विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 310, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 310
अ० २० ] * चतुर्थ अंश * २९९
| यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं यौवनमेति सः।<br>शान्तिं चाप्नोति येनाग्र्यां कर्मणा तेन शान्तनुः ॥ १३ | ''[राजा शान्तनु] जिसको-जिसको अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे वे वृद्ध पुरुष भी युवावस्था प्राप्त कर लेते थे तथा उनके स्पर्शसे सम्पूर्ण जीव अत्युत्तम शान्तिलाभ करते थे, इसलिये वे शान्तनु कहलाते थे'' ॥ १३ ॥ |
| तस्य च शान्तनो राष्ट्रे द्वादशवर्षाणि देवो न ववर्ष ॥ १४ ॥ ततश्चाशेषराष्ट्रविनाशमवेक्ष्यासौ राजा ब्राह्मणानपृच्छत् कस्मादस्माकं राष्ट्रे देवो न वर्षति को ममापराध इति ॥ १५ ॥ | एक बार महाराज शान्तनुके राज्यमें बारह वर्षतक वर्षा न हुई ॥ १४ ॥ उस समय सम्पूर्ण देशको नष्ट होता देखकर राजाने ब्राह्मणोंसे पूछा—'हमारे राज्यमें वर्षा क्यों नहीं हुई? इसमें मेरा क्या अपराध है?' ॥ १५ ॥ |
| ततश्च तमूचुर्ब्राह्मणाः ॥ १६ ॥ अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया सम्भुज्यते अतः परिवेत्ता त्वमित्युक्तस्स राजा पुनस्तानपृच्छत् ॥ १७ ॥ किं मयात्र विधेयमिति ॥ १८ ॥ | तब ब्राह्मणोंने उससे कहा—'यह राज्य तुम्हारे बड़े भाईका है किन्तु इसे तुम भोग रहे हो; इसलिये तुम परिवेत्ता हो।' उनके ऐसा कहनेपर राजा शान्तनुने उनसे फिर पूछा—'तो इस सम्बन्धमें मुझे अब क्या करना चाहिये?' ॥ १६—१८ ॥ |
| ततस्ते पुनरप्यूचुः ॥ १९ ॥ यावद्देवापिर्न पतनादिभिर्दोषैरभिभूयते तावदेतत्तस्यार्हं राज्यम् ॥ २० ॥ तदलमेतेन तु तस्मै दीयतामित्युक्ते तस्य मन्त्रिप्रवरेणाश्मसारिणा तत्रारण्ये तपस्विनो वेदवादविरोधवक्तारः प्रयुक्ताः ॥ २१ ॥ तैरस्याप्यतिऋजुमतेर्महीपतिपुत्रस्य बुद्धिर्र्वेदवादविरोधमार्गानुसारिण्यक्रियत् ॥ २२ ॥ राजा च शान्तनुर्द्विजवचनोत्पन्नपरिदेवनशोकस्तान् ब्राह्मणानग्रतः कृत्वाग्रजस्य प्रदानायारण्यं जगाम ॥ २३ ॥ | इसपर वे ब्राह्मण फिर बोले—'जबतक तुम्हारा बड़ा भाई देवापि किसी प्रकार पतित न हो तबतक यह राज्य उसीके योग्य है ॥ १९-२० ॥ अतः तुम इसे उसीको दे डालो, तुम्हारा इससे कोई प्रयोजन नहीं।' ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर शान्तनुके मन्त्री अश्मसारिने वेदवादके विरुद्ध बोलनेवाले तपस्वियोंको वनमें नियुक्त किया ॥ २१ ॥ उन्होंने अतिशय सरलमति राजकुमार देवापिकी बुद्धिको वेदवादके विरुद्ध मार्गमें प्रवृत्त कर दिया ॥ २२ ॥ उधर राजा शान्तनु ब्राह्मणोंके कथनानुसार दुःख और शोकयुक्त होकर ब्राह्मणोंको आगे कर अपने बड़े भाईको राज्य देनेके लिये वनमें गये ॥ २३ ॥ |
| तदाश्रममुपगताश्च तमवनतमवनीपतिपुत्रं देवापिमुपतस्थुः ॥ २४ ॥ ते ब्राह्मणा वेदवादानुबन्धीनि वचांसि राज्यमग्रजेन कर्तव्यमित्यर्थवन्ति तमूचुः ॥ २५ ॥ असावपि देवापिर्वेदवादविरोधयुक्तिदूषितमनेकप्रकारं तानाह ॥ २६ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाश्शान्तनुमूचुः ॥ २७ ॥ आगच्छ हे राजन्नलमत्रातिनिर्बन्धेन प्रशान्त एवासावनावृष्टिदोषः पतितोऽयमनादिकालमहितवेदवचनदूषणोच्चारणात् ॥ २८ ॥ पतिते चाग्रजे नैव ते परिवेतृत्वं भवतीत्युक्तश्शान्तनुःस्वपुरमागम्य राज्यमकरोत् ॥ २९ ॥ वेदवादविरोधवचनोच्चारणदूषिते च तस्मिन्देवापौ तिष्ठत्यपि ज्येष्ठभ्रातर्यखिलसस्यनिष्पत्तये ववर्ष भगवान्पर्जन्यः ॥ ३० ॥ | वनमें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणगण परम विनीत राजकुमार देवापिके आश्रमपर उपस्थित हुए; और उससे 'ज्येष्ठ भ्राताको ही राज्य करना चाहिये'—इस अर्थके समर्थक अनेक वेदानुकूल वाक्य कहने लगे ॥ २४-२५ ॥ किन्तु उस समय देवापिने वेदवादके विरुद्ध नाना प्रकारकी युक्तियोंसे दूषित बातें कीं ॥ २६ ॥ तब उन ब्राह्मणोंने शान्तनुसे कहा— ॥ २७ ॥ "हे राजन् ! चलो, अब यहाँ अधिक आग्रह करनेकी आवश्यकता नहीं। अब अनावृष्टिका दोष शान्त हो गया। अनादिकालसे पूजित वेदवाक्योंमें दोष बतलानेके कारण देवापि पतित हो गया है ॥ २८ ॥ ज्येष्ठ भ्राताके पतित हो जानेसे अब तुम परिवेत्ता नहीं रहे।" उनके ऐसा कहनेपर शान्तनु अपनी राजधानीको चले आये और राज्यशासन करने लगे ॥ २९ ॥ वेदवादके विरुद्ध वचन बोलनेके कारण देवापिके पतित हो जानेसे, बड़े भाईके रहते हुए भी सम्पूर्ण धान्योंकी उत्पत्तिके लिये पर्जन्यदेव (मेघ) बरसने लगे ॥ ३० ॥ |