विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० २१ ] * चतुर्थ अंश * ३०१
| अभिमन्योरुत्तरायां परिक्षीणेषु कुरुष्वश्वत्थाम-प्रयुक्तब्रह्मास्त्रेण गर्भ एव भस्मीकृतो भगवत-स्सकलसुरासुरवन्दितचरणयुगलस्यात्मेच्छया कारणमानुषरूपधारिणोऽनुभावात्पुनर्जीवित-मवाप्य परीक्षित्सञ्जज्ञे॥ ५२॥ योऽयं साम्प्रतमेत-द्भूखण्डलमखण्डितायतिधर्मेण पालयतीति॥ ५३॥ | तदनन्तर कुरुकुलके क्षीण हो जानेपर जो अश्वत्थामाके प्रहार किये हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा गर्भमें ही भस्मीभूत हो चुका था किन्तु फिर, जिन्होंने अपनी इच्छासे ही माया-मानव-देह धारण किया है उन सकल सुरासुरवन्दितचरणारविन्द श्रीकृष्णचन्द्रके प्रभावसे पुनः जीवित हो गया; उस परीक्षित्ने अभिमन्युके द्वारा उत्तराके गर्भसे जन्म लिया जो कि इस समय इस प्रकार धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डलका शासन कर रहा है कि जिससे भविष्यमें भी उसकी सम्पत्ति क्षीण न हो॥ ५२-५३॥ |
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इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
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| अतः परं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि॥ १॥ | अब मैं भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन करता हूँ॥ १॥ |
| योऽयं साम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्रा भविष्यन्ति॥ २॥ | इस समय जो परीक्षित् नामक महाराज हैं इनके जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र होंगे॥ २॥ |
| जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति॥ ३॥ | जनमेजयका पुत्र शतानीक होगा |
| योऽसौ याज्ञवल्क्याद्वेदमधीत्य कृपादस्त्राण्यवाप्य विषमविषयविरक्तचित्त-वृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्मज्ञानप्रवीणः परं निर्वाण-मवाप्स्यति॥ ४॥ | जो याज्ञवल्क्यसे वेदाध्ययनकर, कृपासे शस्त्रविद्या प्राप्तकर विषम विषयोंसे विरक्तचित्त हो महर्षि शौनकके उपदेशसे आत्मज्ञानमें निपुण होकर परवनिर्वाण-पद प्राप्त करेगा॥ ३-४॥ |
| शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता॥ ५॥ | शतानीकका पुत्र अश्वमेधदत्त होगा॥ ५॥ |
| तस्मादप्यधिसीमकृष्णः॥ ६॥ | उसके अधिसीमकृष्ण |
| अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः॥ ७॥ | तथा अधिसीमकृष्णके निचक्षु नामक पुत्र होगा |
| यो गङ्गायापहृते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति॥ ८॥ | जो कि गङ्गाजीद्वारा हस्तिनापुरके बहा ले जानेपर कौशाम्बीपुरीमें निवास करेगा॥ ६-८॥ |
| तस्याप्युष्णः पुत्रो भविता॥ ९॥ | निचक्षुका पुत्र उष्ण होगा, |
| उष्णाद्विचित्ररथः॥ १०॥ | उष्णका विचित्ररथ, |
| ततः शुचिरथः॥ ११॥ | विचित्ररथका शुचिरथ, |
| तस्माद्वृष्णिमांस्ततस्सुषेणस्तस्यापि सुनीथ-स्सुनीथान्नृपचक्षुस्तस्मादपि सुखावलस्तस्य च पारिप्लवस्ततश्च सुनयस्तस्यापि मेधावी ॥ १२॥ | शुचिरथका वृष्णिमान्, वृष्णिमान्का सुषेण, सुषेणका सुनीथ, सुनीथका नृप, नृपका चक्षु, चक्षुका सुखावल, सुखावलका पारिप्लव, पारिप्लवका सुनय, सुनयका मेधावी, |
| मेधाविनो रिपुञ्जयस्ततो मृदुस्तस्माच्च तिग्मस्तस्माद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्वसुदानः॥ १३॥ | मेधावीका रिपुंजय, रिपुंजयका मृदु, मृदुका तिग्म, तिग्मका बृहद्रथ, बृहद्रथका वसुदान, |
| ततोऽपरश्शतानीकः॥ १४॥ तस्माच्चोदयन | वसुदानका दूसरा शतानीक, शतानीकका उदयन, |