भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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२८२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३


तदन्यश्शरणमभिलष्यतामित्युक्तश्शतधनु-<br>राह॥८६॥ यद्यस्मत्परित्राणासमर्थ<br>भवानात्मानमधिगच्छति तदयमस्मत्तस्तावन्मणिः<br>संगृह्य रक्ष्यतामिति ॥८७॥ एवमुक्तः<br>सोऽप्याह॥८८॥ यद्यन्तायामप्यवस्थायां न<br>कस्मैचिद्भगवान् कथयिष्यति तदहमेतं<br>ग्रहीष्यामीति॥८९॥ तथेत्युक्ते चाक्रूरस्तन्मणिरत्नं<br>जग्राह॥९०॥इसलिये तुम दूसरेकी शरण लो' अक्रूरके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने कहा—॥८६॥ 'अच्छा, यदि मेरी रक्षा करनेमें आप अपनेको सर्वथा असमर्थ समझते हैं तो मैं आपको यह मणि देता हूँ इसे लेकर इसीकी रक्षा कीजिये'॥८७॥ इसपर अक्रूरने कहा—॥८८॥ 'मैं इसे तभी ले सकता हूँ जब कि अन्तकाल उपस्थित होनेपर भी तुम किसीसे भी यह बात न कहो॥८९॥ शतधन्वाने कहा—'ऐसा ही होगा।' इसपर अक्रूरने वह मणिरत्न अपने पास रख लिया॥९०॥
शतधनुरप्यतुलवेगां शतयोजनवाहिनीं<br>वडवामारुह्यापक्रान्तः॥९१॥ शैव्यसुग्रीव-<br>मेघपुष्पबलाहकाश्वचतुष्टययुक्तरथस्थितौ<br>बलदेववासुदेवौ तमनुप्रयातौ॥९२॥ सा च वडवा<br>शतयोजनप्रमाणमार्गमतीता पुनरपि वाह्यमाना<br>मिथिलावनोद्देशे प्राणानुत्ससर्ज॥९३॥<br>शतधनुरपि तां परित्यज्य पदातिरेवाद्ववत्॥९४॥<br>कृष्णोऽपि बलभद्रमाह ॥९५॥ तावदत्र स्यन्दने<br>भवता स्थेयमहमेनमधमाचारं पदातिरेव<br>पदातिमनुगम्य यावद्घातयामि अत्र हि भूभागे<br>दृष्टदोषास्सम्भया अतो नैतेऽश्वा भवतेमं भूमि-<br>भागमुल्लङ्घनीयाः॥९६॥ तथेत्युक्त्वा बलदेवो<br>रथ एव तस्थौ॥९७॥तदनन्तर शतधन्वा सौ योजनतक जानेवाली एक अत्यन्त वेगवती घोड़ीपर चढ़कर भागा॥९१॥ और शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नामक चार घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर बलदेव और वासुदेवने भी उसका पीछा किया॥९२॥ सौ योजन मार्ग पार कर जानेपर पुनः आगे ले जानेसे उस घोड़ीने मिथिला देशके वनमें प्राण छोड़ दिये॥९३॥ तब शतधन्वा उसे छोड़कर पैदल ही भागा॥९४॥ उस समय श्रीकृष्णचन्द्रने बलभद्रजीसे कहा—॥९५॥ 'आप अभी रथमें ही रहिये मैं इस पैदल दौड़ते हुए दुराचारीको पैदल जाकर ही मारे डालता हूँ। यहाँ [घोड़ीके मरने आदि] दोषोंको देखनेसे घोड़े भयभीत हो रहे हैं, इसलिये आप इन्हें और आगे न बढ़ाइयेगा॥९६॥ तब बलदेवजी 'अच्छा' ऐसा कहकर रथमें ही बैठे रहे॥९७॥
कृष्णोऽपि द्विक्रोशमात्रं भूमिभागमनुसृत्य<br>दूरस्थितस्यैव चक्रं क्षिप्त्वा शतधनुषशिर-<br>श्शिच्छेद॥९८॥ तच्छरीराम्बरादिषु च बहुप्रकार-<br>मन्विच्छन्नपि स्यमन्तकमणिं नावाप यदा तदोपगम्य<br>बलभद्रमाह॥९९॥ वृथैवास्माभिः शतधनुर्घातितो<br>न प्राप्तमखिलजगत्सारभूतं तन्महारत्नं<br>स्यमन्तकाख्यमित्याकर्ण्योद्भूतकोपो बलदेवोश्रीकृष्णचन्द्रने केवल दो ही कोसतक पीछाकर अपना चक्र फेंक दूर होनेपर भी शतधन्वाका सिर काट डाला॥९८॥ किन्तु उसके शरीर और वस्त्र आदिमें बहुत कुछ ढूँढ़नेपर भी जब स्यमन्तकमणिको न पाया तो बलभद्रजीके पास जाकर उनसे कहा—॥९९॥ "हमने शतधन्वाको व्यर्थ ही मारा, क्योंकि उसके पास सम्पूर्ण संसारकी सारभूत स्यमन्तकमणि तो मिली ही नहीं।' यह सुनकर बलदेवजीने [यह समझकर कि श्रीकृष्णचन्द्र उस मणिको छिपानेके लिये ही ऐसी बातें बना रहे हैं]