विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 292, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 292
अ० १३ ] * चतुर्थ अंश * २८१
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| गते च तस्मिन् सुप्तमेव सत्राजितं शतधन्वा जघान मणिरत्नं चाददात् ॥ ७१ ॥ पितृवधामर्षपूर्णा च सत्यभामा शीघ्रं स्यन्दनमारूढा वारणावतं गत्वा भगवतेऽहं प्रतिपादितेत्यक्षान्तिमतो शतधन्वनास्मत्पिता व्यापादितस्तच्च स्यमन्तक-मणिरत्नमपहृतं यस्यावभासनेनापहततिमिरं त्रैलोक्यं भविष्यति ॥ ७२ ॥ तदियं त्वदीयापहासना तदालोच्य यदत्र युक्तं तत्क्रियतामिति कृष्णमाह ॥ ७३ ॥<br><br>तया चैवमुक्तः परितुष्टान्तःकरणोऽपि कृष्णः सत्यभामाममर्षताम्रनयनः प्राह ॥ ७४ ॥ सत्ये सत्यं ममैवैषापहासना नाहमेतां तस्य दुरात्मनस्सहिष्ये ॥ ७५ ॥ न ह्यनुल्लंघ्य वरपादपं तत्कृतनीडाश्रयिणो विहङ्गमा वध्यन्ते तदलमुमुनास्मत्पुरतः शोकप्रेरितवाक्यपरिकरेणेत्युक्त्वा द्वारकामभ्येत्येकान्ते बलदेवं वासुदेवः प्राह ॥ ७६ ॥<br><br>मृगयागतं प्रसेनमटव्यां मृगपतिर्जघान ॥ ७७ ॥<br>सत्राजिदप्यधुना शतधन्वना निधनं प्रापितः ॥ ७८ ॥<br>तदुभयविनाशात्तन्मणिरत्नमावाभ्यां सामान्यं भविष्यति ॥ ७९ ॥<br>तदुत्तिष्ठारुह्यतां रथः शतधन्वनिधनायोद्यमं कुर्वित्यभिहितस्तथेति समन्विप्सितवान् ॥ ८० ॥<br><br>कृतोद्यमौ च तावुभावुपलभ्य शतधन्वा कृतवर्माणमुपेत्य पार्ष्णिपूरणकर्मनिमित्तमचोदयत् ॥ ८१ ॥ आह चैनं कृतवर्मा ॥ ८२ ॥<br>नाहं बलदेववासुदेवाभ्यां सह विरोधायालमित्युक्तश्चाक्रूरमचोदयत् ॥ ८३ ॥ असावप्याह ॥ ८४ ॥<br><br>न हि कश्चिद्भगवता पादप्रहारपरिकम्पितजगतत्रयेण सुररिपुवनितावैधव्यकारिणा प्रबलरिपुचक्राप्रतिहतचक्रेण चक्रिणा मदमुदितनयनावलोकिताखिलनशातनेनातिगुरुवैरिवारणापकर्षणाविकृतमहिमोरुसीरेण सीरिणा च सह सकलजगद्वन्द्यानाममरवराणामपि योद्धुं समर्थः किमुताहम् ॥ ८५ ॥ | उनके चले जानेपर शतधन्वाने सोते हुए सत्राजित्को मारकर वह मणिरत्न ले लिया ॥ ७१ ॥ पिताके वधसे क्रोधित हुई सत्यभामा तुरन्त ही रथपर चढ़कर वारणावत नगरमें पहुँची और भगवान् कृष्णसे बोली—"भगवन्! पिताजीने मुझे आपके करकमलोंमें सौंप दिया—इस बातको सहन न कर सकनेके कारण शतधन्वाने मेरे पिताजीको मार दिया है और उस स्यमन्तक नामक मणिरत्नको ले लिया है जिसके प्रकाशसे सम्पूर्ण त्रिलोकी भी अन्धकारशून्य हो जायगी ॥ ७२ ॥ इसमें आपकीही हँसी है इसलिये सब बातोंका विचार करके जैसा उचित समझें, करें" ॥ ७३ ॥<br><br>सत्यभामाके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होनेपर भी उनसे क्रोधसे आँखें लाल करके कहा— ॥ ७४ ॥ "सत्ये! अवश्य इसमें मेरी ही हँसी है, उस दुरात्माके इस कुकर्मको मैं सहन नहीं कर सकता, क्योंकि यदि ऊँचे वृक्षका उल्लंघन न किया जा सके तो उसपर घोंसला बनाकर रहनेवाले पक्षियोंको नहीं मार दिया जाता। [अर्थात् बड़े आदमियोंसे पार न पानेपर उनके आश्रितोंको नहीं दबाना चाहिये।] इसलिये अब तुम्हें हमारे सामने इन शोक-प्रेरित वाक्योंके कहनेकी और आवश्यकता नहीं है। [तुम शोक छोड़ दो, मैं इसका भली प्रकार बदला चुका दूँगा।]'' सत्यभामासे इस प्रकार कह भगवान् वासुदेवने द्वारकामें आकर श्रीबलदेवजीसे एकान्तमें कहा— ॥ ७५-७६ ॥ 'वनमें आखेटके लिये गये हुए प्रसेनको तो सिंहने मार दिया था ॥ ७७ ॥ अब शतधन्वाने सत्राजित्को भी मार दिया है ॥ ७८ ॥ इस प्रकार उन दोनोंके मारे जानेपर मणिरत्न स्यमन्तकपर हम दोनोंका समान अधिकार होगा ॥ ७९ ॥ इसलिये उठिये और रथपर चढ़कर शतधन्वाके मारनेका प्रयत्न कीजिये।' कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर बलदेवजीने भी 'बहुत अच्छा' कह उसे स्वीकार किया ॥ ८० ॥<br><br>कृष्ण और बलदेवको [अपने वधके लिये] उद्यत जान शतधन्वाने कृतवर्माके पास जाकर सहायताके लिये प्रार्थना की ॥ ८१ ॥ तब कृतवर्माने इससे कहा— ॥ ८२ ॥ 'मैं बलदेव और वासुदेवसे विरोध करनेमें समर्थ नहीं हूँ।' उसके ऐसा कहनेपर शतधन्वाने अक्रूरसे सहायता माँगी, तो अक्रूरने भी कहा— ॥ ८३-८४ ॥ 'जो अपने पाद-प्रहारसे त्रिलोकीको कम्पायमान कर देते हैं, देवशत्रु असुरगणकी स्त्रियोंको वैधव्यदान देते हैं तथा अति प्रबल शत्रु-सेनासे भी जिनका चक्र अप्रतिहत रहता है उन चक्रधारी भगवान् वासुदेवसे तथा जो अपने मदोन्मत्त नयनोंकी चितवनसे सबका दमन करनेवाले और भयंकर शत्रुसमूहरूप हाथियोंको खींचनेके लिये अखण्ड महिमाशाली प्रचण्ड हल धारण करनेवाले हैं उन श्रीहलधरसे युद्ध करनेमें तो निखिल-लोक-वन्दनीय देवगणमें भी कोई समर्थ नहीं है फिर मेरी तो बात ही क्या है? ॥ ८५ ॥ |
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