विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 308, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 308
अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| द्विजमीढस्य तु यवीनरसंज्ञः पुत्रः ॥४८॥ तस्यापि धृतिमांस्तस्माच्च सत्यधृतिस्ततश्च दृढनेमिस्तस्माच्च सुपाश्र्वस्ततस्सुमतिस्ततश्च सन्नतिमान् ॥४९॥ सन्नतिमन्तः कृतः पुत्रोऽभूत् ॥५०॥ यं हिरण्यनाभो योगमध्यापयामास ॥५१॥ यश्चतुर्विंशतिं प्राच्यसामगानां संहिताश्चकार ॥५२॥ कृताच्चोग्रायुधः ॥५३॥ येन प्राचुर्येण नीपक्षयः कृतः ॥५४॥ उग्रायुधात्क्षेम्यः क्षेम्यात्सुधीरस्तस्मादरिपुञ्जयस्तस्माच्च बहुरथ इत्येते पौरवाः ॥५५॥ | द्विजमीढका पुत्र यवीनर था ॥४८॥ उसका धृतिमान्, धृतिमान्का सत्यधृति, सत्यधृतिका दृढनेमि, दृढनेमिका सुपाश्र्व, सुपाश्र्वका सुमति, सुमतिका सन्नतिमान् तथा सन्नतिमान्का पुत्र कृत हुआ जिसे हिरण्यनाभने योगविद्याकी शिक्षा दी थी तथा जिसने प्राच्य सामग श्रुतियोंकी चौबीस संहिताएँ रची थीं ॥४९–५२॥ कृतका पुत्र उग्रायुध था जिसने अनेकों नीपवंशीय क्षत्रियोंका नाश किया ॥५३-५४॥ उग्रायुधके क्षेम्य, क्षेम्यके सुधीर, सुधीरके रिपुंजय और रिपुंजयसे बहुरथने जन्म लिया। ये सब पुरुवंशीय राजागण हुए ॥५५॥ |
| अजमीढस्य नलिनी नाम पत्नी तस्या नीलसंज्ञः पुत्रोऽभवत् ॥५६॥ तस्मादपि शान्तिः शान्तेस्सुशान्तिस्सुशान्तेः पुरञ्जयस्तस्माच्च ऋक्षः ॥५७॥ ततश्च हर्यश्वः ॥५८॥ तस्मान्मुद्गलसृञ्जयबृहदिषुयवीनरकाम्पिल्यसंज्ञाः पञ्चानामेव तेषां विषयाणां रक्षणायालमेते मत्पुत्रा इति पित्राभिहिताः पाञ्चालाः ॥५९॥ | अजमीढकी नलिनीनाम्नी एक भार्या थी। उसके नील नामक एक पुत्र हुआ ॥५६॥ नीलके शान्ति, शान्तिके सुशान्ति, सुशान्तिके पुरंजय, पुरंजयके ऋक्ष और ऋक्षके हर्यश्व नामक पुत्र हुआ ॥५७-५८॥ हर्यश्वके मुद्गल, सृंजय, बृहदिषु, यवीनर और काम्पिल्य नामक पाँच पुत्र हुए। पिताने कहा था कि मेरे ये पुत्र मेरे आश्रित पाँचों देशोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, इसलिये वे पांचाल कहलाये ॥५९॥ |
| मुद्गलाच्च मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो बभूवुः ॥६०॥ मुद्गलाद्बृहदश्वः ॥६१॥ बृहदश्वादिवोदासोऽहल्या च मिथुनमभूत् ॥६२॥ शरद्वतश्चाहल्यायां शतानन्दोऽभवत् ॥६३॥ शतानन्दात्सत्यधृतिर्धनुर्वेदन्तगो जज्ञे ॥६४॥ सत्यधृतेर्वरप्सरसमूर्वशीं दृष्ट्वा रेतस्कन्नं शरस्तम्बे पपात ॥६५॥ तच्च द्विधागतमपत्यद्वयं कुमारः कन्या चाभवत् ॥६६॥ तौ च मृगयामुपयातश्शान्तनुर्दृष्ट्वा कृपया जग्राह ॥६७॥ ततः कुमारः कृपः कन्या चाश्वत्थाम्नो जननी कृपी द्रोणाचार्यस्य पत्न्यभवत् ॥६८॥ | मुद्गलसे मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई ॥६०॥ मुद्गलसे बृहदश्व और बृहदश्वसे दिवोदास नामक पुत्र एवं अहल्या नामकी एक कन्याका जन्म हुआ ॥६१-६२॥ अहल्यासे महर्षि गौतमके द्वारा शतानन्दका जन्म हुआ ॥६३॥ शतानन्दसे धनुर्वेदका पारदर्शी सत्यधृति उत्पन्न हुआ ॥६४॥ एक बार अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीको देखनेसे सत्यधृतिका वीर्य स्खलित होकर शरस्तम्ब (सरकण्डे)-पर पड़ा ॥६५॥ उससे दो भागोंमें बँट जानेके कारण पुत्र और पुत्रीरूप दो सन्तानें उत्पन्न हुईं ॥६६॥ उन्हें मृगयाके लिये गये हुए राजा शान्तनु कृपावश ले आये ॥६७॥ तदनन्तर पुत्रका नाम कृप हुआ और कन्या अश्वत्थामाकी माता द्रोणाचार्यकी पत्नी कृपी हुई ॥६८॥ |
| दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायुः ॥६९॥ मित्रायोश्च्यवनो नाम राजा ॥७०॥ च्यवनात्सुदासः सुदासात्सौदासरः सौदासात्सहदेवस्तस्यापि सोमकः ॥७१॥ सोमकाज्जन्तुः पुत्रशतज्येष्ठोऽभवत् ॥७२॥ तेषां यवीयान् पृषतः पृषताद्द्रुपदस्तस्माच्च धृष्टद्युम्नस्ततो धृष्टकेतुः ॥७३॥ | दिवोदासका पुत्र मित्रायु हुआ ॥६९॥ मित्रायुका पुत्र च्यवन नामक राजा हुआ, च्यवनका सुदास, सुदासका सौदासर, सौदासका सहदेव, सहदेवका सोमक और सोमकके सौ पुत्र हुए जिनमें जन्तु सबसे बड़ा और पृषत सबसे छोटा था। पृषतका पुत्र द्रुपद, द्रुपदका धृष्टद्युम्न और धृष्टद्युम्नका पुत्र धृष्टकेतु था ॥७०–७३॥ |