तस्य श्लोकः पृथिव्यां गीयते ॥ १२ ॥ | प्रतीपके देवापि, शान्तनु और बाह्लीक नामक तीन पुत्र हुए ॥ ९ ॥ इनमेंसे देवापि बाल्यावस्थामें ही वनमें चला गया था अतः शान्तनु ही राजा हुआ ॥ १०-११ ॥ उसके विषयमें पृथिवीतलपर यह श्लोक कहा जाता है— ॥ १२ ॥ |
अ० २० ] * चतुर्थ अंश * २९९
| यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं यौवनमेति सः।<br>शान्तिं चाप्नोति येनाग्र्यां कर्मणा तेन शान्तनुः ॥ १३ | ''[राजा शान्तनु] जिसको-जिसको अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे वे वृद्ध पुरुष भी युवावस्था प्राप्त कर लेते थे तथा उनके स्पर्शसे सम्पूर्ण जीव अत्युत्तम शान्तिलाभ करते थे, इसलिये वे शान्तनु कहलाते थे'' ॥ १३ ॥ |
| तस्य च शान्तनो राष्ट्रे द्वादशवर्षाणि देवो न ववर्ष ॥ १४ ॥ ततश्चाशेषराष्ट्रविनाशमवेक्ष्यासौ राजा ब्राह्मणानपृच्छत् कस्मादस्माकं राष्ट्रे देवो न वर्षति को ममापराध इति ॥ १५ ॥ | एक बार महाराज शान्तनुके राज्यमें बारह वर्षतक वर्षा न हुई ॥ १४ ॥ उस समय सम्पूर्ण देशको नष्ट होता देखकर राजाने ब्राह्मणोंसे पूछा—'हमारे राज्यमें वर्षा क्यों नहीं हुई? इसमें मेरा क्या अपराध है?' ॥ १५ ॥ |
| ततश्च तमूचुर्ब्राह्मणाः ॥ १६ ॥ अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया सम्भुज्यते अतः परिवेत्ता त्वमित्युक्तस्स राजा पुनस्तानपृच्छत् ॥ १७ ॥ किं मयात्र विधेयमिति ॥ १८ ॥ | तब ब्राह्मणोंने उससे कहा—'यह राज्य तुम्हारे बड़े भाईका है किन्तु इसे तुम भोग रहे हो; इसलिये तुम परिवेत्ता हो।' उनके ऐसा कहनेपर राजा शान्तनुने उनसे फिर पूछा—'तो इस सम्बन्धमें मुझे अब क्या करना चाहिये?' ॥ १६—१८ ॥ |
| ततस्ते पुनरप्यूचुः ॥ १९ ॥ यावद्देवापिर्न पतनादिभिर्दोषैरभिभूयते तावदेतत्तस्यार्हं राज्यम् ॥ २० ॥ तदलमेतेन तु तस्मै दीयतामित्युक्ते तस्य मन्त्रिप्रवरेणाश्मसारिणा तत्रारण्ये तपस्विनो वेदवादविरोधवक्तारः प्रयुक्ताः ॥ २१ ॥ तैरस्याप्यतिऋजुमतेर्महीपतिपुत्रस्य बुद्धिर्र्वेदवादविरोधमार्गानुसारिण्यक्रियत् ॥ २२ ॥ राजा च शान्तनुर्द्विजवचनोत्पन्नपरिदेवनशोकस्तान् ब्राह्मणानग्रतः कृत्वाग्रजस्य प्रदानायारण्यं जगाम ॥ २३ ॥ | इसपर वे ब्राह्मण फिर बोले—'जबतक तुम्हारा बड़ा भाई देवापि किसी प्रकार पतित न हो तबतक यह राज्य उसीके योग्य है ॥ १९-२० ॥ अतः तुम इसे उसीको दे डालो, तुम्हारा इससे कोई प्रयोजन नहीं।' ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर शान्तनुके मन्त्री अश्मसारिने वेदवादके विरुद्ध बोलनेवाले तपस्वियोंको वनमें नियुक्त किया ॥ २१ ॥ उन्होंने अतिशय सरलमति राजकुमार देवापिकी बुद्धिको वेदवादके विरुद्ध मार्गमें प्रवृत्त कर दिया ॥ २२ ॥ उधर राजा शान्तनु ब्राह्मणोंके कथनानुसार दुःख और शोकयुक्त होकर ब्राह्मणोंको आगे कर अपने बड़े भाईको राज्य देनेके लिये वनमें गये ॥ २३ ॥ |
| तदाश्रममुपगताश्च तमवनतमवनीपतिपुत्रं देवापिमुपतस्थुः ॥ २४ ॥ ते ब्राह्मणा वेदवादानुबन्धीनि वचांसि राज्यमग्रजेन कर्तव्यमित्यर्थवन्ति तमूचुः ॥ २५ ॥ असावपि देवापिर्वेदवादविरोधयुक्तिदूषितमनेकप्रकारं तानाह ॥ २६ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाश्शान्तनुमूचुः ॥ २७ ॥ आगच्छ हे राजन्नलमत्रातिनिर्बन्धेन प्रशान्त एवासावनावृष्टिदोषः पतितोऽयमनादिकालमहितवेदवचनदूषणोच्चारणात् ॥ २८ ॥ पतिते चाग्रजे नैव ते परिवेतृत्वं भवतीत्युक्तश्शान्तनुःस्वपुरमागम्य राज्यमकरोत् ॥ २९ ॥ वेदवादविरोधवचनोच्चारणदूषिते च तस्मिन्देवापौ तिष्ठत्यपि ज्येष्ठभ्रातर्यखिलसस्यनिष्पत्तये ववर्ष भगवान्पर्जन्यः ॥ ३० ॥ | वनमें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणगण परम विनीत राजकुमार देवापिके आश्रमपर उपस्थित हुए; और उससे 'ज्येष्ठ भ्राताको ही राज्य करना चाहिये'—इस अर्थके समर्थक अनेक वेदानुकूल वाक्य कहने लगे ॥ २४-२५ ॥ किन्तु उस समय देवापिने वेदवादके विरुद्ध नाना प्रकारकी युक्तियोंसे दूषित बातें कीं ॥ २६ ॥ तब उन ब्राह्मणोंने शान्तनुसे कहा— ॥ २७ ॥ "हे राजन् ! चलो, अब यहाँ अधिक आग्रह करनेकी आवश्यकता नहीं। अब अनावृष्टिका दोष शान्त हो गया। अनादिकालसे पूजित वेदवाक्योंमें दोष बतलानेके कारण देवापि पतित हो गया है ॥ २८ ॥ ज्येष्ठ भ्राताके पतित हो जानेसे अब तुम परिवेत्ता नहीं रहे।" उनके ऐसा कहनेपर शान्तनु अपनी राजधानीको चले आये और राज्यशासन करने लगे ॥ २९ ॥ वेदवादके विरुद्ध वचन बोलनेके कारण देवापिके पतित हो जानेसे, बड़े भाईके रहते हुए भी सम्पूर्ण धान्योंकी उत्पत्तिके लिये पर्जन्यदेव (मेघ) बरसने लगे ॥ ३० ॥ |
३०० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
| बाह्लीकात्सोमदत्तः पुत्रोऽभूत् ॥ ३१ ॥ | बाह्लीकके सोमदत्त नामक पुत्र हुआ तथा सोमदत्तके |
|---|---|
| सोमदत्तस्यापि भूरिभूरिश्रवःशल्यसंज्ञास्त्रयः पुत्रा | भूरि, भूरिश्रवा और शल्य नामक तीन पुत्र |
| बभूवुः ॥ ३२ ॥ शान्तनोरप्यमरनद्यां जाह्नव्या- | हुए ॥ ३१-३२ ॥ शान्तनुके गंगाजीसे अतिशय कीर्तिमान् |
| मुदारकीर्तिरशेषशास्त्रार्थविद्भीष्मः पुत्रो- | तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंका जाननेवाला भीष्म नामक पुत्र |
| ऽभूत् ॥ ३३ ॥ सत्यवत्यां च चित्राङ्गदविचित्रवीर्यौ | हुआ ॥ ३३ ॥ शान्तनुने सत्यवतीसे चित्रांगद और विचित्रवीर्य |
| द्वौ पुत्रावुत्पादयामास शान्तनुः ॥ ३४ ॥ | नामक दो पुत्र और भी उत्पन्न किये ॥ ३४ ॥ उनमेंसे |
| चित्राङ्गदस्तु बाल एव चित्राङ्गदेनैव गन्धर्वेणाहवे | चित्रांगदको तो बाल्यावस्थामें ही चित्रांगद नामक गन्धर्वने |
| निहतः ॥ ३५ ॥ विचित्रवीर्योऽपि काशिराजतनये | युद्धमें मार डाला ॥ ३५ ॥ विचित्रवीर्यने काशिराजकी |
| पुत्रिका-धर्मानुसार बभ्रुवाहन नामक एक पुत्र उत्पन्न | |
| अम्बिकाम्बालिके उपयेमे ॥ ३६ ॥ तदुपभोगाति- | पुत्री अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया ॥ ३६ ॥ |
| खेदाच्च यक्ष्मणा गृहीतः स पञ्चत्वम- | उनमें अत्यन्त भोगासक्त रहनेके कारण अतिशय खिन्न |
| गमत् ॥ ३७ ॥ सत्यवतीनियोगाच्च मत्पुत्रः कृष्ण- | रहनेसे वह यक्ष्माके वशीभूत होकर [अकालहीमें] मर |
| द्वैपायनो मातृवचनमनतिक्रमणीयमिति कृत्वा | गया ॥ ३७ ॥ तदनन्तर मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनने सत्यवतीके |
| विचित्रवीर्यक्षेत्रे धृतराष्ट्रपाण्डू तत्प्रहित- | नियुक्त करनेसे माताका वचन टालना उचित न जान |
| भुजिष्यायां विदुरं चोत्पादयामास ॥ ३८ ॥ | विचित्रवीर्यकी पत्नियोंसे धृतराष्ट्र और पाण्डु नामक दो |
| पुत्र उत्पन्न किये और उनकी भेजी हुई दासीसे विदुर | |
| नामक एक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३८ ॥ | |
| धृतराष्ट्रोऽपि गान्धार्या दुर्योधनदुःशासनप्रधानं | धृतराष्ट्रने भी गान्धारीसे दुर्योधन और दुःशासन |
| पुत्रशतमूत्पादयामास ॥ ३९ ॥ पाण्डोरप्यरrootण्ये | आदि सौ पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३९ ॥ पाण्डु वनमें |
| मृगयायामृषि शापोपहतप्रजाजननसामर्थ्यस्य धर्म- | आखेट करते समय ऋषिके शापसे सन्तानोत्पादनमें |
| वायुशक्रैर्य्युधिष्ठिरभीमसेनार्जुनाः कुन्त्यां | असमर्थ हो गये थे अतः उनकी स्त्री कुन्तीसे धर्म, |
| नकुलसहदेवौ चाश्विभ्यां माद्र्यां पञ्चपुत्रा- | वायु और इन्द्रने क्रमशः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन |
| स्समुत्पादिताः ॥ ४० ॥ तेषां च द्रौपद्यां पञ्चैव | नामक तीन पुत्र तथा माद्रीसे दोनों अश्विनीकुमारोंने |
| पुत्रा बभूवुः ॥ ४१ ॥ युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्यः | नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। इस |
| प्रकार उनके पाँच पुत्र हुए ॥ ४० ॥ उन पाँचोंके द्रौपदीसे | |
| पाँच ही पुत्र हुए ॥ ४१ ॥ उनमेंसे युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, | भीमसेनाच्छुतसेनः श्रुतकीर्तिरर्जुनाच्छुतानीको |
| भीमसेनसे श्रुतसेन, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे श्रुतानीक | नकुलाच्छ्रतकर्म सहदेवात् ॥ ४२ ॥ |
| तथा सहदेवसे श्रुतकर्मका जन्म हुआ था ॥ ४२ ॥ | |
| अन्ये च पाण्डवानामात्मजास्तद्यथा ॥ ४३ ॥ | इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके और भी कई पुत्र |
| यौधेयी युधिष्ठिराद्देवकं पुत्रमवाप ॥ ४४ ॥ | हुए ॥ ४३ ॥ जैसे-युधिष्ठिरसे यौधेयीके देवक नामक |
| हिडिम्बा घटोत्कचं भीमसेनात्पुत्रं लेभे ॥ ४५ ॥ | पुत्र हुआ, भीमसेनसे हिडिम्बाके घटोत्कच और काशीसे |
| काशी च भीमसेनादेव सर्वगं सुतमवाप ॥ ४६ ॥ | सर्वग नामक पुत्र हुआ, सहदेवसे विजयाके सुहोत्रका |
| सहदेवाच्च विजया सुहोत्रं पुत्रमवाप ॥ ४७ ॥ | जन्म हुआ, नकुलने रेणुमतीसे निरमित्रको उत्पन्न |
| रेणुमत्यां च नकुलोऽपि निरमित्रमजीजनत् ॥ ४८ ॥ | किया ॥ ४४-४८ ॥ अर्जुनके नागकन्या उलूपीसे इरावान् |
| अर्जुनस्याप्युलूप्यां नागकन्यायामिरावान्नाम | नामक पुत्र हुआ ॥ ४९ ॥ मणिपुर नरेशकी पुत्रीसे अर्जुनने |
| पुत्रोऽभवत् ॥ ४९ ॥ मणिपुरपतिपुत्र्यां पुत्रिका- | पुत्रिका-धर्मानुसार बभ्रुवाहन नामक एक पुत्र उत्पन्न |
| धर्मेण बभ्रुवाहनं नाम पुत्रमर्जुनोऽजनयत् ॥ ५० ॥ | किया ॥ ५० ॥ तथा उसके सुभद्रासे अभिमन्युका जन्म |
| सुभद्रायां चार्भकत्वेऽपि योऽसावतिबलपराक्रम- | हुआ जो कि बाल्यावस्थामें ही बड़ा बल-पराक्रम- |
| स्समस्तारातिरयजेता सोऽभिमन्युरजायत ॥ ५१ ॥ | सम्पन्न तथा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतनेवाला था ॥ ५१ ॥ |
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अ० २१ ] * चतुर्थ अंश * ३०१
| अभिमन्योरुत्तरायां परिक्षीणेषु कुरुष्वश्वत्थाम-प्रयुक्तब्रह्मास्त्रेण गर्भ एव भस्मीकृतो भगवत-स्सकलसुरासुरवन्दितचरणयुगलस्यात्मेच्छया कारणमानुषरूपधारिणोऽनुभावात्पुनर्जीवित-मवाप्य परीक्षित्सञ्जज्ञे॥ ५२॥ योऽयं साम्प्रतमेत-द्भूखण्डलमखण्डितायतिधर्मेण पालयतीति॥ ५३॥ | तदनन्तर कुरुकुलके क्षीण हो जानेपर जो अश्वत्थामाके प्रहार किये हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा गर्भमें ही भस्मीभूत हो चुका था किन्तु फिर, जिन्होंने अपनी इच्छासे ही माया-मानव-देह धारण किया है उन सकल सुरासुरवन्दितचरणारविन्द श्रीकृष्णचन्द्रके प्रभावसे पुनः जीवित हो गया; उस परीक्षित्ने अभिमन्युके द्वारा उत्तराके गर्भसे जन्म लिया जो कि इस समय इस प्रकार धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डलका शासन कर रहा है कि जिससे भविष्यमें भी उसकी सम्पत्ति क्षीण न हो॥ ५२-५३॥ |
|---|
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अतः परं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि॥ १॥ | अब मैं भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन करता हूँ॥ १॥ |
| योऽयं साम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्रा भविष्यन्ति॥ २॥ | इस समय जो परीक्षित् नामक महाराज हैं इनके जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र होंगे॥ २॥ |
| जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति॥ ३॥ | जनमेजयका पुत्र शतानीक होगा |
| योऽसौ याज्ञवल्क्याद्वेदमधीत्य कृपादस्त्राण्यवाप्य विषमविषयविरक्तचित्त-वृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्मज्ञानप्रवीणः परं निर्वाण-मवाप्स्यति॥ ४॥ | जो याज्ञवल्क्यसे वेदाध्ययनकर, कृपासे शस्त्रविद्या प्राप्तकर विषम विषयोंसे विरक्तचित्त हो महर्षि शौनकके उपदेशसे आत्मज्ञानमें निपुण होकर परवनिर्वाण-पद प्राप्त करेगा॥ ३-४॥ |
| शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता॥ ५॥ | शतानीकका पुत्र अश्वमेधदत्त होगा॥ ५॥ |
| तस्मादप्यधिसीमकृष्णः॥ ६॥ | उसके अधिसीमकृष्ण |
| अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः॥ ७॥ | तथा अधिसीमकृष्णके निचक्षु नामक पुत्र होगा |
| यो गङ्गायापहृते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति॥ ८॥ | जो कि गङ्गाजीद्वारा हस्तिनापुरके बहा ले जानेपर कौशाम्बीपुरीमें निवास करेगा॥ ६-८॥ |
| तस्याप्युष्णः पुत्रो भविता॥ ९॥ | निचक्षुका पुत्र उष्ण होगा, |
| उष्णाद्विचित्ररथः॥ १०॥ | उष्णका विचित्ररथ, |
| ततः शुचिरथः॥ ११॥ | विचित्ररथका शुचिरथ, |
| तस्माद्वृष्णिमांस्ततस्सुषेणस्तस्यापि सुनीथ-स्सुनीथान्नृपचक्षुस्तस्मादपि सुखावलस्तस्य च पारिप्लवस्ततश्च सुनयस्तस्यापि मेधावी ॥ १२॥ | शुचिरथका वृष्णिमान्, वृष्णिमान्का सुषेण, सुषेणका सुनीथ, सुनीथका नृप, नृपका चक्षु, चक्षुका सुखावल, सुखावलका पारिप्लव, पारिप्लवका सुनय, सुनयका मेधावी, |
| मेधाविनो रिपुञ्जयस्ततो मृदुस्तस्माच्च तिग्मस्तस्माद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्वसुदानः॥ १३॥ | मेधावीका रिपुंजय, रिपुंजयका मृदु, मृदुका तिग्म, तिग्मका बृहद्रथ, बृहद्रथका वसुदान, |
| ततोऽपरश्शतानीकः॥ १४॥ तस्माच्चोदयन | वसुदानका दूसरा शतानीक, शतानीकका उदयन, |
३०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| उदयनादहीनरस्ततश्च दण्डपाणिस्ततो निरमित्रः ॥ १५ ॥ तस्माच्च क्षेमकः ॥ १६ ॥ | उदयनका अहीनर, अहीनरका दण्डपाणि, दण्डपाणिका निरमित्र तथा निरमित्रका पुत्र क्षेमक होगा। इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १५–१७ ॥ |
| अत्रायं श्लोकः ॥ १७ ॥ | |
| ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो राजर्षिसत्कृतः ।<br>क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यते कलौ ॥ १८ ॥ | ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका कारणरूप तथा नाना राजर्षियोंसे सभाजित है वह कलियुगमें राजा क्षेमकके उत्पन्न होनेपर समाप्त हो जायगा’ ॥ १८ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय
भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः पार्थिवाः कथ्यन्ते ॥ १ ॥ | अब मैं भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| बृहद्वलस्य पुत्रो बृहत्क्षणः ॥ २ ॥ | बृहद्वलका पुत्र बृहत्क्षण होगा, उसका उरुक्षय, |
| तस्मादुरुक्षयस्तस्माच्च वत्सव्यूहस्ततश्च प्रतिव्योमस्तस्मादपि दिवाकरः ॥ ३ ॥ | उरुक्षयका वत्सव्यूह, वत्सव्यूहका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका दिवाकर, दिवाकरका सहदेव, |
| तस्मात्सहदेवः सहदेवाद्बृहदश्वस्तत्सूनुर्भानुरथस्तस्य च प्रतीताश्वस्तस्यापि सुप्रतीकस्ततश्च मरुदेवस्ततः सुनक्षत्रस्तस्मात्किन्नरः ॥ ४ ॥ | सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्वका भानुरथ, भानुरथका प्रतीताश्व, प्रतीताश्वका सुप्रतीक, सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका किन्नर, किन्नरका अन्तरिक्ष, |
| किन्नरादन्तरिक्षस्तस्मात्सुपर्णस्ततश्चामित्रजित् ॥ ५ ॥ | अन्तरिक्षका सुपर्ण, सुपर्णका अमित्रजित्, अमित्रजित्का बृहद्राज, |
| ततश्च बृहद्राजस्तस्यापि धर्मी धर्मिणः कृतञ्जयः ॥ ६ ॥ | बृहद्राजका धर्मी, धर्मीका कृतंजय, कृतंजयका रणंजय, |
| कृतञ्जयाद्रणञ्जयः ॥ ७ ॥ | रणंजयका संजय, संजयका शाक्य, |
| रणञ्जयात्सञ्जयस्तस्माच्छाक्यश्शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद्राहुलस्ततः प्रसेनजित् ॥ ८ ॥ | शाक्यका शुद्धोदन, शुद्धोदनका राहुल, राहुलका प्रसेनजित्, प्रसेनजित्का क्षुद्रक, |
| ततश्च क्षुद्रकस्ततश्च कुण्डकस्तस्मादपि सुरथः ॥ ९ ॥ | क्षुद्रकका कुण्डक, कुण्डकका सुरथ और सुरथका सुमित्र नामक पुत्र होगा। |
| तत्पुत्रश्च सुमित्रः ॥ १० ॥ | |
| इत्येते चेक्ष्वाकवो बृहद्वलान्वयाः ॥ ११ ॥ | ये सब इक्ष्वाकुके वंशमें बृहद्वलकी सन्तान होंगे ॥ २–११ ॥ |
| अत्रानुवंशश्लोकः ॥ १२ ॥ | इस वंशके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १२ ॥ |
| इक्ष्वाकूणामयं वंशस्सुमित्रान्तो भविष्यति ।<br>यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥ १३ ॥ | ‘यह इक्ष्वाकुवंश राजा सुमित्रतक रहेगा, क्योंकि कलियुगमें राजा सुमित्रके होनेपर फिर यह समाप्त हो जायगा’ ॥ १३ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
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