भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

अ० २४ ] * चतुर्थ अंश * ३०९

यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि।
प्रतिपन्नं कलियुगं तस्य संख्यां निबोध मे॥ ११३

त्रीणि लक्षाणि वर्षाणां द्विज मानुष्यसंख्यया।
षष्टिश्चैव सहस्राणि भविष्यत्येष वै कलिः ॥ ११४

शतानि तानि दिव्यानां सप्त पञ्च च संख्यया।
निश्शेषेण गते तस्मिन् भविष्यति पुनः कृतम्॥ ११५

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याश्शूद्राश्च द्विजसत्तम।
युगे युगे महात्मानः समतीतास्सहस्रशः ॥ ११६

बहुत्वान्नामधेयानां परिसंख्या कुले कुले।
पौनरुक्त्याद्धि साम्याच्च न मया परिकीर्त्तिता ॥ ११७

देवापिः पौरवो राजा पुरुश्चेक्ष्वाकुवंशजः।
महायोगबलोपेतौ कलापग्रामसंश्रितौ ॥ ११८

कृते युगे त्विहागम्य क्षत्रप्रवर्त्तकौ हि तौ।
भविष्यतो मनोर्वंशबीजभूतौ व्यवस्थितौ ॥ ११९

एतेन क्रमयोगेन मनुपुत्रैर्वसुन्धरा।
कृतत्रेताद्वापराणि युगानि त्रीणि भुज्यते ॥ १२०

कलौ ते बीजभूता वै केचित्तिष्ठन्ति वै मुने।
यथैव देवापिपुरू साम्प्रतं समधिष्ठितौ ॥ १२१

एष तूद्देशतो वंशस्तवोक्तो भूभुजां मया।
निखिलो गदितुं शक्यो नैष वर्षशतैरपि ॥ १२२

एते चान्ये च भूपाला यैरत्र क्षितिमण्डले।
कृतं ममत्वं मोहान्धैर्नित्यं हेयकलेवरे ॥ १२३

कथं ममेयमचला मत्पुत्रस्य कथं मही।
मद्वंशस्येति चिन्तार्त्ता जगमुरन्तमिमे नृपाः ॥ १२४

तेभ्यः पूर्वतराश्चान्ये तेभ्यस्तेभ्यस्तथा परे।
भविष्याश्चैव यास्यन्ति तेषामन्ये च येऽप्यनु ॥ १२५

विलोक्यात्मजयोद्योगं यात्राव्यग्रान्नराधिपान्।
पुष्पप्रहासैश्शरदि हसन्तीव वसुन्धरा ॥ १२६

मैत्रेय पृथिवीगीताञ्छ्लोकांश्चात्र निबोध मे।
यानाह धर्मध्वजिने जनकायासितो मुनिः ॥ १२७


जिस दिन भगवान् कृष्णचन्द्र परमधामको गये थे उसी दिन कलियुग उपस्थित हो गया था। अब तुम कलियुगकी वर्ष-संख्या सुनो— ॥ ११३॥

हे द्विज! मानवी वर्षगणनाके अनुसार कलियुग तीन लाख साठ हजार वर्ष रहेगा ॥ ११४ ॥ इसके पश्चात् बारह सौ दिव्य वर्षपर्यन्त कृतयुग रहेगा ॥ ११५ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ ! प्रत्येक युगमें हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र महात्मागण हो गये हैं ॥ ११६ ॥ उनके बहुत अधिक संख्यामें होनेसे तथा समानता होनेके कारण कुलोंमें पुनरुक्ति हो जानेके भयसे मैंने उन सबके नाम नहीं बतलाये हैं ॥ ११७ ॥

पुरुवंशीय राजा देवापि तथा इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न राजा पुरु—ये दोनों अत्यन्त योगबलसम्पन्न हैं और कलापग्राममें रहते हैं ॥ ११८ ॥ सत्ययुगका आरम्भ होनेपर ये पुनः मर्त्यलोकमें आकर क्षत्रिय-कुलके प्रवर्त्तक होंगे। वे आगामी मनुवंशके बीजरूप हैं ॥ ११९ ॥ सत्ययुग, त्रेता और द्वापर इन तीनों युगोंमें इसी क्रमसे मनुपुत्र पृथिवीका भोग करते हैं ॥ १२० ॥ फिर कलियुगमें उन्हींमेंसे कोई-कोई आगामी मनुसन्तानके बीजरूपसे स्थित रहते हैं जिस प्रकार कि आजकल देवापि और पुरु हैं ॥ १२१ ॥

इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण राजवंशोंका यह संक्षिप्त वर्णन कर दिया है, इनका पूर्णतया वर्णन तो सौ वर्षमें भी नहीं किया जा सकता ॥ १२२ ॥ इस हेय शरीरके मोहसे अन्धे हुए ये तथा और भी ऐसे अनेक भूपतिगण हो गये हैं जिन्होंने इस पृथिवीमण्डलको अपना-अपना माना है ॥ १२३ ॥ 'यह पृथिवी किस प्रकार अचलभावसे मेरी, मेरे पुत्रकी अथवा मेरे वंशकी होगी ?' इसी चिन्तामें व्याकुल हुए इन सभी राजाओंका अन्त हो गया ॥ १२४ ॥ इसी चिन्तामें डूबे रहकर इन सम्पूर्ण राजाओंके पूर्व-पूर्वतरवर्ती राजालोग चले गये और इसीमें मग्न रहकर आगामी भूपतिगण भी मृत्यु-मुखमें चले जायँगे ॥ १२५ ॥ इस प्रकार अपनेको जीतनेके लिये राजाओंको अथक उद्योग करते देखकर वसुन्धरा शरत्कालीन पुष्पोंके रूपमें मानो हँस रही है ॥ १२६ ॥

हे मैत्रेय! अब तुम पृथिवीके कहे हुए कुछ श्लोकोंको सुनो। पूर्वकालमें इन्हें असित मुनिने धर्मध्वजी राजा जनकको सुनाया था ॥ १२७॥