विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २० |
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| अजमीढस्यान्य ऋक्षनामा पुत्रोऽभवत् ॥ ७४ ॥ तस्य संवरणः ॥ ७५ ॥ संवरणात्कुरुः ॥ ७६ ॥ य इदं धर्मक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं चकार ॥ ७७ ॥ सुधनुर्जह्नुपरीक्षित्प्रमुखाः कुरोः पुत्रा बभूवुः ॥ ७८ ॥ सुधनुषः पुत्रस्सुहोत्रस्तस्माच्च्यवनश्च्यवनात् कृतकः ॥ ७९ ॥ ततश्चोपरिचरो वसुः ॥ ८० ॥ बृहद्रथप्रत्यग्रकुशाम्बुकुचेल्मात्स्यप्रमुखा वसोः पुत्रास्सप्ताजायन्त ॥ ८१ ॥ बृहद्रथात्कुशाग्रः कुशाग्राद्वृषभो वृषभात् पुष्पवान् तस्मात्सत्यहितस्तस्मात्सुधन्वा तस्य च जतुः ॥ ८२ ॥ बृहद्रथाच्चान्यश्शकलद्वयजन्मा जरया संहितो जरासन्धनामा ॥ ८३ ॥ तस्मात्सहदेवस्सहदेवात्सोमपस्ततश्च श्रुतश्रवाः ॥ ८४ ॥ इत्येते मया मागधा भूपालाः कथिताः ॥ ८५ ॥ | अजमीढका ऋक्ष नामक एक पुत्र और था ॥ ७४ ॥ उसका पुत्र संवरण हुआ तथा संवरणका पुत्र कुरु था जिसने कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रकी स्थापना की ॥ ७५-७७ ॥ कुरुके पुत्र सुधनु, जह्नु और परीक्षित् आदि हुए ॥ ७८ ॥ सुधनुका पुत्र सुहोत्र था, सुहोत्रका च्यवन, च्यवनका कृतक और कृतकका पुत्र उपरिचर वसु हुआ ॥ ७९-८० ॥ वसुके बृहद्रथ, प्रत्यग्र, कुशाम्बु, कुचेल और मात्स्य आदि सात पुत्र थे ॥ ८१ ॥ इनमेंसे बृहद्रथके कुशाग्र, कुशाग्रके वृषभ, वृषभके पुष्पवान्, पुष्पवान्के सत्यहित, सत्यहितके सुधन्वा और सुधन्वाके जतुका जन्म हुआ ॥ ८२ ॥ बृहद्रथके दो खण्डोंमें विभक्त एक पुत्र और हुआ था जो कि जराके द्वारा जोड़ दिये जानेपर जरासन्ध कहलाया ॥ ८३ ॥ उससे सहदेवका जन्म हुआ तथा सहदेवसे सोमप और सोमपसे श्रुतिश्रवाकी उत्पत्ति हुई ॥ ८४ ॥ इस प्रकार मैंने तुमसे यह मागध भूपालोंका वर्णन कर दिया है ॥ ८५ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेंऽशे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
कुरुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—[कुरुपुत्र] परीक्षित्के |
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| परीक्षितो जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्राः ॥ १ ॥ जह्नोस्तु सुरथो नामात्मजो बभूव ॥ २ ॥ तस्यापि विदूरथः ॥ ३ ॥ तस्मात्सार्वभौमस्सार्वभौमाज्जयसेनस्तस्मादाराधितस्ततश्चायुतायुरयुतायोरक्रोधनः ॥ ४ ॥ तस्माद्देवातिथिः ॥ ५ ॥ ततश्च ऋक्षोऽन्योऽभवत् ॥ ६ ॥ ऋक्षाद्भीमसेनस्ततश्च दिलीपः ॥ ७ ॥ दिलीपात् प्रतीपः ॥ ८ ॥ | जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र हुए, तथा जह्नुके सुरथ नामक एक पुत्र हुआ ॥ १-२ ॥ सुरथके विदूरथका जन्म हुआ। विदूरथके सार्वभौम, सार्वभौमके जयसेन, जयसेनके आराधित, आराधितके अयुतायु, अयुतायुके अक्रोधन, अक्रोधनके देवातिथि तथा देवातिथिके [अजमीढके पुत्र ऋक्षसे भिन्न] दूसरे ऋक्षका जन्म हुआ ॥ ३-६ ॥ ऋक्षसे भीमसेन, भीमसेनसे दिलीप और दिलीपसे प्रतीप नामक पुत्र हुआ ॥ ७-८ ॥ |
| तस्यापि देवापिशान्तनुबाहीकसंज्ञास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ देवापिर्बाल एवारण्यं विवेश ॥ १० ॥ शान्तनुस्तु महीपालोऽभूत् ॥ ११ ॥ अयं च तस्य श्लोकः पृथिव्यां गीयते ॥ १२ ॥ | प्रतीपके देवापि, शान्तनु और बाह्लीक नामक तीन पुत्र हुए ॥ ९ ॥ इनमेंसे देवापि बाल्यावस्थामें ही वनमें चला गया था अतः शान्तनु ही राजा हुआ ॥ १०-११ ॥ उसके विषयमें पृथिवीतलपर यह श्लोक कहा जाता है— ॥ १२ ॥ |