विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १३
अथाहाक्रूरः स एष मणिः शतधन्वनास्माकं समर्पितः यस्यायं स एनं गृह्णातु इति ॥ १४८ ॥ तमालोक्य सर्वयादवानां साधुसाध्विति विस्मितमनसां वाचोऽश्रूयन्त ॥ १४९ ॥ तमालोक्यातीव बलभद्रो ममायमच्युतेनैव सामान्यस्समन्वीप्सित इति कृतस्पृहोऽभूत् ॥ १५० ॥ ममैवायं पितृधनमित्यतीव च सत्यभामापि स्पृहयाञ्चकार ॥ १५१ ॥ बलसत्यावलोकनात्कृष्णोऽप्यात्मानं गोचक्रान्तरावस्थितमिव मेने ॥ १५२ ॥ सकलयादवसमक्षं चाक्रूरमाह ॥ १५३ ॥ एतद्धि मणिरत्नमात्मसंशोधनाय एतेषां यदूनां मया दर्शितम् एतच्च मम बलभद्रस्य च सामान्यं पितृधनं चैतत् सत्यभामाया नान्यस्यैतत् ॥ १५४ ॥ एतच्च सर्वकालं शुचिना ब्रह्मचर्यादिगुणवता ध्रियमाणमशेषराष्ट्रस्योपकारकमशुचिना ध्रियमाणमाधारमेव हन्ति ॥ १५५ ॥ अतोऽहमस्य षोडशस्त्रीसहस्रपरिग्रहादसमर्थो धारणे कथमेतत् सत्यभामा स्वीकरोति ॥ १५६ ॥ आर्यबलभद्रेणापि मदिरापानाद्यशेषोपभोगपरित्यागः कार्यः ॥ १५७ ॥ तदलं यदुलोकोऽयं बलभद्रः अहं च सत्या च त्वां दानपते प्रार्थयामः ॥ १५८ ॥ तद्भवानेव धारयितुं समर्थः ॥ १५९ ॥ त्वद्धृतं चास्य राष्ट्रस्योपकारकं तद्द्वानशेषाष्ट्रनिमित्तमेतत्पूर्ववद्धारयत्वन्यन्न वक्तव्यमित्युक्तो दानपतिस्तथेत्याह जग्राह च तन्महारत्नम् ॥ १६० ॥ ततः प्रभृत्यक्रूरः प्रकटेनैव तेनातिजाज्वल्यमानेनात्मकण्ठावसक्तेनादित्य इवांशुमाली चचार ॥ १६१ ॥ इत्येतद्भगवतो मिथ्याभिशस्तिप्रक्षालनं यः स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति अव्याहताखिलेन्द्रियश्चाखिलपापमोक्षमवाप्नोति ॥ १६२ ॥
तब अक्रूरजीने कहा—'मुझे यह मणि शतधन्वाने दी थी, यह जिसकी हो वह ले ले॥ १४८॥ उसको देखनेपर सभी यादवोंका विस्मयपूर्वक 'साधु, साधु' यह वचन सुना गया॥ १४९॥ उसे देखकर बलभद्रजीने 'अच्युतके ही समान इसपर मेरा भी अधिकार है' इस प्रकार अपनी अधिक स्पृहा दिखलायी॥ १५०॥ तथा 'यह मेरी ही पैतृक सम्पत्ति है' इस तरह सत्यभामाने भी उसके लिये अपनी उत्कट अभिलाषा प्रकट की॥ १५१॥ बलभद्र और सत्यभामाको देखकर कृष्णचन्द्रने अपनेको बैल और पहियेके बीचमें पड़े हुए जीवके समान दोनों ओरसे संकटग्रस्त देखा॥ १५२॥ और समस्त यादवोंके सामने वे अक्रूरजीसे बोले—॥ १५३॥ "इस मणिरत्नको मैंने अपनी सफाई देनेके लिये ही इन यादवोंको दिखवाया था। इस मणिपर मेरा और बलभद्रजीका तो समान अधिकार है और सत्यभामाकी यह पैतृक सम्पत्ति है; और किसीका इसपर कोई अधिकार नहीं है॥ १५४॥ यह मणि सदा शुद्ध और ब्रह्मचर्य आदि गुणयुक्त रहकर धारण करनेसे सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करती है और अशुद्धावस्थामें धारण करनेसे अपने आश्रयदाताको भी मार डालती है॥ १५५॥ मेरे सोलह हजार स्त्रियाँ हैं, इसलिये मैं इसके धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ, इसीलिये सत्यभामा भी इसको कैसे धारण कर सकती है?॥ १५६॥ आर्य बलभद्रको भी इसके कारणसे मदिरापान आदि सम्पूर्ण भोगोंको त्यागना पड़ेगा॥ १५७॥ इसलिये हे दानपते! ये यादवगण, बलभद्रजी, मैं और सत्यभामा सब मिलकर आपसे प्रार्थना करते हैं कि इसे धारण करनेमें आप ही समर्थ हैं॥ १५८-१५९॥ आपके धारण करनेसे यह सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करेगी, इसलिये सम्पूर्ण राष्ट्रके मंगलके लिये आप ही इसे पूर्ववत् धारण कीजिये; इस विषयमें आप और कुछ भी न कहें।" भगवान्के ऐसा कहनेपर दानपति अक्रूरने 'जो आज्ञा' कह वह महारत्न ले लिया। तबसे अक्रूरजी सबके सामने उस अति देदीप्यमान मणिको अपने गलेमें धारणकर सूर्यके समान किरण-जालसे युक्त होकर विचरने लगे॥ १६०-१६१॥ भगवान्के मिथ्या-कलंक-शोधनरूप इस प्रसंगका जो कोई स्मरण करेगा उसे कभी थोड़ा-सा भी मिथ्या कलंक न लगेगा, उसकी समस्त इन्द्रियाँ समर्थ रहेंगी तथा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ १६२॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥