भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० १९ ] * चतुर्थ अंश * २९७


संस्कृतहिन्दी
द्विजमीढस्य तु यवीनरसंज्ञः पुत्रः ॥४८॥ तस्यापि धृतिमांस्तस्माच्च सत्यधृतिस्ततश्च दृढनेमिस्तस्माच्च सुपाश्र्वस्ततस्सुमतिस्ततश्च सन्नतिमान् ॥४९॥ सन्नतिमन्तः कृतः पुत्रोऽभूत् ॥५०॥ यं हिरण्यनाभो योगमध्यापयामास ॥५१॥ यश्चतुर्विंशतिं प्राच्यसामगानां संहिताश्चकार ॥५२॥ कृताच्चोग्रायुधः ॥५३॥ येन प्राचुर्येण नीपक्षयः कृतः ॥५४॥ उग्रायुधात्क्षेम्यः क्षेम्यात्सुधीरस्तस्मादरिपुञ्जयस्तस्माच्च बहुरथ इत्येते पौरवाः ॥५५॥द्विजमीढका पुत्र यवीनर था ॥४८॥ उसका धृतिमान्, धृतिमान्‌का सत्यधृति, सत्यधृतिका दृढनेमि, दृढनेमिका सुपाश्र्व, सुपाश्र्वका सुमति, सुमतिका सन्नतिमान् तथा सन्नतिमान्‌का पुत्र कृत हुआ जिसे हिरण्यनाभने योगविद्याकी शिक्षा दी थी तथा जिसने प्राच्य सामग श्रुतियोंकी चौबीस संहिताएँ रची थीं ॥४९–५२॥ कृतका पुत्र उग्रायुध था जिसने अनेकों नीपवंशीय क्षत्रियोंका नाश किया ॥५३-५४॥ उग्रायुधके क्षेम्य, क्षेम्यके सुधीर, सुधीरके रिपुंजय और रिपुंजयसे बहुरथने जन्म लिया। ये सब पुरुवंशीय राजागण हुए ॥५५॥
अजमीढस्य नलिनी नाम पत्नी तस्या नीलसंज्ञः पुत्रोऽभवत् ॥५६॥ तस्मादपि शान्तिः शान्तेस्सुशान्तिस्सुशान्तेः पुरञ्जयस्तस्माच्च ऋक्षः ॥५७॥ ततश्च हर्यश्वः ॥५८॥ तस्मान्मुद्गलसृञ्जयबृहदिषुयवीनरकाम्पिल्यसंज्ञाः पञ्चानामेव तेषां विषयाणां रक्षणायालमेते मत्पुत्रा इति पित्राभिहिताः पाञ्चालाः ॥५९॥अजमीढकी नलिनीनाम्नी एक भार्या थी। उसके नील नामक एक पुत्र हुआ ॥५६॥ नीलके शान्ति, शान्तिके सुशान्ति, सुशान्तिके पुरंजय, पुरंजयके ऋक्ष और ऋक्षके हर्यश्व नामक पुत्र हुआ ॥५७-५८॥ हर्यश्वके मुद्गल, सृंजय, बृहदिषु, यवीनर और काम्पिल्य नामक पाँच पुत्र हुए। पिताने कहा था कि मेरे ये पुत्र मेरे आश्रित पाँचों देशोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, इसलिये वे पांचाल कहलाये ॥५९॥
मुद्गलाच्च मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो बभूवुः ॥६०॥ मुद्गलाद्बृहदश्वः ॥६१॥ बृहदश्वादिवोदासोऽहल्या च मिथुनमभूत् ॥६२॥ शरद्वतश्चाहल्यायां शतानन्दोऽभवत् ॥६३॥ शतानन्दात्सत्यधृतिर्धनुर्वेदन्तगो जज्ञे ॥६४॥ सत्यधृतेर्वरप्सरसमूर्वशीं दृष्ट्वा रेतस्कन्नं शरस्तम्बे पपात ॥६५॥ तच्च द्विधागतमपत्यद्वयं कुमारः कन्या चाभवत् ॥६६॥ तौ च मृगयामुपयातश्शान्तनुर्दृष्ट्वा कृपया जग्राह ॥६७॥ ततः कुमारः कृपः कन्या चाश्वत्थाम्नो जननी कृपी द्रोणाचार्यस्य पत्न्यभवत् ॥६८॥मुद्गलसे मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई ॥६०॥ मुद्गलसे बृहदश्व और बृहदश्वसे दिवोदास नामक पुत्र एवं अहल्या नामकी एक कन्याका जन्म हुआ ॥६१-६२॥ अहल्यासे महर्षि गौतमके द्वारा शतानन्दका जन्म हुआ ॥६३॥ शतानन्दसे धनुर्वेदका पारदर्शी सत्यधृति उत्पन्न हुआ ॥६४॥ एक बार अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीको देखनेसे सत्यधृतिका वीर्य स्खलित होकर शरस्तम्ब (सरकण्डे)-पर पड़ा ॥६५॥ उससे दो भागोंमें बँट जानेके कारण पुत्र और पुत्रीरूप दो सन्तानें उत्पन्न हुईं ॥६६॥ उन्हें मृगयाके लिये गये हुए राजा शान्तनु कृपावश ले आये ॥६७॥ तदनन्तर पुत्रका नाम कृप हुआ और कन्या अश्वत्थामाकी माता द्रोणाचार्यकी पत्नी कृपी हुई ॥६८॥
दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायुः ॥६९॥ मित्रायोश्च्यवनो नाम राजा ॥७०॥ च्यवनात्सुदासः सुदासात्सौदासरः सौदासात्सहदेवस्तस्यापि सोमकः ॥७१॥ सोमकाज्जन्तुः पुत्रशतज्येष्ठोऽभवत् ॥७२॥ तेषां यवीयान् पृषतः पृषताद्द्रुपदस्तस्माच्च धृष्टद्युम्नस्ततो धृष्टकेतुः ॥७३॥दिवोदासका पुत्र मित्रायु हुआ ॥६९॥ मित्रायुका पुत्र च्यवन नामक राजा हुआ, च्यवनका सुदास, सुदासका सौदासर, सौदासका सहदेव, सहदेवका सोमक और सोमकके सौ पुत्र हुए जिनमें जन्तु सबसे बड़ा और पृषत सबसे छोटा था। पृषतका पुत्र द्रुपद, द्रुपदका धृष्टद्युम्न और धृष्टद्युम्नका पुत्र धृष्टकेतु था ॥७०–७३॥
२९८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० २०

| अजमीढस्यान्य ऋक्षनामा पुत्रोऽभवत् ॥ ७४ ॥ तस्य संवरणः ॥ ७५ ॥ संवरणात्कुरुः ॥ ७६ ॥ य इदं धर्मक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं चकार ॥ ७७ ॥ सुधनुर्जह्नुपरीक्षित्प्रमुखाः कुरोः पुत्रा बभूवुः ॥ ७८ ॥ सुधनुषः पुत्रस्सुहोत्रस्तस्माच्च्यवनश्च्यवनात् कृतकः ॥ ७९ ॥ ततश्चोपरिचरो वसुः ॥ ८० ॥ बृहद्रथप्रत्यग्रकुशाम्बुकुचेल्मात्स्यप्रमुखा वसोः पुत्रास्सप्ताजायन्त ॥ ८१ ॥ बृहद्रथात्कुशाग्रः कुशाग्राद्वृषभो वृषभात् पुष्पवान् तस्मात्सत्यहितस्तस्मात्सुधन्वा तस्य च जतुः ॥ ८२ ॥ बृहद्रथाच्चान्यश्शकलद्वयजन्मा जरया संहितो जरासन्धनामा ॥ ८३ ॥ तस्मात्सहदेवस्सहदेवात्सोमपस्ततश्च श्रुतश्रवाः ॥ ८४ ॥ इत्येते मया मागधा भूपालाः कथिताः ॥ ८५ ॥ | अजमीढका ऋक्ष नामक एक पुत्र और था ॥ ७४ ॥ उसका पुत्र संवरण हुआ तथा संवरणका पुत्र कुरु था जिसने कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रकी स्थापना की ॥ ७५-७७ ॥ कुरुके पुत्र सुधनु, जह्नु और परीक्षित् आदि हुए ॥ ७८ ॥ सुधनुका पुत्र सुहोत्र था, सुहोत्रका च्यवन, च्यवनका कृतक और कृतकका पुत्र उपरिचर वसु हुआ ॥ ७९-८० ॥ वसुके बृहद्रथ, प्रत्यग्र, कुशाम्बु, कुचेल और मात्स्य आदि सात पुत्र थे ॥ ८१ ॥ इनमेंसे बृहद्रथके कुशाग्र, कुशाग्रके वृषभ, वृषभके पुष्पवान्, पुष्पवान्के सत्यहित, सत्यहितके सुधन्वा और सुधन्वाके जतुका जन्म हुआ ॥ ८२ ॥ बृहद्रथके दो खण्डोंमें विभक्त एक पुत्र और हुआ था जो कि जराके द्वारा जोड़ दिये जानेपर जरासन्ध कहलाया ॥ ८३ ॥ उससे सहदेवका जन्म हुआ तथा सहदेवसे सोमप और सोमपसे श्रुतिश्रवाकी उत्पत्ति हुई ॥ ८४ ॥ इस प्रकार मैंने तुमसे यह मागध भूपालोंका वर्णन कर दिया है ॥ ८५ ॥ |

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेंऽशे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥


बीसवाँ अध्याय

कुरुके वंशका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—[कुरुपुत्र] परीक्षित्के
परीक्षितो जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्राः ॥ १ ॥ जह्नोस्तु सुरथो नामात्मजो बभूव ॥ २ ॥ तस्यापि विदूरथः ॥ ३ ॥ तस्मात्सार्वभौमस्सार्वभौमाज्जयसेनस्तस्मादाराधितस्ततश्चायुतायुरयुतायोरक्रोधनः ॥ ४ ॥ तस्माद्देवातिथिः ॥ ५ ॥ ततश्च ऋक्षोऽन्योऽभवत् ॥ ६ ॥ ऋक्षाद्भीमसेनस्ततश्च दिलीपः ॥ ७ ॥ दिलीपात् प्रतीपः ॥ ८ ॥जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र हुए, तथा जह्नुके सुरथ नामक एक पुत्र हुआ ॥ १-२ ॥ सुरथके विदूरथका जन्म हुआ। विदूरथके सार्वभौम, सार्वभौमके जयसेन, जयसेनके आराधित, आराधितके अयुतायु, अयुतायुके अक्रोधन, अक्रोधनके देवातिथि तथा देवातिथिके [अजमीढके पुत्र ऋक्षसे भिन्न] दूसरे ऋक्षका जन्म हुआ ॥ ३-६ ॥ ऋक्षसे भीमसेन, भीमसेनसे दिलीप और दिलीपसे प्रतीप नामक पुत्र हुआ ॥ ७-८ ॥
तस्यापि देवापिशान्तनुबाहीकसंज्ञास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ॥ ९ ॥ देवापिर्बाल एवारण्यं विवेश ॥ १० ॥ शान्तनुस्तु महीपालोऽभूत् ॥ ११ ॥ अयं च तस्य श्लोकः पृथिव्यां गीयते ॥ १२ ॥प्रतीपके देवापि, शान्तनु और बाह्लीक नामक तीन पुत्र हुए ॥ ९ ॥ इनमेंसे देवापि बाल्यावस्थामें ही वनमें चला गया था अतः शान्तनु ही राजा हुआ ॥ १०-११ ॥ उसके विषयमें पृथिवीतलपर यह श्लोक कहा जाता है— ॥ १२ ॥

अ० २० ] * चतुर्थ अंश * २९९


यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं यौवनमेति सः।<br>शान्तिं चाप्नोति येनाग्र्यां कर्मणा तेन शान्तनुः ॥ १३  ''[राजा शान्तनु] जिसको-जिसको अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे वे वृद्ध पुरुष भी युवावस्था प्राप्त कर लेते थे तथा उनके स्पर्शसे सम्पूर्ण जीव अत्युत्तम शान्तिलाभ करते थे, इसलिये वे शान्तनु कहलाते थे'' ॥ १३ ॥
  तस्य च शान्तनो राष्ट्रे द्वादशवर्षाणि देवो न ववर्ष ॥ १४ ॥ ततश्चाशेषराष्ट्रविनाशमवेक्ष्यासौ राजा ब्राह्मणानपृच्छत् कस्मादस्माकं राष्ट्रे देवो न वर्षति को ममापराध इति ॥ १५ ॥  एक बार महाराज शान्तनुके राज्यमें बारह वर्षतक वर्षा न हुई ॥ १४ ॥ उस समय सम्पूर्ण देशको नष्ट होता देखकर राजाने ब्राह्मणोंसे पूछा—'हमारे राज्यमें वर्षा क्यों नहीं हुई? इसमें मेरा क्या अपराध है?' ॥ १५ ॥
  ततश्च तमूचुर्ब्राह्मणाः ॥ १६ ॥ अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया सम्भुज्यते अतः परिवेत्ता त्वमित्युक्तस्स राजा पुनस्तानपृच्छत् ॥ १७ ॥ किं मयात्र विधेयमिति ॥ १८ ॥  तब ब्राह्मणोंने उससे कहा—'यह राज्य तुम्हारे बड़े भाईका है किन्तु इसे तुम भोग रहे हो; इसलिये तुम परिवेत्ता हो।' उनके ऐसा कहनेपर राजा शान्तनुने उनसे फिर पूछा—'तो इस सम्बन्धमें मुझे अब क्या करना चाहिये?' ॥ १६—१८ ॥
  ततस्ते पुनरप्यूचुः ॥ १९ ॥ यावद्देवापिर्न पतनादिभिर्दोषैरभिभूयते तावदेतत्तस्यार्हं राज्यम् ॥ २० ॥ तदलमेतेन तु तस्मै दीयतामित्युक्ते तस्य मन्त्रिप्रवरेणाश्मसारिणा तत्रारण्ये तपस्विनो वेदवादविरोधवक्तारः प्रयुक्ताः ॥ २१ ॥ तैरस्याप्यतिऋजुमतेर्महीपतिपुत्रस्य बुद्धिर्र्वेदवादविरोधमार्गानुसारिण्यक्रियत् ॥ २२ ॥ राजा च शान्तनुर्द्विजवचनोत्पन्नपरिदेवनशोकस्तान् ब्राह्मणानग्रतः कृत्वाग्रजस्य प्रदानायारण्यं जगाम ॥ २३ ॥  इसपर वे ब्राह्मण फिर बोले—'जबतक तुम्हारा बड़ा भाई देवापि किसी प्रकार पतित न हो तबतक यह राज्य उसीके योग्य है ॥ १९-२० ॥ अतः तुम इसे उसीको दे डालो, तुम्हारा इससे कोई प्रयोजन नहीं।' ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर शान्तनुके मन्त्री अश्मसारिने वेदवादके विरुद्ध बोलनेवाले तपस्वियोंको वनमें नियुक्त किया ॥ २१ ॥ उन्होंने अतिशय सरलमति राजकुमार देवापिकी बुद्धिको वेदवादके विरुद्ध मार्गमें प्रवृत्त कर दिया ॥ २२ ॥ उधर राजा शान्तनु ब्राह्मणोंके कथनानुसार दुःख और शोकयुक्त होकर ब्राह्मणोंको आगे कर अपने बड़े भाईको राज्य देनेके लिये वनमें गये ॥ २३ ॥
  तदाश्रममुपगताश्च तमवनतमवनीपतिपुत्रं देवापिमुपतस्थुः ॥ २४ ॥ ते ब्राह्मणा वेदवादानुबन्धीनि वचांसि राज्यमग्रजेन कर्तव्यमित्यर्थवन्ति तमूचुः ॥ २५ ॥ असावपि देवापिर्वेदवादविरोधयुक्तिदूषितमनेकप्रकारं तानाह ॥ २६ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाश्शान्तनुमूचुः ॥ २७ ॥ आगच्छ हे राजन्नलमत्रातिनिर्बन्धेन प्रशान्त एवासावनावृष्टिदोषः पतितोऽयमनादिकालमहितवेदवचनदूषणोच्चारणात् ॥ २८ ॥ पतिते चाग्रजे नैव ते परिवेतृत्वं भवतीत्युक्तश्शान्तनुःस्वपुरमागम्य राज्यमकरोत् ॥ २९ ॥ वेदवादविरोधवचनोच्चारणदूषिते च तस्मिन्देवापौ तिष्ठत्यपि ज्येष्ठभ्रातर्यखिलसस्यनिष्पत्तये ववर्ष भगवान्पर्जन्यः ॥ ३० ॥  वनमें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणगण परम विनीत राजकुमार देवापिके आश्रमपर उपस्थित हुए; और उससे 'ज्येष्ठ भ्राताको ही राज्य करना चाहिये'—इस अर्थके समर्थक अनेक वेदानुकूल वाक्य कहने लगे ॥ २४-२५ ॥ किन्तु उस समय देवापिने वेदवादके विरुद्ध नाना प्रकारकी युक्तियोंसे दूषित बातें कीं ॥ २६ ॥ तब उन ब्राह्मणोंने शान्तनुसे कहा— ॥ २७ ॥ "हे राजन् ! चलो, अब यहाँ अधिक आग्रह करनेकी आवश्यकता नहीं। अब अनावृष्टिका दोष शान्त हो गया। अनादिकालसे पूजित वेदवाक्योंमें दोष बतलानेके कारण देवापि पतित हो गया है ॥ २८ ॥ ज्येष्ठ भ्राताके पतित हो जानेसे अब तुम परिवेत्ता नहीं रहे।" उनके ऐसा कहनेपर शान्तनु अपनी राजधानीको चले आये और राज्यशासन करने लगे ॥ २९ ॥ वेदवादके विरुद्ध वचन बोलनेके कारण देवापिके पतित हो जानेसे, बड़े भाईके रहते हुए भी सम्पूर्ण धान्योंकी उत्पत्तिके लिये पर्जन्यदेव (मेघ) बरसने लगे ॥ ३० ॥

३०० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०

बाह्लीकात्सोमदत्तः पुत्रोऽभूत् ॥ ३१ ॥बाह्लीकके सोमदत्त नामक पुत्र हुआ तथा सोमदत्तके
सोमदत्तस्यापि भूरिभूरिश्रवःशल्यसंज्ञास्त्रयः पुत्राभूरि, भूरिश्रवा और शल्य नामक तीन पुत्र
बभूवुः ॥ ३२ ॥ शान्तनोरप्यमरनद्यां जाह्नव्या-हुए ॥ ३१-३२ ॥ शान्तनुके गंगाजीसे अतिशय कीर्तिमान्
मुदारकीर्तिरशेषशास्त्रार्थविद्भीष्मः पुत्रो-तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंका जाननेवाला भीष्म नामक पुत्र
ऽभूत् ॥ ३३ ॥ सत्यवत्यां च चित्राङ्गदविचित्रवीर्यौहुआ ॥ ३३ ॥ शान्तनुने सत्यवतीसे चित्रांगद और विचित्रवीर्य
द्वौ पुत्रावुत्पादयामास शान्तनुः ॥ ३४ ॥नामक दो पुत्र और भी उत्पन्न किये ॥ ३४ ॥ उनमेंसे
चित्राङ्गदस्तु बाल एव चित्राङ्गदेनैव गन्धर्वेणाहवेचित्रांगदको तो बाल्यावस्थामें ही चित्रांगद नामक गन्धर्वने
निहतः ॥ ३५ ॥ विचित्रवीर्योऽपि काशिराजतनयेयुद्धमें मार डाला ॥ ३५ ॥ विचित्रवीर्यने काशिराजकी
पुत्रिका-धर्मानुसार बभ्रुवाहन नामक एक पुत्र उत्पन्न
अम्बिकाम्बालिके उपयेमे ॥ ३६ ॥ तदुपभोगाति-पुत्री अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया ॥ ३६ ॥
खेदाच्च यक्ष्मणा गृहीतः स पञ्चत्वम-उनमें अत्यन्त भोगासक्त रहनेके कारण अतिशय खिन्न
गमत् ॥ ३७ ॥ सत्यवतीनियोगाच्च मत्पुत्रः कृष्ण-रहनेसे वह यक्ष्माके वशीभूत होकर [अकालहीमें] मर
द्वैपायनो मातृवचनमनतिक्रमणीयमिति कृत्वागया ॥ ३७ ॥ तदनन्तर मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनने सत्यवतीके
विचित्रवीर्यक्षेत्रे धृतराष्ट्रपाण्डू तत्प्रहित-नियुक्त करनेसे माताका वचन टालना उचित न जान
भुजिष्यायां विदुरं चोत्पादयामास ॥ ३८ ॥विचित्रवीर्यकी पत्नियोंसे धृतराष्ट्र और पाण्डु नामक दो
पुत्र उत्पन्न किये और उनकी भेजी हुई दासीसे विदुर
नामक एक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३८ ॥
धृतराष्ट्रोऽपि गान्धार्या दुर्योधनदुःशासनप्रधानंधृतराष्ट्रने भी गान्धारीसे दुर्योधन और दुःशासन
पुत्रशतमूत्पादयामास ॥ ३९ ॥ पाण्डोरप्यरrootण्येआदि सौ पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३९ ॥ पाण्डु वनमें
मृगयायामृषि शापोपहतप्रजाजननसामर्थ्यस्य धर्म-आखेट करते समय ऋषिके शापसे सन्तानोत्पादनमें
वायुशक्रैर्य्युधिष्ठिरभीमसेनार्जुनाः कुन्त्यांअसमर्थ हो गये थे अतः उनकी स्त्री कुन्तीसे धर्म,
नकुलसहदेवौ चाश्विभ्यां माद्र्यां पञ्चपुत्रा-वायु और इन्द्रने क्रमशः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
स्समुत्पादिताः ॥ ४० ॥ तेषां च द्रौपद्यां पञ्चैवनामक तीन पुत्र तथा माद्रीसे दोनों अश्विनीकुमारोंने
पुत्रा बभूवुः ॥ ४१ ॥ युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्यःनकुल और सहदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। इस
प्रकार उनके पाँच पुत्र हुए ॥ ४० ॥ उन पाँचोंके द्रौपदीसे
पाँच ही पुत्र हुए ॥ ४१ ॥ उनमेंसे युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य,भीमसेनाच्छुतसेनः श्रुतकीर्तिरर्जुनाच्छुतानीको
भीमसेनसे श्रुतसेन, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे श्रुतानीकनकुलाच्छ्रतकर्म सहदेवात् ॥ ४२ ॥
तथा सहदेवसे श्रुतकर्मका जन्म हुआ था ॥ ४२ ॥
अन्ये च पाण्डवानामात्मजास्तद्यथा ॥ ४३ ॥इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके और भी कई पुत्र
यौधेयी युधिष्ठिराद्देवकं पुत्रमवाप ॥ ४४ ॥हुए ॥ ४३ ॥ जैसे-युधिष्ठिरसे यौधेयीके देवक नामक
हिडिम्बा घटोत्कचं भीमसेनात्पुत्रं लेभे ॥ ४५ ॥पुत्र हुआ, भीमसेनसे हिडिम्बाके घटोत्कच और काशीसे
काशी च भीमसेनादेव सर्वगं सुतमवाप ॥ ४६ ॥सर्वग नामक पुत्र हुआ, सहदेवसे विजयाके सुहोत्रका
सहदेवाच्च विजया सुहोत्रं पुत्रमवाप ॥ ४७ ॥जन्म हुआ, नकुलने रेणुमतीसे निरमित्रको उत्पन्न
रेणुमत्यां च नकुलोऽपि निरमित्रमजीजनत् ॥ ४८ ॥किया ॥ ४४-४८ ॥ अर्जुनके नागकन्या उलूपीसे इरावान्
अर्जुनस्याप्युलूप्यां नागकन्यायामिरावान्नामनामक पुत्र हुआ ॥ ४९ ॥ मणिपुर नरेशकी पुत्रीसे अर्जुनने
पुत्रोऽभवत् ॥ ४९ ॥ मणिपुरपतिपुत्र्यां पुत्रिका-पुत्रिका-धर्मानुसार बभ्रुवाहन नामक एक पुत्र उत्पन्न
धर्मेण बभ्रुवाहनं नाम पुत्रमर्जुनोऽजनयत् ॥ ५० ॥किया ॥ ५० ॥ तथा उसके सुभद्रासे अभिमन्युका जन्म
सुभद्रायां चार्भकत्वेऽपि योऽसावतिबलपराक्रम-हुआ जो कि बाल्यावस्थामें ही बड़ा बल-पराक्रम-
स्समस्तारातिरयजेता सोऽभिमन्युरजायत ॥ ५१ ॥सम्पन्न तथा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतनेवाला था ॥ ५१ ॥

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अ० २१ ] * चतुर्थ अंश * ३०१


अभिमन्योरुत्तरायां परिक्षीणेषु कुरुष्वश्वत्थाम-प्रयुक्तब्रह्मास्त्रेण गर्भ एव भस्मीकृतो भगवत-स्सकलसुरासुरवन्दितचरणयुगलस्यात्मेच्छया कारणमानुषरूपधारिणोऽनुभावात्पुनर्जीवित-मवाप्य परीक्षित्सञ्जज्ञे॥ ५२॥ योऽयं साम्प्रतमेत-द्भूखण्डलमखण्डितायतिधर्मेण पालयतीति॥ ५३॥तदनन्तर कुरुकुलके क्षीण हो जानेपर जो अश्वत्थामाके प्रहार किये हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा गर्भमें ही भस्मीभूत हो चुका था किन्तु फिर, जिन्होंने अपनी इच्छासे ही माया-मानव-देह धारण किया है उन सकल सुरासुरवन्दितचरणारविन्द श्रीकृष्णचन्द्रके प्रभावसे पुनः जीवित हो गया; उस परीक्षित्‌ने अभिमन्युके द्वारा उत्तराके गर्भसे जन्म लिया जो कि इस समय इस प्रकार धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डलका शासन कर रहा है कि जिससे भविष्यमें भी उसकी सम्पत्ति क्षीण न हो॥ ५२-५३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे विंशोऽध्यायः॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
अतः परं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि॥ १॥अब मैं भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन करता हूँ॥ १॥
योऽयं साम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्चत्वारः पुत्रा भविष्यन्ति॥ २॥इस समय जो परीक्षित् नामक महाराज हैं इनके जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन नामक चार पुत्र होंगे॥ २॥
जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति॥ ३॥जनमेजयका पुत्र शतानीक होगा
योऽसौ याज्ञवल्क्याद्वेदमधीत्य कृपादस्त्राण्यवाप्य विषमविषयविरक्तचित्त-वृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्मज्ञानप्रवीणः परं निर्वाण-मवाप्स्यति॥ ४॥जो याज्ञवल्क्यसे वेदाध्ययनकर, कृपासे शस्त्रविद्या प्राप्तकर विषम विषयोंसे विरक्तचित्त हो महर्षि शौनकके उपदेशसे आत्मज्ञानमें निपुण होकर परवनिर्वाण-पद प्राप्त करेगा॥ ३-४॥
शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता॥ ५॥शतानीकका पुत्र अश्वमेधदत्त होगा॥ ५॥
तस्मादप्यधिसीमकृष्णः॥ ६॥उसके अधिसीमकृष्ण
अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः॥ ७॥तथा अधिसीमकृष्णके निचक्षु नामक पुत्र होगा
यो गङ्गायापहृते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति॥ ८॥जो कि गङ्गाजीद्वारा हस्तिनापुरके बहा ले जानेपर कौशाम्बीपुरीमें निवास करेगा॥ ६-८॥
तस्याप्युष्णः पुत्रो भविता॥ ९॥निचक्षुका पुत्र उष्ण होगा,
उष्णाद्विचित्ररथः॥ १०॥उष्णका विचित्ररथ,
ततः शुचिरथः॥ ११॥विचित्ररथका शुचिरथ,
तस्माद्वृष्णिमांस्ततस्सुषेणस्तस्यापि सुनीथ-स्सुनीथान्नृपचक्षुस्तस्मादपि सुखावलस्तस्य च पारिप्लवस्ततश्च सुनयस्तस्यापि मेधावी ॥ १२॥शुचिरथका वृष्णिमान्, वृष्णिमान्‌का सुषेण, सुषेणका सुनीथ, सुनीथका नृप, नृपका चक्षु, चक्षुका सुखावल, सुखावलका पारिप्लव, पारिप्लवका सुनय, सुनयका मेधावी,
मेधाविनो रिपुञ्जयस्ततो मृदुस्तस्माच्च तिग्मस्तस्माद्बृहद्रथो बृहद्रथाद्वसुदानः॥ १३॥मेधावीका रिपुंजय, रिपुंजयका मृदु, मृदुका तिग्म, तिग्मका बृहद्रथ, बृहद्रथका वसुदान,
ततोऽपरश्शतानीकः॥ १४॥ तस्माच्चोदयनवसुदानका दूसरा शतानीक, शतानीकका उदयन,

३०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२


उदयनादहीनरस्ततश्च दण्डपाणिस्ततो निरमित्रः ॥ १५ ॥ तस्माच्च क्षेमकः ॥ १६ ॥उदयनका अहीनर, अहीनरका दण्डपाणि, दण्डपाणिका निरमित्र तथा निरमित्रका पुत्र क्षेमक होगा। इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १५–१७ ॥
अत्रायं श्लोकः ॥ १७ ॥
ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो राजर्षिसत्कृतः ।<br>क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यते कलौ ॥ १८ ॥‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका कारणरूप तथा नाना राजर्षियोंसे सभाजित है वह कलियुगमें राजा क्षेमकके उत्पन्न होनेपर समाप्त हो जायगा’ ॥ १८ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥


बाईसवाँ अध्याय

भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः पार्थिवाः कथ्यन्ते ॥ १ ॥अब मैं भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥
बृहद्वलस्य पुत्रो बृहत्क्षणः ॥ २ ॥बृहद्वलका पुत्र बृहत्क्षण होगा, उसका उरुक्षय,
तस्मादुरुक्षयस्तस्माच्च वत्सव्यूहस्ततश्च प्रतिव्योमस्तस्मादपि दिवाकरः ॥ ३ ॥उरुक्षयका वत्सव्यूह, वत्सव्यूहका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका दिवाकर, दिवाकरका सहदेव,
तस्मात्सहदेवः सहदेवाद्बृहदश्वस्तत्सूनुर्भानुरथस्तस्य च प्रतीताश्वस्तस्यापि सुप्रतीकस्ततश्च मरुदेवस्ततः सुनक्षत्रस्तस्मात्किन्नरः ॥ ४ ॥सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्वका भानुरथ, भानुरथका प्रतीताश्व, प्रतीताश्वका सुप्रतीक, सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका किन्नर, किन्नरका अन्तरिक्ष,
किन्नरादन्तरिक्षस्तस्मात्सुपर्णस्ततश्चामित्रजित् ॥ ५ ॥अन्तरिक्षका सुपर्ण, सुपर्णका अमित्रजित्, अमित्रजित्का बृहद्राज,
ततश्च बृहद्राजस्तस्यापि धर्मी धर्मिणः कृतञ्जयः ॥ ६ ॥बृहद्राजका धर्मी, धर्मीका कृतंजय, कृतंजयका रणंजय,
कृतञ्जयाद्रणञ्जयः ॥ ७ ॥रणंजयका संजय, संजयका शाक्य,
रणञ्जयात्सञ्जयस्तस्माच्छाक्यश्शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद्राहुलस्ततः प्रसेनजित् ॥ ८ ॥शाक्यका शुद्धोदन, शुद्धोदनका राहुल, राहुलका प्रसेनजित्, प्रसेनजित्का क्षुद्रक,
ततश्च क्षुद्रकस्ततश्च कुण्डकस्तस्मादपि सुरथः ॥ ९ ॥क्षुद्रकका कुण्डक, कुण्डकका सुरथ और सुरथका सुमित्र नामक पुत्र होगा।
तत्पुत्रश्च सुमित्रः ॥ १० ॥
इत्येते चेक्ष्वाकवो बृहद्वलान्वयाः ॥ ११ ॥ये सब इक्ष्वाकुके वंशमें बृहद्वलकी सन्तान होंगे ॥ २–११ ॥
अत्रानुवंशश्लोकः ॥ १२ ॥इस वंशके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ १२ ॥
इक्ष्वाकूणामयं वंशस्सुमित्रान्तो भविष्यति ।<br>यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥ १३ ॥‘यह इक्ष्वाकुवंश राजा सुमित्रतक रहेगा, क्योंकि कलियुगमें राजा सुमित्रके होनेपर फिर यह समाप्त हो जायगा’ ॥ १३ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥


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अ० २३, २४ ] * चतुर्थ अंश * ३०३


तेईसवाँ अध्याय

मगधवंशका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
मागधानां बार्हद्रथानां भाविनामनुक्रमं कथयिष्यामि ॥ १ ॥ अत्र हि वंशे महाबलपराक्रमा जरासन्धप्रधाना बभूवुः ॥ २ ॥अब मैं मगधदेशीय बृहद्रथकी भावी सन्तानका अनुक्रमसे वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ इस वंशमें महाबलवान् और पराक्रमी जरासन्ध आदि राजागण प्रधान थे ॥ २ ॥
जरासन्धस्य पुत्रः सहदेवः ॥ ३ ॥ सहदेवात्सोमापिस्तस्य श्रुतश्रवास्तस्याप्ययुतायुस्ततश्च निरमित्रस्तत्तनयस्सुनेत्रस्तस्मादपि बृहत्कर्मा ॥ ४ ॥ ततश्च सेनजित्ततश्च श्रुतञ्जयस्ततो विप्रस्तस्य च पुत्रश्शुचिनामा भविष्यति ॥ ५ ॥ तस्यापि क्षेम्यस्ततश्च सुव्रतस्सुव्रताद्धर्म्मस्ततस्सुश्रवाः ॥ ६ ॥ ततो दृढसेनः ॥ ७ ॥ तस्मात्सुबलः ॥ ८ ॥ सुबलात्सुनीतो भविता ॥ ९ ॥ ततस्सत्यजित् ॥ १० ॥ तस्माद्विश्वजित् ॥ ११ ॥ तस्यापि रिपुञ्जयः ॥ १२ ॥ इत्येते बार्हद्रथा भूपतयो वर्षसहस्रमेकं भविष्यन्ति ॥ १३ ॥जरासन्धका पुत्र सहदेव है ॥ ३ ॥ सहदेवके सोमापि नामक पुत्र होगा, सोमापिके श्रुतश्रवा, श्रुतश्रवाके अयुतायु, अयुतायुके निरमित्र, निरमित्रके सुनेत्र, सुनेत्रके बृहत्कर्मा, बृहत्कर्माके सेनजित्, सेनजित्के श्रुतंजय, श्रुतंजयके विप्र तथा विप्रके शुचि नामक एक पुत्र होगा ॥ ४–५ ॥ शुचिके क्षेम्य, क्षेम्यके सुव्रत, सुव्रतके धर्म, धर्मके सुश्रवा, सुश्रवाके दृढसेन, दृढसेनके सुबल, सुबलके सुनीत, सुनीतके सत्यजित्, सत्यजित्के विश्वजित् और विश्वजित्के रिपुंजयका जन्म होगा ॥ ६–१२ ॥ इस प्रकारसे बृहद्रथवंशीय राजागण एक सहस्र वर्षपर्यन्त मगधमें शासन करेंगे ॥ १३ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥


चौबीसवाँ अध्याय

कलियुगी राजाओं और कलिधर्मोंका वर्णन तथा राजवंश-वर्णनका उपसंहार

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
योऽयं रिपुञ्जयो नाम बार्हद्रथोऽन्त्यस्तस्यामात्यो सुनिको नाम भविष्यति ॥ १ ॥ स चैनं स्वामिनं हत्वा स्वपुत्रं प्रद्योतनामानमभिषेक्ष्यति ॥ २ ॥ तस्यापि बलाकनामा पुत्रो भविता ॥ ३ ॥ ततश्च विशाखयूपः ॥ ४ ॥ तत्पुत्रो जनकः ॥ ५ ॥ तस्य च नन्दिवर्द्धनः ॥ ६ ॥ ततो नन्दी ॥ ७ ॥ इत्येतेऽष्टत्रिंशदुत्तरमब्दशतं पञ्च प्रद्योताः पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ ८ ॥बृहद्रथवंशका रिपुंजय नामक जो अन्तिम राजा होगा उसका सुनिक नामक एक मन्त्री होगा। वह अपने स्वामी रिपुंजयको मारकर अपने पुत्र प्रद्योतका राज्याभिषेक करेगा। उसका पुत्र बलाक होगा, बलाकका विशाखयूप, विशाखयूपका जनक, जनकका नन्दिवर्द्धन तथा नन्दिवर्द्धनका पुत्र नन्दी होगा। ये पाँच प्रद्योतवंशीय नृपतिगण एक सौ अड़तीस वर्ष पृथिवीका पालन करेंगे ॥ १–८ ॥
३०४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० २४

[मूल संस्कृत]

ततश्च शिशुनाभः ॥ ९ ॥ तत्पुत्रः काकवर्णो भविता ॥ १० ॥ तस्य च पुत्रः क्षेमधर्मा ॥ ११ ॥ तस्यापि क्षतौजाः ॥ १२ ॥ तत्पुत्रो विधिसारः ॥ १३ ॥ ततश्चाजातशत्रुः ॥ १४ ॥ तस्मादर्भकः ॥ १५ ॥ तस्माच्चोदयनः ॥ १६ ॥ तस्मादपि नन्दिवर्द्धनः ॥ १७ ॥ ततो महानन्दी ॥ १८ ॥ इत्येते शैशुनाभा भूपालास्त्रीणि वर्षशतानि द्विषष्ट्यधिकानि भविष्यन्ति ॥ १९ ॥

महानन्दिनस्ततश्शूद्रागर्भोद्भवोऽतिलुब्धोऽतिबलो महापद्मनामा नन्दः परशुराम इवापरोऽखिलक्षत्रान्तकारी भविष्यति ॥ २० ॥ ततः प्रभृति शूद्रा भूपाला भविष्यन्ति ॥ २१ ॥ स चैकच्छत्रामनुल्लङ्घितशासनों महापद्मः पृथिवीं भोक्ष्यते ॥ २२ ॥ तस्याप्यष्टौ सुतास्सुमाल्याद्या भवितारः ॥ २३ ॥ तस्य महापद्मस्यनु पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ २४ ॥ महापद्मपुत्राश्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति ॥ २५ ॥ ततश्च नव चैतान्नन्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणस्समुद्धरिष्यति ॥ २६ ॥ तेषामभावे मौर्याः पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ २७ ॥ कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तमुत्पन्नं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २८ ॥

तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति ॥ २९ ॥ तस्याप्यशोकवर्द्धनस्ततस्सुयशास्ततश्च दशरथस्ततश्च संयुतस्ततश्शालिशूकस्तस्मात्सोमशर्मा तस्यापि सोमशर्मणश्शतधन्वा ॥ ३० ॥ तस्यापि बृहद्रथनामा भविता ॥ ३१ ॥ एवमेते मौर्य्या दश भूपतयो भविष्यन्ति अब्दशतं सप्तत्रिंशदुत्तरम् ॥ ३२ ॥ तेषामन्ते पृथिवीं दश शुङ्गा भोक्ष्यन्ति ॥ ३३ ॥ पुष्यमित्रस्सेनापतिस्स्वामिनं हत्वा राज्यं करिष्यति तस्यात्मजोऽग्निमित्रः ॥ ३४ ॥ तस्मात्सुज्येष्ठस्ततो वसुमित्रस्तस्मादप्युदंकस्ततः पुलिन्दकस्ततो घोषवसुस्तस्मादपि वज्रमित्रस्ततो


[हिन्दी अनुवाद]

नन्दीका पुत्र शिशुनाभ होगा, शिशुनाभका काकवर्ण, काकवर्णका क्षेमधर्मा, क्षेमधर्माका क्षतौजा, क्षतौजाका विधिसार, विधिसारका अजातशत्रु, अजातशत्रुका अर्भक, अर्भकका उदयन, उदयनका नन्दिवर्द्धन और नन्दिवर्द्धनका पुत्र महानन्दी होगा। ये शिशुनाभवंशीय नृपतिगण तीन सौ बासठ वर्ष पृथिवीका शासन करेंगे ॥ ९—१९ ॥

महानन्दीके शूद्राके गर्भसे उत्पन्न महापद्म नामक नन्द दूसरे परशुरामके समान सम्पूर्ण क्षत्रियोंका नाश करनेवाला होगा। तबसे शूद्रजातीय राजा राज्य करेंगे। राजा महापद्म सम्पूर्ण पृथिवीका एकच्छत्र और अनुल्लङ्घित राज्य-शासन करेगा। उसके सुमाली आदि आठ पुत्र होंगे जो महापद्मके पीछे पृथिवीका राज्य भोगेंगे ॥ २०—२४ ॥ महापद्म और उसके पुत्र सौ वर्षतक पृथिवीका शासन करेंगे। तदनन्तर इन नवों नन्दोंको कौटिल्य नामक एक ब्राह्मण नष्ट करेगा, उनका अन्त होनेपर मौर्य नृपतिगण पृथिवीको भोगेंगे। कौटिल्य ही [मुरा नामकी दासीसे नन्दद्वारा] उत्पन्न हुए चन्द्रगुप्तको राज्याभिषिक्त करेगा ॥ २५—२८ ॥

चन्द्रगुप्तका पुत्र बिन्दुसार, बिन्दुसारका अशोकवर्द्धन, अशोकवर्द्धनका सुयशा, सुयशाका दशरथ, दशरथका संयुत, संयुतका शालिशूक, शालिशूकका सोमशर्मा, सोमशर्माका शतधन्वा तथा शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। इस प्रकार एक सौ तिहत्तर वर्षतक ये दस मौर्यवंशी राजा राज्य करेंगे ॥ २९—३२ ॥ इनके अनन्तर पृथिवीमें दस शुंगवंशीय राजागण होंगे ॥ ३३ ॥ उनमें पहला पुष्यमित्र नामक सेनापति अपने स्वामीको मारकर स्वयं राज्य करेगा, उसका पुत्र अग्निमित्र होगा ॥ ३४ ॥ अग्निमित्रका पुत्र सुज्येष्ठ, सुज्येष्ठका वसुमित्र, वसुमित्रका उदंक, उदंकका पुलिन्दक, पुलिन्दकका घोषवसु, घोषवसुका वज्रमित्र, वज्रमित्रका

अ० २४ ]* चतुर्थ अंश *३०५
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
भागवतः ॥ ३५ ॥ तस्माद्देवभूतिः ॥ ३६ ॥ इत्येते शुङ्गा द्वादशोत्तरं वर्षशतं पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ ३७ ॥भागवत और भागवतका पुत्र देवभूति होगा ॥ ३५-३६ ॥ ये शुंगनरेश एक सौ बारह वर्ष पृथिवीका भोग करेंगे ॥ ३७ ॥
ततः कणवानेषा भूर्यास्यति ॥ ३८ ॥ देवभूतिं तु शुङ्गराजानं व्यसनिनं तस्यैवामात्यः काण्वो वसुदेवनामा तं निहत्य स्वयमवनीं भोक्ष्यति ॥ ३९ ॥ तस्य पुत्रो भूमिमित्रस्तस्यापि नारायणः ॥ ४० ॥ नारायणात्मजस्सुशर्मा ॥ ४१ ॥ एते काण्वायनाश्चत्वारः पञ्चचत्वारिंशद्वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ४२ ॥इसके अनन्तर यह पृथिवी कण्व भूपालोंके अधिकारमें चली जायगी ॥ ३८ ॥ शुंगवंशीय अति व्यसनशील राजा देवभूतिको कण्ववंशीय वसुदेव नामक उसका मन्त्री मारकर स्वयं राज्य भोगेगा ॥ ३९ ॥ उसका पुत्र भूमिमित्र, भूमिमित्रका नारायण तथा नारायणका पुत्र सुशर्मा होगा ॥ ४०-४१ ॥ ये चार काण्व भूपतिगण पैंतालीस वर्ष पृथिवीके अधिपति रहेंगे ॥ ४२ ॥
सुशर्माणं तु काण्वं तद्भृत्यो बलिपुच्छकनामा हत्वान्ध्रजातीयो वसुधां भोक्ष्यति ॥ ४३ ॥ ततश्च कृष्णनामा तद्‌भ्राता पृथिवीपतिर्भविष्यति ॥ ४४॥ तस्यापि पुत्रः शान्तकर्णिस्तस्यापि पूर्णोत्सङ्गस्तत्पुत्रश्शातकर्णिस्तस्माच्चलम्बोदरस्तस्माच्च पिलकस्ततो मेघस्वातिस्ततः पटुमान् ॥ ४५ ॥ ततश्चारिष्टकर्मा ततो हालाहलः ॥ ४६ ॥ हालाहलात्पललकस्ततः पुलिन्दसेनस्ततः सुन्दरस्ततश्शातकर्णिस्ततश्शिवस्वातिस्ततश्च गोमतिपुत्रस्तत्पुत्रोऽलिमान् ॥ ४७ ॥ तस्यापि शान्तकर्णिस्ततः शिवश्रितस्ततश्च शिवस्कन्धस्तस्मादपि यज्ञश्रीस्ततो द्वियज्ञस्तस्माच्चन्द्रश्रीः ॥ ४८ ॥ तस्मात्पुलोमार्चिः ॥ ४९ ॥ एवमेते त्रिंशच्चत्वार्यब्दशतानि षट्पञ्चाशदधिकानि पृथिवीं भोक्ष्यन्ति आन्ध्रभृत्याः ॥ ५० ॥कण्ववंशीय सुशर्माको उसका बलिपुच्छक नामवाला आन्ध्रजातीय सेवक मारकर स्वयं पृथिवीका भोग करेगा ॥ ४३ ॥ उसके पीछे उसका भाई कृष्ण पृथिवीका स्वामी होगा ॥ ४४ ॥ उसका पुत्र शान्तकर्णि होगा। शान्तकर्णिका पुत्र पूर्णोत्संग, पूर्णोत्संगका शातकर्णि, शातकर्णिका लम्बोदर, लम्बोदरका पिलक, पिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिक पटुमान्, पटुमान्का अरिष्टकर्मा, अरिष्टकर्माका हालाहल, हालाहलका पललक, पललकका पुलिन्दसेन, पुलिन्दसेनका सुन्दर, सुन्दरका शातकर्णि, [दूसरा] शातकर्णिका शिवस्वाति, शिवस्वातिक गोमतिपुत्र, गोमतिपुत्रका अलिमान्, अलिमान्का शान्तकर्णि [दूसरा], शान्तकर्णिका शिवश्रित, शिवश्रितका शिवस्कन्ध, शिवस्कन्धका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका द्वियज्ञ, द्वियज्ञका चन्द्रश्री तथा चन्द्रश्रीका पुत्र पुलोमार्चि होगा ॥ ४५-४९ ॥ इस प्रकार ये तीस आन्ध्रभृत्य राजागण चार सौ छप्पन वर्ष पृथिवीको भोगेंगे ॥ ५० ॥
सप्ताभीरप्रभृतयो दश गर्दभिलाश्च भूभुजो भविष्यन्ति ॥ ५१ ॥ ततष्षोडश शका भूपतयो भवितारः ॥ ५२ ॥ ततश्चाष्टौ यवनाश्चतुर्दश तुरुष्कारा मुण्डाश्च त्रयोदश एकादश मौना एते वै पृथिवीपतयः पृथिवीं दशवर्षशतानि नवत्यधिकानि भोक्ष्यन्ति ॥ ५३ ॥इनके पीछे सात आभीर और दस गर्दभिल राजा होंगे ॥ ५१ ॥ फिर सोलह शक राजा होंगे ॥ ५२ ॥ उनके पीछे आठ यवन, चौदह तुर्क, तेरह मुण्ड (गुरुण्ड) और ग्यारह मौनजातीय राजालोग एक हजार नब्बे वर्ष पृथिवीका शासन करेंगे ॥ ५३ ॥
ततश्च एकादश भूपतयोऽब्दशतानि त्रीणि पृथिवीं भोक्ष्यन्ति ॥ ५४ ॥ तेषूत्सन्नेषु कैङ्किला यवना भूपतयो भविष्यन्त्यमूर्द्धाभिषिक्ताः ॥ ५५ ॥इनमेंसे भी ग्यारह मौन राजा पृथिवीको तीन सौ वर्षतक भोगेंगे ॥ ५४ ॥ इनके उच्छिन्न होनेपर कैंकिल नामक यवनजातीय अभिषेकरहित राजा होंगे ॥ ५५ ॥

३०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
तेषामपत्यं विन्ध्यशक्तिस्ततः पुरञ्जयस्तस्माद्-<br>रामचन्द्रस्तस्माद्धर्मवर्मा ततो वङ्गस्ततोऽभूनन्दन-<br>स्ततस्सुनन्दी तद्भ्राता नन्द्यशाश्शुक्रः प्रवीर एते<br>वर्षशतं षड्वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ५६ ॥उनका वंशधर विन्ध्यशक्ति होगा। विन्ध्यशक्तिका पुत्र पुरंजय होगा। पुरंजयका रामचन्द्र, रामचन्द्रका धर्मवर्मा, धर्मवर्माका वंग, वंगका नन्दन तथा नन्दनका पुत्र सुनन्दी होगा। सुनन्दीके नन्दियशा, शुक्र और प्रवीर ये तीन भाई होंगे। ये सब एक सौ छः वर्ष राज्य करेंगे॥ ५६॥
ततस्तत्पुत्रास्त्रयोदशैते बाह्लिकाश्च त्रयः ॥ ५७ ॥इसके पीछे तेरह इनके वंशके और तीन बाह्लिक राजा होंगे॥ ५७॥
ततः पुष्पमित्राः पटुमित्रास्त्रयोदशैलाश्र्च<br>सप्तान्ध्राः ॥ ५८ ॥उनके बाद तेरह पुष्पमित्र और पटुमित्र आदि तथा सात आन्ध्र माण्डलिक भूपतिगण होंगे॥ ५८॥
ततश्च कोशलायां तु नव चैव<br>भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ५९ ॥तथा नौ राजा क्रमशः कोसलदेशमें राज्य करेंगे॥ ५९॥
नैषधास्तु<br>त एव ॥ ६० ॥निषधदेशके स्वामी भी ये ही होंगे॥ ६०॥
मगधायां तु विश्वस्फटिकसंज्ञोऽन्यान्वर्णान्-<br>करिष्यति ॥ ६१ ॥मगधदेशमें विश्वस्फटिक नामक राजा अन्य वर्णोंको प्रवृत्त करेगा॥ ६१॥
कैवर्त्तवटुपुलिन्द-<br>ब्राह्मणान्राज्ये स्थापयिष्यति ॥ ६२ ॥वह कैवर्त, वटु, पुलिन्द और ब्राह्मणोंको राज्यमें नियुक्त करेगा॥ ६२॥
उत्साद्याखिलक्षत्रजातिं नव नागाः पद्मावत्यां नाम<br>पुर्यामनुगङ्गाप्रयागं गयायाञ्च मागधा गुप्ताश्च<br>भोक्ष्यन्ति ॥ ६३ ॥सम्पूर्ण क्षत्रिय-जातिको उच्छिन्न कर पद्मावतीपुरीमें नागगण तथा गंगाके निकटवर्ती प्रयाग और गयामें मागध और गुप्त राजालोग राज्य भोग करेंगे॥ ६३॥
कोशलान्ध्रपुण्ड्रताम्रलिप्त-<br>समुद्रतटपुरीं च देवरक्षितो रक्षिता ॥ ६४ ॥कोसल, आन्ध्र, पुण्ड्र, ताम्रलिप्त और समुद्रतटवर्तिनी पुरीकी देवरक्षित नामक एक राजा रक्षा करेगा॥ ६४॥
कलिङ्गमाहिषमहेन्द्रभौमान् गुहा भोक्ष्यन्ति ॥ ६५ ॥कलिंग, माहिष, महेन्द्र और भौम आदि देशोंको गुह नरेश भोगेंगे॥ ६५॥
नैषधनैमिषककालकोशकाञ्जनपदान्मणि-<br>धान्यकवंशा भोक्ष्यन्ति ॥ ६६ ॥नैषध, नैमिषक और कालकोशक आदि जनपदोंको मणि-धान्यक-वंशीय राजा भोगेंगे॥ ६६॥
त्रैराज्यमुषिक-<br>जनपदान्कनकाह्वयो भोक्ष्यति ॥ ६७ ॥त्रैराज्य और मुषिक देशोंपर कनक नामक राजाका राज्य होगा॥ ६७॥
सौराष्ट्रावन्तिशूद्राभीरान्नर्मदामरुभूविषयांश्च<br>व्रात्यद्विजाभीरशूद्राद्या भोक्ष्यन्ति ॥ ६८ ॥सौराष्ट्र, अवन्ति, शूद्र, आभीर तथा नर्मदा-तटवर्ती मरुभूमिपर व्रात्य द्विज, आभीर और शूद्र आदिका आधिपत्य होगा॥ ६८॥
सिन्धुतटदाविकोर्वीचन्द्रभागाकाश्मीरविषयांश्च<br>व्रात्यम्लेच्छशूद्रादयो भोक्ष्यन्ति ॥ ६९ ॥समुद्रतट, दाविकोर्वी, चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशोंका व्रात्य, म्लेच्छ और शूद्र आदि राजागण भोग करेंगे॥ ६९॥
एते च तुल्यकालास्सर्वे पृथिव्यां भूभुजो<br>भविष्यन्ति ॥ ७० ॥ये सम्पूर्ण राजालोग पृथिवीमें एक ही समयमें होंगे॥ ७०॥
अल्पप्रसादा बृहत्कोपा-<br>स्सर्वकालमनृताधर्मरुचयः स्त्रीबालगोवधकर्त्तारः<br>परस्वादानरुचयोऽल्पसारास्तमिस्रप्राया उदिता-<br>स्तमितप्राया अल्पायुषो महेच्छा ह्यल्पधर्मा<br>लुब्धाश्च भविष्यन्ति ॥ ७१ ॥ये थोड़ी प्रसन्नतावाले, अत्यन्त क्रोधी, सर्वदा अधर्म और मिथ्या भाषणमें रुचि रखनेवाले, स्त्री-बालक और गौओंकी हत्या करनेवाले, पर-धन-हरणमें रुचि रखनेवाले, अल्पशक्ति तमःप्रधान उत्थानके साथ ही पतनशील, अल्पायु, महती कामनावाले, अल्पपुण्य और अत्यन्त लोभी होंगे॥ ७१॥
तैश्च विमिश्रा<br>जनपदास्तच्छीलानुवर्त्तिनो राजाश्रयशुष्मिणो<br>म्लेच्छाश्चार्याश्च विपर्ययेण वर्त्तमानाः प्रजाः<br>क्षपयिष्यन्ति ॥ ७२ ॥ये सम्पूर्ण देशोंको परस्पर मिला देंगे तथा उन राजाओंके आश्रयसे ही बलवान् और उन्हींके स्वभावका अनुकरण करनेवाले म्लेच्छ तथा आर्यविपरीत आचरण करते हुए सारी प्रजाको नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे॥ ७२॥

अ० २४] * चतुर्थ अंश * ३०७

ततश्चानुदिनमल्पालपह््रासव्यprefixतावच्छेदद्धर्मार्थयो-<br>र्जगतस्संङ्क्षयो भविष्यति॥ ७३॥<br>ततश्चार्थ एवाभिजनहेतुः॥ ७४॥<br>बलमेवाशेषधर्महेतुः॥ ७५॥ अभिरुचिरेव<br>दाम्पत्यसम्बन्धहेतुः॥ ७६॥ स्त्रीत्वमेवोपभोग-<br>हेतुः॥ ७७॥ अनृतमेव व्यवहारजयहेतुः॥ ७८॥<br>उन्नताम्बुतैव पृथिवीहेतुः॥ ७९॥ ब्रह्मसूत्रमेव<br>विप्रत्वहेतुः॥ ८०॥ रत्नधातुतैव श्लाघ्यता-<br>हेतुः॥ ८१॥ लिङ्गधारणमेवाश्रमहेतुः॥ ८२॥<br>अन्याय एव वृत्तिहेतुः॥ ८३॥ दौर्बल्यमेवावृत्ति-<br>हेतुः॥ ८४॥ अभयप्रगल्भोच्चारणमेव<br>पाण्डित्यहेतुः॥ ८५॥ अनाढ्यतैव साधुत्व-<br>हेतुः॥ ८६॥ स्नानमेव प्रसाधनहेतुः॥ ८७॥<br>दानमेव धर्महेतुः॥ ८८॥ स्वीकरणमेव<br>विवाहहेतुः॥ ८९॥ सद्द्वेषधार्यैव पात्रम्॥ ९०॥<br>दूरायतनोदकमेव तीर्थहेतुः॥ ९१॥<br>कपटवेषधारणमेव महत्त्वहेतुः ॥९२॥<br>इत्येवमनेकदोषोत्तरे तु भूमण्डले सर्ववर्णेष्वेव<br>यो यो बलवान्स स भूपतिर्भविष्यति॥ ९३॥<br>एवं चातिलुब्धकराजासहाश्शैलानामान्तर-<br>द्रोणीः प्रजास्संश्रयिष्यन्ति॥ ९४॥ मधुशाक-<br>मूलफलपत्रपुष्पाद्याहाराश्च भविष्यन्ति॥ ९५॥<br>तरुवल्कलपर्णचीरप्रावरणाश्चातिबहुप्रजाश्शी-<br>तवातातपवर्षसहाश्च भविष्यन्ति॥ ९६॥ न च<br>कश्चित्रयोविंशतिवर्षाणि जीविष्यति<br>अनवरतं चात्र कलियुगे क्षयमाया-<br>त्यखिल एवैष जनः॥ ९७॥ श्रौते स्मार्ते च धर्मे<br>विप्लवमत्यन्तमुपगते क्षीणप्राये च कलावशेष-<br>जगत्स्रष्टुश्चराचरगुरोरादिमध्यान्तरहितस्य ब्रह्म-<br>मयस्यात्मरूपिणो भगवतो वासुदेवस्यांश-<br>श्शाम्बलग्रामप्रधानब्राह्मणस्य विष्णुयशसो<br>गृहेऽष्टगुणर्द्धिसमन्वितः कल्किरूपी जगत्यत्रावतीर्य-<br>सकलम्लेच्छदस्युदुष्टाचरणचेतसामशेषाणा-<br>मपरिच्छिन्नशक्तिमाहात्म्यः क्षयं करिष्यतितब दिन-दिन धर्म और अर्थका थोड़ा-थोड़ा ह्रास तथा क्षय होनेके कारण संसारका क्षय हो जायगा॥ ७३॥ उस समय अर्थ ही कुलीनताका हेतु होगा; बल ही सम्पूर्ण धर्मका हेतु होगा; पारस्परिक रुचि ही दाम्पत्य-सम्बन्धकी हेतु होगी, स्त्रीत्व ही उपभोगका हेतु होगा [अर्थात् स्त्रीकी जाति-कुल आदिका विचार न होगा]; मिथ्या भाषण ही व्यवहारमें सफलता प्राप्त करनेका हेतु होगा; जलकी सुलभता और सुगमता ही पृथिवीकी स्वीकृतिका हेतु होगा [अर्थात् पुण्यक्षेत्रादिका कोई विचार न होगा। जहाँकी जलवायु उत्तम होगी वही भूमि उत्तम मानी जायगी]; यज्ञोपवीत ही ब्राह्मणत्वका हेतु होगा; रत्नादि धारण करना ही प्रशंसाका हेतु होगा; बाह्य चिह्न ही आश्रमोंके हेतु होंगे; अन्याय ही आजीविकाका हेतु होगा; दुर्बलता ही बेकारीका हेतु होगा; निर्भयतापूर्वक धृष्टताके साथ बोलना ही पाण्डित्यका हेतु होगा, निर्धनता ही साधुत्वका हेतु होगी; स्नान ही साधनका हेतु होगा; दान ही धर्मका हेतु होगा; स्वीकार कर लेना ही विवाहका हेतु होगा [अर्थात् संस्कार आदिकी अपेक्षा न कर पारस्परिक स्नेहबन्धनसे ही दाम्पत्य-सम्बन्ध स्थापित हो जायगा]; भली प्रकार बन-ठनकर रहनेवाला ही सुपात्र समझा जायगा; दूरदेशका जल ही तीर्थोदकत्वका हेतु होगा तथा छद्मवेश धारण ही गौरवका कारण होगा॥ ७४—९२॥ इस प्रकार पृथिवीमण्डलमें विविध दोषोंके फैल जानेसे सभी वर्णोंमें जो-जो बलवान् होगा वही-वही राजा बन बैठेगा॥ ९३॥<br>इस प्रकार अतिलोलुप राजाओंके कर-भारको सहन न कर सकनेके कारण प्रजा पर्वत-कन्दराओंका आश्रय लेगी तथा मधु, शाक, मूल, फल, पत्र और पुष्प आदि खाकर दिन काटेगी॥ ९४-९५॥ वृक्षोंके पत्र और वल्कल ही उनके पहनने तथा ओढ़नेके कपड़े होंगे। अधिक सन्तानें होंगी। सब लोग शीत, वायु, घाम और वर्षा आदिके कष्ट सहेंगे॥ ९६॥ कोई भी तेईस वर्षतक जीवित न रह सकेगा। इस प्रकार कलियुगमें यह सम्पूर्ण जनसमुदाय निरन्तर क्षीण होता रहेगा॥ ९७॥ इस प्रकार श्रौत और स्मार्तधर्मका अत्यन्त ह्रास हो जाने तथा कलियुगके प्रायः बीत जानेपर शम्बल (सम्भल) ग्रामनिवासी ब्राह्मणश्रेष्ठ विष्णुयशके घर सम्पूर्ण संसारके रचयिता, चराचर गुरु, आदिमध्यान्तशून्य, ब्रह्ममय, आत्मस्वरूप भगवान् वासुदेव अपने अंशसे अष्टैश्वर्ययुक्त कल्किरूपसे संसारमें अवतार लेकर असीम शक्ति और माहात्म्यसे

३०८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
स्वधर्मेषु चाखिलमेव संस्थापयिष्यति॥ ९८॥सम्पन्न हो सकल म्लेच्छ, दस्यु, दुष्टाचारी तथा दुष्ट चित्तोंका क्षय करेंगे और समस्त प्रजाको अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करेंगे॥ ९८॥
अनन्तरं चाशेषकलेरवसाने निशावसाने विबुद्धानामिव तेषामेव जनपदानाम् अमलस्फटिकविशुद्धा मतयो भविष्यन्ति॥ ९९॥इसके पश्चात् समस्त कलियुगके समाप्त हो जानेपर रात्रिके अन्तमें जागे हुओंके समान तत्कालीन लोगोंकी बुद्धि स्वच्छ, स्फटिकमणिके समान निर्मल हो जायगी॥ ९९॥
तेषां च बीजभूतानामशेषमनुष्याणां परिणतानामपि तत्कालकृतापत्यप्रसूतिर्भविष्यति॥ १००॥उन बीजभूत समस्त मनुष्योंसे उनकी अधिक अवस्था होनेपर भी उस समय सन्तान उत्पन्न हो सकेगी॥ १००॥
तानि च तदपत्यानि कृतयुगानुसारिण्येव भविष्यन्ति॥ १०१॥उनकी वे सन्तानें सत्ययुगके ही धर्मोंका अनुसरण करनेवाली होंगी॥ १०१॥
अत्रोच्यतेइस विषयमें ऐसा कहा जाता है कि—
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः।<br>एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति वै कृतम्॥ १०२जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति पुष्यनक्षत्रमें स्थित होकर एक राशिपर एक साथ आवेंगे उसी समय सत्ययुगका आरम्भ हो जायगा*॥ १०२॥
अतीता वर्त्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये।<br>एते वंशेषु भूपालाः कथिता मुनिसत्तम॥ १०३हे मुनिश्रेष्ठ! तुमसे मैंने यह समस्त वंशोंके भूत, भविष्यत् और वर्तमान सम्पूर्ण राजाओंका वर्णन कर दिया॥ १०३॥
यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नन्दाभिषेचनम्।<br>एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पाञ्चशदुत्तरम्॥ १०४परीक्षित्के जन्मसे नन्दके अभिषेकतक एक हजार पचास वर्षका समय जानना चाहिये॥ १०४॥
सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते ह्युदितौ दिवि।<br>तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि॥ १०५<br><br>तेन सप्तर्षयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम्।<br>ते तु पारिक्षिते काले मघास्वासन्द्विजोत्तम॥ १०६<br><br>तदा प्रवृत्तश्च कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः॥ १०७सप्तर्षियोंमेंसे जो [पुलस्त्य और क्रतु] दो नक्षत्र आकाशमें पहले दिखायी देते हैं, उनके बीचमें रात्रिके समय जो [दक्षिणोत्तर रेखापर] समदेशमें स्थित [अश्विनी आदि] नक्षत्र हैं, उनमेंसे प्रत्येक नक्षत्रपर सप्तर्षिगण एक-एक सौ वर्ष रहते हैं। हे द्विजोत्तम! परीक्षित्के समयमें वे सप्तर्षिगण मघानक्षत्रपर थे। उसी समय बारह सौ वर्ष प्रमाणवाला कलियुग आरम्भ हुआ था॥ १०५—१०७॥
यदैव भगवाग्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज।<br>वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवात्रागतः कलिः॥ १०८हे द्विज! जिस समय भगवान् विष्णुके अंशावतार भगवान् वासुदेव निजधामको पधारे थे उसी समय पृथिवीपर कलियुगका आगमन हुआ था॥ १०८॥
यावत्स पादपद्माभ्यां पस्पर्शैमां वसुन्धराम्।<br>तावत्पृथ्वीपरिश्वङ्गे समर्थो नाभवत्कलिः॥ १०९जबतक भगवान् अपने चरण-कमलोंसे इस पृथिवीका स्पर्श करते रहे, तबतक पृथिवीसे संसर्ग करनेकी कलियुगकी हिम्मत न पड़ी॥ १०९॥
गते सनातनस्यांशे विष्णोस्तत्र भुवो दिवम्।<br>तत्याज सानुजो राज्यं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ११०सनातन पुरुष भगवान् विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके स्वर्गलोक पधारनेपर भाइयोंके सहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने अपने राज्यको छोड़ दिया॥ ११०॥
विपरीतानि दृष्ट्वा च निमित्तानि हि पाण्डवः।<br>याते कृष्णे चकाराथ सोऽभिषेकं परीक्षितः॥ १११कृष्णचन्द्रके अन्तर्धान हो जानेपर विपरीत लक्षणोंको देखकर पाण्डवोंने परीक्षित्को राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया॥ १११॥
प्रयास्यन्ति यदा चैते पूर्वाषाढां महर्षयः।<br>तदा नन्दात्प्रभृत्येष गतिवृद्धिं गमिष्यति॥ ११२जिस समय ये सप्तर्षिगण पूर्वाषाढानक्षत्रपर जायँगे उसी समय राजा नन्दके समयसे कलियुगका प्रभाव बढ़ेगा॥ ११२॥

* यद्यपि प्रति बारहवें वर्ष जब बृहस्पति कर्कराशिपर जाते हैं तो अमावास्यातिथिको पुष्यनक्षत्रपर इन तीनों ग्रहोंका योग होता है, तथापि 'समेष्यन्ति' पदसे एक साथ आनेपर सत्ययुगका आरम्भ कहा है; इसलिये उक्त समयपर अतिव्याप्तिदोष नहीं है।

अ० २४ ] * चतुर्थ अंश * ३०९

यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि।
प्रतिपन्नं कलियुगं तस्य संख्यां निबोध मे॥ ११३

त्रीणि लक्षाणि वर्षाणां द्विज मानुष्यसंख्यया।
षष्टिश्चैव सहस्राणि भविष्यत्येष वै कलिः ॥ ११४

शतानि तानि दिव्यानां सप्त पञ्च च संख्यया।
निश्शेषेण गते तस्मिन् भविष्यति पुनः कृतम्॥ ११५

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याश्शूद्राश्च द्विजसत्तम।
युगे युगे महात्मानः समतीतास्सहस्रशः ॥ ११६

बहुत्वान्नामधेयानां परिसंख्या कुले कुले।
पौनरुक्त्याद्धि साम्याच्च न मया परिकीर्त्तिता ॥ ११७

देवापिः पौरवो राजा पुरुश्चेक्ष्वाकुवंशजः।
महायोगबलोपेतौ कलापग्रामसंश्रितौ ॥ ११८

कृते युगे त्विहागम्य क्षत्रप्रवर्त्तकौ हि तौ।
भविष्यतो मनोर्वंशबीजभूतौ व्यवस्थितौ ॥ ११९

एतेन क्रमयोगेन मनुपुत्रैर्वसुन्धरा।
कृतत्रेताद्वापराणि युगानि त्रीणि भुज्यते ॥ १२०

कलौ ते बीजभूता वै केचित्तिष्ठन्ति वै मुने।
यथैव देवापिपुरू साम्प्रतं समधिष्ठितौ ॥ १२१

एष तूद्देशतो वंशस्तवोक्तो भूभुजां मया।
निखिलो गदितुं शक्यो नैष वर्षशतैरपि ॥ १२२

एते चान्ये च भूपाला यैरत्र क्षितिमण्डले।
कृतं ममत्वं मोहान्धैर्नित्यं हेयकलेवरे ॥ १२३

कथं ममेयमचला मत्पुत्रस्य कथं मही।
मद्वंशस्येति चिन्तार्त्ता जगमुरन्तमिमे नृपाः ॥ १२४

तेभ्यः पूर्वतराश्चान्ये तेभ्यस्तेभ्यस्तथा परे।
भविष्याश्चैव यास्यन्ति तेषामन्ये च येऽप्यनु ॥ १२५

विलोक्यात्मजयोद्योगं यात्राव्यग्रान्नराधिपान्।
पुष्पप्रहासैश्शरदि हसन्तीव वसुन्धरा ॥ १२६

मैत्रेय पृथिवीगीताञ्छ्लोकांश्चात्र निबोध मे।
यानाह धर्मध्वजिने जनकायासितो मुनिः ॥ १२७


जिस दिन भगवान् कृष्णचन्द्र परमधामको गये थे उसी दिन कलियुग उपस्थित हो गया था। अब तुम कलियुगकी वर्ष-संख्या सुनो— ॥ ११३॥

हे द्विज! मानवी वर्षगणनाके अनुसार कलियुग तीन लाख साठ हजार वर्ष रहेगा ॥ ११४ ॥ इसके पश्चात् बारह सौ दिव्य वर्षपर्यन्त कृतयुग रहेगा ॥ ११५ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ ! प्रत्येक युगमें हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र महात्मागण हो गये हैं ॥ ११६ ॥ उनके बहुत अधिक संख्यामें होनेसे तथा समानता होनेके कारण कुलोंमें पुनरुक्ति हो जानेके भयसे मैंने उन सबके नाम नहीं बतलाये हैं ॥ ११७ ॥

पुरुवंशीय राजा देवापि तथा इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न राजा पुरु—ये दोनों अत्यन्त योगबलसम्पन्न हैं और कलापग्राममें रहते हैं ॥ ११८ ॥ सत्ययुगका आरम्भ होनेपर ये पुनः मर्त्यलोकमें आकर क्षत्रिय-कुलके प्रवर्त्तक होंगे। वे आगामी मनुवंशके बीजरूप हैं ॥ ११९ ॥ सत्ययुग, त्रेता और द्वापर इन तीनों युगोंमें इसी क्रमसे मनुपुत्र पृथिवीका भोग करते हैं ॥ १२० ॥ फिर कलियुगमें उन्हींमेंसे कोई-कोई आगामी मनुसन्तानके बीजरूपसे स्थित रहते हैं जिस प्रकार कि आजकल देवापि और पुरु हैं ॥ १२१ ॥

इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण राजवंशोंका यह संक्षिप्त वर्णन कर दिया है, इनका पूर्णतया वर्णन तो सौ वर्षमें भी नहीं किया जा सकता ॥ १२२ ॥ इस हेय शरीरके मोहसे अन्धे हुए ये तथा और भी ऐसे अनेक भूपतिगण हो गये हैं जिन्होंने इस पृथिवीमण्डलको अपना-अपना माना है ॥ १२३ ॥ 'यह पृथिवी किस प्रकार अचलभावसे मेरी, मेरे पुत्रकी अथवा मेरे वंशकी होगी ?' इसी चिन्तामें व्याकुल हुए इन सभी राजाओंका अन्त हो गया ॥ १२४ ॥ इसी चिन्तामें डूबे रहकर इन सम्पूर्ण राजाओंके पूर्व-पूर्वतरवर्ती राजालोग चले गये और इसीमें मग्न रहकर आगामी भूपतिगण भी मृत्यु-मुखमें चले जायँगे ॥ १२५ ॥ इस प्रकार अपनेको जीतनेके लिये राजाओंको अथक उद्योग करते देखकर वसुन्धरा शरत्कालीन पुष्पोंके रूपमें मानो हँस रही है ॥ १२६ ॥

हे मैत्रेय! अब तुम पृथिवीके कहे हुए कुछ श्लोकोंको सुनो। पूर्वकालमें इन्हें असित मुनिने धर्मध्वजी राजा जनकको सुनाया था ॥ १२७॥

३१० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


पृथिव्युवाच

कथमेष नरेन्द्राणां मोहो बुद्धिमतामपि।
येन फेनसधर्माणोऽप्यतिविश्वस्तचेतसः ॥ १२८

पूर्वमात्मजयं कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मन्त्रिणः।
ततो भृत्यांश्च पौरांश्च जिगीषन्ते तथा रिपून् ॥ १२९

क्रमेणानेन जेष्यामो वयं पृथ्वीं ससागराम्।
इत्यासक्तधियो मृत्युं न पश्यन्त्यविदूरगम् ॥ १३०

समुद्रावरणं याति भूमण्डलमथो वशम्।
कियदात्मजयस्यैतन्मुक्तिरात्मजये फलम् ॥ १३१

उत्सृज्य पूर्वजा याता यां नादाय गतः पिता।
तां मामतीवमूढत्वाज्जेतुमिच्छन्ति पार्थिवाः ॥ १३२

मत्कृते पितृपुत्राणां भ्रातॄणां चापि विग्रहः।
जायतेऽत्यन्तमोहेन ममत्वादृतचेतसाम् ॥ १३३

पृथ्वी ममेयं सकला ममैषा
मदन्वयस्यापि च शाश्वतीयम्।
यो यो मृतो ह्यत्र बभूव राजा
कुबुद्धिरासीदिति तस्य तस्य ॥ १३४

दृष्ट्वा ममत्वादृतचित्तमेकं
विहाय मां मृत्युवशं व्रजन्तम्।
तस्यानु यस्तस्य कथं ममत्वं
हृद्यास्पदं मत्प्रभवं करोति ॥ १३५

पृथ्वी ममैषाशु परित्यजैनां
वदन्ति ये दूतमूखैःस्वशत्रून्।
नराधिपास्तेषु ममातिहासः
पुनश्च मूढेषु दयाभ्युपैति ॥ १३६

श्रीपराशर उवाच

इत्येते धरणीगीताश्श्लोका मैत्रेय यैश्श्रुताः।
ममत्वं विलयं याति तपत्यर्के यथा हिमम् ॥ १३७

इत्येष कथितः सम्यङ्मन्वंशो मया तव।
यत्र स्थितिप्रवृत्तस्य विष्णोरंशांशका नृपाः ॥ १३८

शृणोति य इमं भक्त्या मनोर्वंशमनुक्रमात्।
तस्य पापमशेषं वै प्रणश्यत्यमलात्मनः ॥ १३९


पृथिवी कहती है— अहो! बुद्धिमान् होते हुए भी इन राजाओंको यह कैसा मोह हो रहा है जिसके कारण ये बुलबुलेके समान क्षणस्थायी होते हुए भी अपनी स्थिरतामें इतना विश्वास रखते हैं॥ १२८॥ ये लोग प्रथम अपनेको जीतते हैं और फिर अपने मन्त्रियोंको तथा इसके अनन्तर ये क्रमशः अपने भृत्य, पुरवासी एवं शत्रुओंको जीतना चाहते हैं॥ १२९॥ 'इसी क्रमसे हम समुद्रपर्यन्त इस सम्पूर्ण पृथिवीको जीत लेंगे' ऐसी बुद्धिसे मोहित हुए ये लोग अपनी निकटवर्तिनी मृत्युको नहीं देखते ॥ १३०॥ यदि समुद्रसे घिरा हुआ यह सम्पूर्ण भूमण्डल अपने वशमें हो ही जाय तो भी मनोजयकी अपेक्षा इसका मूल्य ही क्या है? क्योंकि मोक्ष तो मनोजयसे ही प्राप्त होता है॥ १३१॥ जिसे छोड़कर इनके पूर्वज चले गये तथा जिसे अपने साथ लेकर इनके पिता भी नहीं गये उसी मुझको अत्यन्त मूर्खताके कारण ये राजालोग जीतना चाहते हैं॥ १३२॥ जिनका चित्त ममतामय है उन पिता-पुत्र और भाइयोंमें अत्यन्त मोहके कारण मेरे ही लिये परस्पर कलह होता है॥ १३३॥ जो-जो राजालोग यहाँ हो चुके हैं उन सभीकी ऐसी कुबुद्धि रही है कि यह सम्पूर्ण पृथिवी मेरी ही है और मेरे पीछे यह सदा मेरी सन्तानकी ही रहेगी॥ १३४॥ इस प्रकार मेरेमें ममता करनेवाले एक राजाको, मुझे छोड़कर मृत्युके मुखमें जाते हुए देखकर भी न जाने कैसे उसका उत्तराधिकारी अपने हृदयमें मेरे लिये ममताको स्थान देता है? ॥ १३५॥ जो राजालोग दूतोंके द्वारा अपने शत्रुओंसे इस प्रकार कहलाते हैं कि 'यह पृथिवी मेरी है, तुमलोग इसे तुरन्त छोड़कर चले जाओ' उनपर मुझे बड़ी हँसी आती है और फिर उन मूढ़ोंपर मुझे दया भी आ जाती है॥ १३६॥

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! पृथिवीके कहे हुए इन श्लोकोंको जो पुरुष सुनेगा उसकी ममता इसी प्रकार लीन हो जायगी जैसे सूर्यके तपते समय बर्फ पिघल जाता है॥ १३७॥ इस प्रकार मैंने तुमसे भली प्रकार मनुके वंशका वर्णन कर दिया। जिस वंशके राजागण स्थितिकारक भगवान् विष्णुके अंशके अंश थे॥ १३८॥ जो पुरुष इस मनुवंशका क्रमशः श्रवण करता है उस शुद्धात्माके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १३९॥

अ० २४ ] * चतुर्थ अंश * ३१९


धनधान्यर्द्धिमपुलां प्राप्नोत्यव्याहतेन्द्रियः ।
श्रुत्वैवमखिलं वंशं प्रशस्तं शशिसूर्ययोः ॥ १४०

इक्ष्वाकुजह्नुमान्धातृसगराविक्षितान्रघून् ।
ययातिनहुषाद्यांश्च ज्ञात्वा निष्ठामुपागतान् ॥ १४१

महाबलान्महावीर्याननन्तधनसञ्चयान् ।
कृतान्कालेन बलिना कथाशेषान्नराधिपान् ॥ १४२

श्रुत्वा न पुत्रदारादौ गृहक्षेत्रादिके तथा ।
द्रव्यादौ वा कृतप्रज्ञो ममत्वं कुरुते नरः ॥ १४३

तप्तं तपो यैः पुरुषप्रवीरै-
रुद्बाहुभिर्वर्षगणाननेकान् ।
इष्ट्वा सुयज्ञैर्बलिनोऽतिवीर्याः
कृता नु कालेन कथावशेषाः ॥ १४४

पृथुस्समस्तान्विचचारलोका-
नव्याहतो यो विजितारिचक्रः ।
स कालवाताभिहतः प्रणष्टः
क्षिप्तं यथा शाल्मलितूलमग्नौ ॥ १४५

यः कार्त्तवीर्यो बुभुजे समस्ता-
न्द्वीपान्समाक्रम्य हतारिचक्रः ।
कथाप्रसङ्गेष्वभिधीयमान-
स्स एव सङ्कल्पविकल्पहेतुः ॥ १४६

दशाननाविक्षितराघवाणा-
मैश्वर्यमुद्भासितदिङ्मुखानाम् ।
भस्मापि शिष्टं न कथं क्षणेन
भ्रूभङ्गपातेन धिगन्तकस्य ॥ १४७

कथाशरीरत्वमवाप यद्वै
मान्धातृनामा भुवि चक्रवर्ती ।
श्रुत्वापि तत्को हि करोति साधु-
र्ममत्वमात्मन्यपि मन्दचेताः ॥ १४८

भगीरथाद्यास्सगरः ककुत्स्थो
दशाननो राघवलक्ष्मणौ च ।
युधिष्ठिराद्याश्च बभूवुरेते
सत्यं न मिथ्या क्वनु ते न विद्मः ॥ १४९


[ हिन्दी-अनुवाद ]

जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर सूर्य और चन्द्रमाके इन प्रशंसनीय वंशोंका सम्पूर्ण वर्णन सुनता है, वह अतुलित धन-धान्य और सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ १४० ॥ महाबलवान्, महावीर्यशाली, अनन्त धन संचय करनेवाले तथा परम निष्ठावान् इक्ष्वाकु, जह्नु, मान्धाता, सगर, अविक्षित, रघुवंशीय राजागण तथा नहुष और ययाति आदिके चरित्रोंको सुनकर, जिन्हें कि कालने आज कथामात्र ही शेष रखा है, प्रज्ञावान् मनुष्य पुत्र, स्त्री, गृह, क्षेत्र और धन आदिमें ममता न करेगा ॥ १४१—१४३ ॥

जिन पुरुषश्रेष्ठोंने ऊर्ध्वबाहु होकर अनेक वर्षपर्यन्त कठिन तपस्या की थी तथा विविध प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, आज उन अति बलवान् और वीर्यशाली राजाओंकी कालने केवल कथामात्र ही छोड़ दी है ॥ १४४ ॥ जो पृथु अपने शत्रुसमूहको जीतकर स्वच्छन्द-गतिसे समस्त लोकोंमें विचरता था आज वही काल-वायुकी प्रेरणासे अग्निमें फेंके हुए सेमरकी रूईके ढेरके समान नष्ट-भ्रष्ट हो गया है ॥ १४५ ॥ जो कार्त्तवीर्य अपने शत्रु-मण्डलका संहारकर समस्त द्वीपोंको वशीभूतकर उन्हें भोगता था वही आज कथा-प्रसंगसे वर्णन करते समय उलटा संकल्प-विकल्पका हेतु होता है [अर्थात् उसका वर्णन करते समय यह सन्देह होता है कि वास्तवमें वह हुआ था या नहीं।] ॥ १४६ ॥ समस्त दिशाओंको देदीप्यमान करनेवाले रावण, अविक्षित और रामचन्द्र आदिके [क्षणभंगुर] ऐश्वर्यको धिक्कार है। अन्यथा कालके क्षणिक कटाक्षपातके कारण आज उसका भस्ममात्र भी क्यों नहीं बच सका ? ॥ १४७ ॥ जो मान्धाता सम्पूर्ण भूमण्डलका चक्रवर्ती सम्राट् था आज उसका केवल कथामें ही पता चलता है। ऐसा कौन मन्दबुद्धि होगा जो यह सुनकर अपने शरीरमें भी ममता करेगा? [फिर पृथिवी आदिमें ममता करनेकी तो बात ही क्या है?] ॥ १४८ ॥ भगीरथ, सगर, ककुत्स्थ, रावण, रामचन्द्र, लक्ष्मण और युधिष्ठिर आदि पहले हो गये हैं यह बात सर्वथा सत्य है, किसी प्रकार भी मिथ्या नहीं है; किन्तु अब वे कहाँ हैं इसका हमें पता नहीं ॥ १४९ ॥

३१२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


ये साम्प्रतं ये च नृपा भविष्याः<br>प्रोक्ता मया विप्रवरोग्रवीर्याः।<br>एते तथान्ये च तथाभिधेयाः<br>सर्वे भविष्यन्ति यथैव पूर्वे ॥ १५०हे विप्रवर! वर्तमान और भविष्यत्कालीन जिन-जिन महावीर्यशाली राजाओंका मैंने वर्णन किया है ये तथा अन्य लोग भी पूर्वोक्त राजाओंकी भाँति कथामात्र शेष रहेंगे ॥ १५० ॥
एतद्विदित्वा न नरेण कार्यं<br>ममत्वमात्मन्यपि पण्डितेन।<br>तिष्ठन्तु तावत्तनयात्मजाद्याः<br>क्षेत्रादयो ये च शरीरिणोऽन्ये ॥ १५१ऐसा जानकर पुत्र, पुत्री और क्षेत्र आदि तथा अन्य प्राणी तो अलग रहें, बुद्धिमान् मनुष्यको अपने शरीरमें भी ममता नहीं करनी चाहिये ॥ १५१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके श्रीमति
विष्णुमहापुराणे चतुर्थोऽंशः समाप्तः।


$$ॐ$$ श्रीमन्नारायणाय नमः

श्रीविष्णुपुराण

पञ्चम अंश

पहला अध्याय

वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान्‌का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रीमैत्रेय उवाच<br>नृपाणां कथितस्सर्वो भवता वंशविस्तरः।<br>वंशानुचरितं चैव यथावदनुवर्णितम्॥ १**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! आपने राजाओंके सम्पूर्ण वंशोंका विस्तार तथा उनके चरित्रोंका क्रमशः यथावत् वर्णन किया॥ १॥
अंशावतारो ब्रह्मर्षे योऽयं यदुकुलोद्भवः।<br>विष्णोस्तं विस्तरेणाहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ २अब, हे ब्रह्मर्षे! यदुकुलमें जो भगवान् विष्णुका अंशावतार हुआ था, उसे मैं तत्त्वतः और विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ २॥
चकार यानि कर्माणि भगवान्पुरुषोत्तमः।<br>अंशांशेनावतीर्योर्व्यां तत्र तानि मुने वद॥ ३हे मुने! भगवान् पुरुषोत्तमने अपने अंशांशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर जो-जो कर्म किये थे, उन सबका आप मुझसे वर्णन कीजिये॥ ३॥
श्रीपराशर उवाच<br>मैत्रेय श्रूयतामेतद्यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>विष्णोरंशांशसम्भूतिचरितं जगतो हितम्॥ ४**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! तुमने मुझसे जो पूछा है वह संसारमें परम मंगलकारी भगवान् विष्णुके अंशावतारका चरित्र सुनो॥ ४॥
देवकस्य सुतां पूर्वं वसुदेवो महामुने।<br>उपयेमे महाभागां देवकीं देवतोपमाम्॥ ५हे महामुने! पूर्वकालमें देवककी महाभाग्यशालिनी पुत्री देवीस्वरूपा देवकीके साथ वसुदेवजीने विवाह किया॥ ५॥
कंसस्तयोर्वररथं चोदयामास सारथिः।<br>वसुदेवस्य देवक्याः संयोगे भोजनन्दनः॥ ६वसुदेव और देवकीके वैवाहिक सम्बन्ध होनेके अनन्तर [विदा होते समय] भोजनन्दन कंस सारथि बनकर उन दोनोंका माङ्गलिक रथ हाँकने लगा॥ ६॥
अथान्तरिक्षे वागुच्चैः कंसमाभाष्य सादरम्।<br>मेघगम्भीरनिर्घोषं समाभाष्येदमब्रवीत्॥ ७उसी समय मेघके समान गम्भीर घोष करती हुई आकाशवाणी कंसको ऊँचे स्वरसे सम्बोधन करके यों बोली—॥ ७॥
यामेतां वहसे मूढ सह भर्त्रा रथे स्थिताम्।<br>अस्यास्तवाष्टमो गर्भः प्राणानपहरिष्यति॥ ८“अरे मूढ़! पतिके साथ रथपर बैठी हुई जिस देवकीको तू लिये जा रहा है इसका आठवाँ गर्भ तेरे प्राण हर लेगा”॥ ८॥
श्रीपराशर उवाच<br>इत्याकर्ण्य समुत्पाट्य खड्गं कंसो महाबलः।<br>देवकीं हन्तुमारब्धो वसुदेवोऽब्रवीदिदम्॥ ९**श्रीपराशरजी बोले—**यह सुनते ही महाबली कंस [म्यानसे] खड्ग निकालकर देवकीको मारनेके लिये उद्यत हुआ। तब वसुदेवजी यों कहने लगे—॥ ९॥

३१४

  • श्रीविष्णुपुराण *

[ अ० १ ]

न हन्तव्या महाभाग देवकी भवतानघ। समर्पयिष्ये सकलानाभिनस्योदरोद्भवान् ॥ १०

श्रीपराशर उवाच

तथेत्याह ततः कंसो वसुदेवं द्विजोत्तम। न घातयामास च तां देवकीं सत्यगौरवात् ॥ ११ एतस्मिन्नेव काले तु भूरिभारावपीडिता। जगाम धरणी मेरी समाजं त्रिदिवौकसाम् ॥ १२ सब्रह्मकान्सुरान्सर्वान्प्रणिपत्त्याथ मेदिनी। कथयामास तत्सर्वं खेदात्करुणभाषिणी ॥ १३

भूमिरुवाच

अग्निस्सुवर्णस्य गुरुर्गवां सूर्यः परो गुरुः। ममाप्यखिललोकानां गुरुनारायणो गुरुः ॥ १४ प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा पूर्वेषामपि पूर्वजः। कलाक्रांठानिमेधात्मा कलशचाव्यक्तमूर्तिमान् ॥ १५ तदंशभूतस्सर्वेषां समूहो वसुरोत्तमाः ॥ १६ आदित्या मरुतस्साध्या रुद्रा वस्वशिववहनयः। पितरो ये च लोकानां स्वष्टारोऽत्रिपुरोगमाः ॥ १७ एते तस्याप्रमेयस्य विष्णो रूपं महात्मनः ॥ १८ यक्षराक्षसदैत्यपिशाचोरगदानवाः । गन्धर्वाप्सरसश्चैव रूपं विष्णोर्महात्मनः ॥ १९ ग्रहर्क्ष्तिरकाचित्रगगनानिजलानिलाः। अहं च विषयाश्चैव सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥ २० तथाप्यनेकरूपस्य तस्य रूपाण्यहर्निशम्। बाध्यबाधकतां यान्ति कल्लोला इव सागरे ॥ २१ तत्साम्प्रतममी दैत्याः कालनेमिपुरोगमाः। मर्त्यलोकं समाक्रम्य बाधन्तेऽहर्निशं प्रजाः ॥ २२ कालनेमिर्हतो योऽसौ विष्णुना प्रभविष्णुना। उग्रसेनसुतः कंससम्भूतस्स महासुरः ॥ २३ अरिष्टो धेनुकः केशी प्रलम्बो नरकस्तथा। सुन्दोऽसुरस्तथात्युगो बाणश्चापि बलैस्सुतः ॥ २४ तथान्ये च महावीर्या नृपाणां भवनेषु ये। समुत्पन्ना दुरात्मानस्तान् संख्यातुमुत्सहे ॥ २५

“हे महाभाग! हे अनघ! आप देवकीका वध न करें; मैं इसके गर्भसे उत्पन्न हुए सभी बालक आपको सौंप दूँगा” ॥ १० ॥

श्रीपराशरजी बोले—हे द्विजोत्तम! तब सत्यके गौरवसे कंसने वसुदेवजीसे ‘बहुत अच्छा’ कह देवकीका वध नहीं किया ॥ ११ ॥ इसी समय अत्यन्त भारसे पीडित होकर पृथिवी [गौका रूप धारणकर] सुमेरुपर्वतपर देवताओंके दलमें गयी ॥ १२ ॥ वहाँ उसने ब्रह्माजीके सहित समस्त देवताओंको प्रणामकर खेदपूर्वक करुणस्वरसे बोलती हुई अपना सारा वृत्तान्त कहा ॥ १३ ॥

पृथिवी बोली—जिस प्रकार अग्नि सुवर्णका तथा सूर्य गो (किरण)-समूहका परमगुरु है, उसी प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके गुरु श्रीनारायण मेरे गुरु हैं ॥ १४ ॥ वे प्रजापतियोंके पति और पूर्वजोंके पूर्वज ब्रह्माजी हैं तथा वे ही कला-काष्ठा-निमेष-स्वरूप अत्यन्त मूर्तिमान् काल हैं। हे देवश्रेष्ठगण! आप सब लोगोंका समूह भी उन्हींका अंशस्वरूप हैं ॥ १५-१६ ॥ आदित्य, मरुद्गण, साध्यगण, रुद्र, वसु, अग्नि, पितृगण और अत्रि आदि प्रजापतिगण—ये सब अप्रमेय महात्मा विष्णुके ही रूप हैं ॥ १७-१८ ॥ यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, सर्प, दानव, गन्धर्व और अप्सरा आदि भी महात्मा विष्णुके ही रूप हैं ॥ १९ ॥ ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणोंसे चित्रित आकाश, अग्नि, जल, वायु, मैं और इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषय—यह सारा जगत् विष्णुमय ही है ॥ २० ॥ तथापि उन अनेक रूपधारी विष्णुके ये रूप समुद्रकी तरंगोंके समान रात-दिन एक-दूसरेके बाध्य-बाधक होते रहते हैं ॥ २१ ॥

इस समय कालनेमि आदि दैत्यगण मर्त्यलोकपर अधिकार जमाकर अहर्निश जनताको क्लेशित कर रहे हैं ॥ २२ ॥ जिस कालनेमिको सामर्थ्यवान् भगवान् विष्णुने मारा था, इस समय वही उग्रसेनके पुत्र महान् असुर कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ है ॥ २३ ॥ अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, सुन्द, बलिका पुत्र अति भयंकर बाणासुर तथा और भी जो महाबलवान् दुरात्मा राक्षस राजाओंके घरमें उत्पन्न हो गये हैं उनकी मैं गणना नहीं कर सकती ॥ २४-२५ ॥

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अ० १ ] * पञ्चम अंश * ३१५


अक्षौहिण्योऽत्र बहुला दिव्यमूर्त्तिधरासुराः।<br>महाबलानां दृप्तानां दैत्येन्द्राणां ममोपरि॥ २६हे दिव्यमूर्त्तिधारी देवगण! इस समय मेरे ऊपर महाबलवान् और गर्वीले दैत्यराजोंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं॥ २६॥
तद्भूरिभारपीडार्त्ता न शक्नोम्यमरेश्वराः।<br>विभर्त्तुमात्मानमह्मिति विज्ञापयामि वः॥ २७हे अमरेश्वरो! मैं आपलोगोंको यह बतलाये देती हूँ कि अब मैं उनके अत्यन्त भारसे पीडित होकर अपनेको धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ॥ २७॥
क्रियतां तन्महाभागा मम भारावतारणम्।<br>यथा रसातलं नाहं गच्छेयमतिविह्वला॥ २८अतः हे महाभागगण! आपलोग मेरे भार उतारनेका अब कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे मैं अत्यन्त व्याकुल होकर रसातलको न चली जाऊँ॥ २८॥
इत्याकर्ण्य धरावाक्यमशेषैस्त्रिदशेश्वरैः।<br>भुवो भारावतारार्थं ब्रह्मा प्राह प्रचोदितः॥ २९पृथिवीके इन वाक्योंको सुनकर उसके भार उतारनेके विषयमें समस्त देवताओंकी प्रेरणासे भगवान् ब्रह्माजीने कहना आरम्भ किया॥ २९॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—
यथाह वसुधा सर्वं सत्यमेव दिवौकसः।<br>अहं भवो भवन्तश्च सर्वे नारायणत्मकाः॥ ३०हे देवगण! पृथिवीने जो कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य ही है, वास्तवमें मैं, शंकर और आप सब लोग नारायणस्वरूप ही हैं॥ ३०॥
विभूतयश्च यास्तस्य तासामेव परस्परम्।<br>आधिक्यं न्यूनता बाध्यबाधकत्वेन वर्तते॥ ३१उनकी जो-जो विभूतियाँ हैं, उनकी परस्पर न्यूनता और अधिकता ही बाध्य तथा बाधकरूपसे रहा करती है॥ ३१॥
तदागच्छत गच्छाम क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम्।<br>तत्राराध्य हरिं तस्मै सर्वं विज्ञापयाम वै॥ ३२इसलिये आओ, अब हमलोग क्षीरसागरके पवित्र तटपर चलें, वहाँ श्रीहरिकी आराधना कर यह सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दें॥ ३२॥
सर्वथैव जगत्यर्थे स सर्वात्मा जगन्मयः।<br>सत्त्वांशेनावतीर्योर्व्यां धर्मस्य कुरुते स्थितिम्॥ ३३वे विश्वरूप सर्वात्मा सर्वथा संसारके हितके लिये ही अपने शुद्ध सत्त्वांशसे अवतीर्ण होकर पृथिवीमें धर्मकी स्थापना करते हैं॥ ३३॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र सह देवैः पितामहः।<br>समाहितमनाश्चैवं तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ३४ऐसा कहकर देवताओंके सहित पितामह ब्रह्माजी वहाँ गये और एकाग्रचित्तसे श्रीगरुडध्वज भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ३४॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—
द्वे विद्ये त्वमनाम्नाय परा चैवापरा तथा।<br>त एव भवतो रूपे मूर्त्तामूर्त्तात्मिके प्रभो॥ ३५हे वेदवाणीके अगोचर प्रभो! परा और अपरा—ये दोनों विद्याएँ आप ही हैं। हे नाथ! वे दोनों आपहीके मूर्त्त और अमूर्त्त रूप हैं॥ ३५॥
द्वे ब्रह्मणी त्वणीयोऽतिस्थूलात्मन्सर्व सर्ववित्।<br>शब्दब्रह्म परं चैव ब्रह्म ब्रह्ममयस्य यत्॥ ३६हे अत्यन्त सूक्ष्म! हे विराट्स्वरूप! हे सर्व! हे सर्वज्ञ! शब्दब्रह्म और परब्रह्म—ये दोनों आप ब्रह्ममयके ही रूप हैं॥ ३६॥
ऋग्वेदस्त्वं यजुर्वेदस्सामवेदस्त्वथर्वणः।<br>शिक्षा कल्पो निरुक्तं च च्छन्दो ज्योतिषमेव च॥ ३७आप ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं तथा आप ही शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-शास्त्र हैं॥ ३७॥
इतिहासपुराणे च तथा व्याकरणं प्रभो।<br>मीमांसा न्यायशास्त्रं च धर्मशास्त्राण्यधोक्षज॥ ३८हे प्रभो! हे अधोक्षज! इतिहास, पुराण, व्याकरण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र—ये सब भी आप ही हैं॥ ३८॥
आत्मात्मदेहगुणवद्विचाराचारि यद्वचः।<br>तदप्याद्यपते नान्यदध्यात्मात्मस्वरूपवत्॥ ३९हे आद्यपते! जीवात्मा, परमात्मा, स्थूल-सूक्ष्म-देह तथा उनका कारण अव्यक्त—इन सबके विचारसे युक्त जो अन्तर्रात्मा और परमात्माके स्वरूपका बोधक [तत्त्वमसि] वाक्य है, वह भी आपसे भिन्न नहीं है॥ ३९॥

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३१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १


त्वमव्यक्तमनिर्देश्यमचिन्त्यानामवर्णवत् ।
अपाणिपादरूपं च शुद्धं नित्यं परात्परम् ॥ ४०
शृणोष्यकर्णः परिपश्यसि त्व-
  मचक्षुरेको बहुरूपरूपः ।
अपादहस्तो जवनो ग्रहीता
  त्वं वेत्सि सर्वं न च सर्ववेद्यः ॥ ४१
अणोरणीयांसमसत्स्वरूपं
  त्वां पश्यतोऽज्ञाननिवृत्तिरग्र्या ।
धीरस्य धीरस्य बिभर्त्ति नान्य-
  द्वरेण्यरूपात्परतः परात्मन् ॥ ४२
त्वं विश्वनाभिर्भुवनस्य गोप्ता
  सर्वाणि भूतानि तवान्तराणि ।
यद्भूतभव्यं यदणोरणीयः
  पुमांस्त्वमेकः प्रकृतेः परस्तात् ॥ ४३
एकश्चतुर्द्धा भगवान्हुताशो
  वर्चोविभूतिं जगतो ददासि ।
त्वं विश्वतश्चक्षुरनन्तमूर्त्ते
  त्रेधा पदं त्वं निदधासि धातः ॥ ४४
यथाग्निरेको बहुधा समिध्यते
  विकारभेदैरविकाररूपः ।
तथा भवान्सर्वगतैकरूपी
  रूपाण्यशेषाण्यनुपुष्यतीश ॥ ४५
एकं त्वमग्र्यं परमं पदं य-
  त्पश्यन्ति त्वां सूरयो ज्ञानदृश्यम् ।
त्वत्तो नान्यत्किञ्चिदस्ति स्वरूपं
  यद्वा भूतं यच्च भव्यं परात्मन् ॥ ४६
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपस्त्वं समष्टिव्यष्टिरूपवान् ।
सर्वज्ञस्सर्ववित्सर्वशक्तिज्ञानबलर्द्धिमन् ॥ ४७
अन्यूनश्चाप्यवृद्धिश्च स्वाधीनो नादिमान्वशी ।
क्लमतन्द्राभयक्रोधकामादिभिरसंयुतः ॥ ४८
निरवद्यः परः प्राप्तेर्निरधिष्ठोऽक्षरः क्रमः ।
सर्वेश्वरः पराधारो धाम्नां धामात्मकोऽक्षयः ॥ ४९


[हिन्दी अनुवाद]

आप अव्यक्त, अनिर्वाच्य, अचिन्त्य, नाम-वर्णसे रहित, हाथ-पाँव तथा रूपसे हीन, शुद्ध, सनातन और परसे भी पर हैं ॥ ४० ॥ आप कर्णहीन होकर भी सुनते हैं, नेत्रहीन होकर भी देखते हैं, एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, हस्त-पादादिसे रहित होकर भी बड़े वेगशाली और ग्रहण करनेवाले हैं तथा सबके अवेद्य होकर भी सबको जाननेवाले हैं ॥ ४१ ॥ हे परात्मन् ! जिस धीर पुरुषकी बुद्धि आपके श्रेष्ठतम रूपसे पृथक् और कुछ भी नहीं देखती, आपके अणुसे भी अणु और दृश्य-स्वरूपको देखनेवाले उस पुरुषकी आत्यन्तिक अज्ञाननिवृत्ति हो जाती है ॥ ४२ ॥ आप विश्वके केन्द्र और त्रिभुवनके रक्षक हैं; सम्पूर्ण भूत आपहीमें स्थित हैं तथा जो कुछ भूत, भविष्यत् और अणुसे भी अणु है वह सब आप प्रकृतिसे परे एकमात्र परमपुरुष ही हैं ॥ ४३ ॥ आप ही चार प्रकारका अग्नि होकर संसारको तेज और विभूति दान करते हैं। हे अनन्तमूर्ते ! आपके नेत्र सब ओर हैं। हे धातः ! आप ही [त्रिविक्रमावतारमें] तीनों लोकमें अपने तीन पग रखते हैं ॥ ४४ ॥ हे ईश! जिस प्रकार एक ही अविकारी अग्नि विकृत होकर नाना प्रकारसे प्रज्वलित होता है, उसी प्रकार सर्वगतरूप एक आप ही अनन्त रूप धारण कर लेते हैं ॥ ४५ ॥ एकमात्र जो श्रेष्ठ परमपद है; वह आप ही हैं, ज्ञानी पुरुष ज्ञानदृष्टिसे देखे जाने-योग्य आपको ही देखा करते हैं। हे परात्मन्! भूत और भविष्यत् जो कुछ स्वरूप है वह आपसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ४६ ॥ आप व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप हैं, समष्टि और व्यष्टिरूप हैं तथा आप ही सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी, सर्वशक्तिमान् एवं सम्पूर्ण ज्ञान, बल और ऐश्वर्यसे युक्त हैं ॥ ४७ ॥ आप ह्रास और वृद्धिसे रहित, स्वाधीन, अनादि और जितेन्द्रिय हैं तथा आपके अन्दर श्रम, तन्द्रा, भय, क्रोध और काम आदि नहीं हैं ॥ ४८ ॥ आप अनिन्द्य, अप्राप्य, निराधार और अव्याहत गति हैं, आप सबके स्वामी, अन्य ब्रह्मादिके आश्रय तथा सूर्यादि तेजोंके तेज एवं अविनाशी हैं ॥ ४९ ॥


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