विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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* चतुर्थ अंश *
२७३
कृतधर्मकृतौजसश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः॥ १०॥
कृतवीर्यादर्जुनस्सप्तद्वीपाधिपतिर्बाहुसहस्रो जज्ञे॥ ११॥ योऽसौ भगवदंशमत्रिकुलप्रसूतं दत्तात्रेयाख्यमाराध्य बाहुसहस्रमधर्मसेवानिवारणं स्वधर्मसेवित्वं रणे पृथिवीजयं धर्मतश्चानुपालनमरातिभ्योऽपराजयमखिलजगत्प्रख्यातपुरुषाच्च मृत्युमित्येतान्वरानभिलषिताँल्लेभे च॥ १२॥ तेनेयमशेषद्वीपवती पृथिवी सम्यक्परिपालिता॥ १३॥ दशयज्ञसहस्राण्यसावयजत्॥ १४॥ तस्य च श्लोकोऽद्यापि गीयते॥ १५॥
न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः।
यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रयेण श्रुतेन च॥ १६
अनष्टद्रव्यता च तस्य राज्येऽभवत्॥ १७॥ एवं च पञ्चाशीतिवर्षसहस्राण्यव्याहतारोग्यश्रीबलपराक्रमो राज्यमकरोत्॥ १८॥ माहिष्मत्यां दिग्विजयमभ्यागतो नर्मदाजलावगाहनक्रीडातिपानमदाकुलेनायत्नेनैव तेनाशेषदेवदैत्यगन्धर्वेशजयोद्भूतमदावलेपोऽपि रावणः पशुरिव बद्ध्वा स्वनगरैकान्ते स्थापितः॥ १९॥ यश्च पञ्चाशीतिवर्षसहस्रोपलक्षणकालावसाने भगवन्नारायणांशेन परशुरामेणोपसंहृतः॥ २०॥ तस्य च पुत्रशतप्रधानाः पञ्च पुत्रा बभूवुः शूरशूरसेनवृषसेनमधुजयध्वजसंज्ञाः॥ २१॥
जयध्वजात्तालजङ्घः पुत्रोऽभवत्॥ २२॥ तालजङ्घस्य तालजङ्घाख्यं पुत्रशतमासीत्॥ २३॥ एषां ज्येष्ठो वीतिहोत्रस्तथान्यौ भरतः॥ २४॥ भरताद्वृषः॥ २५॥ वृषस्य पुत्रो मधुरभवत्॥ २६॥ तस्यापि वृष्णिप्रमुखं पुत्रशतमासीत्॥ २७॥ यतो वृष्णिसंज्ञामेतद्गोत्रमवाप॥ २८॥ मधुसंज्ञाहेतुश्च मधुरभवत्॥ २९॥ यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति॥ ३०॥
हिन्दी अनुवाद
कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतधर्म और कृतौजा नामक चार पुत्र हुए॥ १०॥
कृतवीर्यके सहस्र भुजाओंवाले सप्तद्वीपाधिपति अर्जुनका जन्म हुआ॥ ११॥ सहस्रार्जुनने अत्रिकुलमें उत्पन्न भगवदंशरूप श्रीदत्तात्रेयजीकी उपासना कर 'सहस्र भुजाएँ, अधर्माचरणका निवारण, स्वधर्मका सेवन, युद्धके द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विजय, धर्मानुसार प्रजा-पालन, शत्रुओंसे अपराजय तथा त्रिलोकप्रसिद्ध पुरुषसे मृत्यु'—ऐसे कई वर माँगे और प्राप्त किये थे॥ १२॥ अर्जुनने इस सम्पूर्ण सप्तद्वीपवती पृथिवीका पालन तथा दस हजार यज्ञोंका अनुष्ठान किया था॥ १३-१४॥ उसके विषयमें यह श्लोक आजतक कहा जाता है—॥ १५॥
'यज्ञ, दान, तप, विनय और विद्यामें कार्तवीर्य—सहस्रार्जुनकी समता कोई भी राजा नहीं कर सकता'॥ १६॥
उसके राज्यमें कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता था॥ १७॥ इस प्रकार उसने बल, पराक्रम, आरोग्य और सम्पत्तिको सर्वथा सुरक्षित रखते हुए पचासी हजार वर्ष राज्य किया॥ १८॥ एक दिन जब वह अतिशय मद्य-पानसे व्याकुल हुआ नर्मदा नदीमें जल-क्रीडा कर रहा था, उसकी राजधानी माहिष्मतीपुरीपर दिग्विजयके लिये आये हुए सम्पूर्ण देव, दानव, गन्धर्व और राजाओंके विजयमदसे उन्मत्त रावणने आक्रमण किया, उस समय उसने अनायास ही रावणको पशुके समान बाँधकर अपने नगरके एक निर्जन स्थानमें रख दिया॥ १९॥ इस सहस्रार्जुनका पचासी हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् नारायणके अंशावतार परशुरामजीने वध किया था॥ २०॥ इसके सौ पुत्रोंमेंसे शूर, शूरसेन, वृषसेन, मधु और जयध्वज—ये पाँच प्रधान थे॥ २१॥
जयध्वजका पुत्र तालजंघ हुआ और तालजंघके तालजंघ नामक सौ पुत्र हुए इनमें सबसे बड़ा वीतिहोत्र तथा दूसरा भरत था॥ २२-२४॥ भरतके वृष, वृषके मधु और मधुके वृष्णि आदि सौ पुत्र हुए॥ २५-२७॥ वृष्णिके कारण यह वंश वृष्णि कहलाया॥ २८॥ मधुके कारण इसकी मधु-संज्ञा हुई॥ २९॥ और यदुके नामानुसार इस वंशके लोग यादव कहलाये॥ ३०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥