भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 558 में से

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पृष्ठ 282

अ० १० ] * चतुर्थ अंश * २७१


  एकं वर्षसहस्रमतृप्तोऽस्मि विषयेषु त्वद्वयसा विषयान्हं भोक्तुमिच्छामि ॥ १० ॥ नात्र भवता प्रत्याख्यानं कर्त्तव्यमित्युक्तस्स यदुर्नैच्छत्तां जरामादातुम् ॥ ११ ॥ तं च पिता शशाप त्वत्प्रसूतिर्न राज्यार्हा भविष्यतीति ॥ १२ ॥<br>  अनन्तरं च तुर्वसुं द्रुह्युमनुं च पृथिवीपतिर्जराग्रहणार्थं स्वयौवनप्रदानाय चाभ्यर्थयामास ॥ १३ ॥ तैरप्येकैकेन प्रत्याख्यातस्ताञ्छशाप ॥ १४ ॥ अथ शर्मिष्ठातनयमशेषकनीयांसं पूरुं तथैवाह ॥ १५ ॥ स चातिप्रवणमतिः सबहुमानं पितरं प्रणम्य महाप्रसादोऽयमस्माकमित्युदारमभिधाय जरां जग्राह ॥ १६ ॥ स्वकीयं च यौवनं स्वपित्रे ददौ ॥ १७ ॥<br>  सोऽपि पौरवं यौवनमासाद्य धर्माविरोधेन यथाकामं यथाकालोपपन्नं यथोत्साहं विषयांश्चचार ॥ १८ ॥ सम्यक् च प्रजापालनमकरोत् ॥ १९ ॥ विश्वाच्या देवयान्या च सहोपभोगं भुक्त्वा कामाना मन्तं प्राप्स्यामीत्यनुदिनं उन्मनस्को बभूव ॥ २० ॥ अनुदिनं चोपभोगतः कामानतिरम्यान्मेने ॥ २१ ॥ ततश्चैवमगायत ॥ २२ ॥<br>न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।<br>हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्द्धते ॥ २३<br>यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।<br>एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ॥ २४<br>यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् ।<br>समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वास्सुखमया दिशः ॥ २५<br>या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।<br>तां तृष्णां सन्त्यजेत्प्राज्ञस्सुखैनैवाभिपूर्यते ॥ २६<br>जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।<br>धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यतः ॥ २७<br>पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः ।<br>तथाप्यनुदिनं तृष्णा मम तेषूपजायते ॥ २८  मैं अभी विषय-भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ, इसलिये एक सहस्र वर्षतक मैं तुम्हारी युवावस्थासे उन्हें भोगना चाहता हूँ॥ १०॥ इस विषयमें तुम्हें किसी प्रकारकी आनाकानी नहीं करनी चाहिये।' किन्तु पिताके ऐसा कहनेपर भी यदुने वृद्धावस्थाको ग्रहण करना न चाहा॥ ११॥ तब पिताने उसे शाप दिया कि तेरी सन्तान राज्य-पदके योग्य न होगी॥ १२॥<br>  फिर राजा ययातिने तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुसे भी अपना यौवन देकर वृद्धावस्था ग्रहण करनेके लिये कहा; तथा उनमेंसे प्रत्येकके अस्वीकार करनेपर उन्होंने उन सभीको शाप दे दिया॥ १३-१४॥ अन्तमें सबसे छोटे शर्मिष्ठाके पुत्र पूरुसे भी वही बात कही तो उसने अति नम्रता और आदरके साथ पिताको प्रणाम करके उदारतापूर्वक कहा—'यह तो हमारे ऊपर आपका महान् अनुग्रह है।' ऐसा कहकर पूरुने अपने पिताकी वृद्धावस्था ग्रहण कर उन्हें अपना यौवन दे दिया॥ १५—१७॥<br>  राजा ययातिने पूरुका यौवन लेकर समयानुसार प्राप्त हुए यथेच्छ विषयोंको अपने उत्साहके अनुसार धर्मपूर्वक भोगा और अपनी प्रजाका भली प्रकार पालन किया॥ १८-१९॥ फिर विश्वाची और देवयानीके साथ विविध भोगोंको भोगते हुए 'मैं कामनाओंका अन्त कर दूँगा'—ऐसे सोचते-सोचते वे प्रतिदिन [भोगोंके लिये] उत्कण्ठित रहने लगे॥ २०॥ और निरन्तर भोगते रहनेसे उन कामनाओंको अत्यन्त प्रिय मानने लगे; तदुपरान्त उन्होंने इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट किया॥ २१-२२॥<br>  'भोगोंकी तृष्णा उनके भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती, बल्कि घृताहुतिसे अग्निके समान वह बढ़ती ही जाती है॥ २३॥ सम्पूर्ण पृथिवीमें जितने भी धान्य, यव, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं वे सब एक मनुष्यके लिये भी सन्तोषजनक नहीं हैं, इसलिये तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये॥ २४॥ जिस समय कोई पुरुष किसी भी प्राणीके लिये पापमयी भावना नहीं करता, उस समय उस समदर्शीके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी हो जाती हैं॥ २५॥ दुर्मतियोंके लिये जो अत्यन्त दुस्त्यज है तथा वृद्धावस्थामें भी जो शिथिल नहीं होती, बुद्धिमान् पुरुष उस तृष्णाको त्यागकर सुखसे परिपूर्ण हो जाता है॥ २६॥ अवस्थाके जीर्ण होनेपर केश और दाँत तो जीर्ण हो जाते हैं किन्तु जीवन और धनकी आशाएँ उसके जीर्ण होनेपर भी नहीं जीर्ण होतीं ॥ २७ ॥ विषयोंमें आसक्त रहते हुए मुझे एक सहस्र वर्ष बीत गये, फिर भी नित्य ही उनमें मेरी कामना होती है ॥ २८ ॥

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