विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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२९६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १९
| तस्यापि नामनिर्वचनश्लोकः पठ्यते ॥ १७ ॥<br>मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते ।<br>यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ १८<br>भरद्वाजस्स वितथे पुत्रजन्मनि मरुद्भिर्दत्तस्ततो<br>वितथसंज्ञामवाप ॥ १९ ॥ वितथस्यापि मन्युः<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २० ॥ बृहत्क्षत्रमहावीर्यनरगर्गा<br>अभवन्मन्युपुत्राः ॥ २१ ॥ नरस्य सङ्कृतिस्सङ्कृते-<br>र्गुरुप्रीतिरन्तिदेवौ ॥ २२ ॥ गर्गाच्छिनिः,<br>ततश्च गार्ग्यशैन्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो<br>बभूवुः ॥ २३ ॥ महावीर्याच्च दुरुक्षयो नाम<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २४ ॥ तस्य त्रय्यारुणिः पुष्करिण्यो<br>कपिश्च पुत्रत्रयमभूत् ॥ २५ ॥ तच्च पुत्रत्रितयमपि<br>पश्चाद्विप्रतामुपजगाम ॥ २६ ॥ बृहत्क्षत्रस्य<br>सुहोत्रः ॥ २७ ॥ सुहोत्राद्धस्ती य इदं हस्तिनापुर-<br>मावासयामास ॥ २८ ॥<br>अजमीढद्विजमीढपुरुमीढास्त्रयो हस्तिनस्त-<br>नयाः ॥ २९ ॥ अजमीढात्कण्वः ॥ ३० ॥<br>कण्वान्मेधातिथिः ॥ ३१ ॥ यतः काण्वायना<br>द्विजाः ॥ ३२ ॥ अजमीढस्यान्यः पुत्रो<br>बृहदिषुः ॥ ३३ ॥ बृहदिषोर्बृहद्धनुर्बृहद्धनुषश्च<br>बृहत्कर्मा ततश्च जयद्रथस्तस्मादपि<br>विश्वजित् ॥ ३४ ॥ ततश्च सेनजित् ॥ ३५ ॥<br>रुचिराश्वकाश्यदृढहनुवत्सहनुसंज्ञास्सेनजितः<br>पुत्राः ॥ ३६ ॥ रुचिराश्वपुत्रः पृथुसेनः<br>पृथुसेनात्पारः ॥ ३७ ॥ पारान्नीलः ॥ ३८ ॥<br>तस्यैकशतं पुत्राणाम् ॥ ३९ ॥ तेषां प्रधानः<br>काम्पिल्याधिपतिस्समरः ॥ ४० ॥ समरस्यापि<br>पारसुपारसदश्वास्त्रयः पुत्राः ॥ ४१ ॥ सुपारात्पृथुः<br>पृथोस्सुकृतिस्ततो विभ्राजः ॥ ४२ ॥<br>तस्माच्चाणुहः ॥ ४३ ॥ यश्शुकदुहितरं कीर्तिं<br>नामोपयेमे ॥ ४४ ॥ अणुहाद्ब्रह्मदत्तः ॥ ४५ ॥<br>ततश्च विष्वक्सेनस्तस्मादुदक्सेनः ॥ ४६ ॥<br>भल्लाभस्तस्य चात्मजः ॥ ४७ ॥ | उसके नामकरणके विषयमें भी यह श्लोक कहा<br>जाता है— ॥ १७ ॥<br>“पुत्रोत्पत्तिके अनन्तर बृहस्पतिने ममतासे कहा—<br>‘हे मूढे! यह पुत्र द्वाज (हम दोनोंसे उत्पन्न हुआ)<br>है तू इसका भरण कर।' तब ममताने भी कहा—<br>‘हे बृहस्पते! यह पुत्र द्वाज (हम दोनोंसे उत्पन्न<br>हुआ) है अतः तुम इसका भरण करो।' इस प्रकार<br>परस्पर विवाद करते हुए उसके माता-पिता चले गये,<br>इसलिये उसका नाम 'भरद्वाज' पड़ा”॥ १८॥<br>पुत्र-जन्म वितथ (विफल) होनेपर मरुद्गणने राजा<br>भरतको भरद्वाज दिया था, इसलिये उसका नाम 'वितथ'<br>भी हुआ॥ १९॥ वितथका पुत्र मन्यु हुआ और मन्युके<br>बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और गर्ग आदि कई पुत्र<br>हुए॥ २०-२१॥ नरका पुत्र संकृति और संकृतिके गुरुप्रीति<br>एवं रन्तिदेव नामक दो पुत्र हुए॥ २२॥ गर्गसे शिनिका<br>जन्म हुआ जिससे कि गार्ग्य और शैन्य नामसे विख्यात<br>क्षत्रोपेत ब्राह्मण उत्पन्न हुए॥ २३॥ महावीर्यका पुत्र दुरुक्षय<br>हुआ॥ २४॥ उसके त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य और कपि नामक<br>तीन पुत्र हुए॥ २५॥ ये तीनों पुत्र पीछे ब्राह्मण हो गये<br>थे॥ २६॥ बृहत्क्षत्रका पुत्र सुहोत्र, सुहोत्रका पुत्र हस्ती था<br>जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था॥ २७-२८॥<br>हस्तीके तीन पुत्र अजमीढ, द्विजमीढ और पुरुमीढ<br>थे। अजमीढके कण्व और कण्वके मेधातिथि नामक<br>पुत्र हुआ जिससे कि काण्वायन ब्राह्मण उत्पन्न<br>हुए॥ २९-३२॥ अजमीढका दूसरा पुत्र बृहदिषु था॥ ३३॥<br>बृहदिषुके बृहद्धनु, बृहद्धनुके बृहत्कर्मा, बृहत्कर्मके जयद्रथ,<br>जयद्रथके विश्वजित् तथा विश्वजित्के सेनजित्का जन्म<br>हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काश्य, दृढहनु और वत्सहनु<br>नामक चार पुत्र हुए॥ ३४-३६॥ रुचिराश्वके पृथुसेन,<br>पृथुसेनके पार और पारके नीलका जन्म हुआ। इस<br>नीलके सौ पुत्र थे, जिनमें काम्पिल्यनरेश समर प्रधान<br>था॥ ३७-४०॥ समरके पार, सुपार और सदश्व नामक<br>तीन पुत्र थे॥ ४१॥ सुपारके पृथु, पृथुके सुकृति, सुकृतिके<br>विभ्राज और विभ्राजके अणुह नामक पुत्र हुआ,<br>जिसने शुककन्या कीर्तिसे विवाह किया था॥ ४२-४४॥<br>अणुहसे ब्रह्मदत्तका जन्म हुआ। ब्रह्मदत्तसे विष्वक्सेन,<br>विष्वक्सेनसे उदक्सेन तथा उदक्सेनसे भल्लाभ नामक<br>पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४५-४७॥ |