भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९५

उन्नीसवाँ अध्याय

पुरुवंश

श्रीपराशर उवाच
पुरोर्जनमेजयस्तस्यापि प्रचिन्वान् प्रचिन्वतः प्रवीरः प्रवीरान्मनस्युर्मनस्योश्चाभयदस्तस्यापि सुद्युस्सुद्योर्बहुगतस्तस्यापि संयातिस्संयातेरहंयातिस्ततो रौद्राश्वः ॥ १ ॥

ऋतेषुकक्षेपुस्थण्डिलेषुकृतेषुजलेषुधर्मेषुधृतेषुस्थलेषसन्नतेषुवनेषुनामानो रौद्राश्वस्य दश पुत्रा बभूवुः ॥ २ ॥ ऋतेषोरन्तिनारः पुत्रोऽभूत् ॥ ३ ॥ सुमतिम्प्रतिरथं ध्रुवं चाप्यन्तिनारः पुत्रानवाप ॥ ४ ॥ अप्रतिरथस्य कण्वः पुत्रोऽभूत् ॥ ५ ॥ तस्यापि मेधातिथिः ॥ ६ ॥ यतः काण्वायना द्विजा बभूवुः ॥ ७ ॥ अप्रतिरथस्यापरः पुत्रोऽभूदैलीनः ॥ ८ ॥ ऐलीनस्य दुष्यन्ताद्याश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ दुष्यन्ताच्चक्रवर्ती भरतोऽभूत् ॥ १० ॥ यन्नामहेतुर्देवैश्लोको गीयते ॥ ११ ॥

माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाश्शकुन्तलाम् ॥ १२ ॥

रेतोधाः पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ १३ ॥

भरतस्य पत्नीत्रये नव पुत्रा बभूवुः ॥ १४ ॥ नैते ममानुरूपा इत्यभिहितास्तन्मातरः परित्यागभयात्तत्पुत्रान्जघ्नुः ॥ १५ ॥ ततोऽस्य वितथे पुत्रजन्मनि पुत्रार्थिनो मरुत्सोमयाजिनो दीर्घतमसः पाष्ण्र्यपास्ताद्बृहस्पतिवीर्यादुतथ्यपत्यां ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजाख्यः पुत्रो मरुद्भिर्दत्तः ॥ १६ ॥


श्रीपराशरजी बोले— पुरूका पुत्र जनमेजय था। जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्का प्रवीर, प्रवीरका मनस्यु, मनस्युका अभयद, अभयदका सुद्यु, सुद्युका बहुगत, बहुगतका संयाति, संयातिक अहंयाति तथा अहंयातिका पुत्र रौद्राश्व था॥ १॥

रौद्राश्वके ऋतेषु, कक्षेपु, स्थण्डिलेषु, कृतेषु, जलेषु, धर्मेषु, धृतेषु, स्थलेषु, सन्नतेषु और वनेषु नामक दस पुत्र थे॥ २॥ ऋतेषुका पुत्र अन्तिनार हुआ तथा अन्तिनारके सुमति, अप्रतिरथ और ध्रुव नामक तीन पुत्रोंने जन्म लिया॥ ३-४॥ इनमेंसे अप्रतिरथका पुत्र कण्व और कण्वका मेधातिथि हुआ जिसकी सन्तान काण्वायन ब्राह्मण हुए॥ ५-७॥ अप्रतिरथका दूसरा पुत्र ऐलीन था॥ ८॥ इस ऐलीनके दुष्यन्त आदि चार पुत्र हुए॥ ९॥ दुष्यन्तके यहाँ चक्रवर्ती सम्राट् भरतका जन्म हुआ जिसके नामके विषयमें देवगणने इस श्लोकका गान किया था— ॥ १०-११॥

"माता तो केवल चमड़ेकी धौंकनीके समान है, पुत्रपर अधिकार तो पिताका ही है, पुत्र जिसके द्वारा जन्म ग्रहण करता है उसीका स्वरूप होता है। हे दुष्यन्त ! तू इस पुत्रका पालन-पोषण कर, शकुन्तलाका अपमान न कर। हे नरदेव ! अपने ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र अपने पिताको यमलोकसे [उद्धार कर स्वर्गलोकको] ले जाता है। 'इस पुत्रके आधान करनेवाले तुम्हीं हो'— शकुन्तलाने यह बात ठीक ही कही है'॥ १२-१३॥

भरतके तीन स्त्रियाँ थीं जिनसे उनके नौ पुत्र हुए॥ १४॥ भरतके यह कहनेपर कि 'ये मेरे अनुरूप नहीं हैं', उनकी माताओंने इस भयसे कि राजा हमको त्याग न दें, उन पुत्रोंको मार डाला॥ १५॥ इस प्रकार पुत्र-जन्मके विफल हो जानेसे भरतने पुत्रकी कामनासे मरुत्सोम नामक यज्ञ किया। उस यज्ञके अन्तमें मरुद्गणने उन्हें भरद्वाज नामक एक बालक पुत्ररूपसे दिया जो उतथ्यपत्नी ममताके गर्भमें स्थित दीर्घतमा मुनिके पाद-प्रहारसे स्खलित हुए बृहस्पतिजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था॥ १६॥