विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| उदयनादहीनरस्ततश्च दण्डपाणिस्ततो निरमित्रः ॥ १५ ॥ तस्माच्च क्षेमकः ॥ १६ ॥ | उदयनका अहीनर, अहीनरका दण्डपाणि, दण्डपाणिका निरमित्र तथा निरमित्रका पुत्र क्षेमक होगा। इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १५–१७ ॥ |
| अत्रायं श्लोकः ॥ १७ ॥ | |
| ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो राजर्षिसत्कृतः ।<br>क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यते कलौ ॥ १८ ॥ | ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका कारणरूप तथा नाना राजर्षियोंसे सभाजित है वह कलियुगमें राजा क्षेमकके उत्पन्न होनेपर समाप्त हो जायगा’ ॥ १८ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय
भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः पार्थिवाः कथ्यन्ते ॥ १ ॥ | अब मैं भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| बृहद्वलस्य पुत्रो बृहत्क्षणः ॥ २ ॥ | बृहद्वलका पुत्र बृहत्क्षण होगा, उसका उरुक्षय, |
| तस्मादुरुक्षयस्तस्माच्च वत्सव्यूहस्ततश्च प्रतिव्योमस्तस्मादपि दिवाकरः ॥ ३ ॥ | उरुक्षयका वत्सव्यूह, वत्सव्यूहका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका दिवाकर, दिवाकरका सहदेव, |
| तस्मात्सहदेवः सहदेवाद्बृहदश्वस्तत्सूनुर्भानुरथस्तस्य च प्रतीताश्वस्तस्यापि सुप्रतीकस्ततश्च मरुदेवस्ततः सुनक्षत्रस्तस्मात्किन्नरः ॥ ४ ॥ | सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्वका भानुरथ, भानुरथका प्रतीताश्व, प्रतीताश्वका सुप्रतीक, सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका किन्नर, किन्नरका अन्तरिक्ष, |
| किन्नरादन्तरिक्षस्तस्मात्सुपर्णस्ततश्चामित्रजित् ॥ ५ ॥ | अन्तरिक्षका सुपर्ण, सुपर्णका अमित्रजित्, अमित्रजित्का बृहद्राज, |
| ततश्च बृहद्राजस्तस्यापि धर्मी धर्मिणः कृतञ्जयः ॥ ६ ॥ | बृहद्राजका धर्मी, धर्मीका कृतंजय, कृतंजयका रणंजय, |
| कृतञ्जयाद्रणञ्जयः ॥ ७ ॥ | रणंजयका संजय, संजयका शाक्य, |
| रणञ्जयात्सञ्जयस्तस्माच्छाक्यश्शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद्राहुलस्ततः प्रसेनजित् ॥ ८ ॥ | शाक्यका शुद्धोदन, शुद्धोदनका राहुल, राहुलका प्रसेनजित्, प्रसेनजित्का क्षुद्रक, |
| ततश्च क्षुद्रकस्ततश्च कुण्डकस्तस्मादपि सुरथः ॥ ९ ॥ | क्षुद्रकका कुण्डक, कुण्डकका सुरथ और सुरथका सुमित्र नामक पुत्र होगा। |
| तत्पुत्रश्च सुमित्रः ॥ १० ॥ | |
| इत्येते चेक्ष्वाकवो बृहद्वलान्वयाः ॥ ११ ॥ | ये सब इक्ष्वाकुके वंशमें बृहद्वलकी सन्तान होंगे ॥ २–११ ॥ |
| अत्रानुवंशश्लोकः ॥ १२ ॥ | इस वंशके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १२ ॥ |
| इक्ष्वाकूणामयं वंशस्सुमित्रान्तो भविष्यति ।<br>यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥ १३ ॥ | ‘यह इक्ष्वाकुवंश राजा सुमित्रतक रहेगा, क्योंकि कलियुगमें राजा सुमित्रके होनेपर फिर यह समाप्त हो जायगा’ ॥ १३ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
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