विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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२९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| रज उद्रेकप्रेरितैकाग्रमतिस्तद्भावनायोगात्ततोऽवाप्त- | रजोगुणके उत्कर्षसे प्रेरित हो उसकी मति [उस विपरीत |
| वधहेतुकीं निरतिशयामेवाखिलत्रैलोक्याधिक्य- | भावनाके अनुसार] दृढ़ हो गयी। अतः उसके भीतर |
| धारिणीं दशाननत्वे भोगसम्पदमवाप ॥ ७ ॥ न तु | ईश्वरीय भावनाका योग न होनेसे भगवान्के द्वारा मारे |
| स तस्मिन्ननादिनिधने परब्रह्मभूते भगवत्यनालम्बिनि | जानेके कारण ही रावणका जन्म लेनेपर उसने सम्पूर्ण |
| कृते मनसस्तल्लयमवाप ॥ ८ ॥ | त्रिलोकीमें सर्वाधिक भोग-सम्पत्ति प्राप्त की ॥ ७ ॥ उन |
| एवं दशाननत्वेऽप्यनङ्गपराधीनतया जानकी- | अनादि-निधन, परब्रह्मस्वरूप, निराधार भगवान्में चित्त |
| समासक्तचेतसा भगवता दाशरथिरूपधारिणा | न लगानेके कारण वह उन्हींमें लीन नहीं हुआ ॥ ८ ॥ |
| हतस्य तद्रूपदर्शनमेवासीत्, नायमच्युत इत्यासक्ति- | इसी प्रकार रावण होनेपर भी कामवश जानकीजीमें |
| र्विपद्यतोऽन्तःकरणे मानुषबुद्धिरेव केवल- | चित्त लग जानेसे भगवान् दशरथनन्दन रामके द्वारा मारे |
| मस्याभूत् ॥ ९ ॥ | जानेपर केवल उनके रूपका ही दर्शन हुआ था; 'ये अच्युत |
| पुनरप्यच्युतविनिपातमात्रफलमखिलभूमण्डल- | हैं' ऐसी आसक्ति नहीं हुई, बल्कि मरते समय इसके |
| श्लाघ्यचेदिराजकुले जन्म अव्याहतैश्वर्यं | अन्तःकरणमें केवल मनुष्यबुद्धि ही रही ॥ ९ ॥ |
| शिशुपालत्वेऽप्यवाप ॥ १० ॥ तत्र त्वखिलाना- | फिर श्रीअच्युतके द्वारा मारे जानेके फलस्वरूप इसने |
| मेव स भगवन्नाम्नां त्वङ्कारकारणमभवत् ॥ ११ ॥ | सम्पूर्ण भूमण्डलमें प्रशंसित चेदिराजके कुलमें शिशुपालरूपसे |
| ततश्च तत्कालकृतानां तेषामशेषाणा- | जन्म लेकर भी अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त किया ॥ १० ॥ उस |
| मेवाच्युतनाम्नामनवरतमनेकजन्मसु वर्द्धित- | जन्ममें वह भगवान्के प्रत्येक नामोंमें तुच्छताकी भावना |
| विद्वेषानुबन्धिश्चित्तो विनिन्दन्सन्तर्जनादिषूच्चारण- | करने लगा ॥ ११ ॥ उसका हृदय अनेक जन्मके द्वेषानुबन्धसे |
| मकरोत् ॥ १२ ॥ तच्च रूपमुत्फुल्लपद्मदलाम- | युक्त था, अतः वह उनकी निन्दा और तिरस्कार आदि |
| लाक्षमत्युज्ज्वलपीतवस्त्रधार्यमलकिरीटकेयूरहार- | करते हुए भगवान्के सम्पूर्ण समयानुसार लीलाकृत नामोंका |
| कटकादिशोभितमुदारचतुर्बाहुशङ्खचक्रगदाधर- | निरन्तर उच्चारण करता था ॥ १२ ॥ खिले हुए कमलदलके |
| मतिप्ररूढवैरानुभावादटनभोजनस्नानासन- | समान जिसकी निर्मल आँखें हैं, जो उज्ज्वल पीताम्बर तथा |
| शयनादिष्वशेषावस्थान्तरेषु नान्यत्रोपययावस्य | निर्मल किरीट, केयूर, हार और कटकादि धारण किये हुए |
| चेतसः ॥ १३ ॥ ततस्तमेवाक्रोशेषूच्चारयंस्तमेव | हैं तथा जिसकी लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं और जो शंख, |
| हृदयेन धारयन्नात्मवधाय यावद्भगवद्धस्तचक्रांशु- | चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं, भगवान्का वह |
| मालोज्ज्वलमक्षयतेजस्स्वरूपं ब्रह्मभूतमपगत- | दिव्य रूप अत्यन्त वैरानुबन्धके कारण भ्रमण, भोजन, |
| द्वेषादिदोषं भगवन्तमद्राक्षीत् ॥ १४ ॥ तावच्च | स्नान, आसन और शयन आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें कभी |
| भगवच्चक्रेणाशुव्यापादितस्तत्स्मरणदग्धाखिलाघ- | उसके चित्तसे दूर न होता था ॥ १३ ॥ फिर गाली देते समय |
| सञ्चयो भगवन्तान्तमुपनीतस्तस्मिन्नेव | उन्हींका नामोच्चारण करते हुए और हृदयमें भी उन्हींका |
| लयमुपययौ ॥ १५ ॥ एतत्तवाखिलं मयाभि- | ध्यान धरते हुए जिस समय वह अपने वधके लिये हाथमें |
| हितम् ॥ १६ ॥ अयं हि भगवान् कीर्तितश्च संस्मृतश्च | धारण किये चक्रके उज्ज्वल किरणजालसे सुशोभित, अक्षय |
| द्वेषानुबन्धेनापि अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं | तेजस्वरूप द्वेषादि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित ब्रह्मभूत भगवान्को |
| प्रयच्छति किमुत सम्यग्भक्तिमतामिति ॥ १७ ॥ | देख रहा था ॥ १४ ॥ उसी समय तुरन्त भगवच्चक्रसे मारा |
| गया; भगवत्स्मरणके कारण सम्पूर्ण पापराशिके दग्ध हो | |
| जानेसे भगवान्के द्वारा उसका अन्त हुआ और वह उन्हींमें | |
| लीन हो गया ॥ १५ ॥ इस प्रकार इस सम्पूर्ण रहस्यका मैंने | |
| तुमसे वर्णन किया ॥ १६ ॥ अहो! वे भगवान् तो द्वेषानुबन्धके | |
| कारण भी कीर्तन और स्मरण करनेसे सम्पूर्ण देवता और | |
| असुरोंको दुर्लभ परमफल देते हैं, फिर सम्यक् भक्तिसम्पन्न | |
| पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥ |