विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २८९
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यश्च भगवता सकललोकगुरुणा नरसिंहेन घातितः ॥ ४७॥ पुनरपि अक्षयवीर्यशौर्यसम्पत्पराक्रमगुणस्समाक्रान्तसकलत्रैलोक्येश्वरप्रभावो दशाननो नामाभूत् ॥ ४८॥ बहुकालोपभुक्तभगवत्सकाशावाप्तशरीरपातोद्भवपुण्यफलो भगवता राघवरूपिणा सोऽपि निधनमुपपादितः ॥ ४९॥ पुनश्चेदिराजस्य दमघोषस्यात्मजश्शिशुपालनामाभवत् ॥ ५०॥ शिशुपालत्वेऽपि भगवतो भूभारावतारणायावतीर्णांशस्य पुण्डरीकनयनाख्यस्योपरि द्वेषानुबन्धमतितराञ्चकार ॥ ५१॥ भगवता च स निधनमुपनीतस्तत्रैव परमात्मभूते मनस एकाग्रतया सायुज्यमवाप ॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्नो यथाभिलषितं ददाति तथा अप्रसन्नोऽपि निघ्नन् दिव्यमनुपमं स्थानं प्रयच्छति ॥ ५३॥ | भगवान् नृसिंहने मारा था॥ ४६-४७॥ तदनन्तर यह अक्षय, वीर्य, शौर्य, सम्पत्ति और पराक्रम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त त्रिभुवनके स्वामी इन्द्रके भी प्रभावको दबानेवाला दशानन हुआ॥ ४८॥ स्वयं भगवान्के हाथसे ही मारे जानेके पुण्यसे प्राप्त हुए नाना भोगोंको वह बहुत समयतक भोगते हुए अन्तमें राघवरूपधारी भगवान्के ही द्वारा मारा गया॥ ४९॥ उसके पीछे यह चेदिराज दमघोषका पुत्र शिशुपाल हुआ॥ ५०॥ शिशुपाल होनेपर भी वह भू-भार-हरणके लिये अवतीर्ण हुए भगवदंशस्वरूप भगवान् पुण्डरीकाक्षमें अत्यन्त द्वेषबुद्धि करने लगा॥ ५१॥ अन्तमें भगवान्के हाथसे ही मारे जानेपर उन परमात्मामें ही मन लगे रहनेके कारण सायुज्य-मोक्ष प्राप्त किया॥ ५२॥ भगवान् यदि प्रसन्न होते हैं तब जिस प्रकार यथेच्छ फल देते हैं, उसी प्रकार अप्रसन्न होकर मारनेपर भी वे अनुपम दिव्यलोककी प्राप्ति कराते हैं॥ ५३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
शिशुपालके पूर्व-जन्मान्तरोंका तथा वसुदेवजीकी सन्ततिका वर्णन
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>हिरण्यकशिपुत्वे च रावणत्वे च विष्णुना।<br>अवाप निहतो भोगानप्राप्यानमरैरपि ॥ १<br>न लयं तत्र तेनैव निहतः स कथं पुनः।<br>सम्प्राप्तः शिशुपालत्वे सायुज्यं शाश्वते हरौ ॥ २<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वधर्मभृतां वर।<br>कौतूहलपरेणैतत्पृष्टो मे वक्तुमर्हसि ॥ ३<br>श्रीपराशर उवाच<br>दैत्येश्वरस्य वधायाखिललोकोत्पत्तिस्थितिविनाशकारिणा पूर्वं तनुग्रहणं कुर्वता नृसिंहरूपमाविष्कृतम्॥ ४॥ तत्र च हिरण्यकशिपोर्विष्णुरयमित्येतन्न मनस्यभूत्॥ ५॥ निरतिशयपुण्यसमुद्भूतमेतत्सत्त्वजातमिति ॥ ६॥ | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! पूर्वजन्मोंमें हिरण्यकशिपु और रावण होनेपर इस शिशुपालने भगवान् विष्णुके द्वारा मारे जानेसे देव-दुर्लभ भोगोंको तो प्राप्त किया, किन्तु यह उनमें लीन नहीं हुआ; फिर इस जन्ममें ही उनके द्वारा मारे जानेपर इसने सनातन पुरुष श्रीहरिमें सायुज्य-मोक्ष कैसे प्राप्त किया?॥ १-२॥ हे समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनिवर! यह बात सुननेकी मुझे बड़ी ही इच्छा है। मैंने अत्यन्त कुतूहलवश होकर आपसे यह प्रश्न किया है, कृपया इसका निरूपण कीजिये॥ ३॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**प्रथम जन्ममें दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले भगवान्ने शरीर ग्रहण करते समय नृसिंहरूप प्रकट किया था॥ ४॥ उस समय हिरण्यकशिपुके चित्तमें यह भाव नहीं हुआ था कि ये विष्णुभगवान् हैं॥ ५॥ केवल इतना ही विचार हुआ कि यह कोई निरतिशय पुण्य-समूहसे उत्पन्न हुआ प्राणी है॥ ६॥ |
२९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| रज उद्रेकप्रेरितैकाग्रमतिस्तद्भावनायोगात्ततोऽवाप्त- | रजोगुणके उत्कर्षसे प्रेरित हो उसकी मति [उस विपरीत |
| वधहेतुकीं निरतिशयामेवाखिलत्रैलोक्याधिक्य- | भावनाके अनुसार] दृढ़ हो गयी। अतः उसके भीतर |
| धारिणीं दशाननत्वे भोगसम्पदमवाप ॥ ७ ॥ न तु | ईश्वरीय भावनाका योग न होनेसे भगवान्के द्वारा मारे |
| स तस्मिन्ननादिनिधने परब्रह्मभूते भगवत्यनालम्बिनि | जानेके कारण ही रावणका जन्म लेनेपर उसने सम्पूर्ण |
| कृते मनसस्तल्लयमवाप ॥ ८ ॥ | त्रिलोकीमें सर्वाधिक भोग-सम्पत्ति प्राप्त की ॥ ७ ॥ उन |
| एवं दशाननत्वेऽप्यनङ्गपराधीनतया जानकी- | अनादि-निधन, परब्रह्मस्वरूप, निराधार भगवान्में चित्त |
| समासक्तचेतसा भगवता दाशरथिरूपधारिणा | न लगानेके कारण वह उन्हींमें लीन नहीं हुआ ॥ ८ ॥ |
| हतस्य तद्रूपदर्शनमेवासीत्, नायमच्युत इत्यासक्ति- | इसी प्रकार रावण होनेपर भी कामवश जानकीजीमें |
| र्विपद्यतोऽन्तःकरणे मानुषबुद्धिरेव केवल- | चित्त लग जानेसे भगवान् दशरथनन्दन रामके द्वारा मारे |
| मस्याभूत् ॥ ९ ॥ | जानेपर केवल उनके रूपका ही दर्शन हुआ था; 'ये अच्युत |
| पुनरप्यच्युतविनिपातमात्रफलमखिलभूमण्डल- | हैं' ऐसी आसक्ति नहीं हुई, बल्कि मरते समय इसके |
| श्लाघ्यचेदिराजकुले जन्म अव्याहतैश्वर्यं | अन्तःकरणमें केवल मनुष्यबुद्धि ही रही ॥ ९ ॥ |
| शिशुपालत्वेऽप्यवाप ॥ १० ॥ तत्र त्वखिलाना- | फिर श्रीअच्युतके द्वारा मारे जानेके फलस्वरूप इसने |
| मेव स भगवन्नाम्नां त्वङ्कारकारणमभवत् ॥ ११ ॥ | सम्पूर्ण भूमण्डलमें प्रशंसित चेदिराजके कुलमें शिशुपालरूपसे |
| ततश्च तत्कालकृतानां तेषामशेषाणा- | जन्म लेकर भी अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त किया ॥ १० ॥ उस |
| मेवाच्युतनाम्नामनवरतमनेकजन्मसु वर्द्धित- | जन्ममें वह भगवान्के प्रत्येक नामोंमें तुच्छताकी भावना |
| विद्वेषानुबन्धिश्चित्तो विनिन्दन्सन्तर्जनादिषूच्चारण- | करने लगा ॥ ११ ॥ उसका हृदय अनेक जन्मके द्वेषानुबन्धसे |
| मकरोत् ॥ १२ ॥ तच्च रूपमुत्फुल्लपद्मदलाम- | युक्त था, अतः वह उनकी निन्दा और तिरस्कार आदि |
| लाक्षमत्युज्ज्वलपीतवस्त्रधार्यमलकिरीटकेयूरहार- | करते हुए भगवान्के सम्पूर्ण समयानुसार लीलाकृत नामोंका |
| कटकादिशोभितमुदारचतुर्बाहुशङ्खचक्रगदाधर- | निरन्तर उच्चारण करता था ॥ १२ ॥ खिले हुए कमलदलके |
| मतिप्ररूढवैरानुभावादटनभोजनस्नानासन- | समान जिसकी निर्मल आँखें हैं, जो उज्ज्वल पीताम्बर तथा |
| शयनादिष्वशेषावस्थान्तरेषु नान्यत्रोपययावस्य | निर्मल किरीट, केयूर, हार और कटकादि धारण किये हुए |
| चेतसः ॥ १३ ॥ ततस्तमेवाक्रोशेषूच्चारयंस्तमेव | हैं तथा जिसकी लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं और जो शंख, |
| हृदयेन धारयन्नात्मवधाय यावद्भगवद्धस्तचक्रांशु- | चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं, भगवान्का वह |
| मालोज्ज्वलमक्षयतेजस्स्वरूपं ब्रह्मभूतमपगत- | दिव्य रूप अत्यन्त वैरानुबन्धके कारण भ्रमण, भोजन, |
| द्वेषादिदोषं भगवन्तमद्राक्षीत् ॥ १४ ॥ तावच्च | स्नान, आसन और शयन आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें कभी |
| भगवच्चक्रेणाशुव्यापादितस्तत्स्मरणदग्धाखिलाघ- | उसके चित्तसे दूर न होता था ॥ १३ ॥ फिर गाली देते समय |
| सञ्चयो भगवन्तान्तमुपनीतस्तस्मिन्नेव | उन्हींका नामोच्चारण करते हुए और हृदयमें भी उन्हींका |
| लयमुपययौ ॥ १५ ॥ एतत्तवाखिलं मयाभि- | ध्यान धरते हुए जिस समय वह अपने वधके लिये हाथमें |
| हितम् ॥ १६ ॥ अयं हि भगवान् कीर्तितश्च संस्मृतश्च | धारण किये चक्रके उज्ज्वल किरणजालसे सुशोभित, अक्षय |
| द्वेषानुबन्धेनापि अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं | तेजस्वरूप द्वेषादि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित ब्रह्मभूत भगवान्को |
| प्रयच्छति किमुत सम्यग्भक्तिमतामिति ॥ १७ ॥ | देख रहा था ॥ १४ ॥ उसी समय तुरन्त भगवच्चक्रसे मारा |
| गया; भगवत्स्मरणके कारण सम्पूर्ण पापराशिके दग्ध हो | |
| जानेसे भगवान्के द्वारा उसका अन्त हुआ और वह उन्हींमें | |
| लीन हो गया ॥ १५ ॥ इस प्रकार इस सम्पूर्ण रहस्यका मैंने | |
| तुमसे वर्णन किया ॥ १६ ॥ अहो! वे भगवान् तो द्वेषानुबन्धके | |
| कारण भी कीर्तन और स्मरण करनेसे सम्पूर्ण देवता और | |
| असुरोंको दुर्लभ परमफल देते हैं, फिर सम्यक् भक्तिसम्पन्न | |
| पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥ |
अ० १५ ] * चतुर्थ अंश * २९१
वसुदेवस्य त्वानकदुन्दुभेः पौरवीरोहिणी- मदिराभद्रादेवकीप्रमुखा बह्व्यः पत्न्यो- ऽभवन् ॥ १८ ॥ बलभद्रशठसारणदुर्मदादीन्पुत्रा- न्रोहिण्यामानकदुन्दुभिरुत्पादयामास ॥ १९ ॥ बलदेवोऽपि रेवत्यां विशठोल्मुकौ पुत्राव- जनयत् ॥ २० ॥ साष्टिर्माष्टिशिशुसत्यधृतिप्रमुखाः सारणात्मजाः ॥ २१ ॥ भद्राश्वभद्रबाहुदुर्मभूताद्या रोहिण्याः कुलजाः ॥ २२ ॥ नन्दोपनन्द- कृतकाद्या मदिरायास्तनयाः ॥ २३ ॥ भद्रायाश्चोपनिधिगदाद्याः ॥ २४ ॥ वैशाल्यां च कौशिकमेकमेवाजनयत् ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभेर्देवक्यामपि कीर्तिमत्सुषेणो- दायभद्रसेनऋजुदासभद्रदेवाख्याः षट् पुत्रा जज्ञिरे ॥ २६ ॥ तांश्च सर्वानैव कंसो घातितवान् ॥ २७ ॥ अनन्तरं च सप्तमं गर्भमर्द्धरात्रे भगवत्प्रहिता योगनिद्रा रोहिण्या जठरमाकृष्य नीतवती ॥ २८ ॥ कर्षणाच्चासावपि संकर्षणाख्या- मगमत् ॥ २९ ॥ ततश्च सकलजगन्महा- तरुमूलभूतो भूतभविष्यदादिसकलसुरासुरमुनि- जनमनसामप्यगोचरोऽब्जभवप्रमुखैरनलमुखैः प्रणम्यावनिभारहरणाय प्रसादितो भगवाननादि- मध्यनिधनो देवकीगर्भमवततार वासुदेवः ॥ ३० ॥ तत्प्रसादविवर्द्धमानोरुमहिमा च योगनिद्रा नन्दगोपपत्या यशोदाया गर्भ- मधिष्ठितवती ॥ ३१ ॥ सुप्रसन्नादित्यचन्द्रादिग्रह- मव्यालादिभयं स्वस्थमानसमखिलमे- वैतज्जगदपास्ताधर्ममभवत्तस्मिंश्च पुण्डरी- कनयने जायमाने ॥ ३२ ॥ जातेन च तेनाखिल- मेवैतत्सन्मार्गवर्त्ति जगदक्रियत् ॥ ३३ ॥
भगवतोऽप्यत्र मर्त्यलोकेऽवतीर्णस्य षोडशसहस्राण्येकोत्तरशताधिकानि भार्याणाम- भवन् ॥ ३४ ॥ तासां च रुक्मिणीसत्यभामाजाम्ब- वतीचारुहासिनीप्रमुखा ह्यष्टौ पत्न्यः प्रधाना बभूवुः ॥ ३५ ॥ तासु चाष्टावयुतानिलक्षं च पुत्राणां
आनकदुन्दुभि वसुदेवजीके पौरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा और देवकी आदि बहुत-सी स्त्रियाँ थीं ॥ १८ ॥ उनमें रोहिणीसे वसुदेवजीने बलभद्र, शठ, सारण और दुर्मद आदि कई पुत्र उत्पन्न किये ॥ १९ ॥ तथा बलभद्रजीके रेवतीसे विशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए ॥ २० ॥ साष्टि, माष्टि, सत्य और धृति आदि सारणके पुत्र थे ॥ २१ ॥ इनके अतिरिक्त भद्राश्व, भद्रबाहु, दुर्मम और भूत आदि भी रोहिणीहीकी सन्तानमें थे ॥ २२ ॥ नन्द, उपनन्द और कृतक आदि मदिराके तथा उपनिधि और गद आदि भद्राके पुत्र थे ॥ २३-२४ ॥ वैशालीके गर्भसे कौशिक नामक केवल एक ही पुत्र हुआ ॥ २५ ॥
आनकदुन्दुभिके देवकीसे कीर्तिमान्, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास तथा भद्रदेव नामक छः पुत्र हुए ॥ २६ ॥ इन सबको कंसने मार डाला था ॥ २७ ॥ पीछे भगवान्की प्रेरणासे योगमायाने देवकीके सातवें गर्भको आधी रातके समय खींचकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया ॥ २८ ॥ आकर्षण करनेसे इस गर्भका नाम संकर्षण हुआ ॥ २९ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप महावृक्षके मूलस्वरूप भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालीन सम्पूर्ण देव, असुर और मुनिजनकी बुद्धिके अगम्य तथा ब्रह्मा और अग्नि आदि देवताओंद्धारा प्रणाम करके भूभारहरणके लिये प्रसन्न किये गये आदि, मध्य और अन्तहीन भगवान् वासुदेवने देवकीके गर्भसे अवतार लिया तथा उन्हींकी कृपासे बढ़ी हुई महिमावाली योगनिद्रा भी नन्दगोपकी पत्नी यशोदाके गर्भमें स्थित हुई ॥ ३०-३१ ॥ उन कमलनयन भगवान्के प्रकट होनेपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहोंसे सम्पन्न सर्पादिके भयसे शून्य, अधर्मादिसे रहित तथा स्वस्थचित्त हो गया ॥ ३२ ॥ उन्होंने प्रकट होकर इस सम्पूर्ण संसारको सन्मार्गावलम्बी कर दिया ॥ ३३ ॥
इस मर्त्यलोकमें अवतीर्ण हुए भगवान्की सोलह हजार एक सौ एक रानियाँ थीं ॥ ३४ ॥ उनमें रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और चारुहासिनी आदि आठ मुख्य थीं ॥ ३५ ॥ अनादि भगवान् अखिलमूर्तिने उनसे एक
२९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
भगवानखिलमूर्तिरनादिमानजनयत् ॥ ३६ ॥
तेषां च प्रद्युम्नचारुदेष्णासाम्बादयस्त्रयोदश प्रधानाः ॥ ३७ ॥
प्रद्युम्नोऽपि रुक्मिणस्तनयां रुक्मवतीं नामोपयेमे ॥ ३८ ॥
तस्यामनिरुद्धो जज्ञे ॥ ३९ ॥
अनिरुद्धोऽपि रुक्मिण एव पौत्रीं सुभद्रां नामोपयेमे ॥ ४० ॥
तस्यामस्य वज्रो जज्ञे ॥ ४१ ॥
वज्रस्य प्रतिबाहुस्तस्यापि सुचारुः ॥ ४२ ॥
एवमनेकशतसहस्रपुरुषसंख्यस्य यदुकुलस्य पुत्रसंख्या वर्षशतैरपि वक्तुं न शक्यते ॥ ४३ ॥
यतो हि श्लोकाविमावत्र चरितार्थौ ॥ ४४ ॥
तिस्रः कोट्यस्सहस्राणामष्टाशीतिशतानि च।
कुमाराणां गृहाचार्याश्चापयोगेषु ये रताः ॥ ४५
संख्यानं यादवानां कः करिष्यति महात्मनाम्।
यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते सदाहुकः ॥ ४६
देवासुरे हता ये तु दैतेयास्सुमहाबलाः।
उत्पन्नास्ते मनुष्येषु जनोपद्रवकारिणः ॥ ४७
तेषामुत्सादनार्थाय भुवि देवा यदोः कुले।
अवतीर्णाः कुलशतं यत्रैकाभ्यधिकं द्विज ॥ ४८
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य ववृधुस्सर्वयादवाः ॥ ४९
इति प्रसूतिं वृष्णीनां यः शृणोति नरः सदा।
स सर्वैः पातकैर्मुक्त्तो विष्णुलोकं प्रपद्यते ॥ ५०
लाख अस्सी हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३६ ॥
उनमेंसे प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और साम्ब आदि तेरह पुत्र प्रधान थे ॥ ३७ ॥
प्रद्युम्नने भी रुक्मीकी पुत्री रुक्मवतीसे विवाह किया था ॥ ३८ ॥
उससे अनिरुद्धका जन्म हुआ ॥ ३९ ॥
अनिरुद्धने भी रुक्मीकी पौत्री सुभद्रासे विवाह किया था ॥ ४० ॥
उससे वज्र उत्पन्न हुआ ॥ ४१ ॥
वज्रका पुत्र प्रतिबाहु तथा प्रतिबाहुका सुचारु था ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सैकड़ों हजार पुरुषोंकी संख्यावाले यदुकुलकी सन्तानोंकी गणना सौ वर्षमें भी नहीं की जा सकती ॥ ४३ ॥
क्योंकि इस विषयमें ये दो श्लोक चरितार्थ हैं— ॥ ४४ ॥
जो गृहाचार्य यादवकुमारोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेमें तत्पर रहते थे उनकी संख्या तीन करोड़ अठ्ठासी लाख थी, फिर उन महात्मा यादवोंकी गणना तो कर ही कौन सकता है? जहाँ हजारों और लाखोंकी संख्यामें सर्वदा यदुराज उग्रसेन रहते थे ॥ ४५-४६ ॥
देवासुर-संग्राममें जो महाबली दैत्यगण मारे गये थे वे मनुष्यलोकमें उपद्रव करनेवाले राजालोग होकर उत्पन्न हुए ॥ ४७ ॥
उनका नाश करनेके लिये देवताओंने यदुवंशमें जन्म लिया जिसमें कि एक सौ एक कुल थे ॥ ४८ ॥
उनका नियन्त्रण और स्वामित्व भगवान् विष्णुने ही किया। वे समस्त यादवगण उनकी आज्ञानुसार ही वृद्धिको प्राप्त हुए ॥ ४९ ॥
इस प्रकार जो पुरुष इस वृष्णिवंशकी उत्पत्तिके विवरणको सुनता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ५० ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अ० १६—१८ ] * चतुर्थ अंश * २१३
सोलहवाँ अध्याय
तुर्वसुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| इत्येष समासस्तस्ते यदोर्वंशः कथितः॥ १॥ अथ तुर्वसोर्वंशमवधारय॥ २॥ तुर्वसोर्वह्निरात्मजः, वह्नेर्भागो भार्गाद्भानुस्ततश्च त्रयीसानुस्तस्माच्च करन्दमस्तस्यापि मरुत्तः॥ ३॥ सोऽनपत्योऽभवत्॥ ४॥ ततश्च पौरवं दुष्यन्तं पुत्रमकल्पयत्॥ ५॥ एवं ययातिशापात्तद्वंशः पौरवमेव वंशं समाश्रितवान्॥ ६॥ | इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपसे यदुके वंशका वर्णन किया॥ १॥ अब तुर्वसुके वंशका वर्णन सुनो॥ २॥ तुर्वसुका पुत्र वह्नि था, वह्निका भार्ग, भार्गका भानु, भानुका त्रयीसानु, त्रयीसानुका करन्दम और करन्दमका पुत्र मरुत्त था॥ ३॥ मरुत्त निस्सन्तान था॥ ४॥ इसलिये उसने पुरुवंशीय दुष्यन्तको पुत्ररूपसे स्वीकार कर लिया॥ ५॥ इस प्रकार ययातिके शापसे तुर्वसुके वंशने पुरुवंशका ही आश्रय लिया॥ ६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
द्रुह्युवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| द्रुह्योस्तु तनयो बभ्रुः॥ १॥ बभ्रोस्सेतुः॥ २॥ सेतुपुत्र आरब्धनामा॥ ३॥ आरब्धस्यात्मजो गान्धारो गान्धारस्य धर्मो धर्माद् घृतः घृताद् दुर्दमस्ततः प्रचेताः॥ ४॥ प्रचेतसः पुत्रश्शतधर्मा बहुलानां म्लेच्छानामुदीच्यानामाधिपत्यमकरोत्॥ ५॥ | द्रुह्युका पुत्र बभ्रु था, बभ्रुका सेतु, सेतुका आरब्ध, आरब्धका गान्धार, गान्धारका धर्म, धर्मका घृत, घृतका दुर्दम, दुर्दमका प्रचेता तथा प्रचेताका पुत्र शतधर्म था। इसने उत्तरवर्ती बहुत-से म्लेच्छोंका आधिपत्य किया॥ १—५॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
अठारहवाँ अध्याय
अनुवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| ययातेश्चतुर्थपुत्रस्यानोस्सभानलचक्षुःपरमेषुसंज्ञास्त्रयः पुत्राः बभूवुः॥ १॥ सभानलपुत्रः कालानलः॥ २॥ कालानलात्सृञ्जयः॥ ३॥ सृञ्जयात्पुरञ्जयः॥ ४॥ पुरञ्जयाज्जनमेजयः॥ ५॥ | ययातिके चौथे पुत्र अनुके सभानल, चक्षु और परमेषु नामक तीन पुत्र थे। सभानलका पुत्र कालानल हुआ तथा कालानलके सृंजय, सृंजयके पुरंजय, पुरंजयके जनमेजय, |
| २९४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १८ |
|---|
| तस्मान्महाशालः ॥ ६ ॥ तस्माच्च महामनाः ॥ ७ ॥ तस्मादुशीनरतितिक्षू द्वौ पुत्रावुत्पन्नौ ॥ ८ ॥<br><br>उशीनरस्यापि शिबिनृगनरकृमिवर्माख्याः पञ्च पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ पृषदश्वसुवीरकेक्यमद्रका-श्चत्वारश्शिबिपुत्राः ॥ १० ॥ तितिक्षोरपि रुशद्रथः पुत्रोऽभूत् ॥ ११ ॥ तस्यापि हेमो हेमस्यापि सुतपाः सुतपसश्च बलिः ॥ १२ ॥ यस्य क्षेत्रे दीर्घतमसाङ्गवङ्गकलिङ्गसुह्मपौण्ड्राख्यं वालेयं क्षत्रमजन्यत ॥ १३ ॥ तन्नामसन्ततिसंज्ञाश्च पञ्चविषया बभूवुः ॥ १४ ॥ अङ्गादनपानस्ततो दिविरथस्तस्माद्धर्मरथः ॥ १५ ॥ ततश्चित्ररथो रोमपादसंज्ञः ॥ १६ ॥ यस्य दशरथो मित्रं जज्ञे ॥ १७ ॥ यस्याजपुत्रो दशरथश्शान्तां नाम कन्यामनपत्यस्य दुहितृत्वे युयोज ॥ १८ ॥<br><br>रोमपादाच्चतुरङ्गस्तस्मात्पृथुलाक्षः ॥ १९ ॥ ततश्चम्पो यश्चम्पां निवेशयामास ॥ २० ॥ चम्पस्य हर्यङ्गो नामात्मजोऽभूत् ॥ २१ ॥ हर्यङ्गाद्भद्ररथो भद्ररथाद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्बृहत्कर्मा बृहत्कर्मणश्च बृहद्भानुस्तस्माच्च बृहन्मना बृहन्मनसो जयद्रथः ॥ २२ ॥ जयद्रथो ब्रह्मक्षत्रात्तरालसम्भूत्यां पत्न्यां विजयं नाम पुत्रमजीजनत् ॥ २३ ॥ विजयश्च धृतिं पुत्रमवाप ॥ २४ ॥ तस्यापि धृतव्रतः पुत्रोऽभूत् ॥ २५ ॥ धृतव्रतात्सत्यकर्मा ॥ २६ ॥ सत्यकर्मणस्त्वतिरथः ॥ २७ ॥ यो गङ्गाप्लवतो मञ्जूषागतं पृथापविद्धं कर्णं पुत्रमवाप ॥ २८ ॥ कर्णाद्वृषसेनः इत्येतदन्ता अङ्गवंश्याः ॥ २९ ॥ अतश्च पुरुवंशं श्रोतुमर्हसि ॥ ३० ॥ | जनमेजयके महाशाल, महाशालके महामना और महामनाके उशीनर तथा तितिक्षु नामक दो पुत्र हुए ॥ १–८ ॥<br><br>उशीनरके शिबि, नृग, नर, कृमि और वर्म नामक पाँच पुत्र हुए ॥ ९ ॥ उनमेंसे शिबिके पृषदश्व, सुवीर, केकय और मद्रक—ये चार पुत्र थे ॥ १० ॥ तितिक्षुका पुत्र रुशद्रथ हुआ। उसके हेम, हेमके सुतपा तथा सुतपाके बलि नामक पुत्र हुआ ॥ ११–१२ ॥ इस बलिके क्षेत्र (रानी)-में दीर्घतमा नामक मुनिने अंग, वंग, कलिंग, सुह्म और पौण्ड्र नामक पाँच वालेय क्षत्रिय उत्पन्न किये ॥ १३ ॥ इन बलिपुत्रोंकी सन्ततिके नामानुसार पाँच देशोंके भी ये ही नाम पड़े ॥ १४ ॥ इनमेंसे अंगसे अनपान, अनपानसे दिविरथ, दिविरथसे धर्मरथ और धर्मरथसे चित्ररथका जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम रोमपाद था। इस रोमपादके मित्र दशरथजी थे, अजके पुत्र दशरथजीने रोमपादको सन्तानहीन देखकर उन्हें पुत्रीरूपसे अपनी शान्ता नामकी कन्या गोद दे दी थी ॥ १५–१८ ॥<br><br>रोमपादका पुत्र चतुरंग था। चतुरंगके पृथुलाक्ष तथा पृथुलाक्षके चम्प नामक पुत्र हुआ जिसने चम्पा नामकी पुरी बसायी थी ॥ १९–२० ॥ चम्पके हर्यंग नामक पुत्र हुआ, हर्यंगसे भद्ररथ, भद्ररथसे बृहद्रथ, बृहद्रथसे बृहत्कर्मा बृहत्कर्मासे बृहद्भानु, बृहद्भानुसे बृहन्मना, बृहन्मनासे जयद्रथका जन्म हुआ ॥ २१–२२ ॥ जयद्रथकी ब्राह्मण और क्षत्रियके संसर्गसे उत्पन्न हुई पत्नीके गर्भसे विजय नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ २३ ॥ विजयके धृति नामक पुत्र हुआ, धृतिके धृतव्रत, धृतव्रतके सत्यकर्मा और सत्यकर्माके अतिरथका जन्म हुआ जिसने कि [स्नानके लिये] गंगाजीमें जानेपर पिटारीमें रखकर पृथाद्वारा बहाये हुए कर्णको पुत्ररूपसे पाया था। इस कर्णका पुत्र वृषसेन था। बस, अंगवंश इतना ही है ॥ २४–२९ ॥ इसके आगे पुरुवंशका वर्णन सुनो ॥ ३० ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९५
उन्नीसवाँ अध्याय
पुरुवंश
श्रीपराशर उवाच
पुरोर्जनमेजयस्तस्यापि प्रचिन्वान् प्रचिन्वतः प्रवीरः प्रवीरान्मनस्युर्मनस्योश्चाभयदस्तस्यापि सुद्युस्सुद्योर्बहुगतस्तस्यापि संयातिस्संयातेरहंयातिस्ततो रौद्राश्वः ॥ १ ॥
ऋतेषुकक्षेपुस्थण्डिलेषुकृतेषुजलेषुधर्मेषुधृतेषुस्थलेषसन्नतेषुवनेषुनामानो रौद्राश्वस्य दश पुत्रा बभूवुः ॥ २ ॥ ऋतेषोरन्तिनारः पुत्रोऽभूत् ॥ ३ ॥ सुमतिम्प्रतिरथं ध्रुवं चाप्यन्तिनारः पुत्रानवाप ॥ ४ ॥ अप्रतिरथस्य कण्वः पुत्रोऽभूत् ॥ ५ ॥ तस्यापि मेधातिथिः ॥ ६ ॥ यतः काण्वायना द्विजा बभूवुः ॥ ७ ॥ अप्रतिरथस्यापरः पुत्रोऽभूदैलीनः ॥ ८ ॥ ऐलीनस्य दुष्यन्ताद्याश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ दुष्यन्ताच्चक्रवर्ती भरतोऽभूत् ॥ १० ॥ यन्नामहेतुर्देवैश्लोको गीयते ॥ ११ ॥
माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाश्शकुन्तलाम् ॥ १२ ॥
रेतोधाः पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ १३ ॥
भरतस्य पत्नीत्रये नव पुत्रा बभूवुः ॥ १४ ॥ नैते ममानुरूपा इत्यभिहितास्तन्मातरः परित्यागभयात्तत्पुत्रान्जघ्नुः ॥ १५ ॥ ततोऽस्य वितथे पुत्रजन्मनि पुत्रार्थिनो मरुत्सोमयाजिनो दीर्घतमसः पाष्ण्र्यपास्ताद्बृहस्पतिवीर्यादुतथ्यपत्यां ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजाख्यः पुत्रो मरुद्भिर्दत्तः ॥ १६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— पुरूका पुत्र जनमेजय था। जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्का प्रवीर, प्रवीरका मनस्यु, मनस्युका अभयद, अभयदका सुद्यु, सुद्युका बहुगत, बहुगतका संयाति, संयातिक अहंयाति तथा अहंयातिका पुत्र रौद्राश्व था॥ १॥
रौद्राश्वके ऋतेषु, कक्षेपु, स्थण्डिलेषु, कृतेषु, जलेषु, धर्मेषु, धृतेषु, स्थलेषु, सन्नतेषु और वनेषु नामक दस पुत्र थे॥ २॥ ऋतेषुका पुत्र अन्तिनार हुआ तथा अन्तिनारके सुमति, अप्रतिरथ और ध्रुव नामक तीन पुत्रोंने जन्म लिया॥ ३-४॥ इनमेंसे अप्रतिरथका पुत्र कण्व और कण्वका मेधातिथि हुआ जिसकी सन्तान काण्वायन ब्राह्मण हुए॥ ५-७॥ अप्रतिरथका दूसरा पुत्र ऐलीन था॥ ८॥ इस ऐलीनके दुष्यन्त आदि चार पुत्र हुए॥ ९॥ दुष्यन्तके यहाँ चक्रवर्ती सम्राट् भरतका जन्म हुआ जिसके नामके विषयमें देवगणने इस श्लोकका गान किया था— ॥ १०-११॥
"माता तो केवल चमड़ेकी धौंकनीके समान है, पुत्रपर अधिकार तो पिताका ही है, पुत्र जिसके द्वारा जन्म ग्रहण करता है उसीका स्वरूप होता है। हे दुष्यन्त ! तू इस पुत्रका पालन-पोषण कर, शकुन्तलाका अपमान न कर। हे नरदेव ! अपने ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र अपने पिताको यमलोकसे [उद्धार कर स्वर्गलोकको] ले जाता है। 'इस पुत्रके आधान करनेवाले तुम्हीं हो'— शकुन्तलाने यह बात ठीक ही कही है'॥ १२-१३॥
भरतके तीन स्त्रियाँ थीं जिनसे उनके नौ पुत्र हुए॥ १४॥ भरतके यह कहनेपर कि 'ये मेरे अनुरूप नहीं हैं', उनकी माताओंने इस भयसे कि राजा हमको त्याग न दें, उन पुत्रोंको मार डाला॥ १५॥ इस प्रकार पुत्र-जन्मके विफल हो जानेसे भरतने पुत्रकी कामनासे मरुत्सोम नामक यज्ञ किया। उस यज्ञके अन्तमें मरुद्गणने उन्हें भरद्वाज नामक एक बालक पुत्ररूपसे दिया जो उतथ्यपत्नी ममताके गर्भमें स्थित दीर्घतमा मुनिके पाद-प्रहारसे स्खलित हुए बृहस्पतिजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था॥ १६॥
२९६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १९
| तस्यापि नामनिर्वचनश्लोकः पठ्यते ॥ १७ ॥<br>मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते ।<br>यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ १८<br>भरद्वाजस्स वितथे पुत्रजन्मनि मरुद्भिर्दत्तस्ततो<br>वितथसंज्ञामवाप ॥ १९ ॥ वितथस्यापि मन्युः<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २० ॥ बृहत्क्षत्रमहावीर्यनरगर्गा<br>अभवन्मन्युपुत्राः ॥ २१ ॥ नरस्य सङ्कृतिस्सङ्कृते-<br>र्गुरुप्रीतिरन्तिदेवौ ॥ २२ ॥ गर्गाच्छिनिः,<br>ततश्च गार्ग्यशैन्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो<br>बभूवुः ॥ २३ ॥ महावीर्याच्च दुरुक्षयो नाम<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २४ ॥ तस्य त्रय्यारुणिः पुष्करिण्यो<br>कपिश्च पुत्रत्रयमभूत् ॥ २५ ॥ तच्च पुत्रत्रितयमपि<br>पश्चाद्विप्रतामुपजगाम ॥ २६ ॥ बृहत्क्षत्रस्य<br>सुहोत्रः ॥ २७ ॥ सुहोत्राद्धस्ती य इदं हस्तिनापुर-<br>मावासयामास ॥ २८ ॥<br>अजमीढद्विजमीढपुरुमीढास्त्रयो हस्तिनस्त-<br>नयाः ॥ २९ ॥ अजमीढात्कण्वः ॥ ३० ॥<br>कण्वान्मेधातिथिः ॥ ३१ ॥ यतः काण्वायना<br>द्विजाः ॥ ३२ ॥ अजमीढस्यान्यः पुत्रो<br>बृहदिषुः ॥ ३३ ॥ बृहदिषोर्बृहद्धनुर्बृहद्धनुषश्च<br>बृहत्कर्मा ततश्च जयद्रथस्तस्मादपि<br>विश्वजित् ॥ ३४ ॥ ततश्च सेनजित् ॥ ३५ ॥<br>रुचिराश्वकाश्यदृढहनुवत्सहनुसंज्ञास्सेनजितः<br>पुत्राः ॥ ३६ ॥ रुचिराश्वपुत्रः पृथुसेनः<br>पृथुसेनात्पारः ॥ ३७ ॥ पारान्नीलः ॥ ३८ ॥<br>तस्यैकशतं पुत्राणाम् ॥ ३९ ॥ तेषां प्रधानः<br>काम्पिल्याधिपतिस्समरः ॥ ४० ॥ समरस्यापि<br>पारसुपारसदश्वास्त्रयः पुत्राः ॥ ४१ ॥ सुपारात्पृथुः<br>पृथोस्सुकृतिस्ततो विभ्राजः ॥ ४२ ॥<br>तस्माच्चाणुहः ॥ ४३ ॥ यश्शुकदुहितरं कीर्तिं<br>नामोपयेमे ॥ ४४ ॥ अणुहाद्ब्रह्मदत्तः ॥ ४५ ॥<br>ततश्च विष्वक्सेनस्तस्मादुदक्सेनः ॥ ४६ ॥<br>भल्लाभस्तस्य चात्मजः ॥ ४७ ॥ | उसके नामकरणके विषयमें भी यह श्लोक कहा<br>जाता है— ॥ १७ ॥<br>“पुत्रोत्पत्तिके अनन्तर बृहस्पतिने ममतासे कहा—<br>‘हे मूढे! यह पुत्र द्वाज (हम दोनोंसे उत्पन्न हुआ)<br>है तू इसका भरण कर।' तब ममताने भी कहा—<br>‘हे बृहस्पते! यह पुत्र द्वाज (हम दोनोंसे उत्पन्न<br>हुआ) है अतः तुम इसका भरण करो।' इस प्रकार<br>परस्पर विवाद करते हुए उसके माता-पिता चले गये,<br>इसलिये उसका नाम 'भरद्वाज' पड़ा”॥ १८॥<br>पुत्र-जन्म वितथ (विफल) होनेपर मरुद्गणने राजा<br>भरतको भरद्वाज दिया था, इसलिये उसका नाम 'वितथ'<br>भी हुआ॥ १९॥ वितथका पुत्र मन्यु हुआ और मन्युके<br>बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और गर्ग आदि कई पुत्र<br>हुए॥ २०-२१॥ नरका पुत्र संकृति और संकृतिके गुरुप्रीति<br>एवं रन्तिदेव नामक दो पुत्र हुए॥ २२॥ गर्गसे शिनिका<br>जन्म हुआ जिससे कि गार्ग्य और शैन्य नामसे विख्यात<br>क्षत्रोपेत ब्राह्मण उत्पन्न हुए॥ २३॥ महावीर्यका पुत्र दुरुक्षय<br>हुआ॥ २४॥ उसके त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य और कपि नामक<br>तीन पुत्र हुए॥ २५॥ ये तीनों पुत्र पीछे ब्राह्मण हो गये<br>थे॥ २६॥ बृहत्क्षत्रका पुत्र सुहोत्र, सुहोत्रका पुत्र हस्ती था<br>जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था॥ २७-२८॥<br>हस्तीके तीन पुत्र अजमीढ, द्विजमीढ और पुरुमीढ<br>थे। अजमीढके कण्व और कण्वके मेधातिथि नामक<br>पुत्र हुआ जिससे कि काण्वायन ब्राह्मण उत्पन्न<br>हुए॥ २९-३२॥ अजमीढका दूसरा पुत्र बृहदिषु था॥ ३३॥<br>बृहदिषुके बृहद्धनु, बृहद्धनुके बृहत्कर्मा, बृहत्कर्मके जयद्रथ,<br>जयद्रथके विश्वजित् तथा विश्वजित्के सेनजित्का जन्म<br>हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काश्य, दृढहनु और वत्सहनु<br>नामक चार पुत्र हुए॥ ३४-३६॥ रुचिराश्वके पृथुसेन,<br>पृथुसेनके पार और पारके नीलका जन्म हुआ। इस<br>नीलके सौ पुत्र थे, जिनमें काम्पिल्यनरेश समर प्रधान<br>था॥ ३७-४०॥ समरके पार, सुपार और सदश्व नामक<br>तीन पुत्र थे॥ ४१॥ सुपारके पृथु, पृथुके सुकृति, सुकृतिके<br>विभ्राज और विभ्राजके अणुह नामक पुत्र हुआ,<br>जिसने शुककन्या कीर्तिसे विवाह किया था॥ ४२-४४॥<br>अणुहसे ब्रह्मदत्तका जन्म हुआ। ब्रह्मदत्तसे विष्वक्सेन,<br>विष्वक्सेनसे उदक्सेन तथा उदक्सेनसे भल्लाभ नामक<br>पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४५-४७॥ |
अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| द्विजमीढस्य तु यवीनरसंज्ञः पुत्रः ॥४८॥ तस्यापि धृतिमांस्तस्माच्च सत्यधृतिस्ततश्च दृढनेमिस्तस्माच्च सुपाश्र्वस्ततस्सुमतिस्ततश्च सन्नतिमान् ॥४९॥ सन्नतिमन्तः कृतः पुत्रोऽभूत् ॥५०॥ यं हिरण्यनाभो योगमध्यापयामास ॥५१॥ यश्चतुर्विंशतिं प्राच्यसामगानां संहिताश्चकार ॥५२॥ कृताच्चोग्रायुधः ॥५३॥ येन प्राचुर्येण नीपक्षयः कृतः ॥५४॥ उग्रायुधात्क्षेम्यः क्षेम्यात्सुधीरस्तस्मादरिपुञ्जयस्तस्माच्च बहुरथ इत्येते पौरवाः ॥५५॥ | द्विजमीढका पुत्र यवीनर था ॥४८॥ उसका धृतिमान्, धृतिमान्का सत्यधृति, सत्यधृतिका दृढनेमि, दृढनेमिका सुपाश्र्व, सुपाश्र्वका सुमति, सुमतिका सन्नतिमान् तथा सन्नतिमान्का पुत्र कृत हुआ जिसे हिरण्यनाभने योगविद्याकी शिक्षा दी थी तथा जिसने प्राच्य सामग श्रुतियोंकी चौबीस संहिताएँ रची थीं ॥४९–५२॥ कृतका पुत्र उग्रायुध था जिसने अनेकों नीपवंशीय क्षत्रियोंका नाश किया ॥५३-५४॥ उग्रायुधके क्षेम्य, क्षेम्यके सुधीर, सुधीरके रिपुंजय और रिपुंजयसे बहुरथने जन्म लिया। ये सब पुरुवंशीय राजागण हुए ॥५५॥ |
| अजमीढस्य नलिनी नाम पत्नी तस्या नीलसंज्ञः पुत्रोऽभवत् ॥५६॥ तस्मादपि शान्तिः शान्तेस्सुशान्तिस्सुशान्तेः पुरञ्जयस्तस्माच्च ऋक्षः ॥५७॥ ततश्च हर्यश्वः ॥५८॥ तस्मान्मुद्गलसृञ्जयबृहदिषुयवीनरकाम्पिल्यसंज्ञाः पञ्चानामेव तेषां विषयाणां रक्षणायालमेते मत्पुत्रा इति पित्राभिहिताः पाञ्चालाः ॥५९॥ | अजमीढकी नलिनीनाम्नी एक भार्या थी। उसके नील नामक एक पुत्र हुआ ॥५६॥ नीलके शान्ति, शान्तिके सुशान्ति, सुशान्तिके पुरंजय, पुरंजयके ऋक्ष और ऋक्षके हर्यश्व नामक पुत्र हुआ ॥५७-५८॥ हर्यश्वके मुद्गल, सृंजय, बृहदिषु, यवीनर और काम्पिल्य नामक पाँच पुत्र हुए। पिताने कहा था कि मेरे ये पुत्र मेरे आश्रित पाँचों देशोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, इसलिये वे पांचाल कहलाये ॥५९॥ |
| मुद्गलाच्च मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो बभूवुः ॥६०॥ मुद्गलाद्बृहदश्वः ॥६१॥ बृहदश्वादिवोदासोऽहल्या च मिथुनमभूत् ॥६२॥ शरद्वतश्चाहल्यायां शतानन्दोऽभवत् ॥६३॥ शतानन्दात्सत्यधृतिर्धनुर्वेदन्तगो जज्ञे ॥६४॥ सत्यधृतेर्वरप्सरसमूर्वशीं दृष्ट्वा रेतस्कन्नं शरस्तम्बे पपात ॥६५॥ तच्च द्विधागतमपत्यद्वयं कुमारः कन्या चाभवत् ॥६६॥ तौ च मृगयामुपयातश्शान्तनुर्दृष्ट्वा कृपया जग्राह ॥६७॥ ततः कुमारः कृपः कन्या चाश्वत्थाम्नो जननी कृपी द्रोणाचार्यस्य पत्न्यभवत् ॥६८॥ | मुद्गलसे मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई ॥६०॥ मुद्गलसे बृहदश्व और बृहदश्वसे दिवोदास नामक पुत्र एवं अहल्या नामकी एक कन्याका जन्म हुआ ॥६१-६२॥ अहल्यासे महर्षि गौतमके द्वारा शतानन्दका जन्म हुआ ॥६३॥ शतानन्दसे धनुर्वेदका पारदर्शी सत्यधृति उत्पन्न हुआ ॥६४॥ एक बार अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीको देखनेसे सत्यधृतिका वीर्य स्खलित होकर शरस्तम्ब (सरकण्डे)-पर पड़ा ॥६५॥ उससे दो भागोंमें बँट जानेके कारण पुत्र और पुत्रीरूप दो सन्तानें उत्पन्न हुईं ॥६६॥ उन्हें मृगयाके लिये गये हुए राजा शान्तनु कृपावश ले आये ॥६७॥ तदनन्तर पुत्रका नाम कृप हुआ और कन्या अश्वत्थामाकी माता द्रोणाचार्यकी पत्नी कृपी हुई ॥६८॥ |
| दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायुः ॥६९॥ मित्रायोश्च्यवनो नाम राजा ॥७०॥ च्यवनात्सुदासः सुदासात्सौदासरः सौदासात्सहदेवस्तस्यापि सोमकः ॥७१॥ सोमकाज्जन्तुः पुत्रशतज्येष्ठोऽभवत् ॥७२॥ तेषां यवीयान् पृषतः पृषताद्द्रुपदस्तस्माच्च धृष्टद्युम्नस्ततो धृष्टकेतुः ॥७३॥ | दिवोदासका पुत्र मित्रायु हुआ ॥६९॥ मित्रायुका पुत्र च्यवन नामक राजा हुआ, च्यवनका सुदास, सुदासका सौदासर, सौदासका सहदेव, सहदेवका सोमक और सोमकके सौ पुत्र हुए जिनमें जन्तु सबसे बड़ा और पृषत सबसे छोटा था। पृषतका पुत्र द्रुपद, द्रुपदका धृष्टद्युम्न और धृष्टद्युम्नका पुत्र धृष्टकेतु था ॥७०–७३॥ |
| २९८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २० |
|---|
| अजमीढस्यान्य ऋक्षनामा पुत्रोऽभवत् ॥ ७४ ॥ तस्य संवरणः ॥ ७५ ॥ संवरणात्कुरुः ॥ ७६ ॥ य इदं धर्मक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं चकार ॥ ७७ ॥ सुधनुर्जह्नुपरीक्षित्प्रमुखाः कुरोः पुत्रा बभूवुः ॥ ७८ ॥ सुधनुषः पुत्रस्सुहोत्रस्तस्माच्च्यवनश्च्यवनात् कृतकः ॥ ७९ ॥ ततश्चोपरिचरो वसुः ॥ ८० ॥ बृहद्रथप्रत्यग्रकुशाम्बुकुचेल्मात्स्यप्रमुखा वसोः पुत्रास्सप्ताजायन्त ॥ ८१ ॥ बृहद्रथात्कुशाग्रः कुशाग्राद्वृषभो वृषभात् पुष्पवान् तस्मात्सत्यहितस्तस्मात्सुधन्वा तस्य च जतुः ॥ ८२ ॥ बृहद्रथाच्चान्यश्शकलद्वयजन्मा जरया संहितो जरासन्धनामा ॥ ८३ ॥ तस्मात्सहदेवस्सहदेवात्सोमपस्ततश्च श्रुतश्रवाः ॥ ८४ ॥ इत्येते मया मागधा भूपालाः कथिताः ॥ ८५ ॥ | अजमीढका ऋक्ष नामक एक पुत्र और था ॥ ७४ ॥ उसका पुत्र संवरण हुआ तथा संवरणका पुत्र कुरु था जिसने कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रकी स्थापना की ॥ ७५-७७ ॥ कुरुके पुत्र सुधनु, जह्नु और परीक्षित् आदि हुए ॥ ७८ ॥ सुधनुका पुत्र सुहोत्र था, सुहोत्रका च्यवन, च्यवनका कृतक और कृतकका पुत्र उपरिचर वसु हुआ ॥ ७९-८० ॥ वसुके बृहद्रथ, प्रत्यग्र, कुशाम्बु, कुचेल और मात्स्य आदि सात पुत्र थे ॥ ८१ ॥ इनमेंसे बृहद्रथके कुशाग्र, कुशाग्रके वृषभ, वृषभके पुष्पवान्, पुष्पवान्के सत्यहित, सत्यहितके सुधन्वा और सुधन्वाके जतुका जन्म हुआ ॥ ८२ ॥ बृहद्रथके दो खण्डोंमें विभक्त एक पुत्र और हुआ था जो कि जराके द्वारा जोड़ दिये जानेपर जरासन्ध कहलाया ॥ ८३ ॥ उससे सहदेवका जन्म हुआ तथा सहदेवसे सोमप और सोमपसे श्रुतिश्रवाकी उत्पत्ति हुई ॥ ८४ ॥ इस प्रकार मैंने तुमसे यह मागध भूपालोंका वर्णन कर दिया है ॥ ८५ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेंऽशे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
कुरुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—[कुरुपुत्र] परीक्षित्के |
|---|---|
| परीक्षितो जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्राः ॥ १ ॥ जह्नोस्तु सुरथो नामात्मजो बभूव ॥ २ ॥ तस्यापि विदूरथः ॥ ३ ॥ तस्मात्सार्वभौमस्सार्वभौमाज्जयसेनस्तस्मादाराधितस्ततश्चायुतायुरयुतायोरक्रोधनः ॥ ४ ॥ तस्माद्देवातिथिः ॥ ५ ॥ ततश्च ऋक्षोऽन्योऽभवत् ॥ ६ ॥ ऋक्षाद्भीमसेनस्ततश्च दिलीपः ॥ ७ ॥ दिलीपात् प्रतीपः ॥ ८ ॥ | जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र हुए, तथा जह्नुके सुरथ नामक एक पुत्र हुआ ॥ १-२ ॥ सुरथके विदूरथका जन्म हुआ। विदूरथके सार्वभौम, सार्वभौमके जयसेन, जयसेनके आराधित, आराधितके अयुतायु, अयुतायुके अक्रोधन, अक्रोधनके देवातिथि तथा देवातिथिके [अजमीढके पुत्र ऋक्षसे भिन्न] दूसरे ऋक्षका जन्म हुआ ॥ ३-६ ॥ ऋक्षसे भीमसेन, भीमसेनसे दिलीप और दिलीपसे प्रतीप नामक पुत्र हुआ ॥ ७-८ ॥ |
| तस्यापि देवापिशान्तनुबाहीकसंज्ञास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ देवापिर्बाल एवारण्यं विवेश ॥ १० ॥ शान्तनुस्तु महीपालोऽभूत् ॥ ११ ॥ अयं च तस्य श्लोकः पृथिव्यां गीयते ॥ १२ ॥ | प्रतीपके देवापि, शान्तनु और बाह्लीक नामक तीन पुत्र हुए ॥ ९ ॥ इनमेंसे देवापि बाल्यावस्थामें ही वनमें चला गया था अतः शान्तनु ही राजा हुआ ॥ १०-११ ॥ उसके विषयमें पृथिवीतलपर यह श्लोक कहा जाता है— ॥ १२ ॥ |
अ० २० ] * चतुर्थ अंश * २९९
| यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं यौवनमेति सः।<br>शान्तिं चाप्नोति येनाग्र्यां कर्मणा तेन शान्तनुः ॥ १३ | ''[राजा शान्तनु] जिसको-जिसको अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे वे वृद्ध पुरुष भी युवावस्था प्राप्त कर लेते थे तथा उनके स्पर्शसे सम्पूर्ण जीव अत्युत्तम शान्तिलाभ करते थे, इसलिये वे शान्तनु कहलाते थे'' ॥ १३ ॥ |
| तस्य च शान्तनो राष्ट्रे द्वादशवर्षाणि देवो न ववर्ष ॥ १४ ॥ ततश्चाशेषराष्ट्रविनाशमवेक्ष्यासौ राजा ब्राह्मणानपृच्छत् कस्मादस्माकं राष्ट्रे देवो न वर्षति को ममापराध इति ॥ १५ ॥ | एक बार महाराज शान्तनुके राज्यमें बारह वर्षतक वर्षा न हुई ॥ १४ ॥ उस समय सम्पूर्ण देशको नष्ट होता देखकर राजाने ब्राह्मणोंसे पूछा—'हमारे राज्यमें वर्षा क्यों नहीं हुई? इसमें मेरा क्या अपराध है?' ॥ १५ ॥ |
| ततश्च तमूचुर्ब्राह्मणाः ॥ १६ ॥ अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया सम्भुज्यते अतः परिवेत्ता त्वमित्युक्तस्स राजा पुनस्तानपृच्छत् ॥ १७ ॥ किं मयात्र विधेयमिति ॥ १८ ॥ | तब ब्राह्मणोंने उससे कहा—'यह राज्य तुम्हारे बड़े भाईका है किन्तु इसे तुम भोग रहे हो; इसलिये तुम परिवेत्ता हो।' उनके ऐसा कहनेपर राजा शान्तनुने उनसे फिर पूछा—'तो इस सम्बन्धमें मुझे अब क्या करना चाहिये?' ॥ १६—१८ ॥ |
| ततस्ते पुनरप्यूचुः ॥ १९ ॥ यावद्देवापिर्न पतनादिभिर्दोषैरभिभूयते तावदेतत्तस्यार्हं राज्यम् ॥ २० ॥ तदलमेतेन तु तस्मै दीयतामित्युक्ते तस्य मन्त्रिप्रवरेणाश्मसारिणा तत्रारण्ये तपस्विनो वेदवादविरोधवक्तारः प्रयुक्ताः ॥ २१ ॥ तैरस्याप्यतिऋजुमतेर्महीपतिपुत्रस्य बुद्धिर्र्वेदवादविरोधमार्गानुसारिण्यक्रियत् ॥ २२ ॥ राजा च शान्तनुर्द्विजवचनोत्पन्नपरिदेवनशोकस्तान् ब्राह्मणानग्रतः कृत्वाग्रजस्य प्रदानायारण्यं जगाम ॥ २३ ॥ | इसपर वे ब्राह्मण फिर बोले—'जबतक तुम्हारा बड़ा भाई देवापि किसी प्रकार पतित न हो तबतक यह राज्य उसीके योग्य है ॥ १९-२० ॥ अतः तुम इसे उसीको दे डालो, तुम्हारा इससे कोई प्रयोजन नहीं।' ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर शान्तनुके मन्त्री अश्मसारिने वेदवादके विरुद्ध बोलनेवाले तपस्वियोंको वनमें नियुक्त किया ॥ २१ ॥ उन्होंने अतिशय सरलमति राजकुमार देवापिकी बुद्धिको वेदवादके विरुद्ध मार्गमें प्रवृत्त कर दिया ॥ २२ ॥ उधर राजा शान्तनु ब्राह्मणोंके कथनानुसार दुःख और शोकयुक्त होकर ब्राह्मणोंको आगे कर अपने बड़े भाईको राज्य देनेके लिये वनमें गये ॥ २३ ॥ |
| तदाश्रममुपगताश्च तमवनतमवनीपतिपुत्रं देवापिमुपतस्थुः ॥ २४ ॥ ते ब्राह्मणा वेदवादानुबन्धीनि वचांसि राज्यमग्रजेन कर्तव्यमित्यर्थवन्ति तमूचुः ॥ २५ ॥ असावपि देवापिर्वेदवादविरोधयुक्तिदूषितमनेकप्रकारं तानाह ॥ २६ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाश्शान्तनुमूचुः ॥ २७ ॥ आगच्छ हे राजन्नलमत्रातिनिर्बन्धेन प्रशान्त एवासावनावृष्टिदोषः पतितोऽयमनादिकालमहितवेदवचनदूषणोच्चारणात् ॥ २८ ॥ पतिते चाग्रजे नैव ते परिवेतृत्वं भवतीत्युक्तश्शान्तनुःस्वपुरमागम्य राज्यमकरोत् ॥ २९ ॥ वेदवादविरोधवचनोच्चारणदूषिते च तस्मिन्देवापौ तिष्ठत्यपि ज्येष्ठभ्रातर्यखिलसस्यनिष्पत्तये ववर्ष भगवान्पर्जन्यः ॥ ३० ॥ | वनमें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणगण परम विनीत राजकुमार देवापिके आश्रमपर उपस्थित हुए; और उससे 'ज्येष्ठ भ्राताको ही राज्य करना चाहिये'—इस अर्थके समर्थक अनेक वेदानुकूल वाक्य कहने लगे ॥ २४-२५ ॥ किन्तु उस समय देवापिने वेदवादके विरुद्ध नाना प्रकारकी युक्तियोंसे दूषित बातें कीं ॥ २६ ॥ तब उन ब्राह्मणोंने शान्तनुसे कहा— ॥ २७ ॥ "हे राजन् ! चलो, अब यहाँ अधिक आग्रह करनेकी आवश्यकता नहीं। अब अनावृष्टिका दोष शान्त हो गया। अनादिकालसे पूजित वेदवाक्योंमें दोष बतलानेके कारण देवापि पतित हो गया है ॥ २८ ॥ ज्येष्ठ भ्राताके पतित हो जानेसे अब तुम परिवेत्ता नहीं रहे।" उनके ऐसा कहनेपर शान्तनु अपनी राजधानीको चले आये और राज्यशासन करने लगे ॥ २९ ॥ वेदवादके विरुद्ध वचन बोलनेके कारण देवापिके पतित हो जानेसे, बड़े भाईके रहते हुए भी सम्पूर्ण धान्योंकी उत्पत्तिके लिये पर्जन्यदेव (मेघ) बरसने लगे ॥ ३० ॥ |
३०० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
| बाह्लीकात्सोमदत्तः पुत्रोऽभूत् ॥ ३१ ॥ | बाह्लीकके सोमदत्त नामक पुत्र हुआ तथा सोमदत्तके |
|---|---|
| सोमदत्तस्यापि भूरिभूरिश्रवःशल्यसंज्ञास्त्रयः पुत्रा | भूरि, भूरिश्रवा और शल्य नामक तीन पुत्र |
| बभूवुः ॥ ३२ ॥ शान्तनोरप्यमरनद्यां जाह्नव्या- | हुए ॥ ३१-३२ ॥ शान्तनुके गंगाजीसे अतिशय कीर्तिमान् |
| मुदारकीर्तिरशेषशास्त्रार्थविद्भीष्मः पुत्रो- | तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंका जाननेवाला भीष्म नामक पुत्र |
| ऽभूत् ॥ ३३ ॥ सत्यवत्यां च चित्राङ्गदविचित्रवीर्यौ | हुआ ॥ ३३ ॥ शान्तनुने सत्यवतीसे चित्रांगद और विचित्रवीर्य |
| द्वौ पुत्रावुत्पादयामास शान्तनुः ॥ ३४ ॥ | नामक दो पुत्र और भी उत्पन्न किये ॥ ३४ ॥ उनमेंसे |
| चित्राङ्गदस्तु बाल एव चित्राङ्गदेनैव गन्धर्वेणाहवे | चित्रांगदको तो बाल्यावस्थामें ही चित्रांगद नामक गन्धर्वने |
| निहतः ॥ ३५ ॥ विचित्रवीर्योऽपि काशिराजतनये | युद्धमें मार डाला ॥ ३५ ॥ विचित्रवीर्यने काशिराजकी |
| पुत्रिका-धर्मानुसार बभ्रुवाहन नामक एक पुत्र उत्पन्न | |
| अम्बिकाम्बालिके उपयेमे ॥ ३६ ॥ तदुपभोगाति- | पुत्री अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया ॥ ३६ ॥ |
| खेदाच्च यक्ष्मणा गृहीतः स पञ्चत्वम- | उनमें अत्यन्त भोगासक्त रहनेके कारण अतिशय खिन्न |
| गमत् ॥ ३७ ॥ सत्यवतीनियोगाच्च मत्पुत्रः कृष्ण- | रहनेसे वह यक्ष्माके वशीभूत होकर [अकालहीमें] मर |
| द्वैपायनो मातृवचनमनतिक्रमणीयमिति कृत्वा | गया ॥ ३७ ॥ तदनन्तर मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनने सत्यवतीके |
| विचित्रवीर्यक्षेत्रे धृतराष्ट्रपाण्डू तत्प्रहित- | नियुक्त करनेसे माताका वचन टालना उचित न जान |
| भुजिष्यायां विदुरं चोत्पादयामास ॥ ३८ ॥ | विचित्रवीर्यकी पत्नियोंसे धृतराष्ट्र और पाण्डु नामक दो |
| पुत्र उत्पन्न किये और उनकी भेजी हुई दासीसे विदुर | |
| नामक एक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३८ ॥ | |
| धृतराष्ट्रोऽपि गान्धार्या दुर्योधनदुःशासनप्रधानं | धृतराष्ट्रने भी गान्धारीसे दुर्योधन और दुःशासन |
| पुत्रशतमूत्पादयामास ॥ ३९ ॥ पाण्डोरप्यरrootण्ये | आदि सौ पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३९ ॥ पाण्डु वनमें |
| मृगयायामृषि शापोपहतप्रजाजननसामर्थ्यस्य धर्म- | आखेट करते समय ऋषिके शापसे सन्तानोत्पादनमें |
| वायुशक्रैर्य्युधिष्ठिरभीमसेनार्जुनाः कुन्त्यां | असमर्थ हो गये थे अतः उनकी स्त्री कुन्तीसे धर्म, |
| नकुलसहदेवौ चाश्विभ्यां माद्र्यां पञ्चपुत्रा- | वायु और इन्द्रने क्रमशः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन |
| स्समुत्पादिताः ॥ ४० ॥ तेषां च द्रौपद्यां पञ्चैव | नामक तीन पुत्र तथा माद्रीसे दोनों अश्विनीकुमारोंने |
| पुत्रा बभूवुः ॥ ४१ ॥ युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्यः | नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। इस |
| प्रकार उनके पाँच पुत्र हुए ॥ ४० ॥ उन पाँचोंके द्रौपदीसे | |
| पाँच ही पुत्र हुए ॥ ४१ ॥ उनमेंसे युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, | भीमसेनाच्छुतसेनः श्रुतकीर्तिरर्जुनाच्छुतानीको |
| भीमसेनसे श्रुतसेन, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे श्रुतानीक | नकुलाच्छ्रतकर्म सहदेवात् ॥ ४२ ॥ |
| तथा सहदेवसे श्रुतकर्मका जन्म हुआ था ॥ ४२ ॥ | |
| अन्ये च पाण्डवानामात्मजास्तद्यथा ॥ ४३ ॥ | इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके और भी कई पुत्र |
| यौधेयी युधिष्ठिराद्देवकं पुत्रमवाप ॥ ४४ ॥ | हुए ॥ ४३ ॥ जैसे-युधिष्ठिरसे यौधेयीके देवक नामक |
| हिडिम्बा घटोत्कचं भीमसेनात्पुत्रं लेभे ॥ ४५ ॥ | पुत्र हुआ, भीमसेनसे हिडिम्बाके घटोत्कच और काशीसे |
| काशी च भीमसेनादेव सर्वगं सुतमवाप ॥ ४६ ॥ | सर्वग नामक पुत्र हुआ, सहदेवसे विजयाके सुहोत्रका |
| सहदेवाच्च विजया सुहोत्रं पुत्रमवाप ॥ ४७ ॥ | जन्म हुआ, नकुलने रेणुमतीसे निरमित्रको उत्पन्न |
| रेणुमत्यां च नकुलोऽपि निरमित्रमजीजनत् ॥ ४८ ॥ | किया ॥ ४४-४८ ॥ अर्जुनके नागकन्या उलूपीसे इरावान् |
| अर्जुनस्याप्युलूप्यां नागकन्यायामिरावान्नाम | नामक पुत्र हुआ ॥ ४९ ॥ मणिपुर नरेशकी पुत्रीसे अर्जुनने |
| पुत्रोऽभवत् ॥ ४९ ॥ मणिपुरपतिपुत्र्यां पुत्रिका- | पुत्रिका-धर्मानुसार बभ्रुवाहन नामक एक पुत्र उत्पन्न |
| धर्मेण बभ्रुवाहनं नाम पुत्रमर्जुनोऽजनयत् ॥ ५० ॥ | किया ॥ ५० ॥ तथा उसके सुभद्रासे अभिमन्युका जन्म |
| सुभद्रायां चार्भकत्वेऽपि योऽसावतिबलपराक्रम- | हुआ जो कि बाल्यावस्थामें ही बड़ा बल-पराक्रम- |
| स्समस्तारातिरयजेता सोऽभिमन्युरजायत ॥ ५१ ॥ | सम्पन्न तथा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतनेवाला था ॥ ५१ ॥ |
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अ० २१ ] * चतुर्थ अंश * ३०१
| अभिमन्योरुत्तरायां परिक्षीणेषु कुरुष्वश्वत्थाम-प्रयुक्तब्रह्मास्त्रेण गर्भ एव भस्मीकृतो भगवत-स्सकलसुरासुरवन्दितचरणयुगलस्यात्मेच्छया कारणमानुषरूपधारिणोऽनुभावात्पुनर्जीवित-मवाप्य परीक्षित्सञ्जज्ञे॥ ५२॥ योऽयं साम्प्रतमेत-द्भूखण्डलमखण्डितायतिधर्मेण पालयतीति॥ ५३॥ | तदनन्तर कुरुकुलके क्षीण हो जानेपर जो अश्वत्थामाके प्रहार किये हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा गर्भमें ही भस्मीभूत हो चुका था किन्तु फिर, जिन्होंने अपनी इच्छासे ही माया-मानव-देह धारण किया है उन सकल सुरासुरवन्दितचरणारविन्द श्रीकृष्णचन्द्रके प्रभावसे पुनः जीवित हो गया; उस परीक्षित्ने अभिमन्युके द्वारा उत्तराके गर्भसे जन्म लिया जो कि इस समय इस प्रकार धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डलका शासन कर रहा है कि जिससे भविष्यमें भी उसकी सम्पत्ति क्षीण न हो॥ ५२-५३॥ |
|---|
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अतः परं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि॥ १॥ | अब मैं भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन करता हूँ॥ १॥ |
| योऽयं साम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्रा भविष्यन्ति॥ २॥ | इस समय जो परीक्षित् नामक महाराज हैं इनके जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र होंगे॥ २॥ |
| जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति॥ ३॥ | जनमेजयका पुत्र शतानीक होगा |
| योऽसौ याज्ञवल्क्याद्वेदमधीत्य कृपादस्त्राण्यवाप्य विषमविषयविरक्तचित्त-वृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्मज्ञानप्रवीणः परं निर्वाण-मवाप्स्यति॥ ४॥ | जो याज्ञवल्क्यसे वेदाध्ययनकर, कृपासे शस्त्रविद्या प्राप्तकर विषम विषयोंसे विरक्तचित्त हो महर्षि शौनकके उपदेशसे आत्मज्ञानमें निपुण होकर परवनिर्वाण-पद प्राप्त करेगा॥ ३-४॥ |
| शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता॥ ५॥ | शतानीकका पुत्र अश्वमेधदत्त होगा॥ ५॥ |
| तस्मादप्यधिसीमकृष्णः॥ ६॥ | उसके अधिसीमकृष्ण |
| अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः॥ ७॥ | तथा अधिसीमकृष्णके निचक्षु नामक पुत्र होगा |
| यो गङ्गायापहृते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति॥ ८॥ | जो कि गङ्गाजीद्वारा हस्तिनापुरके बहा ले जानेपर कौशाम्बीपुरीमें निवास करेगा॥ ६-८॥ |
| तस्याप्युष्णः पुत्रो भविता॥ ९॥ | निचक्षुका पुत्र उष्ण होगा, |
| उष्णाद्विचित्ररथः॥ १०॥ | उष्णका विचित्ररथ, |
| ततः शुचिरथः॥ ११॥ | विचित्ररथका शुचिरथ, |
| तस्माद्वृष्णिमांस्ततस्सुषेणस्तस्यापि सुनीथ-स्सुनीथान्नृपचक्षुस्तस्मादपि सुखावलस्तस्य च पारिप्लवस्ततश्च सुनयस्तस्यापि मेधावी ॥ १२॥ | शुचिरथका वृष्णिमान्, वृष्णिमान्का सुषेण, सुषेणका सुनीथ, सुनीथका नृप, नृपका चक्षु, चक्षुका सुखावल, सुखावलका पारिप्लव, पारिप्लवका सुनय, सुनयका मेधावी, |
| मेधाविनो रिपुञ्जयस्ततो मृदुस्तस्माच्च तिग्मस्तस्माद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्वसुदानः॥ १३॥ | मेधावीका रिपुंजय, रिपुंजयका मृदु, मृदुका तिग्म, तिग्मका बृहद्रथ, बृहद्रथका वसुदान, |
| ततोऽपरश्शतानीकः॥ १४॥ तस्माच्चोदयन | वसुदानका दूसरा शतानीक, शतानीकका उदयन, |
३०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| उदयनादहीनरस्ततश्च दण्डपाणिस्ततो निरमित्रः ॥ १५ ॥ तस्माच्च क्षेमकः ॥ १६ ॥ | उदयनका अहीनर, अहीनरका दण्डपाणि, दण्डपाणिका निरमित्र तथा निरमित्रका पुत्र क्षेमक होगा। इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १५–१७ ॥ |
| अत्रायं श्लोकः ॥ १७ ॥ | |
| ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो राजर्षिसत्कृतः ।<br>क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यते कलौ ॥ १८ ॥ | ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका कारणरूप तथा नाना राजर्षियोंसे सभाजित है वह कलियुगमें राजा क्षेमकके उत्पन्न होनेपर समाप्त हो जायगा’ ॥ १८ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय
भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः पार्थिवाः कथ्यन्ते ॥ १ ॥ | अब मैं भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| बृहद्वलस्य पुत्रो बृहत्क्षणः ॥ २ ॥ | बृहद्वलका पुत्र बृहत्क्षण होगा, उसका उरुक्षय, |
| तस्मादुरुक्षयस्तस्माच्च वत्सव्यूहस्ततश्च प्रतिव्योमस्तस्मादपि दिवाकरः ॥ ३ ॥ | उरुक्षयका वत्सव्यूह, वत्सव्यूहका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका दिवाकर, दिवाकरका सहदेव, |
| तस्मात्सहदेवः सहदेवाद्बृहदश्वस्तत्सूनुर्भानुरथस्तस्य च प्रतीताश्वस्तस्यापि सुप्रतीकस्ततश्च मरुदेवस्ततः सुनक्षत्रस्तस्मात्किन्नरः ॥ ४ ॥ | सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्वका भानुरथ, भानुरथका प्रतीताश्व, प्रतीताश्वका सुप्रतीक, सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका किन्नर, किन्नरका अन्तरिक्ष, |
| किन्नरादन्तरिक्षस्तस्मात्सुपर्णस्ततश्चामित्रजित् ॥ ५ ॥ | अन्तरिक्षका सुपर्ण, सुपर्णका अमित्रजित्, अमित्रजित्का बृहद्राज, |
| ततश्च बृहद्राजस्तस्यापि धर्मी धर्मिणः कृतञ्जयः ॥ ६ ॥ | बृहद्राजका धर्मी, धर्मीका कृतंजय, कृतंजयका रणंजय, |
| कृतञ्जयाद्रणञ्जयः ॥ ७ ॥ | रणंजयका संजय, संजयका शाक्य, |
| रणञ्जयात्सञ्जयस्तस्माच्छाक्यश्शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद्राहुलस्ततः प्रसेनजित् ॥ ८ ॥ | शाक्यका शुद्धोदन, शुद्धोदनका राहुल, राहुलका प्रसेनजित्, प्रसेनजित्का क्षुद्रक, |
| ततश्च क्षुद्रकस्ततश्च कुण्डकस्तस्मादपि सुरथः ॥ ९ ॥ | क्षुद्रकका कुण्डक, कुण्डकका सुरथ और सुरथका सुमित्र नामक पुत्र होगा। |
| तत्पुत्रश्च सुमित्रः ॥ १० ॥ | |
| इत्येते चेक्ष्वाकवो बृहद्वलान्वयाः ॥ ११ ॥ | ये सब इक्ष्वाकुके वंशमें बृहद्वलकी सन्तान होंगे ॥ २–११ ॥ |
| अत्रानुवंशश्लोकः ॥ १२ ॥ | इस वंशके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १२ ॥ |
| इक्ष्वाकूणामयं वंशस्सुमित्रान्तो भविष्यति ।<br>यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥ १३ ॥ | ‘यह इक्ष्वाकुवंश राजा सुमित्रतक रहेगा, क्योंकि कलियुगमें राजा सुमित्रके होनेपर फिर यह समाप्त हो जायगा’ ॥ १३ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
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अ० २३, २४ ] * चतुर्थ अंश * ३०३
तेईसवाँ अध्याय
मगधवंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| मागधानां बार्हद्रथानां भाविनामनुक्रमं कथयिष्यामि ॥ १ ॥ अत्र हि वंशे महाबलपराक्रमा जरासन्धप्रधाना बभूवुः ॥ २ ॥ | अब मैं मगधदेशीय बृहद्रथकी भावी सन्तानका अनुक्रमसे वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ इस वंशमें महाबलवान् और पराक्रमी जरासन्ध आदि राजागण प्रधान थे ॥ २ ॥ |
| जरासन्धस्य पुत्रः सहदेवः ॥ ३ ॥ सहदेवात्सोमापिस्तस्य श्रुतश्रवास्तस्याप्ययुतायुस्ततश्च निरमित्रस्तत्तनयस्सुनेत्रस्तस्मादपि बृहत्कर्मा ॥ ४ ॥ ततश्च सेनजित्ततश्च श्रुतञ्जयस्ततो विप्रस्तस्य च पुत्रश्शुचिनामा भविष्यति ॥ ५ ॥ तस्यापि क्षेम्यस्ततश्च सुव्रतस्सुव्रताद्धर्म्मस्ततस्सुश्रवाः ॥ ६ ॥ ततो दृढसेनः ॥ ७ ॥ तस्मात्सुबलः ॥ ८ ॥ सुबलात्सुनीतो भविता ॥ ९ ॥ ततस्सत्यजित् ॥ १० ॥ तस्माद्विश्वजित् ॥ ११ ॥ तस्यापि रिपुञ्जयः ॥ १२ ॥ इत्येते बार्हद्रथा भूपतयो वर्षसहस्रमेकं भविष्यन्ति ॥ १३ ॥ | जरासन्धका पुत्र सहदेव है ॥ ३ ॥ सहदेवके सोमापि नामक पुत्र होगा, सोमापिके श्रुतश्रवा, श्रुतश्रवाके अयुतायु, अयुतायुके निरमित्र, निरमित्रके सुनेत्र, सुनेत्रके बृहत्कर्मा, बृहत्कर्माके सेनजित्, सेनजित्के श्रुतंजय, श्रुतंजयके विप्र तथा विप्रके शुचि नामक एक पुत्र होगा ॥ ४–५ ॥ शुचिके क्षेम्य, क्षेम्यके सुव्रत, सुव्रतके धर्म, धर्मके सुश्रवा, सुश्रवाके दृढसेन, दृढसेनके सुबल, सुबलके सुनीत, सुनीतके सत्यजित्, सत्यजित्के विश्वजित् और विश्वजित्के रिपुंजयका जन्म होगा ॥ ६–१२ ॥ इस प्रकारसे बृहद्रथवंशीय राजागण एक सहस्र वर्षपर्यन्त मगधमें शासन करेंगे ॥ १३ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
चौबीसवाँ अध्याय
कलियुगी राजाओं और कलिधर्मोंका वर्णन तथा राजवंश-वर्णनका उपसंहार
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| योऽयं रिपुञ्जयो नाम बार्हद्रथोऽन्त्यस्तस्यामात्यो सुनिको नाम भविष्यति ॥ १ ॥ स चैनं स्वामिनं हत्वा स्वपुत्रं प्रद्योतनामानमभिषेक्ष्यति ॥ २ ॥ तस्यापि बलाकनामा पुत्रो भविता ॥ ३ ॥ ततश्च विशाखयूपः ॥ ४ ॥ तत्पुत्रो जनकः ॥ ५ ॥ तस्य च नन्दिवर्द्धनः ॥ ६ ॥ ततो नन्दी ॥ ७ ॥ इत्येतेऽष्टत्रिंशदुत्तरमब्दशतं पञ्च प्रद्योताः पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ ८ ॥ | बृहद्रथवंशका रिपुंजय नामक जो अन्तिम राजा होगा उसका सुनिक नामक एक मन्त्री होगा। वह अपने स्वामी रिपुंजयको मारकर अपने पुत्र प्रद्योतका राज्याभिषेक करेगा। उसका पुत्र बलाक होगा, बलाकका विशाखयूप, विशाखयूपका जनक, जनकका नन्दिवर्द्धन तथा नन्दिवर्द्धनका पुत्र नन्दी होगा। ये पाँच प्रद्योतवंशीय नृपतिगण एक सौ अड़तीस वर्ष पृथिवीका पालन करेंगे ॥ १–८ ॥ |
| ३०४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २४ |
|---|
[मूल संस्कृत]
ततश्च शिशुनाभः ॥ ९ ॥ तत्पुत्रः काकवर्णो भविता ॥ १० ॥ तस्य च पुत्रः क्षेमधर्मा ॥ ११ ॥ तस्यापि क्षतौजाः ॥ १२ ॥ तत्पुत्रो विधिसारः ॥ १३ ॥ ततश्चाजातशत्रुः ॥ १४ ॥ तस्मादर्भकः ॥ १५ ॥ तस्माच्चोदयनः ॥ १६ ॥ तस्मादपि नन्दिवर्द्धनः ॥ १७ ॥ ततो महानन्दी ॥ १८ ॥ इत्येते शैशुनाभा भूपालास्त्रीणि वर्षशतानि द्विषष्ट्यधिकानि भविष्यन्ति ॥ १९ ॥
महानन्दिनस्ततश्शूद्रागर्भोद्भवोऽतिलुब्धोऽतिबलो महापद्मनामा नन्दः परशुराम इवापरोऽखिलक्षत्रान्तकारी भविष्यति ॥ २० ॥ ततः प्रभृति शूद्रा भूपाला भविष्यन्ति ॥ २१ ॥ स चैकच्छत्रामनुल्लङ्घितशासनों महापद्मः पृथिवीं भोक्ष्यते ॥ २२ ॥ तस्याप्यष्टौ सुतास्सुमाल्याद्या भवितारः ॥ २३ ॥ तस्य महापद्मस्यनु पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ २४ ॥ महापद्मपुत्राश्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति ॥ २५ ॥ ततश्च नव चैतान्नन्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणस्समुद्धरिष्यति ॥ २६ ॥ तेषामभावे मौर्याः पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ २७ ॥ कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तमुत्पन्नं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २८ ॥
तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति ॥ २९ ॥ तस्याप्यशोकवर्द्धनस्ततस्सुयशास्ततश्च दशरथस्ततश्च संयुतस्ततश्शालिशूकस्तस्मात्सोमशर्मा तस्यापि सोमशर्मणश्शतधन्वा ॥ ३० ॥ तस्यापि बृहद्रथनामा भविता ॥ ३१ ॥ एवमेते मौर्य्या दश भूपतयो भविष्यन्ति अब्दशतं सप्तत्रिंशदुत्तरम् ॥ ३२ ॥ तेषामन्ते पृथिवीं दश शुङ्गा भोक्ष्यन्ति ॥ ३३ ॥ पुष्यमित्रस्सेनापतिस्स्वामिनं हत्वा राज्यं करिष्यति तस्यात्मजोऽग्निमित्रः ॥ ३४ ॥ तस्मात्सुज्येष्ठस्ततो वसुमित्रस्तस्मादप्युदंकस्ततः पुलिन्दकस्ततो घोषवसुस्तस्मादपि वज्रमित्रस्ततो
[हिन्दी अनुवाद]
नन्दीका पुत्र शिशुनाभ होगा, शिशुनाभका काकवर्ण, काकवर्णका क्षेमधर्मा, क्षेमधर्माका क्षतौजा, क्षतौजाका विधिसार, विधिसारका अजातशत्रु, अजातशत्रुका अर्भक, अर्भकका उदयन, उदयनका नन्दिवर्द्धन और नन्दिवर्द्धनका पुत्र महानन्दी होगा। ये शिशुनाभवंशीय नृपतिगण तीन सौ बासठ वर्ष पृथिवीका शासन करेंगे ॥ ९—१९ ॥
महानन्दीके शूद्राके गर्भसे उत्पन्न महापद्म नामक नन्द दूसरे परशुरामके समान सम्पूर्ण क्षत्रियोंका नाश करनेवाला होगा। तबसे शूद्रजातीय राजा राज्य करेंगे। राजा महापद्म सम्पूर्ण पृथिवीका एकच्छत्र और अनुल्लङ्घित राज्य-शासन करेगा। उसके सुमाली आदि आठ पुत्र होंगे जो महापद्मके पीछे पृथिवीका राज्य भोगेंगे ॥ २०—२४ ॥ महापद्म और उसके पुत्र सौ वर्षतक पृथिवीका शासन करेंगे। तदनन्तर इन नवों नन्दोंको कौटिल्य नामक एक ब्राह्मण नष्ट करेगा, उनका अन्त होनेपर मौर्य नृपतिगण पृथिवीको भोगेंगे। कौटिल्य ही [मुरा नामकी दासीसे नन्दद्वारा] उत्पन्न हुए चन्द्रगुप्तको राज्याभिषिक्त करेगा ॥ २५—२८ ॥
चन्द्रगुप्तका पुत्र बिन्दुसार, बिन्दुसारका अशोकवर्द्धन, अशोकवर्द्धनका सुयशा, सुयशाका दशरथ, दशरथका संयुत, संयुतका शालिशूक, शालिशूकका सोमशर्मा, सोमशर्माका शतधन्वा तथा शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। इस प्रकार एक सौ तिहत्तर वर्षतक ये दस मौर्यवंशी राजा राज्य करेंगे ॥ २९—३२ ॥ इनके अनन्तर पृथिवीमें दस शुंगवंशीय राजागण होंगे ॥ ३३ ॥ उनमें पहला पुष्यमित्र नामक सेनापति अपने स्वामीको मारकर स्वयं राज्य करेगा, उसका पुत्र अग्निमित्र होगा ॥ ३४ ॥ अग्निमित्रका पुत्र सुज्येष्ठ, सुज्येष्ठका वसुमित्र, वसुमित्रका उदंक, उदंकका पुलिन्दक, पुलिन्दकका घोषवसु, घोषवसुका वज्रमित्र, वज्रमित्रका
| अ० २४ ] | * चतुर्थ अंश * | ३०५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भागवतः ॥ ३५ ॥ तस्माद्देवभूतिः ॥ ३६ ॥ इत्येते शुङ्गा द्वादशोत्तरं वर्षशतं पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ ३७ ॥ | भागवत और भागवतका पुत्र देवभूति होगा ॥ ३५-३६ ॥ ये शुंगनरेश एक सौ बारह वर्ष पृथिवीका भोग करेंगे ॥ ३७ ॥ |
| ततः कणवानेषा भूर्यास्यति ॥ ३८ ॥ देवभूतिं तु शुङ्गराजानं व्यसनिनं तस्यैवामात्यः काण्वो वसुदेवनामा तं निहत्य स्वयमवनीं भोक्ष्यति ॥ ३९ ॥ तस्य पुत्रो भूमिमित्रस्तस्यापि नारायणः ॥ ४० ॥ नारायणात्मजस्सुशर्मा ॥ ४१ ॥ एते काण्वायनाश्चत्वारः पञ्चचत्वारिंशद्वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ४२ ॥ | इसके अनन्तर यह पृथिवी कण्व भूपालोंके अधिकारमें चली जायगी ॥ ३८ ॥ शुंगवंशीय अति व्यसनशील राजा देवभूतिको कण्ववंशीय वसुदेव नामक उसका मन्त्री मारकर स्वयं राज्य भोगेगा ॥ ३९ ॥ उसका पुत्र भूमिमित्र, भूमिमित्रका नारायण तथा नारायणका पुत्र सुशर्मा होगा ॥ ४०-४१ ॥ ये चार काण्व भूपतिगण पैंतालीस वर्ष पृथिवीके अधिपति रहेंगे ॥ ४२ ॥ |
| सुशर्माणं तु काण्वं तद्भृत्यो बलिपुच्छकनामा हत्वान्ध्रजातीयो वसुधां भोक्ष्यति ॥ ४३ ॥ ततश्च कृष्णनामा तद्भ्राता पृथिवीपतिर्भविष्यति ॥ ४४॥ तस्यापि पुत्रः शान्तकर्णिस्तस्यापि पूर्णोत्सङ्गस्तत्पुत्रश्शातकर्णिस्तस्माच्चलम्बोदरस्तस्माच्च पिलकस्ततो मेघस्वातिस्ततः पटुमान् ॥ ४५ ॥ ततश्चारिष्टकर्मा ततो हालाहलः ॥ ४६ ॥ हालाहलात्पललकस्ततः पुलिन्दसेनस्ततः सुन्दरस्ततश्शातकर्णिस्ततश्शिवस्वातिस्ततश्च गोमतिपुत्रस्तत्पुत्रोऽलिमान् ॥ ४७ ॥ तस्यापि शान्तकर्णिस्ततः शिवश्रितस्ततश्च शिवस्कन्धस्तस्मादपि यज्ञश्रीस्ततो द्वियज्ञस्तस्माच्चन्द्रश्रीः ॥ ४८ ॥ तस्मात्पुलोमार्चिः ॥ ४९ ॥ एवमेते त्रिंशच्चत्वार्यब्दशतानि षट्पञ्चाशदधिकानि पृथिवीं भोक्ष्यन्ति आन्ध्रभृत्याः ॥ ५० ॥ | कण्ववंशीय सुशर्माको उसका बलिपुच्छक नामवाला आन्ध्रजातीय सेवक मारकर स्वयं पृथिवीका भोग करेगा ॥ ४३ ॥ उसके पीछे उसका भाई कृष्ण पृथिवीका स्वामी होगा ॥ ४४ ॥ उसका पुत्र शान्तकर्णि होगा। शान्तकर्णिका पुत्र पूर्णोत्संग, पूर्णोत्संगका शातकर्णि, शातकर्णिका लम्बोदर, लम्बोदरका पिलक, पिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिक पटुमान्, पटुमान्का अरिष्टकर्मा, अरिष्टकर्माका हालाहल, हालाहलका पललक, पललकका पुलिन्दसेन, पुलिन्दसेनका सुन्दर, सुन्दरका शातकर्णि, [दूसरा] शातकर्णिका शिवस्वाति, शिवस्वातिक गोमतिपुत्र, गोमतिपुत्रका अलिमान्, अलिमान्का शान्तकर्णि [दूसरा], शान्तकर्णिका शिवश्रित, शिवश्रितका शिवस्कन्ध, शिवस्कन्धका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका द्वियज्ञ, द्वियज्ञका चन्द्रश्री तथा चन्द्रश्रीका पुत्र पुलोमार्चि होगा ॥ ४५-४९ ॥ इस प्रकार ये तीस आन्ध्रभृत्य राजागण चार सौ छप्पन वर्ष पृथिवीको भोगेंगे ॥ ५० ॥ |
| सप्ताभीरप्रभृतयो दश गर्दभिलाश्च भूभुजो भविष्यन्ति ॥ ५१ ॥ ततष्षोडश शका भूपतयो भवितारः ॥ ५२ ॥ ततश्चाष्टौ यवनाश्चतुर्दश तुरुष्कारा मुण्डाश्च त्रयोदश एकादश मौना एते वै पृथिवीपतयः पृथिवीं दशवर्षशतानि नवत्यधिकानि भोक्ष्यन्ति ॥ ५३ ॥ | इनके पीछे सात आभीर और दस गर्दभिल राजा होंगे ॥ ५१ ॥ फिर सोलह शक राजा होंगे ॥ ५२ ॥ उनके पीछे आठ यवन, चौदह तुर्क, तेरह मुण्ड (गुरुण्ड) और ग्यारह मौनजातीय राजालोग एक हजार नब्बे वर्ष पृथिवीका शासन करेंगे ॥ ५३ ॥ |
| ततश्च एकादश भूपतयोऽब्दशतानि त्रीणि पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ ५४ ॥ तेषूत्सन्नेषु कैङ्किला यवना भूपतयो भविष्यन्त्यमूर्द्धाभिषिक्ताः ॥ ५५ ॥ | इनमेंसे भी ग्यारह मौन राजा पृथिवीको तीन सौ वर्षतक भोगेंगे ॥ ५४ ॥ इनके उच्छिन्न होनेपर कैंकिल नामक यवनजातीय अभिषेकरहित राजा होंगे ॥ ५५ ॥ |
३०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेषामपत्यं विन्ध्यशक्तिस्ततः पुरञ्जयस्तस्माद्-<br>रामचन्द्रस्तस्माद्धर्मवर्मा ततो वङ्गस्ततोऽभूनन्दन-<br>स्ततस्सुनन्दी तद्भ्राता नन्द्यशाश्शुक्रः प्रवीर एते<br>वर्षशतं षड्वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ५६ ॥ | उनका वंशधर विन्ध्यशक्ति होगा। विन्ध्यशक्तिका पुत्र पुरंजय होगा। पुरंजयका रामचन्द्र, रामचन्द्रका धर्मवर्मा, धर्मवर्माका वंग, वंगका नन्दन तथा नन्दनका पुत्र सुनन्दी होगा। सुनन्दीके नन्दियशा, शुक्र और प्रवीर ये तीन भाई होंगे। ये सब एक सौ छः वर्ष राज्य करेंगे॥ ५६॥ |
| ततस्तत्पुत्रास्त्रयोदशैते बाह्लिकाश्च त्रयः ॥ ५७ ॥ | इसके पीछे तेरह इनके वंशके और तीन बाह्लिक राजा होंगे॥ ५७॥ |
| ततः पुष्पमित्राः पटुमित्रास्त्रयोदशैलाश्र्च<br>सप्तान्ध्राः ॥ ५८ ॥ | उनके बाद तेरह पुष्पमित्र और पटुमित्र आदि तथा सात आन्ध्र माण्डलिक भूपतिगण होंगे॥ ५८॥ |
| ततश्च कोशलायां तु नव चैव<br>भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ५९ ॥ | तथा नौ राजा क्रमशः कोसलदेशमें राज्य करेंगे॥ ५९॥ |
| नैषधास्तु<br>त एव ॥ ६० ॥ | निषधदेशके स्वामी भी ये ही होंगे॥ ६०॥ |
| मगधायां तु विश्वस्फटिकसंज्ञोऽन्यान्वर्णान्-<br>करिष्यति ॥ ६१ ॥ | मगधदेशमें विश्वस्फटिक नामक राजा अन्य वर्णोंको प्रवृत्त करेगा॥ ६१॥ |
| कैवर्त्तवटुपुलिन्द-<br>ब्राह्मणान्राज्ये स्थापयिष्यति ॥ ६२ ॥ | वह कैवर्त, वटु, पुलिन्द और ब्राह्मणोंको राज्यमें नियुक्त करेगा॥ ६२॥ |
| उत्साद्याखिलक्षत्रजातिं नव नागाः पद्मावत्यां नाम<br>पुर्यामनुगङ्गाप्रयागं गयायाञ्च मागधा गुप्ताश्च<br>भोक्ष्यन्ति ॥ ६३ ॥ | सम्पूर्ण क्षत्रिय-जातिको उच्छिन्न कर पद्मावतीपुरीमें नागगण तथा गंगाके निकटवर्ती प्रयाग और गयामें मागध और गुप्त राजालोग राज्य भोग करेंगे॥ ६३॥ |
| कोशलान्ध्रपुण्ड्रताम्रलिप्त-<br>समुद्रतटपुरीं च देवरक्षितो रक्षिता ॥ ६४ ॥ | कोसल, आन्ध्र, पुण्ड्र, ताम्रलिप्त और समुद्रतटवर्तिनी पुरीकी देवरक्षित नामक एक राजा रक्षा करेगा॥ ६४॥ |
| कलिङ्गमाहिषमहेन्द्रभौमान् गुहा भोक्ष्यन्ति ॥ ६५ ॥ | कलिंग, माहिष, महेन्द्र और भौम आदि देशोंको गुह नरेश भोगेंगे॥ ६५॥ |
| नैषधनैमिषककालकोशकाञ्जनपदान्मणि-<br>धान्यकवंशा भोक्ष्यन्ति ॥ ६६ ॥ | नैषध, नैमिषक और कालकोशक आदि जनपदोंको मणि-धान्यक-वंशीय राजा भोगेंगे॥ ६६॥ |
| त्रैराज्यमुषिक-<br>जनपदान्कनकाह्वयो भोक्ष्यति ॥ ६७ ॥ | त्रैराज्य और मुषिक देशोंपर कनक नामक राजाका राज्य होगा॥ ६७॥ |
| सौराष्ट्रावन्तिशूद्राभीरान्नर्मदामरुभूविषयांश्च<br>व्रात्यद्विजाभीरशूद्राद्या भोक्ष्यन्ति ॥ ६८ ॥ | सौराष्ट्र, अवन्ति, शूद्र, आभीर तथा नर्मदा-तटवर्ती मरुभूमिपर व्रात्य द्विज, आभीर और शूद्र आदिका आधिपत्य होगा॥ ६८॥ |
| सिन्धुतटदाविकोर्वीचन्द्रभागाकाश्मीरविषयांश्च<br>व्रात्यम्लेच्छशूद्रादयो भोक्ष्यन्ति ॥ ६९ ॥ | समुद्रतट, दाविकोर्वी, चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशोंका व्रात्य, म्लेच्छ और शूद्र आदि राजागण भोग करेंगे॥ ६९॥ |
| एते च तुल्यकालास्सर्वे पृथिव्यां भूभुजो<br>भविष्यन्ति ॥ ७० ॥ | ये सम्पूर्ण राजालोग पृथिवीमें एक ही समयमें होंगे॥ ७०॥ |
| अल्पप्रसादा बृहत्कोपा-<br>स्सर्वकालमनृताधर्मरुचयः स्त्रीबालगोवधकर्त्तारः<br>परस्वादानरुचयोऽल्पसारास्तमिस्रप्राया उदिता-<br>स्तमितप्राया अल्पायुषो महेच्छा ह्यल्पधर्मा<br>लुब्धाश्च भविष्यन्ति ॥ ७१ ॥ | ये थोड़ी प्रसन्नतावाले, अत्यन्त क्रोधी, सर्वदा अधर्म और मिथ्या भाषणमें रुचि रखनेवाले, स्त्री-बालक और गौओंकी हत्या करनेवाले, पर-धन-हरणमें रुचि रखनेवाले, अल्पशक्ति तमःप्रधान उत्थानके साथ ही पतनशील, अल्पायु, महती कामनावाले, अल्पपुण्य और अत्यन्त लोभी होंगे॥ ७१॥ |
| तैश्च विमिश्रा<br>जनपदास्तच्छीलानुवर्त्तिनो राजाश्रयशुष्मिणो<br>म्लेच्छाश्चार्याश्च विपर्ययेण वर्त्तमानाः प्रजाः<br>क्षपयिष्यन्ति ॥ ७२ ॥ | ये सम्पूर्ण देशोंको परस्पर मिला देंगे तथा उन राजाओंके आश्रयसे ही बलवान् और उन्हींके स्वभावका अनुकरण करनेवाले म्लेच्छ तथा आर्यविपरीत आचरण करते हुए सारी प्रजाको नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे॥ ७२॥ |
अ० २४] * चतुर्थ अंश * ३०७
| ततश्चानुदिनमल्पालपह््रासव्यprefixतावच्छेदद्धर्मार्थयो-<br>र्जगतस्संङ्क्षयो भविष्यति॥ ७३॥<br>ततश्चार्थ एवाभिजनहेतुः॥ ७४॥<br>बलमेवाशेषधर्महेतुः॥ ७५॥ अभिरुचिरेव<br>दाम्पत्यसम्बन्धहेतुः॥ ७६॥ स्त्रीत्वमेवोपभोग-<br>हेतुः॥ ७७॥ अनृतमेव व्यवहारजयहेतुः॥ ७८॥<br>उन्नताम्बुतैव पृथिवीहेतुः॥ ७९॥ ब्रह्मसूत्रमेव<br>विप्रत्वहेतुः॥ ८०॥ रत्नधातुतैव श्लाघ्यता-<br>हेतुः॥ ८१॥ लिङ्गधारणमेवाश्रमहेतुः॥ ८२॥<br>अन्याय एव वृत्तिहेतुः॥ ८३॥ दौर्बल्यमेवावृत्ति-<br>हेतुः॥ ८४॥ अभयप्रगल्भोच्चारणमेव<br>पाण्डित्यहेतुः॥ ८५॥ अनाढ्यतैव साधुत्व-<br>हेतुः॥ ८६॥ स्नानमेव प्रसाधनहेतुः॥ ८७॥<br>दानमेव धर्महेतुः॥ ८८॥ स्वीकरणमेव<br>विवाहहेतुः॥ ८९॥ सद्द्वेषधार्यैव पात्रम्॥ ९०॥<br>दूरायतनोदकमेव तीर्थहेतुः॥ ९१॥<br>कपटवेषधारणमेव महत्त्वहेतुः ॥९२॥<br>इत्येवमनेकदोषोत्तरे तु भूमण्डले सर्ववर्णेष्वेव<br>यो यो बलवान्स स भूपतिर्भविष्यति॥ ९३॥<br>एवं चातिलुब्धकराजासहाश्शैलानामान्तर-<br>द्रोणीः प्रजास्संश्रयिष्यन्ति॥ ९४॥ मधुशाक-<br>मूलफलपत्रपुष्पाद्याहाराश्च भविष्यन्ति॥ ९५॥<br>तरुवल्कलपर्णचीरप्रावरणाश्चातिबहुप्रजाश्शी-<br>तवातातपवर्षसहाश्च भविष्यन्ति॥ ९६॥ न च<br>कश्चित्रयोविंशतिवर्षाणि जीविष्यति<br>अनवरतं चात्र कलियुगे क्षयमाया-<br>त्यखिल एवैष जनः॥ ९७॥ श्रौते स्मार्ते च धर्मे<br>विप्लवमत्यन्तमुपगते क्षीणप्राये च कलावशेष-<br>जगत्स्रष्टुश्चराचरगुरोरादिमध्यान्तरहितस्य ब्रह्म-<br>मयस्यात्मरूपिणो भगवतो वासुदेवस्यांश-<br>श्शाम्बलग्रामप्रधानब्राह्मणस्य विष्णुयशसो<br>गृहेऽष्टगुणर्द्धिसमन्वितः कल्किरूपी जगत्यत्रावतीर्य-<br>सकलम्लेच्छदस्युदुष्टाचरणचेतसामशेषाणा-<br>मपरिच्छिन्नशक्तिमाहात्म्यः क्षयं करिष्यति | तब दिन-दिन धर्म और अर्थका थोड़ा-थोड़ा ह्रास तथा क्षय होनेके कारण संसारका क्षय हो जायगा॥ ७३॥ उस समय अर्थ ही कुलीनताका हेतु होगा; बल ही सम्पूर्ण धर्मका हेतु होगा; पारस्परिक रुचि ही दाम्पत्य-सम्बन्धकी हेतु होगी, स्त्रीत्व ही उपभोगका हेतु होगा [अर्थात् स्त्रीकी जाति-कुल आदिका विचार न होगा]; मिथ्या भाषण ही व्यवहारमें सफलता प्राप्त करनेका हेतु होगा; जलकी सुलभता और सुगमता ही पृथिवीकी स्वीकृतिका हेतु होगा [अर्थात् पुण्यक्षेत्रादिका कोई विचार न होगा। जहाँकी जलवायु उत्तम होगी वही भूमि उत्तम मानी जायगी]; यज्ञोपवीत ही ब्राह्मणत्वका हेतु होगा; रत्नादि धारण करना ही प्रशंसाका हेतु होगा; बाह्य चिह्न ही आश्रमोंके हेतु होंगे; अन्याय ही आजीविकाका हेतु होगा; दुर्बलता ही बेकारीका हेतु होगा; निर्भयतापूर्वक धृष्टताके साथ बोलना ही पाण्डित्यका हेतु होगा, निर्धनता ही साधुत्वका हेतु होगी; स्नान ही साधनका हेतु होगा; दान ही धर्मका हेतु होगा; स्वीकार कर लेना ही विवाहका हेतु होगा [अर्थात् संस्कार आदिकी अपेक्षा न कर पारस्परिक स्नेहबन्धनसे ही दाम्पत्य-सम्बन्ध स्थापित हो जायगा]; भली प्रकार बन-ठनकर रहनेवाला ही सुपात्र समझा जायगा; दूरदेशका जल ही तीर्थोदकत्वका हेतु होगा तथा छद्मवेश धारण ही गौरवका कारण होगा॥ ७४—९२॥ इस प्रकार पृथिवीमण्डलमें विविध दोषोंके फैल जानेसे सभी वर्णोंमें जो-जो बलवान् होगा वही-वही राजा बन बैठेगा॥ ९३॥<br>इस प्रकार अतिलोलुप राजाओंके कर-भारको सहन न कर सकनेके कारण प्रजा पर्वत-कन्दराओंका आश्रय लेगी तथा मधु, शाक, मूल, फल, पत्र और पुष्प आदि खाकर दिन काटेगी॥ ९४-९५॥ वृक्षोंके पत्र और वल्कल ही उनके पहनने तथा ओढ़नेके कपड़े होंगे। अधिक सन्तानें होंगी। सब लोग शीत, वायु, घाम और वर्षा आदिके कष्ट सहेंगे॥ ९६॥ कोई भी तेईस वर्षतक जीवित न रह सकेगा। इस प्रकार कलियुगमें यह सम्पूर्ण जनसमुदाय निरन्तर क्षीण होता रहेगा॥ ९७॥ इस प्रकार श्रौत और स्मार्तधर्मका अत्यन्त ह्रास हो जाने तथा कलियुगके प्रायः बीत जानेपर शम्बल (सम्भल) ग्रामनिवासी ब्राह्मणश्रेष्ठ विष्णुयशके घर सम्पूर्ण संसारके रचयिता, चराचर गुरु, आदिमध्यान्तशून्य, ब्रह्ममय, आत्मस्वरूप भगवान् वासुदेव अपने अंशसे अष्टैश्वर्ययुक्त कल्किरूपसे संसारमें अवतार लेकर असीम शक्ति और माहात्म्यसे |
३०८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वधर्मेषु चाखिलमेव संस्थापयिष्यति॥ ९८॥ | सम्पन्न हो सकल म्लेच्छ, दस्यु, दुष्टाचारी तथा दुष्ट चित्तोंका क्षय करेंगे और समस्त प्रजाको अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करेंगे॥ ९८॥ |
| अनन्तरं चाशेषकलेरवसाने निशावसाने विबुद्धानामिव तेषामेव जनपदानाम् अमलस्फटिकविशुद्धा मतयो भविष्यन्ति॥ ९९॥ | इसके पश्चात् समस्त कलियुगके समाप्त हो जानेपर रात्रिके अन्तमें जागे हुओंके समान तत्कालीन लोगोंकी बुद्धि स्वच्छ, स्फटिकमणिके समान निर्मल हो जायगी॥ ९९॥ |
| तेषां च बीजभूतानामशेषमनुष्याणां परिणतानामपि तत्कालकृतापत्यप्रसूतिर्भविष्यति॥ १००॥ | उन बीजभूत समस्त मनुष्योंसे उनकी अधिक अवस्था होनेपर भी उस समय सन्तान उत्पन्न हो सकेगी॥ १००॥ |
| तानि च तदपत्यानि कृतयुगानुसारिण्येव भविष्यन्ति॥ १०१॥ | उनकी वे सन्तानें सत्ययुगके ही धर्मोंका अनुसरण करनेवाली होंगी॥ १०१॥ |
| अत्रोच्यते | इस विषयमें ऐसा कहा जाता है कि— |
| यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः।<br>एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति वै कृतम्॥ १०२ | जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति पुष्यनक्षत्रमें स्थित होकर एक राशिपर एक साथ आवेंगे उसी समय सत्ययुगका आरम्भ हो जायगा*॥ १०२॥ |
| अतीता वर्त्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये।<br>एते वंशेषु भूपालाः कथिता मुनिसत्तम॥ १०३ | हे मुनिश्रेष्ठ! तुमसे मैंने यह समस्त वंशोंके भूत, भविष्यत् और वर्तमान सम्पूर्ण राजाओंका वर्णन कर दिया॥ १०३॥ |
| यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नन्दाभिषेचनम्।<br>एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पाञ्चशदुत्तरम्॥ १०४ | परीक्षित्के जन्मसे नन्दके अभिषेकतक एक हजार पचास वर्षका समय जानना चाहिये॥ १०४॥ |
| सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते ह्युदितौ दिवि।<br>तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि॥ १०५<br><br>तेन सप्तर्षयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम्।<br>ते तु पारिक्षिते काले मघास्वासन्द्विजोत्तम॥ १०६<br><br>तदा प्रवृत्तश्च कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः॥ १०७ | सप्तर्षियोंमेंसे जो [पुलस्त्य और क्रतु] दो नक्षत्र आकाशमें पहले दिखायी देते हैं, उनके बीचमें रात्रिके समय जो [दक्षिणोत्तर रेखापर] समदेशमें स्थित [अश्विनी आदि] नक्षत्र हैं, उनमेंसे प्रत्येक नक्षत्रपर सप्तर्षिगण एक-एक सौ वर्ष रहते हैं। हे द्विजोत्तम! परीक्षित्के समयमें वे सप्तर्षिगण मघानक्षत्रपर थे। उसी समय बारह सौ वर्ष प्रमाणवाला कलियुग आरम्भ हुआ था॥ १०५—१०७॥ |
| यदैव भगवाग्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज।<br>वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवात्रागतः कलिः॥ १०८ | हे द्विज! जिस समय भगवान् विष्णुके अंशावतार भगवान् वासुदेव निजधामको पधारे थे उसी समय पृथिवीपर कलियुगका आगमन हुआ था॥ १०८॥ |
| यावत्स पादपद्माभ्यां पस्पर्शैमां वसुन्धराम्।<br>तावत्पृथ्वीपरिश्वङ्गे समर्थो नाभवत्कलिः॥ १०९ | जबतक भगवान् अपने चरण-कमलोंसे इस पृथिवीका स्पर्श करते रहे, तबतक पृथिवीसे संसर्ग करनेकी कलियुगकी हिम्मत न पड़ी॥ १०९॥ |
| गते सनातनस्यांशे विष्णोस्तत्र भुवो दिवम्।<br>तत्याज सानुजो राज्यं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ११० | सनातन पुरुष भगवान् विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके स्वर्गलोक पधारनेपर भाइयोंके सहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने अपने राज्यको छोड़ दिया॥ ११०॥ |
| विपरीतानि दृष्ट्वा च निमित्तानि हि पाण्डवः।<br>याते कृष्णे चकाराथ सोऽभिषेकं परीक्षितः॥ १११ | कृष्णचन्द्रके अन्तर्धान हो जानेपर विपरीत लक्षणोंको देखकर पाण्डवोंने परीक्षित्को राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया॥ १११॥ |
| प्रयास्यन्ति यदा चैते पूर्वाषाढां महर्षयः।<br>तदा नन्दात्प्रभृत्येष गतिवृद्धिं गमिष्यति॥ ११२ | जिस समय ये सप्तर्षिगण पूर्वाषाढानक्षत्रपर जायँगे उसी समय राजा नन्दके समयसे कलियुगका प्रभाव बढ़ेगा॥ ११२॥ |
* यद्यपि प्रति बारहवें वर्ष जब बृहस्पति कर्कराशिपर जाते हैं तो अमावास्यातिथिको पुष्यनक्षत्रपर इन तीनों ग्रहोंका योग होता है, तथापि 'समेष्यन्ति' पदसे एक साथ आनेपर सत्ययुगका आरम्भ कहा है; इसलिये उक्त समयपर अतिव्याप्तिदोष नहीं है।