भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

२७० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०


ते चापि तेन बुद्धिमोहेनाभिभूयमाना ब्रह्मद्विषो धर्मत्यागिनो वेदवादपराङ्मुखा बभूवुः ॥ २० ॥ ततस्तानपेतधर्माचारानिन्द्रो जघान ॥ २१ ॥ पुरोहिताप्यायिततेजाश्च शक्रो दिवमाक्रमत् ॥ २२ ॥

एतदिन्द्रस्य स्वपदच्यवनादारोहणं श्रुत्वा पुरुषः स्वपदभ्रंशं दौरात्म्यं च नाप्नोति ॥ २३ ॥

रम्भस्त्वनपत्योऽभवत् ॥ २४ ॥ क्षत्रवृद्धसुतः प्रतिक्षत्रोऽभवत् ॥ २५ ॥ तत्पुत्रः सञ्जयस्तस्यापि जयस्तस्यापि विजयस्तस्माच्च जज्ञे कृतः ॥ २६ ॥ तस्य च हर्यधनो हर्यधनसुतस्सहदेवस्तस्माददीनस्तस्य जयसेनस्ततश्च संस्कृतिस्तत्पुत्रः क्षत्रधर्मा इत्येते क्षत्रवृद्धस्य वंश्याः ॥ २७ ॥ ततो नहुषवंशं प्रवक्ष्यामि ॥ २८ ॥

बुद्धिको मोहित करनेवाले उस अभिचार-कर्मसे अभिभूत हो जानेके कारण रजि-पुत्र ब्राह्मण-विरोधी, धर्म-त्यागी और वेद-विमुख हो गये ॥ २० ॥ तब धर्माचारहीन हो जानेसे इन्द्रने उन्हें मार डाला ॥ २१ ॥ और पुरोहितजीके द्वारा तेजोवृद्ध होकर स्वर्गपर अपना अधिकार जमा लिया ॥ २२ ॥

इस प्रकार इन्द्रके अपने पदसे गिरकर उसपर फिर आरूढ़ होनेके इस प्रसंगको सुननेसे पुरुष अपने पदसे पतित नहीं होता और उसमें कभी दुष्टता नहीं आती ॥ २३ ॥

[आयुका दूसरा पुत्र] रम्भ सन्तानहीन हुआ ॥ २४ ॥ क्षत्रवृद्धका पुत्र प्रतिक्षत्र हुआ, प्रतिक्षत्रका संजय, संजयका जय, जयका विजय, विजयका कृत, कृतका हर्यधन, हर्यधनका सहदेव, सहदेवका अदीन, अदीनका जयसेन, जयसेनका संस्कृति और संस्कृतिका पुत्र क्षत्रधर्मा हुआ। ये सब क्षत्रवृद्धके वंशज हुए ॥ २५—२७ ॥ अब मैं नहुषवंशका वर्णन करूँगा ॥ २८ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥


दसवाँ अध्याय

ययातिका चरित्र

श्रीपराशर उवाच
यतिययातिसंयात्यायातिवियातिकृतिसंज्ञा नहुषस्य षट् पुत्रा महाबलपराक्रमा बभूवुः ॥ १ ॥ यतिस्तु राज्यं नैच्छत् ॥ २ ॥ ययातिस्तु भूपद्भवत् ॥ ३ ॥ उशनसश्च दुहितरं देवयानीं वार्षपर्वणीं च शर्मिष्ठामुपयेमे ॥ ४ ॥ अत्रानुवंशश्लोको भवति ॥ ५ ॥
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ६
काव्यशापाच्चाकालेनैव ययातिर्जरामवाप ॥ ७ ॥ प्रसन्नशुक्रवचनाच्च स्वजरां सङ्क्रामयितुं ज्येष्ठं पुत्रं यदुमुवाच ॥ ८ ॥ वत्स त्वन्मातामहशापादियमकालेनैव जरा ममोपस्थिता तामहं तस्यैवानुग्रहाद्भवतस्सञ्चारयामि ॥ ९ ॥

श्रीपराशरजी बोले— नहुषके यति, ययाति, संयाति, आयाति, वियाति और कृति नामक छः महाबल-विक्रमशाली पुत्र हुए ॥ १ ॥ यतिने राज्यकी इच्छा नहीं की, इसलिये ययाति ही राजा हुआ ॥ २-३ ॥ ययातिने शुक्राचार्यजीकी पुत्री देवयानी और वृषपर्वाकी कन्या शर्मिष्ठासे विवाह किया था ॥ ४ ॥ उनके वंशके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ ५ ॥
'देवयानीने यदु और तुर्वसुको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरुको उत्पन्न किया' ॥ ६ ॥
ययातिको शुक्राचार्यजीके शापसे असमय ही वृद्धावस्थाने घेर लिया था ॥ ७ ॥ पीछे शुक्रजीके प्रसन्न होकर कहनेपर उन्होंने अपनी वृद्धावस्थाको ग्रहण करनेके लिये बड़े पुत्र यदुसे कहा— ॥ ८ ॥ 'वत्स ! तुम्हारे नानाजीके शापसे मुझे असमयमें ही वृद्धावस्थाने घेर लिया है, अब उन्हींकी कृपासे मैं उसे तुमको देना चाहता हूँ ॥ ९ ॥