विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३०८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| स्वधर्मेषु चाखिलमेव संस्थापयिष्यति॥ ९८॥ | सम्पन्न हो सकल म्लेच्छ, दस्यु, दुष्टाचारी तथा दुष्ट चित्तोंका क्षय करेंगे और समस्त प्रजाको अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करेंगे॥ ९८॥ |
| अनन्तरं चाशेषकलेरवसाने निशावसाने विबुद्धानामिव तेषामेव जनपदानाम् अमलस्फटिकविशुद्धा मतयो भविष्यन्ति॥ ९९॥ | इसके पश्चात् समस्त कलियुगके समाप्त हो जानेपर रात्रिके अन्तमें जागे हुओंके समान तत्कालीन लोगोंकी बुद्धि स्वच्छ, स्फटिकमणिके समान निर्मल हो जायगी॥ ९९॥ |
| तेषां च बीजभूतानामशेषमनुष्याणां परिणतानामपि तत्कालकृतापत्यप्रसूतिर्भविष्यति॥ १००॥ | उन बीजभूत समस्त मनुष्योंसे उनकी अधिक अवस्था होनेपर भी उस समय सन्तान उत्पन्न हो सकेगी॥ १००॥ |
| तानि च तदपत्यानि कृतयुगानुसारिण्येव भविष्यन्ति॥ १०१॥ | उनकी वे सन्तानें सत्ययुगके ही धर्मोंका अनुसरण करनेवाली होंगी॥ १०१॥ |
| अत्रोच्यते | इस विषयमें ऐसा कहा जाता है कि— |
| यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः।<br>एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति वै कृतम्॥ १०२ | जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति पुष्यनक्षत्रमें स्थित होकर एक राशिपर एक साथ आवेंगे उसी समय सत्ययुगका आरम्भ हो जायगा*॥ १०२॥ |
| अतीता वर्त्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये।<br>एते वंशेषु भूपालाः कथिता मुनिसत्तम॥ १०३ | हे मुनिश्रेष्ठ! तुमसे मैंने यह समस्त वंशोंके भूत, भविष्यत् और वर्तमान सम्पूर्ण राजाओंका वर्णन कर दिया॥ १०३॥ |
| यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नन्दाभिषेचनम्।<br>एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पाञ्चशदुत्तरम्॥ १०४ | परीक्षित्के जन्मसे नन्दके अभिषेकतक एक हजार पचास वर्षका समय जानना चाहिये॥ १०४॥ |
| सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते ह्युदितौ दिवि।<br>तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि॥ १०५<br><br>तेन सप्तर्षयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम्।<br>ते तु पारिक्षिते काले मघास्वासन्द्विजोत्तम॥ १०६<br><br>तदा प्रवृत्तश्च कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः॥ १०७ | सप्तर्षियोंमेंसे जो [पुलस्त्य और क्रतु] दो नक्षत्र आकाशमें पहले दिखायी देते हैं, उनके बीचमें रात्रिके समय जो [दक्षिणोत्तर रेखापर] समदेशमें स्थित [अश्विनी आदि] नक्षत्र हैं, उनमेंसे प्रत्येक नक्षत्रपर सप्तर्षिगण एक-एक सौ वर्ष रहते हैं। हे द्विजोत्तम! परीक्षित्के समयमें वे सप्तर्षिगण मघानक्षत्रपर थे। उसी समय बारह सौ वर्ष प्रमाणवाला कलियुग आरम्भ हुआ था॥ १०५—१०७॥ |
| यदैव भगवाग्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज।<br>वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवात्रागतः कलिः॥ १०८ | हे द्विज! जिस समय भगवान् विष्णुके अंशावतार भगवान् वासुदेव निजधामको पधारे थे उसी समय पृथिवीपर कलियुगका आगमन हुआ था॥ १०८॥ |
| यावत्स पादपद्माभ्यां पस्पर्शैमां वसुन्धराम्।<br>तावत्पृथ्वीपरिश्वङ्गे समर्थो नाभवत्कलिः॥ १०९ | जबतक भगवान् अपने चरण-कमलोंसे इस पृथिवीका स्पर्श करते रहे, तबतक पृथिवीसे संसर्ग करनेकी कलियुगकी हिम्मत न पड़ी॥ १०९॥ |
| गते सनातनस्यांशे विष्णोस्तत्र भुवो दिवम्।<br>तत्याज सानुजो राज्यं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ११० | सनातन पुरुष भगवान् विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके स्वर्गलोक पधारनेपर भाइयोंके सहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने अपने राज्यको छोड़ दिया॥ ११०॥ |
| विपरीतानि दृष्ट्वा च निमित्तानि हि पाण्डवः।<br>याते कृष्णे चकाराथ सोऽभिषेकं परीक्षितः॥ १११ | कृष्णचन्द्रके अन्तर्धान हो जानेपर विपरीत लक्षणोंको देखकर पाण्डवोंने परीक्षित्को राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया॥ १११॥ |
| प्रयास्यन्ति यदा चैते पूर्वाषाढां महर्षयः।<br>तदा नन्दात्प्रभृत्येष गतिवृद्धिं गमिष्यति॥ ११२ | जिस समय ये सप्तर्षिगण पूर्वाषाढानक्षत्रपर जायँगे उसी समय राजा नन्दके समयसे कलियुगका प्रभाव बढ़ेगा॥ ११२॥ |
* यद्यपि प्रति बारहवें वर्ष जब बृहस्पति कर्कराशिपर जाते हैं तो अमावास्यातिथिको पुष्यनक्षत्रपर इन तीनों ग्रहोंका योग होता है, तथापि 'समेष्यन्ति' पदसे एक साथ आनेपर सत्ययुगका आरम्भ कहा है; इसलिये उक्त समयपर अतिव्याप्तिदोष नहीं है।