विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २९१
वसुदेवस्य त्वानकदुन्दुभेः पौरवीरोहिणी- मदिराभद्रादेवकीप्रमुखा बह्व्यः पत्न्यो- ऽभवन् ॥ १८ ॥ बलभद्रशठसारणदुर्मदादीन्पुत्रा- न्रोहिण्यामानकदुन्दुभिरुत्पादयामास ॥ १९ ॥ बलदेवोऽपि रेवत्यां विशठोल्मुकौ पुत्राव- जनयत् ॥ २० ॥ साष्टिर्माष्टिशिशुसत्यधृतिप्रमुखाः सारणात्मजाः ॥ २१ ॥ भद्राश्वभद्रबाहुदुर्मभूताद्या रोहिण्याः कुलजाः ॥ २२ ॥ नन्दोपनन्द- कृतकाद्या मदिरायास्तनयाः ॥ २३ ॥ भद्रायाश्चोपनिधिगदाद्याः ॥ २४ ॥ वैशाल्यां च कौशिकमेकमेवाजनयत् ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभेर्देवक्यामपि कीर्तिमत्सुषेणो- दायभद्रसेनऋजुदासभद्रदेवाख्याः षट् पुत्रा जज्ञिरे ॥ २६ ॥ तांश्च सर्वानैव कंसो घातितवान् ॥ २७ ॥ अनन्तरं च सप्तमं गर्भमर्द्धरात्रे भगवत्प्रहिता योगनिद्रा रोहिण्या जठरमाकृष्य नीतवती ॥ २८ ॥ कर्षणाच्चासावपि संकर्षणाख्या- मगमत् ॥ २९ ॥ ततश्च सकलजगन्महा- तरुमूलभूतो भूतभविष्यदादिसकलसुरासुरमुनि- जनमनसामप्यगोचरोऽब्जभवप्रमुखैरनलमुखैः प्रणम्यावनिभारहरणाय प्रसादितो भगवाननादि- मध्यनिधनो देवकीगर्भमवततार वासुदेवः ॥ ३० ॥ तत्प्रसादविवर्द्धमानोरुमहिमा च योगनिद्रा नन्दगोपपत्या यशोदाया गर्भ- मधिष्ठितवती ॥ ३१ ॥ सुप्रसन्नादित्यचन्द्रादिग्रह- मव्यालादिभयं स्वस्थमानसमखिलमे- वैतज्जगदपास्ताधर्ममभवत्तस्मिंश्च पुण्डरी- कनयने जायमाने ॥ ३२ ॥ जातेन च तेनाखिल- मेवैतत्सन्मार्गवर्त्ति जगदक्रियत् ॥ ३३ ॥
भगवतोऽप्यत्र मर्त्यलोकेऽवतीर्णस्य षोडशसहस्राण्येकोत्तरशताधिकानि भार्याणाम- भवन् ॥ ३४ ॥ तासां च रुक्मिणीसत्यभामाजाम्ब- वतीचारुहासिनीप्रमुखा ह्यष्टौ पत्न्यः प्रधाना बभूवुः ॥ ३५ ॥ तासु चाष्टावयुतानिलक्षं च पुत्राणां
आनकदुन्दुभि वसुदेवजीके पौरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा और देवकी आदि बहुत-सी स्त्रियाँ थीं ॥ १८ ॥ उनमें रोहिणीसे वसुदेवजीने बलभद्र, शठ, सारण और दुर्मद आदि कई पुत्र उत्पन्न किये ॥ १९ ॥ तथा बलभद्रजीके रेवतीसे विशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए ॥ २० ॥ साष्टि, माष्टि, सत्य और धृति आदि सारणके पुत्र थे ॥ २१ ॥ इनके अतिरिक्त भद्राश्व, भद्रबाहु, दुर्मम और भूत आदि भी रोहिणीहीकी सन्तानमें थे ॥ २२ ॥ नन्द, उपनन्द और कृतक आदि मदिराके तथा उपनिधि और गद आदि भद्राके पुत्र थे ॥ २३-२४ ॥ वैशालीके गर्भसे कौशिक नामक केवल एक ही पुत्र हुआ ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभिके देवकीसे कीर्तिमान्, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास तथा भद्रदेव नामक छः पुत्र हुए ॥ २६ ॥ इन सबको कंसने मार डाला था ॥ २७ ॥ पीछे भगवान्की प्रेरणासे योगमायाने देवकीके सातवें गर्भको आधी रातके समय खींचकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया ॥ २८ ॥ आकर्षण करनेसे इस गर्भका नाम संकर्षण हुआ ॥ २९ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप महावृक्षके मूलस्वरूप भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालीन सम्पूर्ण देव, असुर और मुनिजनकी बुद्धिके अगम्य तथा ब्रह्मा और अग्नि आदि देवताओंद्धारा प्रणाम करके भूभारहरणके लिये प्रसन्न किये गये आदि, मध्य और अन्तहीन भगवान् वासुदेवने देवकीके गर्भसे अवतार लिया तथा उन्हींकी कृपासे बढ़ी हुई महिमावाली योगनिद्रा भी नन्दगोपकी पत्नी यशोदाके गर्भमें स्थित हुई ॥ ३०-३१ ॥ उन कमलनयन भगवान्के प्रकट होनेपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहोंसे सम्पन्न सर्पादिके भयसे शून्य, अधर्मादिसे रहित तथा स्वस्थचित्त हो गया ॥ ३२ ॥ उन्होंने प्रकट होकर इस सम्पूर्ण संसारको सन्मार्गावलम्बी कर दिया ॥ ३३ ॥
इस मर्त्यलोकमें अवतीर्ण हुए भगवान्की सोलह हजार एक सौ एक रानियाँ थीं ॥ ३४ ॥ उनमें रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और चारुहासिनी आदि आठ मुख्य थीं ॥ ३५ ॥ अनादि भगवान् अखिलमूर्तिने उनसे एक