भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 558 में से

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पृष्ठ 283

२७२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११


तस्मादेतामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्‍याधाय मानसम्।
निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैस्सह॥ २९

श्रीपराशर उवाच
पूरोस्सकाशादादाय जरां दत्त्वा च यौवनम्।
राज्येऽभिषिच्य पूरुं च प्रययौ तपसे वनम्॥ ३०
दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं च समादिशत्।
प्रतीच्यां च तथा द्रुह्युं दक्षिणायां ततो यदुम्॥ ३१
उदीच्यां च तथैवानुं कृत्वा मण्डलिनो नृपान्।
सर्वपृथ्वीपतिं पूरुं सोऽभिषिच्य वनं ययौ॥ ३२

अतः अब मैं इसे छोड़कर और अपने चित्तको भगवान्‌में ही स्थिरकर निर्द्वन्द्व और निर्मम होकर [वनमें] मृगोंके साथ विचरूँगा॥ २९॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर राजा ययातिने पूरुसे अपनी वृद्धावस्था लेकर उसका यौवन दे दिया और उसे राज्य-पदपर अभिषिक्त कर वनको चले गये॥ ३०॥ उन्होंने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसुको, पश्चिममें द्रुह्युको, दक्षिणमें यदुको और उत्तरमें अनुको माण्डलिकपदपर नियुक्त किया; तथा पूरुको सम्पूर्ण भूमण्डलके राज्यपर अभिषिक्तकर स्वयं वनको चले गये॥ ३१-३२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे दशमोऽध्यायः॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

यदुवंशका वर्णन और सहस्रार्जुनका चरित्र

श्रीपराशर उवाच
अतः परं ययातेः प्रथमपुत्रस्य यदोर्वंशमहं कथयामि॥ १॥ यत्राशेषलोकनिवासो मनुष्य-सिद्धगन्धर्वयक्षराक्षसगुह्यककिंपुरुषाप्सरउरग-विहगदैत्यदानवादित्यरुद्रवस्वश्विमरुद्देवर्षिभि-र्मुमुक्षुभिर्धर्मार्थकाममोक्षार्थिभिश्च तत्तत्फल-लाभाय सदाभिष्टुतोऽपरिच्छेद्यमाहात्म्यांशेन भगवाननादिनिधनो विष्णुरवततार॥ २॥ अत्र श्लोकः॥ ३॥

यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति॥ ४

सहस्रजित्क्रोष्टुनलनहुषसंज्ञाश्चत्वारो यदुपुत्रा बभूवुः॥ ५॥ सहस्रजित्पुत्रश्शतजित्॥ ६॥ तस्य हैहयहेहयवेणुहयास्त्रयः पुत्रा बभूवुः॥ ७॥ हैहयपुत्रो धर्मस्तस्यापि धर्मनेत्रस्ततः कुन्तिः कुन्तेः सहजित्॥ ८॥ तत्तनयो महिष्मान् योऽसौ माहिष्मतीं पुरीं निवासयामास॥ ९॥ तस्माद्भद्रश्रेण्यस्ततो दुर्ददस्तस्माद्धनको धनकस्य कृतवीर्यकृताग्नि

**श्रीपराशरजी बोले—**अब मैं ययातिके प्रथम पुत्र यदुके वंशका वर्णन करता हूँ, जिसमें कि मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, किंपुरुष, अप्सरा, सर्प, पक्षी, दैत्य, दानव, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, देवर्षि, मुमुक्षु तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके अभिलाषी पुरुषोंद्वारा सर्वदा स्तुति किये जानेवाले, अखिललोक-विश्राम आद्यन्तहीन भगवान् विष्णुने अपने अपरिमित महत्त्वशाली अंशसे अवतार लिया था। इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—॥ १-३॥

‘जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्मने अवतार लिया था, उस यदुवंशका श्रवण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है’॥ ४॥

यदुके सहस्रजित्, क्रोष्टु, नल और नहुष नामक चार पुत्र हुए। सहस्रजित्‌के शतजित् और शतजित्‌के हैहय, हेहय तथा वेणुहय नामक तीन पुत्र हुए॥ ५-७॥ हैहयका पुत्र धर्म, धर्मका धर्मनेत्र, धर्मनेत्रका कुन्ति, कुन्तिका सहजित् तथा सहजित्‌का पुत्र महिष्मान् हुआ, जिसने माहिष्मतीपुरीको बसाया॥ ८-९॥ महिष्मान्‌के भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यके दुर्दम, दुर्दमके धनक तथा धनकके


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