भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 558 में से

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पृष्ठ 300

अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २८९


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
यश्च भगवता सकललोकगुरुणा नरसिंहेन घातितः ॥ ४७॥ पुनरपि अक्षयवीर्यशौर्यसम्पत्पराक्रमगुणस्समाक्रान्तसकलत्रैलोक्येश्वरप्रभावो दशाननो नामाभूत् ॥ ४८॥ बहुकालोपभुक्तभगवत्सकाशावाप्तशरीरपातोद्भवपुण्यफलो भगवता राघवरूपिणा सोऽपि निधनमुपपादितः ॥ ४९॥ पुनश्चेदिराजस्य दमघोषस्यात्मजश्शिशुपालनामाभवत् ॥ ५०॥ शिशुपालत्वेऽपि भगवतो भूभारावतारणायावतीर्णांशस्य पुण्डरीकनयनाख्यस्योपरि द्वेषानुबन्धमतितराञ्चकार ॥ ५१॥ भगवता च स निधनमुपनीतस्तत्रैव परमात्मभूते मनस एकाग्रतया सायुज्यमवाप ॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्नो यथाभिलषितं ददाति तथा अप्रसन्नोऽपि निघ्नन् दिव्यमनुपमं स्थानं प्रयच्छति ॥ ५३॥भगवान् नृसिंहने मारा था॥ ४६-४७॥ तदनन्तर यह अक्षय, वीर्य, शौर्य, सम्पत्ति और पराक्रम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त त्रिभुवनके स्वामी इन्द्रके भी प्रभावको दबानेवाला दशानन हुआ॥ ४८॥ स्वयं भगवान्‌के हाथसे ही मारे जानेके पुण्यसे प्राप्त हुए नाना भोगोंको वह बहुत समयतक भोगते हुए अन्तमें राघवरूपधारी भगवान्‌के ही द्वारा मारा गया॥ ४९॥ उसके पीछे यह चेदिराज दमघोषका पुत्र शिशुपाल हुआ॥ ५०॥ शिशुपाल होनेपर भी वह भू-भार-हरणके लिये अवतीर्ण हुए भगवदंशस्वरूप भगवान् पुण्डरीकाक्षमें अत्यन्त द्वेषबुद्धि करने लगा॥ ५१॥ अन्तमें भगवान्‌के हाथसे ही मारे जानेपर उन परमात्मामें ही मन लगे रहनेके कारण सायुज्य-मोक्ष प्राप्त किया॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्न होते हैं तब जिस प्रकार यथेच्छ फल देते हैं, उसी प्रकार अप्रसन्न होकर मारनेपर भी वे अनुपम दिव्यलोककी प्राप्ति कराते हैं॥ ५३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

शिशुपालके पूर्व-जन्मान्तरोंका तथा वसुदेवजीकी सन्ततिका वर्णन

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
श्रीमैत्रेय उवाच<br>हिरण्यकशिपुत्वे च रावणत्वे च विष्णुना।<br>अवाप निहतो भोगानप्राप्यानमरैरपि ॥ १<br>न लयं तत्र तेनैव निहतः स कथं पुनः।<br>सम्प्राप्तः शिशुपालत्वे सायुज्यं शाश्वते हरौ ॥ २<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वधर्मभृतां वर।<br>कौतूहलपरेणैतत्पृष्टो मे वक्तुमर्हसि ॥ ३<br>श्रीपराशर उवाच<br>दैत्येश्वरस्य वधायाखिललोकोत्पत्तिस्थितिविनाशकारिणा पूर्वं तनुग्रहणं कुर्वता नृसिंहरूपमाविष्कृतम्॥ ४॥ तत्र च हिरण्यकशिपोर्विष्णुरयमित्येतन्न मनस्यभूत्॥ ५॥ निरतिशयपुण्यसमुद्भूतमेतत्सत्त्वजातमिति ॥ ६॥**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! पूर्वजन्मोंमें हिरण्यकशिपु और रावण होनेपर इस शिशुपालने भगवान् विष्णुके द्वारा मारे जानेसे देव-दुर्लभ भोगोंको तो प्राप्त किया, किन्तु यह उनमें लीन नहीं हुआ; फिर इस जन्ममें ही उनके द्वारा मारे जानेपर इसने सनातन पुरुष श्रीहरिमें सायुज्य-मोक्ष कैसे प्राप्त किया?॥ १-२॥ हे समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनिवर! यह बात सुननेकी मुझे बड़ी ही इच्छा है। मैंने अत्यन्त कुतूहलवश होकर आपसे यह प्रश्न किया है, कृपया इसका निरूपण कीजिये॥ ३॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**प्रथम जन्ममें दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले भगवान्‌ने शरीर ग्रहण करते समय नृसिंहरूप प्रकट किया था॥ ४॥ उस समय हिरण्यकशिपुके चित्तमें यह भाव नहीं हुआ था कि ये विष्णुभगवान् हैं॥ ५॥ केवल इतना ही विचार हुआ कि यह कोई निरतिशय पुण्य-समूहसे उत्पन्न हुआ प्राणी है॥ ६॥
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