भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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२८८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४

भजमानाच्च विदूरथः पुत्रोऽभवत् ॥ २२॥
विदूरथाच्छूरः शूराच्छमी शमिनः प्रतिक्षत्रः
तस्मात्स्वयंभोजस्ततश्च हृदिकः ॥ २३ ॥ तस्यापि
कृतवर्मशतधनुर्देवार्हदेवगर्भाद्याः पुत्रा
बभूवुः ॥ २४ ॥ देवगर्भस्यापि शूरः ॥ २५॥
शूरस्यापि मारिषा नाम पत्न्यभवत् ॥ २६ ॥ तस्यां
चासौ दशपुत्रानजनयद्वसुदेवपूर्वान् ॥ २७॥
वसुदेवस्य जातमात्रस्यैव तद्गृहे
भगवदंशावतारमव्याहतदृष्ट्या पश्यद्भिर्देवैर्दिव्या-
नकदुन्दुभयो वादिताः ॥ २८ ॥
ततश्चासावानकदुन्दुभिसंज्ञामवाप ॥ २९ ॥ तस्य
च देवभागदेवश्रवोऽष्टकककुच्चक्र वत्सधा-
रकस्सृञ्जयश्यामशमिकगण्डूषसंज्ञा नव
भ्रातरोऽभवन् ॥ ३० ॥ पृथा श्रुतदेवा श्रुतकीर्तिः
श्रुतश्रवा राजाधिदेवी च वसुदेवादीनां पञ्च
भगिन्योऽभवन् ॥ ३१ ॥

शूरस्य कुन्तिर्नाम सखाभवत् ॥ ३२॥
तस्मै चापुत्राय पृथामात्मजां विधिना शूरो
दत्तवान् ॥ ३३॥ तां च पाण्डुरुवाह ॥ ३४ ॥
तस्यां च धर्मानिलेन्द्रैर्युधिष्ठिरभीमसेनार्जुना-
ख्यास्त्रयः पुत्रास्समुत्पादिताः ॥ ३५ ॥
पूर्वमेवानूढायाञ्च भगवता भास्वता कानीनः
कर्णो नाम पुत्रोऽजनयत ॥ ३६ ॥ तस्याश्च सपत्नी
माद्री नामाभूत् ॥ ३७ ॥ तस्यां च नासत्यदस्राभ्यां
नकुलसहदेवौ पाण्डोः पुत्रौ जनितौ ॥ ३८ ॥

श्रुतदेवां तु वृद्धधर्मा नाम कारूश
उपयेमे ॥ ३९ ॥ तस्यां च दन्तवक्रो नाम महासुरो
जज्ञे ॥ ४० ॥ श्रुतकीर्तिमपि केकयराज
उपयेमे ॥ ४१ ॥ तस्यां च सन्तर्दनादयः कैकेयाः
पञ्च पुत्रा बभूवुः ॥ ४२ ॥ राजाधिदेव्यामावन्त्यौ
विन्दानुविन्दौ जज्ञाते ॥ ४३ ॥ श्रुतश्रवसमपि
चेदिराजो दमघोषनामोपयेमे ॥ ४४ ॥ तस्यां
च शिशुपालमुत्पादयामास ॥ ४५ ॥ स
वा पूर्वमप्युदारविक्रमो दैत्यानामादि-
पुरुषो हिरण्यकशिपुरभवत् ॥ ४६ ॥

भजमानका पुत्र विदूरथ हुआ; विदूरथके शूर, शूरके शमी, शमीके प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रके स्वयंभोज, स्वयंभोजके हृदिक तथा हृदिकके कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह और देवगर्भ आदि पुत्र हुए। देवगर्भके पुत्र शूरसेन थे॥ २२—२५॥ शूरसेनकी मारिषा नामकी पत्नी थी। उससे उन्होंने वसुदेव आदि दस पुत्र उत्पन्न किये॥ २६-२७॥ वसुदेवके जन्म लेते ही देवताओंने अपना अव्याहत दृष्टिसे यह देखकर कि इनके घरमें भगवान् अंशावतार लेंगे, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बजाये थे॥ २८॥ इसीलिये इनका नाम आनकदुन्दुभि भी हुआ॥ २९॥ इनके देवभाग, देवश्रवा, अष्टक, ककुच्चक्र, वत्सधारक, सृंजय, श्याम, शमिक और गण्डूष नामक नौ भाई थे॥ ३०॥ तथा इन वसुदेव आदि दस भाइयोंकी पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी—ये पाँच बहिनें थीं॥ ३१॥

शूरसेनके कुन्ति नामक एक मित्र थे॥ ३२॥ वे निःसन्तान थे, अतः शूरसेनने दत्तक-विधिसे उन्हें अपनी पृथा नामकी कन्या दे दी थी॥ ३३॥ उसका राजा पाण्डुके साथ विवाह हुआ॥ ३४॥ उसके धर्म, वायु और इन्द्रके द्वारा क्रमशः युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन नामक तीन पुत्र हुए॥ ३५॥ इनके पहले इसके अविवाहितावस्थामें ही भगवान् सूर्यके द्वारा कर्ण नामक एक कानीन* पुत्र और हुआ था॥ ३६॥ इसकी माद्री नामकी एक सपत्नी थी॥ ३७॥ उसके अश्विनीकुमारोंद्वारा नकुल और सहदेव नामक पाण्डुके दो पुत्र हुए॥ ३८॥

शूरसेनकी दूसरी कन्या श्रुतदेवाका कारूश-नरेश वृद्धधर्मासे विवाह हुआ था॥ ३९॥ उससे दन्तवक्र नामक महादैत्य उत्पन्न हुआ॥ ४०॥ श्रुतकीर्तिको केकयराजने विवाहा था॥ ४१॥ उससे केकय-नरेशके सन्तर्दन आदि पाँच पुत्र हुए॥ ४२॥ राजाधिदेवीसे अवन्तिदेशीय विन्द और अनुविन्दका जन्म हुआ॥ ४३॥ श्रुतश्रवाका भी चेदिराज दमघोषने पाणिग्रहण किया॥ ४४॥ उससे शिशुपालका जन्म हुआ॥ ४५॥ पूर्वजन्ममें यह अतिशय पराक्रमी हिरण्यकशिपु नामक दैत्योंका मूल पुरुष हुआ था जिसे सकल लोकगुरु


* अविवाहिता कन्याके गर्भसे हुए पुत्रको 'कानीन' कहते हैं।